Dalit poet malkhan singh is no more


हिंदी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है कवि मलखान सिंह का जाना

संजीव खुदशाह

जब हम शुरुआती तौर पर दलित साहित्य पढ़ रहे थे यह ऐसा वक्त था जब दलित साहित्य से हमारा दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। ऐसे समय में दो किताबें मेरे सामने आई जो पहले से चर्चित थी जिस के नामों को हमने सुन रखा था। उनमें से एक किताब थी मलखान सिंह की कविता संग्रह सुनो ब्राह्मण। जब आप सुनो ब्राम्हण कविता को पढ़ते हैं और यह कविता ब्राह्मणवाद को ललकारती है और उन्हें दलितों की जमीनी हकीकत से रूबरू कराती है। इन कविताओं को जब आप पढ़ते हैं तो आप तथाकथित मुख्‍यधारा के साहित्य को भूल जाते हैं आप भूल जाते हैं मुख्‍यधारा के साहित्य का सौंदर्यशास्त्र। आपको तमाम मेंनस्ट्रीम के कवियों की कविताएं खोखली लगने लगती है।
हम शुरुआती दिनों में एडवोकेट भगवानदास कि "मैं भंगी हूं", डॉक्टर अंबेडकर की किताब "शूद्र कौन थे" और "अछूत कौन और कैसे" और मलखान सिंह की कविताएं पढ़कर आगे बढ़ रहे थे। सच कहूं तो मलखान सिंह की कविताएं आज भी जेहन में रमी हुई है बसी हुई है। आज जब उनके जाने का समाचार मिलता है। तो लगता है कि कुछ अधूरा रह गया। क्यों मैं उनसे नहीं मिल सका। उनसे बात ना कर सका। इतने वरिष्‍ठ होने के बावजूद वे मुझे व्हाट्सएप पर संदेश भेजा करते थे और बेहद सक्रिय थे सोशल मीडिया में। वे कवि के साथ-साथ एक क्रांतिकारी किसान नेता भी थे और अपनी बातों को खुलकर कहते थे। बहुत कम ऐसे कवि रहे हैं जोकि किताबों तक सीमित रहने के बजाय अपनी कही हुई बातों को जमीन में भी हकीकत का अमलीजामा पहनाते हैं।
उनकी कविताओं की सबसे बड़ी खूबी यह रही है कि उनकी सभी कविताएं मौलिक ढंग से लिखी गई थी या कहें किसी और कविताओं से या शैली से प्रभावित नहीं है। बल्कि मै दावे के साथ यह कह सकता हूं कि उनकी कविताओं से प्रभावित होकर के लोगों ने कविता लिखना प्रारंभ किया। आज दलित साहित्य में बहुत सारे किताबें हैं जानकारियां हैं। जिनके आधार पर आप पढ़ सकते हैं आगे लिख सकते हैं। लेकिन शुरुआती दिनों में दलित साहित्य कांसेप्ट नहीं था ना ही उस पर किताबें थी। लोग अपनी पीड़ाओं को आत्मकथा और कविताओं ने निबंधों में में लिखने से शर्माते थे ।  उसे मुख्यधारा का साहित्य नहीं माना जाता था। प्रकाशक कूड़े में फेंक दिया करते थे। ऐसे समय शुरुआती दिनों में मलखान सिंह जैसे कवि आए और उनकी कविताएं जन कविताएं बन गई। उनकी किताबें हाथो हाथ बिकने लगी।
आज वह नहीं है उनका जाना ना केवल दलित साहित्य के लिए बल्कि हिंदी साहित्य के लिए भी अपूर्ण क्षति है। जिसकी भरपाई आसान नहीं है। जाते जाते उनकी यह कविता आपकी नजर करता हूं।

सुनो ब्राह्मण!
हमारे पसीने से बू आती है तुम्हें
फिर ऐसा करो
एक दिन अपनी जनानी को
हमारी जनानी के साथ मैला कमाने भेजो
तुम ! मेरे साथ आओ
चमड़ा पकाएँगे दोनो मिल बैठकर
मेरे बेटे के साथ तुम्हारे बेटे को भेजो
दिहाड़ी की खोज में
और अपनी बिटिया को
हमारी बिटिया के साथ
भेजो कटाई करने
मुखिया के खेत में……
(कवि :- मालखन सिंह)

