कौन सा पानी पीने लायक है? डॉक्टर बन्सोडे



डॉ के बी बन्सोडे जी को पिछले दिनो वाटएप के माध्‍यम से मैने उन्‍हे पानी के संबंध में यह वीडियो भेजा था और उनसे निवेदन किया था की वे कृपया इसकी सत्‍यता से परिचित कराये। उन्‍होने इस पर विस्‍तार से जानकारी दी जिसे में यहां हू ब हू पेश कर रहा हूँ यह एक बेहतरीन जानकारी है। बताना चाहूंगा की डॉं बन्‍सोडे वरिष्‍ठ चिकित्‍सक है एवं अंधविश्‍वास विरोधी गतिविधियों में काफी दखल रखते है। - संजीव खुदशाह

प्रिय मित्र संजीव खुदशाह  ,
आपने यह जो वीडियो पोस्ट किया है , वह पिछले कई दिनों से लगभग सभी ग्रुप में चला है ।
यह कहा गया कि आर ओ (RO) पानी पिने वाले सावधान हो जाये ......
इत्यादि ।

इसके पहले भी इसी तरह की एक पोस्ट RO के पानी को लेकर आयी थी , जिसके बारे में मैंने लिखकर शरद जी को पोस्ट किया था ।
  किसी भी वस्तु को या लेख को संभाल कर रखने की आदत नहीं होने के कारण इसे फिर से लिख रहा हूँ ।
·       डॉ के बी बन्सोडे

इस वीडियो की अंतिम बात से तो मैं खुद भी सहमत हूँ कि हमें बोतलबंद पानी लेकर चलने या आर ओ के ही पानी को पीने की आदत से बाज आना चाहिये ।

मेरा स्वयं का भी यही विचार है कि किसी भी कुयें , या झील या निरन्तर बहने वाली नदी का पानी आसानी से पीने लायक होता है । थोड़ी सी सावधानी बहुँत है कि उस पानी को रुमाल या किसी कपड़े से छानकर ही पियें । इससे ज्यादा सावधानी की जरूरत है , तो पानी को उबालकर और साथ ही साधारण कपडे से छानकर पानी को पूर्णतः पिने लायक बनाया जा सकता है ।

अब आगे जो महाशय कोलकाता में किसी कोन्फेरेंस का और डब्लू एच् ओ का हवाला दे रहे थे , उसकी जानकारी अपर्याप्त है , इसलिये उस बात पर मुझे उसकी सत्यता पर संदेह है ।
(अवश्य मैं इस मामले में गलत भी हो सकता हूँ ।)
इस वीडियो की अंतिम बात से मेरी पूर्ण सहमति है , कि बोतल के पानी या आर ओ का ही केवल पानी नहीं पीना चाहिये । बल्कि सभी जगह का पानी पिने योग्य होता है ।
कोलकाता के किसी सम्मेलन की या डब्लू एच् ओ की गाईड लाईन की भी बात से मेरी असहमति है ।
मेरी जानकारी में WHO ने पीने के पानी की कोई भी गाईडलाईन जारी नहीं किया है । विशेष तौर पर RO या बोतलबन्द पानी पिने के इस्तेमाल पर कोई भी गाईडलाईन नहीं है ।
जैसा कि मैंने ऊपर लिखा था कि कोई भी पानी चाहे वह किसी भी कुएँ का हो , झील का हो या नदी का बहता पानी  ,आमतौर पर वह पिने योग्य ही होता है । हम चाहें तो खेत या किसी डबरे का रुका हुवा पानी भी पी सकते हैं । लेकिन यदि इसे किसी कपड़े से छानकर पिया जाये तो ज्यादा सही है ।
पानी में जब अनेक प्रकार की गंदगी मिली होती है , तो वह हमें मटमैला दिखाई देता है । जैसे कि मिट्टी या कीचड़ , फंगस या काई इत्यादि । जिसे हमें पिने से बचना ही चाहिये । लेकिन यदि हम किसी विशेष परिस्थिति में फंसे हुवे हैं , तो इसी पानी को अच्छी तरह कपडे से छानकर पिया जा सकता है ।
इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि जो पानी हमारी नजरों में साफ और स्वच्छ दिखाई दे रहा है , वह पूर्णतः हानि रहित है । इसलिये पानी की अशुद्धियों के बारे में भी हमें जान लेना चाहिये ।

पानी में आमतौर पर तीन प्रकार की अशुद्धि होती है ।
(1) Microbial या जीवाणुयुक्त पानी :- यदि पानी में अनेक प्रकार के जीवाणु और कीटाणु , परजीवी जीव , एल्गी तथा फंगस होंगे तथा इसे हम पीते हैं , तो बीमार होने की संभावना होती है ।
 जैसे कि साफ दिखाई देने वाले पानी में भी अनेक प्रकार के कीटाणु जैसे कि अमीबा ,जियारडीआ, रोटावायरस के कारण अनेक बीमारियाँ जैसे डायरिया , कोलेरा , टाइफाईड हो सकते हैं ।विषाणुओं के कारण  पीलिया या वाईरल  हिपेटाइटिस हो सकता है । कई प्रकार के परजीवी जैसे कि राऊँड वर्म या हुकवर्म इत्यादि भी होते हैं । जिसके कारण हम बीमार हो जाते हैं तथा इससे मृत्यु भी हो सकती है । एल्गी तथा फंगस भी हमें बीमार बनाते है ।
(2) रासायनिक अशुद्धियाँ :- जियोलॉजिकल या भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग जगह के पानी में अनेक प्रकार की रासायनिक अशुद्धियाँ होती है , जो शरीर के लिये नुकसानदेय होती हैं । इसमें प्रमुख रूप से आर्सेनिक , फ्लोराईड , क्लोरीन , सल्फर या मर्करी भी हो सकता है ।
लेकिन कभी कहीं कहीं किसी तत्व या खनिज की अधिकता या कमी भी  होती है ।
सामान्यतः पानी में घुलनशील तत्व या जिसे हम Minerals कहते हैं , वे हैं :-  केल्सियम , मैग्नेशियम , सोडियम , पोटेशियम  , हैड्रोकार्बोनेट , नाइट्रेट , सुल्फाइट इत्यादि ।
जो कि आमतौर पर हमारे शरीर के लिये फायदेमंद ही है ।
(3) आणविक अशुद्धियाँ :- इसमें पानी में घुलनशील आणविक तत्व जैसे कैडमियम , तथा यूरेनियम और  थोरियम इत्यादि । यह हमारे शरीर के लिये अत्यंत हानिकारक होते है ।