friendship day means respect for friendship

4 अगस्‍त 2019 रविवार फ्रेंडशिप डे पर विशेष
दोस्‍ती  का सम्‍मान है फ्रेंडशिप डे
संजीव खुदशाह
मित्रता एक महत्वपूर्ण निधि है। आज के समय में जब समाजिक सौहाद्रता को दाग लग रहा है, लिंचीग जैसी घटनाएं घट रही है ऐसे समय में दोस्ती जैसे रिश्ते की बेहद जरूरत है। कहते है जिसका कोई दोस्‍त नही होता वह व्‍यक्ति समाजिक नही होता। अगर आपका कोई दोस्‍त है तो संभव है आपका दुश्‍मन भी होगा। दोस्‍ती, दुश्‍मन को खत्‍म करने का सबसे कारगर हथियार भी है। किसी दुश्मन को खत्म करना हो, तो बस उसे दोस्त बना डालो। दुश्‍मन हमेशा के लिए खत्‍म हो जायेगा। मित्र कौन हो सकता है? इसकी कोई सीमा नहीं है। गरीब-अमीर, काला-गोरा, लड़का-लड़की, युवा-बुजुर्ग कोई भी आपका दोस्त हो सकता है। और दोस्ती के लिए ऊंच-नीच जाती-पाती धर्म कोई मायने नही रखती है।
फ्रेंडशिप डे क्या है?
दोस्ती के प्रतीक के रूप में जाने वाले इस दिन की शुरुआत सन् 1919 में हुई, जिसका श्रेय हॉलमार्क कार्डस के संस्थापक जॉएस हॉल को जाता है। लोग उन दिनों अपने दोस्तों को फ्रेंडशिप डे कार्ड भेजा करते थे। उन दिनों से शुरू हुआ यह सिलसिला बदस्तूर आज भी जारी है। अगस्त के पहले रविवार को यह ख़ास दिन मनाने के पीछे वजह यह थी कि अमेरिकी देशों में यह समय ऐसा होता है, जब दूर-दूर तक किसी पर्व-त्योहार की छुट्टी नहीं होती। सन् 1958 के 30 जुलाई को औपचारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय फ्रेंडशिप डे (विश्व मैत्री दिवस) की घोषणा की गई थी। बताया जाता है कि डाक्टर अर्टरमिओ ने अपने दोस्त ब्राचो के साथ पराग्वे नदी के पास रात्रि भोजन किया था। पहली बार पराग्वे में ही इस दिन को मनाया गया था। दक्षिण अमेरिकी देशों में सबसे पहले इस दिन को उत्सव के रूप में मनाने की शुरुआत हुई थी। कुछ स्थानों में इसकी तिथियां अलग होती है लेकिन अगस्त के पहले रविवार को यह त्यौहार खासतौर पर पूरे विश्व में मनाया जाता है। यूनाइटेड नेशन ने भी इस दिन पर अपनी मुहर लगा दी है। इसीलिए अब इस त्यौहार को अंतरराष्ट्रीय फ्रेंडशिप डे के रूप में मनाया जाता है।
कैसे मनाए?  
कई लोग इसे ‘’दोस्ती का सम्मान’’ के रूप में मनाते हैं। बहुत सारे ऐसे रिश्ते हैं जिन पर जंग लग चुकी है और रोजमर्रा में भुला दिए गए हैं या खटास आ गई है। उनके लिए यह त्यौहार एक बहाना हो सकता है दोस्ती जिंदा करने का, तरों ताजा करने का, इस दिवस को लोग खासतौर पर बने बैंड एक दूसरे के हांथों में बाधते हैं, उपहार देते हैं, गिले-शिकवे मिटाते हैं। पूरा दिन एक दूसरे के साथ बिताते हैं। कई स्थानों पर स्कूल कॉलेजों के पुराने दोस्त मिलकर पार्टियां भी करते हैं। आज तकनीकी क्रांति और सोशल नेटवर्किग साइट्स के ज़माने में दोस्त और दोस्ती के प्रति अपनी भावना व्यक्त करने का यह अवसर, दुनियाभर में दिन-प्रतिदिन लोकप्रिय हो रहा है। लोगों के बीच रंग, जाति, धर्म जैसी बाधाओं को तोड़कर आपस में दोस्ती और परस्पर सौहाद्र बढ़ाने का संदेश देने वाले इस अनूठे त्योहार के सम्मान में, वर्ष 1998 में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव कोफ़ी अन्नान की पत्नी, नाने अन्नान ने प्रसिद्ध कार्टून कैरेक्टर विन्नी द पूह को दोस्ती के लिए संयुक्त राष्ट्र में दुनिया का राजदूत घोषित किया।
घर में खुशियां चाहिए तो परिवार के सदस्यों को मित्र बना डालो
मित्रता एक खास प्रकार का रिश्ता होता है।मित्र बनाने के लिए किसी रिश्‍ते की बाध्‍यता नही है। लेकिन हर प्रकार के रिश्ते को आप दोस्ती में बदल सकते हैं। यदि आप ऐसा करते हैं तो आपके जीवन में खुशियों का अंबार लग सकता है। पत्नी को दोस्त बनाइए देखिए आपके जीवन में नई रौनक आ जाएगी। वैसे ही पिता, पुत्र, मां, बहन, भाई, दादा, दादी छोटे बच्चे किसी को भी आप अपना दोस्त बना सकते हैं। और अपने जीवन में खुशिया ला सकते है।
दोस्ती का आधार
दोस्ती का आधार प्यार, विश्वास और बराबरी होता है। इन तीनों में से किसी एक की भी गैरमौजूदगी में दोस्ती की कल्पना नहीं की जा सकती। यदि कोई ऐसी मित्रता है? तो वह मित्रता कम बंधन ज्यादा होगा। इसलिए सभी रिश्तो में दोस्ती को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है।
अच्‍छा दोस्‍त
यह तो हर कोई कहता है कि अच्‍छे दोस्‍त तकदीर वालों को  मिलता है। हर व्‍यक्ति की चाहत होती है की उसे एक अच्‍छा दोस्‍त मिले। लेकिन कितने लोग है, जो ये चाहत रखते की वे एक अच्‍छे दोस्‍त बने। अच्‍छा दोस्‍त बनना असान काम नही है। अच्‍छा दोस्‍त बनने के लिए आपको दुख-सुख में खड़ा होना होगा, त्‍याग करना पड़ेगा, दोस्‍त के अच्‍छे बुरे व्‍यवहार को सहना पड़ेगा। तब कही जाकर आप अच्‍छे दोस्‍त बन सकते है। जो अपेक्षा आप अपने अच्‍छे दोस्‍त के लिए करते है वही आपको अच्‍छे दोस्‍त बनने के लिए करना पड़ेगा।
एक ओर सूचना क्रांति ने दूरस्‍थ बैठे दोस्‍त को करीब ला दिया वही निकटवर्ती मित्रो की टोली सूनी हो गई। आस पड़ोस के मित्रों को भी पूरा समय देना होगा। क्‍योकि वे ही आपके और आप ही उनके तुरंत काम आयेगें। पूरे देश में कट्टरवाद तेजी से फैल रहा है। जाति और धर्म आधारित लिंचीग की घटनाएं बढ़ रही है। ऐसे समय में मित्रता दिवस नई आशा लेकर आता है। मित्रता दिवस केवल मित्रता को याद करने वाला दिवस नही है बल्कि नये मित्र बनाने का भी है। आईये हम जातपांत ऊंच नीच धर्म की सीमाओं को तोड़कर नये मित्र बनाये ताकी किसी अल्‍पसंख्‍यक की लिंचीग न हो सके, कोई वंचित पिछड़े के दर्द को समझ सेके उसका शोषण न हो। यह दोस्‍ती का त्‍यौहार सिर्फ ग्रीटिंग कार्ड, शुभकामना संदेश, बैड़ एवं पार्टियों तक सीमित न हो। बल्कि सीमाओं को तोड़ कर समाजिक सौहाद्र स्‍थापित करने का काम करे।


4 अगस्त 2019 नवभारत में प्रकाशित

Protest on dr. Payal Tadvi raipur chhattisgarh

*प्रेस विज्ञप्ति*

आज दिनांक 30 मई 2019 को रायपुर के आंबेडकर चौक में दलित मुक्ति मोर्चा एवं डी एम ए ऑनलाइन के तत्वधान में डॉक्टर पायल तड़वी के संस्थागत हत्या के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन किया गया। इस प्रदर्शन में एससी एसटी ओबीसी माइनॉरिटी के लगभग 100 लोग भाग लिए और इसके अंतर्गत आंबेडकर चौक में जोरदार नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों के अंदर डॉक्टर पायल चौधरी की संस्थागत मृत्यु के सन्दर्भ में काफी गुस्सा था। इस संदर्भ में जिन लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए उनमें से प्रमुख डॉक्टर गोल्डी एम जॉर्ज, आरके जांगड़े, अखिलेश एडगर, संजीव खुदशाह, अंकिता अंधारे, अंजू मेश्राम, पुष्पलता महेश्वर, अनीता कुजूर, इत्यादि थे। 

इस दौरान अन्य कई दलित आदिवासी छात्रों की मृत्यु पर भी लोगों ने अपने रोष जताई। ऐसे ही अन्य कई परिस्थिति जो छत्तीसगढ़ में हो रही है। उदाहरण स्वरूप गणेश कोसले और एक अन्य आदिवासी छात्र का जो घासीदास यूनिवर्सिटी में भेदभाव के शिकार हुआ इन विषयों पर भी लोगों ने अपना गुस्सा जताया। डी०एम० एम० ने सरकार मांग की कि डॉ० पायल तड़वी के संस्थागत हत्यारों के ऊपर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए और शिक्षण संस्थानों से पूर्णता जाति भेद एवं जातिवाद को समाप्त किया जाए। लोगों ने यह भी मांग की कि देश को जाति और धर्म के आधार पर ना चलाया जाये बल्कि देश को संविधान के आदेश पर चलाए जाये। 

अंत में सभी लोगों ने मिलकर पायल को डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के मूर्ति के सामने मोमबत्ती जलाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस संघर्ष को आगे ले जाने की बात सभी ने कही। 

प्याज पॉकेट में रखने से लू लगता है या नहीं

प्याज पॉकेट में रखने से लूं लगता है या नहीं 
डॉक्टर बनसोडे
(मध्य प्रदेश की सरकार ने एक आदेश जारी किया कि इलेक्शन ड्यूटी में जाने वाले अधिकारी कर्मचारियों को लू से बचने के लिए प्याज मुहैया कराया जाए। ज्यादातर लोग मानते हैं कि गर्मी के दिनों में प्याज पॉकेट में रखने पर लू नहीं लगता इस पर डॉक्टर बनसोडे जी एक लेख प्रस्तुत कर रहे हैं पढ़े यह जरूरी आलेख।)

यह भी एक तरह का रूढ़िवादी अंधविश्वास है कि गर्मी के दिनों में बाहर निकलने से लू लग जाती है । यदि बाहर निकलना जरूरी है तो एक प्याज अपने पॉकेट में रखने से लू :- यानी सूर्य की गर्मी को प्याज खींच लेती है तथा व्यक्ति को लू नही लगती है ।

दरअसल जो मजदूर या किसान धूप में खेतों और सड़कों पर काम करते थे , उनका भोजन सुखी रोटी , कोई भी सब्जी , या सब्जी ना हो तो नमक तथा प्याज ही उनका भोजन था । इसके दम पर वे भारी दोपहर की गर्मी हो , ठंड हो या तेज बरसात सभी परिस्थिति में अपना जीवन निर्वाह करते थे  ।
यदि हम देखें तो सुखी रोटी को प्याज़ खाने की वजह से खाने को गटकने के लिये हर निवाले पर पानी पीते जायेगा । गर्मी में वैसे भी अधिक से अधिक पानी की जरूरत शरीर को होती जो गरीब लोग अच्छी तरह जानते हैं । वे तो नदी , तालाब या खेत के पानी को भी पीकर पचा लेते हैं । हाँ जब कभी खराब पानी से कोई इंफेक्शन हो भी गया , तो उनकी मृत्यु का कोई गम भी नही करता है । खराब पानी से हम सब जानते ही हैं कि अनेक प्रकार की बीमारीं हो ही जाती है ।
जैसे पेट में कई प्रकार के परजीवी :- अमीबा , प्रोटोज़ोआ , हेलमिन्थिस इत्यादि , बैक्टीरिया तथा वाईरस से होने वाली बीमारियाँ जैसे पीलिया इत्यादि ।
इसलिये बिना पानी को छाने कोई भी पानी वैसे ही पीना हानिकारक है होता है ।

अब हमारे शहरी भाई और साथ ही गांव वाले भाई लोग भी बोतल बन्द पानी लेकर चलते हैं । अब जगह जगह फ्रिज का ठंडा पानी भी उपलब्ध हो जाता है ।इसलिये गर्मी में भरपूर पानी के पीने से ही लू (Heat Stroke)  से बचा जा सकता है ।

प्याज़ खाना भी सलाद का हिस्सा है । भोजन में नियमित खाने से शरीर को लाभ ही मिलेगा ।

लेकिन रूढ़िवादी परम्परागत विचारों के लोगों को लगता है कि प्याज को अपने जेब (पॉकेट) में या साथ में रखने से लू नही लगती है ।
*यह भी एक अंधविश्वास है ।*