हम यह भी जानते हैं कि पानी का मूलतत्व एच् टू ओ है , (H 2 O ) है । सामान्यतः इसका pH 7 होता है । यदि यह पी एच् कम या ज्यादा होगा तो पानी अम्लीय (acidic )या क्षारीय ( alkaline)  कहलाता है । अधिक छार या अम्ल हमारे शरीर के लिये नुकसानदेय भी होता है । लेकिन आम तौर पर पानी का ph 6.5 से लेकर 8.5 तक भी हो तो पीने में अधिक समस्या नहीं है ।
यदि पानी का ph 7 से नीचे  है तो उसे अम्लीय और ph 7 से अधिक हो तो क्षारीय कहलाता है ।
पानी में घुलनशील तत्वों को साफ करके पीने युक्त बनाने की प्राचीन पद्धति केवल साफ कपड़े से पानी को छानकर पीना ही पर्याप्त समझा जाता था । धीरे धीरे शहरीकरण और आधुनिक विज्ञान की समझ विकसित हुई । जिसके कारण पानी की शुद्धिकरण के प्लांट लगाने की प्रक्रिया हुई ।
इस प्रक्रिया में नदी के पानी को पूरे वर्ष भर तक निरन्तर आपूर्ति किये जाने के योग्य बनाने के लिये नदियों पर छोटे छोटे बांध बनाकर पानी का संग्रहण किया जाता है ।
फिर आवश्यकतानुसार उसे सीमेंट के बनाये बड़े बड़े टंकियों में इकठ्ठा किया जाता है ।
जिसे जल संशोधित संयंत्र के नाम से आप जानते हैं  , तथा इसे नदियों के किनारे ही अधिकतर निर्मित किया जाता है ।
इसमें पानी को कई बार बड़े बड़े टंकियों से गुजारकर उसे नीथारा जाता है । ठोस अशुद्धियों को अलग करके उसमे फिटकरी डाल कर साफ किया जाता है । इसके बाद उसे रेत के कन्टेनर से होकर चारकोल के कन्टेनर से पानी को गुजारा जाता है ।
इस तरह पानी को फिल्टर प्लांट से शहरों के बीच बनाई गई पानी की बड़ी बड़ी टंकियों में भेज दिया जाता है । फिर उसे पाइपलाईन के द्वारा घरों तक पहुँचाया जाता है ।
 शहरों में हमारे घरों के नल तक जो पानी नगरनिगम द्वारा सप्लाई किया जाता है , वह पीनेयुक्त होता है । यह पानी किसी वजह से प्रदूषित भी हो सकता है ।
जैसे कि शहरों में जो  पाइपलाईन बिछाई होती है , वह कई जगहों से टूटी फूटी होती है । जिसके कारण गन्दा पानी घरों में आ जाता है । पानी के प्रदूषण का दूसरा बड़ा कारण पानी की बड़ी बड़ी टंकियों का निरन्तर रखरखाव और साफसफाई का ना होना ।  तीसरा बड़ा कारण पाइपलाईन में सीवरेज के गंदे पानी का मिल जाना ।
इसके बचाव के लिये कई बार लोग अपने घरों में बोर भी करवाते हैं , जिसमे ज़मीन के नीचे का पानी उन्हें मिलता है ।

*"टीडीएस"*
अब ये टीडीएस क्या है ?
पानी में घुले हुवे तत्व ही टीडीएस कहलाते हैं । मोटा मोटी पानी का टीडीएस 60 मिलीग्राम प्रतिलीटर से लेकर 6000 मिलीग्राम/लीटर हो सकता है ।
हम यह कह सकते हैं कि 60 mg/L से लेकर 1200mg/L टीडीएस का पानी भी पिया जा सकता है । जो हानिकारक नहीं होता है ।

*"इसी बात को ध्यान देकर  पूंजीवाद ने RO Water का व्यापार शुरू किया है । "*

RO के पहले सिरेमिक पोर्सेलिन के बने हुवे कैंडल्स भी मिलते थे , जो कि पानी की अशुद्धियों को कम करते थे ।

RO यानि रिवर्स ओसमोसिस ।
 इसमें में भी जो कैंडल्स होते हैं , उनमे भी मेम्ब्रेन पोरस फिल्टर तथा चारकोल फिल्टर ही  होता है । साईज के अनुसार कैंडल्स की संख्या कम या ज्यादा होती है ।
इससे पानी की अशुद्धि और भी कम हो जाती है ।
इसलिये इसका इस्तेमाल लोग करते हैं ।
*" इसका वैसे कोई नुकसान नहीं है ।"*
जैसाकि कई बार कई पोस्ट आती है कि विटामिन बी12 की कमी हो जाती है या शरीर की हड्डियों से केल्सियम कम हो जाता है ...... इत्यादि भ्रामक ही है ।

*अब हम बात करते हैं वीडियो में बताई पानी की जानकारी जो निम्न है :-*

(1) WHO ने RO के पानी नहीं पीने का दिशा निर्देश दिया है ।
इसकी सत्यता नहीं है ।
(2) पानी के टीडीएस की जानकारी जो दी है वह कुछ हद तक सही है ।
 (3) यह भी कहा कि प्लास्टिक की बोतल में बंद पानी में प्लास्टिक घुलता है ।
*यह गलत जानकारी है ।* *प्लास्टिक जो सिंथेटिक पोलीमेर्स होते हैं वे पानी में घुलनशील नहीं होते हैं ,वे एसीटोन में ही घुलनशील होते हैं ।* *इसलिये हमारे पर्यावरण मित्र और सरकार प्लास्टिक की पन्नियों के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगाती है ।*
 (4) पानी के टीडीएस के कम या ज्यादा होने  में हैपोटोनिक और हैपेरटोनिक सोलुशन की बात की है , वह पूर्णतः गलत है ।
 (5) पानी में टीडीएस की गड़बड़ी से homeostasis की गड़बड़ी शरीर में होने की बात का कोई ठोस आधार या शोध या अध्ययन नहीं है ।
 (6) घड़े में ही पिने का पानी रखने से तथा उसे धुप और हवादार स्थान में रखने से पानी का ऑक्सीजिनेशन और सेनिटाइजेशन होता है , यह कथन बिलकुल अवैज्ञानिक है ।
घड़े के छिद्रयुक्त होने से केवल वह पानी को ठंडा ही करता है ।
(7) पानी की कितनी मात्रा किसी भी व्यक्ति को प्रतिदिन पीना चाहिये , इसके बारे में एलोपैथिक चिकित्सकों की सलाह निम्नलिखित है :- एक स्वस्थ वयस्क को प्रतिदिन 3 लीटर पानी पीना चाहिये । किसी मरीज को जो कि किडनी की बीमारी तथा विभिन्न जटिलताओं से ग्रसित हो उसे उसकी जरूरत के अनुसार कितनी मात्रा में पानी पीना है यह सलाह दी जाती है ।
वीडियो में जो कहा है उसमें अतिश्योक्ति है कि पानी कम पीने से शरीर पानी को रिटेन करता है , तथा बीमार बनाता है ।
जरूरत से कम पानी पिने से अनेक समस्या होती ही है ।
 (8) खाना खाने या भोजन के साथ या उस दौरान पानी नहीं पीना चाहिये यह कहना भी गलत है । अत्यधिक मसालेयुक्त भोजन के दौरान पानी आवश्यक ही है । इसके आलावा अधिक पानी पिने से  शरीर को अनेक तरह से निरोगी रखा जा सकता है । भोजन के साथ पानी नहीं पीना या भोजन के एक घंटे बाद पानी पीना स्वास्थ्य के लिये लाभदायक होता है , यह मूलतः आयुर्वेदिक अवधारणा है , जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है ।