:-डॉ के बी बंसोड़े।
🙏🏻

Ramnika gupta is past aways

रमणिका गुप्ता का जाना एक हादसा है

संजीव खुदशाह
Ramnika gupta 
लंबे समय से बीमार रही रमणिका गुप्ता का निधन हो गया। उनकी बीमारी की हालत में मैं उनसे कई बार मिलने गया और यह महसूस होता था कि वह और जीना चाह रही हैं। थोड़ा बहुत भी ठीक होती तो भि‍ड़ जाती अपने कामों में, समय पर मैगजीन युद्ध रत आम आदमी आना है। कौन सा काम कैसा  हो रहा है? एक तरह से उन्हें अपने जाने का भी एहसास हो चुका था। क्योंकि उमर उनकी काफी हो रही थी। वह अपने तमाम राइटिंग्स और स्पीच को इकट्ठा कर रही थी। इसके प्रकाशित करने की तैयारी में थी। शायद वह अब तक प्रकाशित भी हो गई होगी ।
बहुत सारे काम वे जल्‍दबाजी में करना चाह रही थी। हर जगह वह आप अपनी उपस्थिति देना चाहती थी। बता दूं कि रमणिका गुप्ता ने अपने कैरियर की शुरुआत हजारीबाग बिहार। अब झारखंड में है, से शुरू की थी। परिवार से विद्रोह करते हुए उन्होंने कोयला मजदूरों के लिए आंदोलन जारी रखा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी से वह विधायक चुनी गई। उनके जज्बे और साहस की हमेशा तारीफ में होती थी। इसके साथ साथ उन्होंने अपना साहित्यिक काम भी जारी रखा। वह हजारीबाग से ही युद्ध रात आम आदमी पत्रिका निकालती थी। शुरू में यह त्रैमासिक थी ।
उन्हें अपने नाम का बेहद मोह था जैसा कि सभी को होता है। लेकिन वह उसे प्रजेंट करने में कभी भी संकोच नहीं करती थी। उन्होंने अपने जीते जी रमणिका फाउंडेशन बनाया और खुद उसकी संस्थापक सदस्य बनी। रमणिका फाउंडेशन के मार्फत वे कई विधाओं में पुरस्कार भी दिया करती थी। पत्रिका का प्रकाशन भी रमणिका फाउंडेशन के माध्यम से ही होता था।
उन्होंने आदिवासी मुद्दों पर जमकर लिखा और इस पर लिखने वालों को आगे भी बढ़ाए। इसी प्रकार वे दलित मुद्दों पर भी काफी लिखा करती थी और दलित लेखकों को प्रमोट करने का श्रेय उन्हें जाता है। उनकी कविताएं और कहानियां चर्चित रही हैं खासकर उन की एक कहानी बहू जुठाई बेहद चर्चित रही है। यदि मौका मिले तो आप इस कहानी को जरूर पढ़ें।
वे स्त्री मुद्दों को उठाने वाली देश की अग्रणी महिलाओं में शुमार की जाती थी । उनकी तमाम रचनाओं में महिला वादी सोच स्पष्ट दिखाई पड़ती थी। उनकी आत्मकथा हादसे बेहद चर्चित रही। उन्होंने अपने अंतरंग संबंधों और तमाम अनुभवों को इस आत्मकथा में साझा किया था। जिसके कारण वह विवादों में भी घिरी थी।
मेरा जब भी दिल्ली जाना होता मैं रमणिका जी के पास जरूर आता और प्रभावित था कि वे एक बुजुर्ग महिला होने के बावजूद बेहद सक्रिय थी। रात को केवल 4 या 5 घंटे सोती, बाकी समय लिखने पढ़ने में जाता। उनकी पत्रिका का विशेषांक मल मूत्र ढोता भारत के लिए। मैं कई बार दिल्ली गया और इस काम में मैंने मदद की। इसके बाद मैंने पिछड़ा वर्ग विशेषांक संपादन का जिम्मा लिया और क़रीब 4 साल की मेहनत के बाद यह अंक मार्केट में आया। इस बीच मुझे कई बार रायपुर से दिल्ली का दौरा करना पड़ा। तमाम लोगों से इंटरव्यू एवं आलेख मंगाए गए। रचनाओं की छटनी और प्रूफ चेकिंग। एक बहुत बड़ा काम था। यह अंक दो भागों में प्रकाशित हुआ।
 एक बार की घटना मुझे याद आ रही है रमणिका जी को जब पता चलता कि कोई दिल्‍ली के बाहर से लेखक या लेखिका आई हैं। तो उन्हें फोन कर बुला लेती और गपशप मारते हैं। कुछ लिखना पढ़ना होता। इसी दरमियान कंवल भारती जी को उन्होंने फोन पर बुलवाया और उन्होंने कहा कि भारती जी अब आप आ जाइए शाम का खाना खाएंगे कुछ रम शम पिएंगे। कंवल भारती जी ऑटो में तुरंत डिफेंस कॉलोनी स्थित रमणिका जी के निवास पर आ गए। एक-दो दिन पहले से मैं भी वहां पर था। जैसे ही कंवल भारती आए तो उन्होंने स्वागत सत्कार किया और बातचीत करने लगे। कंवल भारती जी ने कहा कि आपने मंगवा लिए (इशारा रम की तरफ था) तो रमणिका जी तुरंत कहने लगी कि नहीं हम तो आजकल लेना बंद कर दिए हैं और यहां पर पिलाना भी बंद हैं। तो कंवल भारती जी तमक गए बोले कि आप ने मुझे बुलाया है, यही बोल कर, इसलिए मैं आया हूं । सहमति के लिए रमणिका जी ने मुझसे हामी भराने की कोशिश की, तो मैंने कहा कि आपने तो कहा था कि आइए कुछ रम सम पिएंगे। रमणिका जी ने कहा कि ऐसा तो मैंने नहीं कहा था। उसके तुरंत बाद कंवल भारती जी नाराज हो कर चले गए। वह कई बार अपने कहे बातों को बदल दिया करती थी और कभी भी अचानक बहुत पैसे वाली हो जाती। तो कभी वे बिल्कुल गरीबों से व्यवहार करती। वह अक्सर कहां करती थी कि मेरे बेटे की कंपनी( जो अमेरिका में है) का टर्नओवर बिहार सरकार के टर्नओवर से ज्यादा है। उनका यह फाउंडेशन उन्हीं की मदद से चल रहा है। उनके यहां जो कर्मचारी काम करते थे उनमें से एक दिनेश को छोड़कर कोई भी कर्मचारी साल 6 महीना से ज्यादा नहीं टिक पाता था। वे रगड़ कर काम लेती थी और किसी भी कर्मचारी को फांके मानने का मौका नहीं देती थी। इसलिए संपादक से लेकर टायपिस्ट टिक नही पाते।
कोई कर्मचारी यदि उनके टेलीफोन से अपने रिश्तेदारों से फोन भी करता तो वह उनकी सैलरी से फोन के बिल के पैसे काट लिया करती। प्रोफेशनल तो इतनी थी कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते। यदि आप जानेंगे कि वे एक दलित आदिवासी और महिला वादी महिला थी। लेकिन इमोशनल तो बिल्कुल भी नहीं थी। कई बार उनके महिला वादी होने पर भी संदेह होता।
ऐसा ही एक वाक्‍या मुझे याद आ रहा है।  एक नेपाली जोड़ा उनके यहां निवास करता था। उसकी पत्नी घर पर झाड़ू पोछा खाना वगैरह बनाने का काम करती थी और पति कहीं किसी कंपनी में चौकीदार था। इसी दरमियान बता दूं मैं की झारखंड हजारीबाग निवासी रमणिका जी के पुराने मित्र का बेटा आईएएस परीक्षा की तैयारी करने के लिए रमणिका का फाउंडेशन में साल भर से ठहरा हुआ था। नाम तो मुझे याद नहीं आ रहा है। लेकिन वह भूमिहार परिवार का था ऐसी जानकारी रमणिका जी ने दी थी। वह लड़का पढ़ाई कम और हीरोगिरी ज्यादा करता था। अक्सर रमणिका फाउंडेशन में आने वाली महिलाओं के पीछे पीछे घूमता रहता और नेपाल से आए उस नेपाली चौकीदार की पत्नी के भी पीछे-पीछे वह घूमा करता था। बाद में पता चला कि इस लड़के ने उस नेपाली महिला के साथ धमकी देकर जबरदस्ती संबंध बनाया और वह महिला प्रेग्नेंट हो गई।  यह जानकारी  उस नेपाली महिला के पति को नहीं हो पाई। क्योंकि वह आधी रात चौकीदारी की ड्यूटी से फाउंडेशन में आकर रुकता था यहां के एक छोटे से कमरे में नेपाली जोड़े को निवास हेतु जगह दिया गया था।  रमणिका फाउंडेशन में हंगामा मच गया। जैसा की होना चाहिए था। इस मामले में रमणिका जी के द्वारा पुलिस में रिपोर्ट लिखा जाना चाहिए था। लेकिन हुआ इसके उलट, वह महिला लगातार रोती रही और पुलिस में जाने की कोशिश करती रही। लेकिन रमणिका जी ने उन्हें डांट कर रोका और उस मामले मैं लीपापोती कर के उसे रफा-दफा कर दिया गया। एक प्रकार से रमणिका जी ने उस भूमिहार बलात्कारी लड़के को बचाने की पूरी कोशिश की जिसमें वह पूरी तरह सफल हो गई। उनके इस व्यवहार से उनके महिला वादी होने पर संदेह होता रहा है मुझे। मैं नहीं समझ पाया कि वह अपने लिखने, कहने और विचारधारा के उलट कैसे व्‍यवहार कर सकती हैं।
जैसा कि मैंने पहले बताया है कि वह फ्रंट में रहने के लिए कुछ भी किया करती। एक बार उन्होंने मुझे फोन किया संजीव जी आमिर खान से संपर्क करो। उन्होंने जो सत्य में जयते पर सफाई कामगारों के लिए एपिसोड बनाया है। उसमें मुझे भी ले ले मैंने भी तो मल मूत्र ढोता भारत पत्रिका विशेषांक निकाला था। इस तरह वे अपने असिस्टेंट उसे फोन करवाती। जिस पर में उन्हें कोई संकोच नहीं था। वह किसी भी संपादक को यदि लेख भेजती, तो उन्हें फोन जरूर करवाती है। जैसे उन्होंने यदि 10 संपादकों को लेख भेजा है। तो अपने असिस्टेंट से उन्हें फोन करने के लिए कहती है और वे स्वयं बात करती। वे जिस प्रकार लाल सलाम बोलने में संकोच नहीं करती थी ठीक उसी प्रकार वह जय भीम बोलने में भी संकोच नहीं करती थी। डॉक्टर अंबेडकर के द्वारा किए गए प्रयासों को वह खुले दिल से स्वीकार करती थी और उन्हें मंचों पर साझा भी करती । सक्रियता उनकी सबसे बड़ी खूबी रही है वह बेहद प्रोफेशनल और सक्रिय महिला थी। मौत के कुछ दिनों पहले भी वह मंचों पर देखी गई और जज्बे के साथ अपने बातों को भी रखती थी। उनका जाना निश्चित रूप से साहित्य और विचारधारा की दुनिया में एक बड़ी खाई है जिसकी क्षतिपूर्ति आसान नहीं है।