अंतिम बात जो वीडियो में कही है , उससे सहमत हूँ कि साझा हवा हम लेते हैं, तो साझा पानी पीना भी गलत नहीं है । घाट घाट का पानी कोई भी आसानी से पी सकता है ।
बशर्ते वायु तथा पानी (जल) प्रदूषित ना हो ।



विवेकानंद के शिकागो भाषण का पुनर्पाठ

झूठ का पुलिंदा है स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण

  •  कवंल भारती

स्वामी विवेकानंद को उनके जिस शिकागो भाषण के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है, उसका पुनर्पाठ होना चाहिए। मैंने 1977 में उस भाषण को पढ़ा था, जिसे श्रीरामकृष्ण आश्रम, नागपुर ने "शिकागो वक्तृता " शीर्षक से छापा था। आज मैंने उस भाषण को फिर से पढ़ा। सच कहूँ, मुझे वह झूट का पुलिंदा नजर आया। उसमे इतिहास की पूरी उपेक्षा की गयी है। इस भाषण के बारे में आज के नौजवानों में यह भ्रम है कि स्वामी जी ने शिकागो की धर्म संसद में "जीरो" पर व्याख्यान दिया था,  जबकि ऐसा कुछ नहीं था। उन्होंने वहां हिंदूधर्म का ही गुणगान किया था। उन्होंने जो कहा, उसे मै सार रूप में यहाँ दे रहा हूँ--

 

   1- उन्होंने कहा, 'मुझे ऐसे धर्मावलम्बी होने का गौरव है, जिसने संसार को 'सहिष्णुता' की शिक्षा दी है।' वे  इतिहास की इस सच्चाई को नकार गये कि इन्हीं धर्मावलम्बियों ने जैन और बौद्ध धर्मावलम्बियों की गर्दनें काटी थीं।

   2- उन्होंने कहा, 'मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी की समस्त पीड़ित और शरणागत जातियों तथा भिन्न धर्मों के बहिष्कृत मतावलम्बियों को आश्रय दिया है।'  उन्होंने यहाँ इतिहास के इस सच को छिपाया कि जिस देश पर उन्हें अभिमान है, उसी देश में करोड़ों लोगों को दास, अछूत और बहिष्कृत बना कर रखा गया  है, जिन्हें मानवीय अधिकार तक प्राप्त नहीं थे।

   3- उन्होंने कहा,  वेद अपौरुषेय हैं। वे अनादि और अनन्त हैं। किन्तु सत्य यह है कि वेद पौरुषेय हैं और उनके अलग अलग रचयिता हैं।

   4- उन्होंने जन्मान्तर वाद का समर्थन करते हुए कहा, 'कुछ लोग जन्म से ही सुखी होते हैं और कुछ लोग जन्म से ही दुखी होते हैं, किसी के हाथ या पाँव नहीं होते, तो कोई  मूर्ख होते हैं। ऐसा क्यों? क्या भगवान पक्षपाती है?' यह सवाल करने के बाद वे उत्तर देते हैं, 'यह स्वीकार करना ही होगा कि इस जन्म के पूर्व ऐसे कारण होने ही चाहिए, जिनके फलस्वरूप मनुष्य इस जन्म में सुखी या दुखी हुआ करता है। और ये कारण हैं उनके ही  पूर्वानुष्ठित कर्म।'

   5- उन्होंने मूर्ति पूजा का समर्थन किया और कहा कि मूर्ति के बिना चिन्तन असम्भव है।

   6-उन्होंने कोलम्बिया अर्थात अमेरिका की प्रशंसा में कहा, 'ऐ स्वाधीनता की जन्मभूमि कोलम्बिया, तू धनी है। तू ही सभ्य जातियों में अग्रणी होकर शांति-पताका फहराने की अधिकारिणी है।
कवंल भारती

सामाजिक बहिष्‍कार मृत्यु से भी बड़ी सजा ....... संजीव खुदशाह



जाति उन्मूलन आंदोलन द्वारा छत्तीसगढ़ सामाजिक बहिष्‍कार (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम कितना प्रासंगिक विषय पर संगोष्‍ठी  संपन्न