Midbrain activation fraud now spreads to rural areas too!

Midbrain activation fraud now spreads to rural areas too!

Dr. Narendra Nayak
       I was on tour of Chattisgarh for four days and an incident that happened at a school called as Manav Seva Samsthan Mandrauth at a village called Megha about 70 kms from Raipur is very interesting and certainly worth reporting! At this village there at a school run by a sect called Kabirpanthis (who are quite rational in their approach to most things) a program was held on the 25th inst. The head of the school had invited children from surrounding schools to our interaction about scientific temper. There were around 500 children, several teachers and villagers. The interaction covered a lot of topics including witch craft, black magic and also some modern day superstitions like mind brain activation. This cheating of making children read blind folded- i.e without light from the object to be visualized falling on the retina had been spreading in this area some years ago and after my visit there and exposure had died down in the urban areas like Raipur, Bhilai etc after a vigorous campaign by some of our organizations. But, now in the past few months it has been raising its head! This had reached even this place. When I demonstrated the same with a girl from one of the schools a teacher got up from the audience said that her son had undergone the process and could see blind folded! I told her I would check him later and we went ahead with our interaction.( (A video in which a teenager sees through a blind fold can be seen here https://youtu.be/EE8u-4kfERk and there are many such on line advertising what is called as midbrain activation!)
       At this another person from the audience named Tameshwar Sahu who claimed to be a teacher of Art of living from a nearby place brought a child,who he said had powers of seeing blind folded. As it turned out he had brought this child just to challenge us! I asked him to bring her on and this little girl of around 8 years was thrust forward asking me to blind fold her and check. Since I had exposed the so called ‘miracle’ and had explained the trick behind if of reading through the gap between the nose and eyes, he asked whether the children were lying. I said yes. He said whether it was possible that thousands of children would lie. I said yes -when they are taught to!  At this juncture I asked the challenger whether this child could see without the light falling on her eye. He said yes. When he openly agreed to that I pulled out the hood that goes over the face- this made of thick black cloth blocks almost all light instead of the customary so called ‘blind fold’ ! That flabbergasted the child as well as the challenger who had expected the usual blind fold! When I covered her face with it and held fingers to be counted and called out. She was wrong every time! When I removed the hood I could see that the child was upset. The children seeing her flop hooted and I felt sad that this little child was humiliated in front of the audience. However, I managed to hug and console her.
       But the challenger was not relenting, he continued with his claims as to how she had predicted rightly ninety of the results of the recently concluded Vidhan Sabha elections of Chattisgarh, how she could find out objects all by the power of the third eye etc! He persisted on continuing testing her then and there. I asked him whether he was the parent of the child as their permission was needed for that he said though he was not, he could take responsibility! Then I put forth our customary challenge of reading the number of a currency note which I would fold and hold right under her nose. He said she would try. I held it and she told that she could tell the last three digits. I said it was not possible and she had to tell all. She first gave the last three digits but I said that would not entitle her or himself to anything as I suspected something fishy. I insisted that the whole number should be given. She blurted out a five digit number and as to be expected, the number was wrong even the number of digits being less than what was printed on the currency note! But, what surprised me was the last two digits 40 were correct! This was interesting as chances of guessing that were in 1 in 100! Later on under retrospection I understood how that happened I had been waving the currency not under her nose and during that process she had managed to have a glimpse of the serial number as the last two digits are quite large!(video of the child trying to read the number of the note is here https://youtu.be/IsHjO2qIS18 but please do not post it on any public media without blanking the face of the child.) The man who brought her to the program to challenge us can be seen in the video wearing a blue kurta.
     But the her teacher Tameshwar Sahu said that she could not perform as it was the usual practice that ten minutes of meditation and yoga were needed before performance! Then the local organizer Dr.Sukhedeve proposed that he could take up a challenge with as many hours of yoga and meditation at a later date at Raipur and he would give a crore to him of she could do that. The challenger persisted with his diatribe about ancient science of India which could enable people to see with the third eye and all that but I told him that I was not interested in any debate but only a practical demonstration under rigidly laid out preconditions and one of them would be the consent of her parents. He said he would bring them along for the challenge! The situation there was such that if the little girl had been pressurized a little more she would have burst into tears raising the sympathy of all and making us look like cruel old men tormenting an innocent child! 
       Later on the teacher who had said that her son had been subjected to midbrain activation'' after paying a fee of four thousand rupees was reading blind folded but when she tightened it started weeping and shouting that his eyes were hurting! Her husband then told her not to torment the child and she had stopped. After seeing our demonstration it became clear to her as how she had been misled into believing that her son could see blind folded!
      After the metros and grade 1 cities the thugs of the mid brain activation scam have now spread to  rural areas where they have now started plying their cheating business. With fancy claims like ancient Indian science and third eye activation they have started duping parents with this new jargon. In urban areas the charges for this process are in tens of thousands while in the smaller places it is a few thousands! However the common factor in both is the gullibility of the species! Our people just want to hang on to their beliefs and the cheats exploit their gullibility and most of the people do not even want to accept that they have been taken for a ride. But the campaign against this scam is picking up again. Three years ago when I had been to Raipur we had taken up exposure this following which a sustained campaign by the local organizations had forced such scamsters to close shop. Since public memory is short they had started it again some weeks back and it was good that my visit there brought the issue to the forefront again. We are just waiting for the challenge to be taken up under controlled conditions which we are going to specify. However going by our previous experiences it is going to be unlikely!
Image    
I
 is the photo pf the school children watching the them


 is about the blind folded teenager demonstrating the supernatural power' of 'blind folded'sight without having undergone any sort of mid brain activation! 