रायपुर, 4 सितंबर 2017। जाति उन्मूलन आंदोलन छत्तीसगढ़ द्वारा छत्तीसगढ़ सामाजिक बहिष्‍कार (रोकथाम, निशेध और निवारण) अधिनियम कितना प्रासंगिक विशय पर संगोश्ठी का आयोजन वाई एम सी ए प्रोग्राम सेटर रायपुर में किया गया। कार्यक्रम में प्रमुख वक्ता के तौर पर जाति उन्मूलन आंदोलन के अखिल भारतीय कार्यकारी संयोजक संजीव खुदशाह, अंधश्रद्धा निमूर्लन समिति छत्तीयगढ़ के अध्यक्ष व ख्यातिप्राप्त नेत्र चिकित्सक डा. दिनेश मिश्र, क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के राश्ट्रीय संयोजक व विकल्प अवाम का घोशणापत्र के संपादक तुहिन व एडवोकेट जन्मेजय सोना उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पीयूसीएल के नंद कश्यप ने की। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में व्याप्त जाति प्रथा के खिलाफ जनमत तैयार करना व सामाजिक प्रताड़ना व बहिष्‍कार की रोकथाम के लिए सक्षम कानून बनाने की दिशा में सरकार पर दबाव बनाने की पहल करना था। इस अवसर पर बंगाल के तेभागा आंदोलन (1946-50) के  महान क्रांतिकारी का. प्रकाश राय जिनका असली नाम अशोक बोस था को स्मरण करते हुए उनकी याद में दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजली दी गई। संगोश्ठी में जाति बहिष्‍कार से पीड़ित दीपा (बेलटुकरी राजिम), निहाल सिंह, तेजशंकर सिन्हा व रमन सिंह बघेल ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम में सामाजिक बहिष्‍कार के खिलाफ शीघ्र कानून बनाने हेतु प्रस्ताव रखा गया जिसे उपस्थितजनों ने सर्वसम्मति से पास किया। इस अवसर पर राज्य के विभिन्न, जनसंगठनों, प्रबुद्धजन, पत्रकारगण, छात्र/छात्राएं, महिला अधिकार व महिला समानता की दिशा में सक्रिय आमजन उपस्थित थे। कार्यक्रम में प्रख्यात जनगायिका बिपाशा राव व रवि बौद्ध ने जनगीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन रतन गोंडाने व आभार रेखा गोंडाने ने किया।
इस अवसर पर तुहिन ने का. प्रकाश राय (अशोक बोस) को स्मरण करते हुए कहा कि वे चालीस के दशक के बंगाल के जमींदार परिवार से होते हुए भी समाज के हित में परिवार से विद्रोह कर ब्रिटिश साम्राज्यवाद व सामंतवाद के खिलाफ किसान, दलित व मेहनतकश जनता को समानता व बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व निछावर कर दिया। वे 1952 में बंगाल से आकर राजनांदगांव में बस गए। और 3 सितंबर 1983 में उनकी मृत्यु तक राजनांदगांव, भिलाई और दिल्ली राजहरा के मेहनतकशों के आंदोलन से जुड़े रहे। लेकिन इन महान क्रांतिकारियों के कई दशकों के कठोर संघर्शो से उत्पीड़ित तबकों ने जिन जनवादी, आर्थिक व सामाजिक अधिकारों को हासिल किया था वर्तमान में उसे निश्ठुरता से छीना जा रहा है।
संजीव खुदशाह ने कहा कि प्रदेश में लगातार सामाजिक बहिष्‍कार की घटनाएं हो रही है जिससे सरकार पर जाति उन्मूलन आंदोलन सहित तमाम प्रगतिशील संगठनों द्वारा दबाव बनाया जा रहा है कि महाराश्ट्र की तरह छत्तीसगढ़ में भी सामाजिक बहिष्‍कार पर कानून बनाया जाए। जिससे तमाम जातियों मे चल रहे जाति पंचायतों के तुगलकी फैसलों एवं न्यायपालिका के अधिकार का हनन करने की प्रक्रिया पर अंकुश लगे। उन्होंने कहा कि डा. बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने कहा है कि सामाजिक बहिष्‍कार मृत्यु से भी बड़ी सजा है। सामाजिक बहिष्‍कार के प्रकरण में अधिकांश गरीब, दलित, महिलाएं व हाशिए पर रहने वाले ही पीड़ित होते हैं जो कि कुछ कर नहीं पाते। यह संविधान के अनुच्छेद 21 का खुला उल्लंघन है जिसमें सभी को स्वतंत्रता का अधिकार मिला हुआ है। कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी की स्वतंत्रता को बाधित नही कर सकता साथ ही यह मानवाधिकार का भी हनन है। ग्राम पंचायत व जातीय पंचायत समाज बहिष्‍कार करती हैं लेकिन ग्राम पंचायत शासकीय प्रणाली होने के बाद भी ऐसा करती हैं। सामाजिक बहिष्‍कार के नाम पर उत्पीड़ित करने वाले ज्यादातर जातीय संगठन व उनके मुखिया अपना प्रभुत्व बनाये रखने के लिए इस अमानवीय प्रथा को बनाये रखने के पक्ष में सक्रीय हैं। जाति उन्मूलन आंदोलन ऐसे संगठनों के प्रति लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है जिससे इसके रोकथाम हेतु कानून बनाने का मार्ग प्रशस्त हो। 
डा. दिनेश मिश्र ने कहा कि वैज्ञानिक युग और लोकतंत्र में इस तरह की घटनाएं शर्मसार करती है। ऐसी जाति व समाज किस काम का जो अपने लोगों को ही अपनों से दूर कर दे। हमारे प्रदेश में अलग-अलग कारणों से 203 परिवारों का सामाजिक बहिष्‍कार कर दिया गया है। बहिष्‍कार के मामलों पर उन्होंने बताया कि किसी ने अपने समाज को सरकार द्वारा दी गई सहायता के संबंध में जानकारी मांगी तो परिवार बहिश्कृत, किसी ने मुंडन नही कराया, अन्र्तजातीय विवाह आदि पर बहिष्‍कार की घटनाएं सामने आ रही है। क्या हमारे देश में सभी समाज के लिए अलग-अलग कानून बनांऐगे। यह कुछ नहीं केवल भय का माहौल बनाने के लिए व अपनी प्रभुता स्थापित करने हेतु दबंगों द्वारा किया जा रहा है। इसलिए हम सबकी जिम्मेदारी है कि समाज के अलिखित नियम जो कि वास्तव में शोशण के लिए बने हैं का बहिष्‍कार किया जाना चाहिए।
एडवोकेट जन्मेजय सोना ने कहा कि कानून की दृश्टि में सभी बराबर है। सभी को गरिमामय जीवन जीने का अधिकार है। ये कानून बनना अतिआवश्यक है साथ ही इसका क्रियान्वयन भी जमीनी स्तर पर होना चाहिए और लोगो को इस कानून के बारे में जागरूक करने की जिम्मेदारी भी हमारी होनी चाहिए।
अध्यक्षीय उद्बोधन में नंद कश्यप ने कहा कि 21 वीं सदी का प्रबुद्ध समाज इस तरह की घटनाओं को चुपचाप देख रहा है और गलत का विरोध नहीं कर रहा है। हमें समाज में घट रही ऐसी घटनाओं का पुरजोर विरोध करना होगा। सामाजिक बहिष्‍कार से पीड़ित व्यक्तियों के साथ खड़ा होना होगा तभी इस सामाजिक बुराई से निजात मिलेगी। साथ ही कानून बनने से निश्चित ही इस तरह की घटनाओं पर विराम लगेगा। पिछले तीन वर्शों से राश्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित सरकार आने के बाद इस तरह की घटनाओं में असाधारण वृद्धि देखी जा रही है। लोगों के खान-पान, रहन-सहन, पहनावे आदि पर रोक लगाने एवं भारत के इतिहास व संस्कृति के विकृतिकरण का कुत्सिक प्रयास लगातार जारी है। यही कारण है कि इन लोगों द्वारा समाज को बांटना और समाज में व्याप्त जाति प्रथा को मजबूती से बनाये रखने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है। जिसके परिणामस्वरूप ही सामाजिक बहिष्‍कार जैसी अमानवीय घटनाएं हो रही है। हमें इस तरह की घटनाओं के प्रति लोगों को जागरूक करने की जरूरत है और कानून बनाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने हेतु सभी को एकजुट होना होगा।




‘नेशनल दस्तक’ की खबर का असर, गूगल ने दलित मूवमेंट एसोसिएशन के ग्रुप से हटायी पाबंदी

osted on July 22, 2017
 
 
 
 
 
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नई दिल्ली। तकरीबन दो सप्ताह पहले गूगल ने दलित मूवमेंट एसोसिएशन के ग्रुप को बैन कर दिया था। नेशनल दस्तक की खबर के बाद अब इस बैन को हटा दिया गया है। ग्रुप के संचालक संजीव खुदशाह ने आभार जताते हुए एक पत्र लिखा है जिसमें उन्होने नेशनल दस्तक और गूगल की पूरी टीम, सामाजिक कार्यकर्ताओं और लेखकों का आभार जताया है।
मुख्य बातें-
  1. नेशनल दस्तक की खबर के बाद गूगल ने दलित एसोसिएशन ग्रुप से हटाया बैन
  2. संजीव खुदवाह ने लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों का जताया आभार
  3.  दो सप्ताह पूर्व बिना कारण ही बैन कर दिया गया था ग्रुप
बता दें कि 12 जुलाई 2017 को नेशनल दस्तक ने ‘दलित मूवमेंट एसोसिएशन का गूगल ग्रुप बैन’ शीर्षक के साथ खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। जिसमें हमने बताया था कि गूगल की ओर से ग्रुप को बैन करते हुए तर्क दिया गया कि इसमें दुर्भावना पूर्ण सामग्री थी। हालांकि इसमें किस सदस्य और किस कंटेंट से गूगल को आपत्ति थी इसका जिक्र नहीं किया गया था।
बता दें कि गूगल ग्रुप डी एम ए विगत 10 सालों से सक्रिय है। जिसमें 7500 से ज्यादा सदस्य जुड़े हुए हैं। जिनमें तमाम नामी गिरामी हस्तियों के साथ-साथ, देश विदेश के प्रगतिशील मानवाधिकार मुद्दों से जुड़े हुए व्यक्ति भी शामिल हैं।
यह एक बेहद सक्रिय ग्रुप है जिसमें देश विदेश के तमाम मुद्दों पर सार्थक बहस होती है। अब तक तक़रीबन पांच हजार मुद्दों पर बहस हो चुकी थी। यह बहस गोपनीय न होकर सभी के लिए ओपन रहती है।

इस ग्रुप में कई मीडिया के लोग भी जुड़े हुए हैं और वे इस ग्रुप में प्रसारित मुद्दों को प्रकाशित भी करते रहे हैं। कई लेख इसी ग्रुप से मीडिया तक पंहुचे हैं।

दलित मूवमेंट एसोसिएशन का गूगल ग्रुप बैन - नेशनल दस्तक

नई दिल्ली। आजकल जिस प्रकार से सोशल मीडिया का गला घोटने का सिलसिला चल पड़ा है उसमें फेसबुक ट्विटर ब्लॉग के साथ-साथ गूगल ग्रुप को भी निशाना बनाया जा रहा है। हाल ही में दलित मूमेंट एसोसिएशन गूगल ग्रुप को बंद कर दिया गया। तर्क यह दिया गया कि इसमें दुर्भावना पूर्ण सामग्री थी। किस मेल से या किस सदस्य से आपत्ति है इसका जिक्र नहीं किया गया है।

खास बातें-
  1. 10 साल से एक्टिव था गूगल ग्रुप
  2. लोग करते थे सामाजिक मुद्दों पर डिस्कशन
  3. ग्रुप का ब्लॉग अभी सक्रिय है
  4. सभी के लिए ओपन थी यह बहस

गूगल ग्रुप डी एम ए विगत 10 सालों से सक्रिय था। इस ग्रुप में करीब 7500 सदस्य जुड़े हुए थे। जिनमें तमाम नामी गिरामी हस्तियों के साथ-साथ, देश विदेश के प्रगतिशील मानवाधिकार मुद्दों से जुड़े हुए व्यक्ति भी शामिल थे।

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यह एक बेहद सक्रिय ग्रुप था जिसमें देश विदेश के तमाम मुद्दों पर सार्थक बहस होती थी। अब तक तक़रीबन पांच हजार मुद्दों पर बहस हो चुकी थी। यह बहस गोपनीय न होकर सभी के लिए ओपन थी। आज वे सरे मुद्दे इस ग्रुप से गायब हैं।
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इस ग्रुप में कई मीडिया के लोग भी जुड़े हुए थे और वे इस ग्रुप में प्रसारित मुद्दों को प्रकाशित भी करते रहे हैं। कई लेख इसी ग्रुप से मीडिया तक पंहुचे हैं। अब तक इसके बहुत सारे सदस्यों को ये नहीं मालूम की यह ग्रुप बंद हो चुका है।
नेशनल दस्तक से साभार 
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सामाजिक बहिष्‍कार रोकथान अधिनियम के हम समर्थन मे है।

सामाजिक बहिष्‍कार रोकथान अधिनियम के हम समर्थन मे है।
संजीव खुदशाह
कार्यकारी संयोजक
जाति उन्‍मूलन आंदोलन

सामाजिक प्रताडना एवं बहिष्‍कार की रोकथाम के लिए प्रदेश में प्रस्‍तावित छत्‍तीसगढ सामाजिक बहिष्‍कार (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम बनने की प्रकिया शुरू हो गई। इसके लिए बकायदा एक कमेटी भी बन गई है। दरअसल हाल ही में हुई सामाजिक बहिष्कार की घटनाओं से सरकार को इस बात का दबाव प्रगतिशील संगठनो के द्वारा बनाया जा रहा था की यहां भी महाराष्‍ट्र की तर्ज पर एक समाजिक बहिष्‍कार रोकथान अधिनियम बने। इसका मकसद तमाम जातियों में चल रहे जाति पंचायतों में तुगलकी फैसलो एवं न्‍यायपालिका के अधिकार का हनन करने की प्रकिया पर अंकुश लगाना है। कानून बनाने के लिए गृह विभाग के सचिव की अध्यक्षता में प्रारूप समिति का गठन भी कर दिया गया है। सात जून को समिति की पहली बैठक भी हो चुकी है। छत्तीसगढ़ में सामाजिक बहिष्कार की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। कभी अंतरजातीय विवाह तो कभी मृत्युभोज नहीं देने पर तो कभी आरटीआई लगाने पर सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ ठोस कानून नहीं होने के कारण ऐसे मामलों में कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि सामाजिक बहिष्कार व्यक्ति के मानवीय अधिकारों का खुला हनन है। इस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए कानून नहीं होने के कारण ग्राम पंचायत या जातिगत सामाजिक पंचायतों द्वारा व्यक्ति या परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर प्रताड़ित किया जाता है। आर्थिक व शारीरिक दंड भी दिया जाता है।केंद्र व राज्य के पास आंकड़े भी नहीं केंद्र व राज्य सरकार के पास सामाजिक बहिष्कार के कितने मामले हैं, इसके आंकड़े उपलब्ध नहीं है। एक सामाजिक संगठन ने आरटीआई के तहत राज्य शासन से सामाजिक बहिष्कार के प्रकरणों और इसकी रोकथाम के लिए उपलबध कानून के बारे में जानकारी मांगी थी। राज्य शासन की तरफ से जवाब निरंक आया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ओर से भी सामाजिक बहिष्कार के मामलों के आंकड़े उपलब्ध नहीं होने की जानकारी दी गई है।