Department wise reservations: attack on bahujan people

विभागवार आरक्षण : वर्ग संघर्ष के इतिहास में वंचितों वर्गों पर एक और प्रहार!
                                                                  -एच.एल.दुसाध  
 7 जनवरी को मंत्रिमंडल में पारित प्रस्ताव को मोदी सरकार द्वारा संविधान की धज्जियां विखेरते हुए महज दो दिनों में लोकसभा एवं राज्यसभा में पास कराकर सवर्णों को आरक्षण दिलाने के बाद, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी ,2019 को समग्र विश्विद्यालय को आरक्षण की इकाई मानने की जगह विभाग को इकाई मानने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय पर मुहर लगाई है, उससे हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से वंचित विश्व की विपुलतम आबादी हतप्रभ है. हतप्रभ हो भी क्यों नहीं, क्योंकि विभागवार आरक्षण लागू होने के बाद हजारों साल से शिक्षालयों से बहिष्कृत दलित, आदिवासी और पिछड़ों का उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षक बनना एक सपना बन जायेगा. विपरीत इसके भारत के उच्च शिक्षा केंद्रों के शिक्षक पदों पर सवर्णों का एकाधिकार और पुष्ट हो जायेगा. कारण ,13 पॉइंट रोस्टर प्रणाली में किसी खास विषय के लिए निकलने वाले प्रथम तीन पद सामान्य के लिए और चौथा पद ओबीसी के लिए होगा. इसके बाद का पांचवां और छठा पद भी सामान्य वर्ग के लिए रहेगा तथा सातवां पद अनुसूचित जाति एवं 14 वां पद अनुसूचित जनजाति के कोटे में जायेगा. चूंकि एक विषय की सामान्यतया दो या तीन रिक्तियां ही निकलली हैं, इस हिसाब से आरक्षित वर्गों(एसटी/एससी और ओबीसी) के लिए कॉलेज/विश्वविद्यालयों में शिक्षक बनना सचमुच एक सपना बन जायेगा.

बहरहाल सिर्फ भारत के जन्मजात वंचित ही नहीं, दुनिया भर के विवेकवान लोग इस बात से हतप्रभ हैं कि जिस देश में भीषणतम असमानता से राष्ट्र की एकता और अखंडता पहले से ही खतरे के सम्मुखीन है, उस देश में सवर्ण आरक्षण के बमुश्किल दो सप्ताह बाद ही उच्च शिक्षा में सवर्णों के एकाधिकार को और मजबूत करने जैसा फैसला कैसे ले लिए गया! ऐसा फैसला लेते हुए क्यों यह भय नहीं हुआ कि इससे देश में विस्फोटक हालात पैदा हो सकते हैं.दरअसल ऐसा नहीं है कि इस देश का शासक वर्ग इन खतरों से अनजान है, किन्तु वह विस्फोटक स्थिति से भलीभांति अवगत होने के बावजूद ऐसे खतरे इसलिए उठा रहे है क्योंकि उसे पता है कि अपने वर्ग-शत्रुओं को नेस्तनाबूद करने लायक, उसे इससे बेहतर अवसर मिल ही नहीं सकते. इसलिए वह अपने स्व-वर्गीय हित में अँधा होकर ऐसे-ऐसे फैसले ले रहा है, जिसकी अन्यत्र कल्पना ही नहीं की जा सकती. इसे समझने के लिए एक बार फिर  महान समाज विज्ञानी कार्ल मार्क्स के नजरिये से मानव जाति के इतिहास का,जिसकी हम अनदेखी करने के अभ्यस्त रहे हैं, सिंहावलोकन कर लेना पड़ेगा. 

   मार्क्स ने कहा है ‘अब तक का विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है. एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है. पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है. मार्क्स के अनुसार समाज के शोषक और शोषित : ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें  कभी भी समझौता नहीं हो सकता. मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के इतिहास की यह व्याख्या मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास की निर्भूल व अकाट्य सचाई है, जिसकी भारत में बुरी तरह अनदेखी होती रही है, जोकि हमारी ऐतिहासिक भूल रही. ऐसा इसलिए कि विश्व इतिहास में वर्ग-संघर्ष का सर्वाधिक बलिष्ठ चरित्र हिन्दू धर्म का प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था में क्रियाशील रहा है, जो मूलतः शक्ति के स्रोतों अर्थात उत्पादन के साधनों के बंटवारे की व्यवस्था रही है एवं जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है

. जी हाँ, वर्ण-व्यवस्था मूलतः संपदा-संसाधनों, मार्क्स की भाषा में कहा जाय तो उत्पादन के साधनों के बटवारे की व्यवस्था रही. चूँकि वर्ण-व्यवस्था में विविध वर्णों(सामाजिक समूहों) के पेशे/कर्म तय रहे तथा इन पेशे/कर्मों की विचलनशीलता धर्मशास्त्रों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध रही, इसलिए वर्ण-व्यवस्था एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले ली,जिसे हिन्दू आरक्षण कहा जा सकता है. वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तकों द्वारा हिन्दू आरक्षण में शक्ति के समस्त स्रोत सुपरिकल्पित रूप से तीन अल्पजन विशेषाधिकारयुक्त तबकों के मध्य आरक्षित कर दिए गए. इस आरक्षण में बहुजनों के हिस्से में संपदा-संसाधन नहीं, मात्र तीन उच्च वर्णों की सेवा आई, वह भी पारिश्रमिक-रहित. वर्ण-व्यवस्था के इस आरक्षणवादी चरित्र के कारण दो वर्गों का निर्माण हुआ: एक विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन और दूसरा वंचित बहुजन.ऐसे में दावे के साथ कहा जा सकता है कि सदियों से भारत में वर्ग संघर्ष आरक्षण में क्रियाशील रहा है. हजारों साल से भारत के विशेषाधिकारयुक्त जन्मजात सुविधाभोगी और वंचित बहुजन समाज : दो वर्गों के मध्य आरक्षण पर जो अनवरत संघर्ष जारी रहा, उसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ आ गया. इसके बाद शुरू हुआ आरक्षण पर संघर्ष का एक नया दौर. 