इन मुआमले में छत्‍तीसगढ शर्मिदा है-
1 हरियाणा की खाप पंचायतों की तर्ज पर रायपुर के टिकरापारा में एक परिवार को समाज से बहिष्कृत करने का मामला सामने आया है। परिवार के मुखिया शंकर सोनकर का आरोप है कि उन्हें महज इसलिए बहिष्कृत कर दिया गया, क्योंकि उसने समाज के स्कूल के बारे में जिला शिक्षा कार्यालय में आरटीआई के जरिए जानकारी मांगी थी।
2 कवर्धा जिले के लोहारा विकासखंड के ग्राम बचेड़ी के तीन परिवारों से सरपंच ने गांव के सभी लोगों को उनके परिवार के किसी भी सदस्य से बात न करने का फरमान जारी कर दिया। इनसे कोई भी बात करता है या किसी प्रकार से मदद करता है तो उससे 25 हजार रुपए अर्थदण्ड लेने और अर्थदण्ड नहीं देने पर समाज से बहिष्कृत करने की चेतावनी दी गई।
3प्रदेश की समाज कल्याण मंत्री रमशीला साहू के गांव के तीन परिवार का हुक्का-पानी सालों से बंद है। वो भी सिर्फ इसलिए कि इनमें से किसी ने बड़ा मंदिर बनवा दिया तो किसी ने उसे पनाह दी, जिसका हुक्का-पानी पहले से बंद था।
3 रायपुर के ही राजिम के पास ग्राम बेलटुकरी में तेजराम साहु के परिवार द्वारा मुंडन नही कराये जाने पर करीब 12 सालों तक समा‍ज से बहिष्‍कृत रखा बाद में संजीव खुदशाह एवं डॉं दिनेश मिश्र के नेतृत्‍व में जाति उन्‍मूलन आंदोलन की टीम द्वारा वहां जाकर वहां जाकर ग्राम वासियों को प्रेरित करने तथा दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही का दबाव बनाने पर उनका समाजिक बहिष्‍कार खत्‍म किया गया।

महाराष्ट्र में है यह कानून महाराष्ट्र में कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का सामाजिक बहिष्कार करता है तो उसे तीन साल की जेल की सजा हो सकती है। साथ ही उस पर एक लाख रुपए जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यह जुर्माना पीड़ित व्यक्ति को दिया जाएगा। महाराष्ट्र सामाजिक बहिष्कार को अपराध मानते हुए कानून लाने वाला देश का पहला राज्य है। पीड़ित व्यक्ति स्वयं या उसके परिवार का कोई भी सदस्य पुलिस या सीधे जज के समक्ष शिकायत दर्ज करा सकता है।किसी व्यक्ति या परिवार का सामाजिक बहिष्कार किसी भी रूप में जायज नहीं है। सामाजिक बहिष्कार की त्रासदी पूरे परिवार को झेलनी पड़ती है। इसकी रोकथाम के लिए कारगर कानून नहीं होने के कारण स्थिति गंभीर होती जा रही है। हम सभी जनप्रतिनिधियों व सामाजिक संगठनों को इस संबंध में पत्र लिखेंने का आहवान करते है।

साथ साथ यह भी खबर है की कुछ समाजिक एवं जातिगत संगठनो ने 21 जून को रायपुर में एक बैठक ली है वे ऐसे प्रस्‍तावित कानून का विरोध कर रहे है। सोशल मीडिया में इस अधिनियम के विरूध दूषित मौहोल तैयार कर रहे है। गौर तलब है की पहले से ही प्रताडित पिछडे एवं अत्‍यंत पिछड्री जातिया ऐसे कानून का विरोध कर रही है जिन्‍हे इस वक्‍त इसकी ज्‍यादा जरूरत है। हम एवं हमारी संस्‍था जाति उन्‍मूलन आंदोलन समाजिक बहिष्कार कानून का पूरा समर्थन करती है तथा ऐसे कानून बनने की प्रकिया में हर प्रकार का सहयोग देने के लिए तत्‍पर है। और आप सभी से ऐसे ही सहयोग की अपेक्षा रखती है।