वर्ग संघर्ष का नया दौर शुरू होते ही आधुनिक भारतीय राजनीति में चाणक्य के नाम से मशहूर नरसिंह राव ने 24 जुलाई ,1991 को गृहित किया ट्रिकल डाउन थ्योरी पर केन्द्रित नवउदारवादी अर्थनीति. राव का मानना था, इससे विकास झरने की भांति ऊपर से नीचे आयेगा, जो शासको की कुत्सित नीति के चलते मुमकिन ही नहीं हो पाया. बहरहाल नवउदारवादी अर्थनीति को अपनाने के पीछे राव के दो हिडेन अजेंडा थे: पहला, आरक्षण को कागजों की शोभा बनाना और दूसरा परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त सुविधाभोगी वर्ग के आर्थिक और शैक्षिणक वर्चस्व को और मजबूत करना . चूंकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सवर्णवादी पार्टियां हैं और दोनों का ही वर्गीय हित एक है, इसलिए अपने वर्गीय हित में दोनों ही दलों के प्रधानमंत्रियों ने राव के बनाये ट्रैक का अनुसरण करने में होड़ लगाया, जिसमे सबको पीछे छोड़ गए वह मोदी, जिन्होंने महज दो दिनों में सवर्ण अरक्षण बिल पास कराने का चमत्कार घटित कर दिया. राव की नीतियों के कारण आज की तारीख में हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगी वर्ग का अर्थ-सत्ता, राज-सत्ता और धर्म-सत्ता  की भांति ज्ञान-सत्ता पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो चुका है.

 बहरहाल मॉडर्न चाणक्य ने वर्ग शत्रु के सफाए के लिए निजीकरण ,उदारीकरण, भूमंडलीकारण, विनिवेशीकरण का जो जाल बिछाया, उससे शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता न रहा. उन्होंने सुपरिकल्पित रुप से निजीकरण को जो बढ़ावा दिया उससे देखते ही देखते कार्पोरेट घरानों और सवर्ण नेताओं को महंगे-महंगे स्कूल/कॉलेजों की श्रृंखला खड़ा करने का अवसर मिल गया. इनमें शिक्षा अत्यंत महंगी  होने के कारण बहुजन यहाँ स्वतः बहिष्कृत होते गए. गुणवत्ती-शिक्षा पर सवर्णों का एकाधिकार कायम करने के लिए एक ओर जहां राव ने निजी स्कूल/कॉलेजों को बढ़ावा दिया, वहीं जिन सरकारी स्कूलों में बहुजनों को शिक्षा सुलभ होती थी, उन्हें बदहाल बनाने की परिकल्पना की .इसके तहत उन्होंने 15 अगस्त,1995 को सरकारी प्राइमरी स्कूलों में मुफ्त भोजन मुहैया कराने का जो निर्णय लिया, वह बहुत मारक साबित  हुआ.बहरहाल गुणवत्ती शिक्षा पर सुविधाभोगी वर्ग का एकाधिकार कायम कराने का जो रास्ता राव ने तैयार किया, उसमें उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने कोई छेड़छाड़ नहीं की: यदि कुछ किया तो यही किया कि जिस गुणवत्ती शिक्षा से आज के प्रतिस्पर्धी युग में अवसरों का सद्व्यवहार किया जा सकता है, उससे बहुजन और दूर छिटकते गए.
 अब जहां तक शिक्षा का सवाल है, अन्यान्य क्षेत्रों की भांति इस क्षेत्र में भी सवर्णों का वर्चस्व स्थापित करने में प्रधानमंत्री मोदी अपने पूर्ववर्तियों को बौना दिए. 

ऐसा इसलिए कि मोदी जिस संघ से प्रशिक्षित होकर सर्वोच्च पद पर पहुंचे हैं, उस संघ और उसके राजनीतिक संगठन को हिन्दू धर्म और उन धर्मशास्त्रों में अपार आस्था रही जो, चीख-चीख कर कहते हैं कि शुद्रातिशूद्रों का जन्म सिर्फ तीन उच्च वर्णीय तबकों(सवर्णों) की निःशुल्क-सेवा के लिए हुआ है. शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक-शैक्षिक) का भोग इनके लिए अधर्म है. अतः कभी जिन हिन्दू धर्म-शास्त्रों को मानवता-विरोधी मानते हुए डॉ. आंबेडकर ने डायनामाईट से उड़ाने का निदेश दिया था, उन धर्मशास्त्रों में अपार आस्था के कारण संघी मोदी के लिए आरक्षण का लाभ उठाने साक्षात् शत्रु थे. अतः आंबेडकरी रिजर्वेशन के सौजन्य से जिन जातियों के लोग आईएएस, आईपीएस,डॉक्टर,इंजीनियर, प्रोफ़ेसर बनकर हिन्दू धर्मशास्त्र-ईश्वर को भ्रान्त बना रहे थे, उन शत्रुओं को नेस्तनाबूद करने के लिए आंबेडकरी आरक्षण को व्यर्थ करने में अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में अतिरिक्त तत्परता दिखलाया, जिससे शिक्षा जगत का आरक्षण भी नहीं सलामत रह पाया.

 मोदी-राज में ही उच्च शिक्षा में सवर्णों का वर्चस्व दृढतर करने के लिए संस्कृत, ज्योतिष, पौरोहित्य, योग इत्यादि जैसी प्रगतिविरोधी विद्यायों को थोपने का सबलतम प्रयास हुआ. इन्ही के राज में शैक्षणिक परिसरों में भेदभाव को इतना शिखर पर पहुँचाया गया कि बहुजन समाज के भूरि –भूरि रोहित वेमुला आत्म-हत्या करने से लेकर यूनिवर्सिटीयों से भागने के लिए विवश हुए. इन्ही के राज में वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को राजीव गांधी फेलोशिप से महरूम करने का कुत्सित प्रयास किया गया. अपने वर्ग शत्रुओं को उच्च शिक्षा से दूर धकेलने के लिए मोदी ने पांच दर्जन से अधिक शीर्ष विश्वविद्यालयों को स्वायतत्ता प्रदान किया. अब उसी कड़ी में मोदी राज में विभागवार आरक्षण का निर्णय लेकर भारत के वर्ग संघर्ष के इतिहास में बहुजनों पर आजाद भारत का सबसे बड़ा प्रहार कर दिया गया है. 

इस प्रहार से बहुजन छात्र और गुरुजन उद्भ्रांत होकर इसे व्यर्थ करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने का मन बनाते  दिख रहे हैं. वे कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे हैं, वे जगह – जगह सभा-सेमीनार आयोजित कर इसका प्रतिवाद कर रहे हैं. 13 पॉइंट रोस्टर के खात्मे व आरक्षण की पूर्व स्थिति बहाल करने के लिए जिला मुख्यालयों से लेकर प्रदेश और देश की राजधानीं में व्यापक पैमाने पर धरना प्रदर्शन की बड़ी तयारी में जुट गए हैं. उनकी तैयारी को को देखते हुए 2016  का सर्द मौसम  याद आ रहा है,जब हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रतिभाशाली छात्र रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या के विरोध में उठी तरंगे विश्व विद्यालयों के कैम्पस और महानगरों को पार कर देश के छोटे-छोटे कस्बों तक फ़ैल गयी थीं. विभागवार आरक्षण  के खिलाफ बहुजन छात्र और गुरुजनों में इतना तीव्र आक्रोश है, कि उनके दबाव में आकर सामाजिक न्यायवादी विभिन्न दलों के नेता भी उनके साथ कंधे-कंधा मिलाकर सडकों पर उतरने के लिए बाध्य हो गए हैं.

जानिए आखिर क्यों प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न दिया गया?