संजीव खुदशाह
कार्यकारी संयोजक, केन्‍द्रीय कमेटी नई दिल्‍ली
जाति उन्‍मूलन आंदोलन



जाति प्रथा एक राष्ट्रीय समस्‍या

जाति का उन्‍मूलन एक विश्‍लेषण
·         संजीव खुदशाह
पिछले कई दशको से जाति उन्‍मूलन की कोशिश अपनी अपनी तरह से की जाती रही है। कुछ कोशिश बुध्‍द, महावीर, कबीर, रयदास, फूले के काल में हुई थी। लेकिन ये एक प्रयास था। इसका मास्‍टर प्‍लान नही था शायद यही कारण है की जाति की पकड़ ढीली तो हुई, लेकिन जाति का उन्‍मूलन रंज मात्र भी नही हुआ। परंन्‍तु पिछले छ: दसक पहले जाति उन्‍मूलन का खाका (जिसे संकुचित अर्थ में मास्‍टर प्‍लान भी कह सकते है) डॉं अम्‍बेडकर के साहित्‍य में देखने मिलता है।
जैसा कि मान्‍यता गढ़ी गई है की जाति उन्‍मूलन दलितों का काम है क्‍योंकि जाति उत्‍पीड़न उन्‍ही का हुआ है। इस तरह डा. अम्‍बेडकर को दलितों तक सिमित कर दिया गया। सिर्फ दलितों तक नही एक जाति विशेष तक सिमित कर दिया गया। अम्‍बेडकर और जाति वाद एक दूसरे के पर्याय समझे जाति लगे। लेकिन ये एक सच नही था। सच्‍चाई ये है कि अम्‍बेडकर ने सभी मुद्दे पर काम किया, चाहे जाति भेद, लिंग भेद हो या रंग भेद धर्म भेद। आश्‍चर्य है कि उन्‍होने किसी जाति विशेष के लिए कभी काम नही किया। वे एक ओर कानून विद थे तो दूसरी और अर्थशास्‍त्री । वे सामाजिक कार्यकर्ता, शोधकर्ता, साहित्‍यकार तो कभी दार्शनिक की भूमिका में दिखाई पड़ते। मुझे ये बात इसलिए बतानी पड़ रही है क्‍योकि अम्‍बेडकर को और उनके विचार को समझे बिना जाति उन्‍मूलन का मास्‍टर प्‍लान तैयार नही किया जा सकता।
भारत में जाति प्रथा कैसे आई ?
इतिहास की किताबों से ज्ञात होता है कि आर्यो के आने के पूर्व यहां जाति प्राथा नही थी जातियां कबिले के रूप में विद्यमान थी। ये कबिले अपनी पहचान एवं चिन्‍ह कायम रखत थे। आर्य जो केवल तीन वर्ण साथ लेकर आये थे ‘’ब्राम्‍हण क्षत्रिय और वैश्‍य’’ बाद में यहां के कबिलों को शूद्र वर्ण में शामिल करके चौथा वर्ण बनाया गया। इन कबिलों का रिश्‍ता किसी खास पेशे से जुड़ता गया। लेकिन सामाजिक अनुक्रम (ऊंच-नीच) से मुक्‍त था। बाहरी लोगो ने यहां पहले से मौजूद कबिलों को वर्णक्रम में जोड़ कर जातिय स्‍वरूप दिया। इसे धार्मिक अमली जामा महनाकर अनुक्रम से जोड़ दिया गया। ऊंच-नीच आने के कारण ये जातियां अपने अस्‍ति‍त्‍व को बनाये रखने के लिए मजबूर होती रही। हर जाति एक दूसरे से घृणा करती और निची नजर से देखती है।
क्‍यों जरूरी है जाति उन्‍मूलन ?
आप सभी को ज्ञात है कि हम आज आधुनिक विज्ञान की दैनिक वस्‍तुए रोजमर्रा में प्रयोग करते है। एक सुई से लेकर हवाई जाहज तक। इनमें से किसी भी चिजों का अविष्‍कार भारत में नही हुआ। इसी प्रकार संसार के 500 चोटी के विश्‍वविद्यालय में भारत का एक भी विश्‍वविद्यालय शामिल नही हो सका। जानते है इसका कारण क्‍या है, इसका कारण है भारत में लोग अविष्‍कार करके गौरांवित नही होते, वे गौरांवित होते है अपनी जाति से। इसलिए लोग अविष्‍कार कररने के बजाय अपनी अपनी जाति गौरव बढ़ाने, उसे पुष्ट करने में लगे रहते है। और  अविष्‍कार नही होगा तो विश्‍वविद्यालय नाम के रहेगे, सिर्फ अंधविश्‍वास के केन्‍द्र। विद्यार्थी परिक्षा पास होने के लिए पढ़ाई के बजाय भगवान की मनौती पर ज्‍यादा विश्‍वास करते है। जाति प्रथा ने भारत का आर्थिक, मानसिक और नैतिक विकास रोके रखा है। इसलिए यदि भारत को शिखर में देखना है तो  जाति का उन्‍मूलन जरूरी है।
वे लोग जो जाति प्रथा को किसी धर्म विशेष(हिन्‍दू) की समस्‍या समझते है वे एक बड़ा भूल करते है। दरअसल यह एक राष्ट्रिय समस्‍या है। जिसने भारत को आज भी कई शताब्दियों पीछे रोके रखा है। वे चंद लोग जो जाति प्रथा से लाभांवित है जाति को समस्‍या नही मानते है। वे इसे एक संस्‍कृति का नाम देकर उन्‍मूलन का विरोध करते है। जब आप इसके उन्‍मूलन की बात करते है तो आपको इसे राष्‍ट्रीय समस्‍या के रूप में देखना होगा। तभी इसका हल निकाला जा सकता है।
जाति उन्‍मूलन किसका होना है ?
ज्‍यादातर ये माना जाता रहा है कि जाति उन्‍मूलन दबी कुचली जाति का होना चाहिए। इसे इन जातियों के संसाधनात्‍मक उत्‍थान से जोड़ कर देखा जाता रहा है। दूसरी मान्‍यता ये भी की जो जाति, जाति प्रथा से पीडि़त है उसे ही उन्‍मूलन के लिए प्रयास करना चाहिए। दरअसल ये एक सफेद झूठ है जिस प्रकार एक ऊंची जाति का व्‍यक्ति जाति को बचाये रखने का प्रयास करता है। ठीक उसी प्राकार निची जाति का व्‍यक्ति भी अपनी जातिय पहचान को बनाये रखने के प्रयासरत रहता है। यहां बात विचारधारा की है।
अत: जाति उन्‍मूलन नीचे पैदान की  जाति के लिए जितनी जरूरी है उतनी जरूरी ऊंचे पैदान की जाति के लिए भी जरूरी है। चूकि अन्‍य धर्म में भी धर्मातरण की ईकाई जाति रही है(‍जाति सहित धर्मांतरण)। इसलिए बौध्‍द सहित हिन्‍दु, मुस्लिम, ईसाई, सिक्‍ख, जैन धर्म में भी जाति प्रथा चरम पर है। यह सोचना की सिर्फ हिन्‍दू धर्म में ही जाति प्रथा की बुराई है तो ये गलत होगा। सभी धर्मो में मौजूद जातियों के उन्‍मूलन की आवश्‍यकता है। लेकिन केन्‍द्र में हिन्‍दू धर्म को रखना होगो।
जाति का उन्‍मूलन कैसे हो ?
जाति उन्‍मूलन के कई उपाय है इसे हम मुख्‍य रूप से दो भागों में बांट सकते है।
1 परंपरागत तरिका
(क) अर्तजातिय विवाह- आजादी के बाद एक ही वर्ग में आने के कारण जाति के बाहर शादि का प्रचलन बढ़ा है जैसे डाक्‍टर, आई ऐ एस आदि आदि। लेकिन जाति प्रथा एक इन्‍च भी पीछे नही खिसकी। उसी प्रकार अर्तजातिय प्रेम विवाह जाति टूटने का सुखद भ्रम तैयार करती है प्रेम विवाह करने वाले अपने आपको जाति उन्‍मूलन का अगवा सिध्‍द करने के लिए तुल जाते है जबकि सच्‍चाई ये है कि सिर्फ महिला की जाति बदलती है कहीं-कहीं तो पुरूष की जाति बदल जाति है। बाद में अगली पीढ़ी मानों अपनी गलती को सुधारते हुए अपनी जाति(पिता की जाति) में विवाह कर लेते है। आज प्रेम विवाह की संख्‍या बढ़ी जरूर है लेकिन जाति वहीं की वही है। मेरा मानना है कि जब अंर्तजातिय अरेंज मैरिज(जिसमें दोनो जातियों एवं परिवारों की रजामंदी हो) होना प्रारंभ हो जायेगा तब ये माना जा सकेगा की जाति उन्‍मूलन हो रहा है।
(ख) अर्तजातिय भोज का आयोजन-आज से छ: दशक पहले अर्तजातिय भोज एक स्‍वप्‍न था। बाद में कुछ सुधार हुऐ और विभिन्‍न अवसरों में इस प्रकार के भोज का आयोजन किया जाने लगा। लोग वहां अपनी जाति के साथ आते और चले जाते। आज ऐसे भोज शहरों में हर मौके पर होते है। लेकिन जाति है कि नही जाती। यह प्रयास भी विफल ही माना गया।
(ग) धर्मशास्त्रों को डायनामाईट से उड़ा दिया जाय- कुछ विचारको ने इस प्रकार के विचार भी रखे। हलांकि यह बात सही है कि धर्म शास्‍त्र जाति प्रथा को धार्मिक मान्‍यता प्रदान करते है। जाति प्रथा को खाद पानी इन्‍ही वेद पुराणों धर्म शास्‍त्रों से मिलती है।  और हर दुख सुख का जातिय हल बता दिया जाता जैसे- इस जन्‍म में अपनी जाति के पेशे को अच्‍छे से करोगे तो, अगला जन्‍म उच्‍चे कुल में होगा। अत: धर्म शास्‍त्रों को यदि डायनामाईट से उड़ा दिया जायेगा तो जो बुराई इन शास्त्रों के कारण लोगो की मासिकता में बसी हुई है उसका क्‍या होगो? इसलिए धर्म शास्‍त्रों के प्रतिरोध के साथ-साथ लोगो के मन से इन धर्मशास्‍त्रों को निकालना होगा।
2  जाति उन्‍मूलन के नये  तरिके
जाति उन्‍मूलन के पहले यह जाना आवश्‍यक है कि जाति किन आधारो पर टिकी हुई है। जब हमे जाति को खड़ा करने के आधार मिल जायेगे तो हमें उन आधारों पर चोंट करना होगा तभी जाति का उन्‍मूलन हो सकेगा।
जाति इन तीन आधारो पर टिकी हुई है
1.    अंधविश्‍वास- कुल गौरव, पुरुष सत्‍ता, कुल गुरू परंपरा, पूर्वजन्‍म आदि ये वे मान्‍यताएं है जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नही है सभी या तो अहम पर टिकी है या संस्‍कृति के नाम पर लेकिन ये है अंधविश्‍वास।। अज्ञानता- ऐसी परंपरा या रूढ़ी जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नही है लेकिन आधुनिक विज्ञान की गलत व्‍याख्‍या से सही सिध्‍द करने की चेष्‍टा की जा‍ती है। जैसे ऊंच नीच को मानना, शुभ अशुभ का विचार करना, काल्‍पनिक विपत्ति को दूर करने के अनुष्‍ठान करना आदि। विज्ञान और धर्म में घाल मेल- विज्ञान और धर्म में घाल मेल करके यह सिध्‍द करने की कोशिश की जाती है कि धर्म इस अविस्‍कार या ज्ञान से पहले से ही बावास्‍ता था। धर्म विज्ञान से ऊपर है ताकि धर्म में मौजूद ऊच नीच का कोई विरोध न कर सके। 
2.    झूठे स्‍वर्णिम अतित की पूजा- आज ये जाति प्रथा का मुख्‍य आधार है। 2000 साल की गुलामी का इतिहास होने के बावजूद। पुराण काल(काल्‍पनिक काल) को स्‍वर्णिम इतिहास बताया जाता है जिसका कोई एतिहासिक साक्ष्‍य नही है इस स्‍वर्णिम भूत काल की बातों में मुख्‍य रूप से यही बाते कही जाती है की जाति प्रथा ही उस स्‍वर्णिम भूत का मुख्‍य आधार था। सब सुखी थे। इसलिए जाति प्रथा का विरोध मत करना नही तो वह स्‍वर्णिम भूतकाल फिर से नही आयेगा।
3.    लिंग भेद (महिलाओं का दम)- सभी जातियां ये मानती है कि उनकी जाति की इज्‍जत उनके घर की स्त्रियों में होती है। स्‍त्री की इज्‍जत गई(आशय यौन संबंध से है) तो उस परिवार की जाति की इज्‍जत गई। मानों जाति की इज्‍जत उनकी महिलाओं की योनी में होती है। इसलिए जब किसी जाति को नीचा दिखाने की बात आती है तो महिलाओं की आबरू से खेला जाता है, उनकी हत्‍या की जाति है। छोटी दलित या पिछड़े वर्ग के लोग तरक्‍की करते है तो दबंग जाति के लोग नीचा दिखाने की नियत उनकी महिलाओं से बलात्‍कार करते है ताकि उस जाति की इज्‍जत को छोटा कर दिया जाय।
इसी इज्‍जत के बहाने बेटी को अपनी ही बिरादरी में ब्‍याहना पड़ता है क्‍योंकि अन्‍य जाति में ब्‍याहने का मतलब इज्‍जत जाना। इसलिए बाप को अपनी ही बिरादरी में अयोग्‍य जात बिरादरी के लड़को से बेटी की शादी करनी पड़ती वो भी  रिश्‍वत (दहेज) देकर।
गौरतलब है की स्त्रियों का दमन यहां तक नही रूकता वह कन्‍या वध, सती प्रथा, आजीवन विधवा शोषण तक जारी रहता है। उद्देश्‍य एक मात्र जाति की योनी का है। यानि जाति प्रथा का मतलब स्त्रियों का शोषण है। यह जाल स्त्रियों को घेरने के लिए है। पर इसी जाति प्रथा में प्ररूष आजाद है।
अब आवश्‍यकता है इन तीन आधार जिस पर जाति प्रथा टिकी हुई पर चोट किया जाय। साथ-साथ इन बिन्‍दुओं पर भी गौर करना होगा।
1.         इर जाति के प्रगतिशील व्‍यक्तियों को इस मुहिम का हिस्‍सा बनाया जाय। यानि सबसे पहले इस मुहिम में जाति का उन्‍मूलन किया जाय। जिस प्रकार ब्राम्‍हण वादी होने के लिए ब्राम्‍हण होना जरूरी नही है। । उसी प्रकार प्रगतिशील वादी होना भी किसी  जाति विशेष की बपौती नही है। इन्‍ही प्रगतिशील व्‍यक्तियों की जरूरत है जो हर रूढ़ी को तोड़ने के लिए तैयार हो।
2.         पारंपरिक या पु‍श्‍तैनी काम का ब‍हिस्‍कार किया जाय।
3.         अंर्तधार्मिक एवं जातिय विवाह को प्रोत्‍साहन संरक्षण दिया जाय।
4.         सामाजिक धरोहरों में से अनावश्‍यक चिजों को हटाकर काम की चिजों का प्रयोग किया जाय।
5.         धार्मिक अंध विश्‍वास से लोगो को परिचित कराया जाय।
6.         यदि धर्म को जिन्‍दा रखना है तो धार्मिक क्रियाकालापों में जातिगत श्रेष्‍ठता को आधार नही माना जाय।
7.         भूमि का समान वितरण हो तथा आर्थिक प्रगति की ओर बढना होगा।
8.         सरकारी दस्‍तावेज में जाति के कालम को विलोपित किया जाय।
       सामाजिक दायरे से बाहर निकलना होगा
1. जाति उन्‍मूलन सिर्फ सामाजिक सुधार का हिस्‍सा नही बल्कि राजनीतिक विचार धारा के मुख्‍य ऐजेण्‍डे में शामिल किया जाना होगा।
2. यदि आवश्‍यक हो तो धर्म के प्रतीनिधी से भी बात होनी चाहिए क्‍योंकि जब बात करेगे तो बात बनेगी।


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