भाजपा राहुल गांधी को भी भारत रत्‍न सम्‍मान देगा
सचिन खुदशाह
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी नानाजी देशमुख और भूपेन हजारिका को भारत रत्न पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। नानाजी देशमुख और भूपेन हजारिका तो भाजपा के थे और उनका आर आर एस से करीबी का रिश्ता रहा है। इसलिए इन दोनों पर तो कोई चर्चा नहीं हो रही है। लेकिन बहुत सारे लोग प्रणव मुखर्जी के नाम पर चर्चा कर रहे हैं। क्योंकि वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे हैं। और राष्‍ट्रपति समेत कई महत्वपूर्ण पदों पर उन्होंने काम किया है।
नाम की घोषणा होते ही भारत की गोदी मीडिया ने कांग्रेसी नेताओं से प्रश्‍न करना शुरू किया कि भाजपा सरकार ने भारतरत्‍न प्रणव मुखर्जी को दिया है आपको कैसा लग रहा है? आप तारीफ करेंगे या विरोध करेंगे? आपने तो उन्हें भारत रत्न नहीं दिया था? इस तरह के प्रश्न दरअसल मामले को उल्‍झाते हैं और जो असल मुद्दे से गुमराह करते हैं।
मैं आपको बता दूं कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वारा प्रणव मुखर्जी को भारत रत्न देना कहीं से भी कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है। आप याद करिए प्रणव मुखर्जी शुरू से कट्टर हिंदुत्व के एजेंडे पर चलते रहें हैं। और यही ऐजेन्‍डा आर एस एस का है यदि आप भूल चुके हो तो बताना चाहूगां कि राष्ट्रपति रहने के दौरान उन्होंने प्रोटोकॉल को तोड़कर बंगाल के एक परंपरागत मंदिर में पुजारी बनकर पूजा अर्चना करवाई थी। जबकि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र प्रमुख द्वारा ऐसा किया जाना संविधान की भावना के विपरीत है। उस समय उनकी इस मामले में काफी किरकिरी भी हुई थी।
कांग्रेस के विभिन्न पदो में रहने के दौरान भी प्रणव मुखर्जी कट्टर हिंदूत्‍व के अपने ऐजेडे पर चलते रहे है। वह भले ही अपने आप को धर्मनिरपेक्ष दिखाने की कोशिश करते रहे लेकिन उनका हिंदूवादी ऐेजेन्‍डा सामने आता रहा है आप ही बताइए कि जीवन भर कांग्रेस में रहने के बाद और कांग्रेस के द्वारा राष्ट्रपति बनाए जाने के बावजूद आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि आर एस एस के बुलाए जाने पर उन्हें जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। सिर्फ वे आर एस एस के कार्यक्रम में गए नहीं बल्कि खुले दिल से उन्होंने आर एस एस की तारीफ की। वह भी उन्होंने ऐसे समय तारीफ कि जब आर एस एस के द्वारा संविधान संशोधन, आरक्षण समीक्षा  और हिन्‍दू राष्‍ट्र जैसे वि‍वादित मुद्दे को अठाया जा रहा है। यह तारीफ दरअसल उनके कट्टर हिंदुत्ववादी एजेंडे पर चलने का एक सबूत मात्र है।
आर एस एस इस तीर से दो निशाने करना चाहता है पहला यह कि वह यह बताना चाहता है कि कांग्रेसी यदि कट्टर हिंदुत्व के एजेंडे पर चलेगे तो वहउसे इनाम देगा। दूसरा यह है कि लोगों में यह संदेश दिया जा सके कि केवल आर एस एस वालों को ही या बीजेपी के लोगों को ही भारत रत्न नहीं दिया जा रहा है। बल्कि विपक्षी पार्टी के सदस्य को भी भारत रत्न दिया जा रहा है ताकि वह अपने कटटरवादी चेहरे पर मुखौदा लगाया जा सके।
कुछ दिन बाद राहुल गांधी को भी भाजपा भारत रत्न का पुरस्कार दे सकती है। क्योंकि राहुल गांधी भी कट्टर हिंदुत्व के एजेंडे पर चल रहे हैं। जिस प्रकार से वे जनेऊ दिखा रहे हैं। अपना गोत्र बता रहे हैं। और विकास के मुद्दों को छोड़कर मंदिर मंदिर घूम रहे हैं। यह भाजपा के एजेंडे पर ही चल रहे हैं। दरअसल भाजपा यही चाहती है कि विपक्ष और तमाम गैरसवर्ण हिंदू यही काम करें। भाजपा अपने मकसद में सफल होते हुए दिखती है। यहां पर एक आम आदमी छला हुआ और ठगा सा महसूस करता है। और ऐसे लोग जो कि कांग्रेस में धर्मनिरपेक्षता की उम्मीद देखना चाहते हैं उन्हें को निराशा होती है। क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि मोदी से ज्यादा मंदिरों में जाने का रिकॉर्ड राहुल गांधी के पास है। और जिस तरीके से अभी मध्यप्रदेश राजस्‍थान और छत्तीसगढ़ में जीतने के बाद राजस्थान और मध्य प्रदेश में जो फैसले गायों के संबंध में लिए गए वह उनके कट्टर हिंदुत्व के एजेंडे को ही बढ़ाते हुए देखते हैं। यह एक प्रकार से भाजपा के ही या फिर कहें आर एस एस के एजेंडे को ही फॉलो करते हुए नजर आते हैं।
मैं आपको बताना चाहता हूं कि आर एस एस अपने कट्टर हिंदुत्व के रवैये को लेकर चलना चाहती है। उसका मकसद है कट्टर हिंदुत्व को बढ़ाना, ना कि भारतीय जनता पार्टी को बढ़ाना। भविष्य में यह भी हो सकता है कि वह भाजपा के बजाए कांग्रेस को सर्पोट करे। जिस तरीके से कांग्रेस कट्टर हिंदुत्व की तरफ जा रही है। इसमें कोई आश्‍चर्य नही होगा की भविष्‍य में मंदिर मंदिर धूमने के कारण भाजपा राहुल गांधी को भी भारत रत्‍न देदे। वे भले ही विदेश में आर आर एस की बुराई करते है। लेकिन राहुल के ऐजेण्‍डे में विकास गुम हो चुका है। प्रणव मुखर्जी को भारत रत्न देना इसका एक छोटा सा उदाहरण है।

Hindu Muslim for whom?

हिन्दू मुस्लिम किसके लिए है?
(कँवल भारती)

सवाल है कि आरएसएस की हिन्दू मुस्लिम की लड़ाई किसके लिए है. क्या यह मुसलमानों के खिलाफ है? अगर कोई ऐसा समझता है, तो गलत समझता है. भाजपा के साथ मुसलमानों के रोटी-बेटी के रिश्ते हैं. क्या दलित-पिछड़ों के साथ ऐसे रिश्ते हैं? फिर हिन्दू मुस्लिम किनके खिलाफ है? स्पष्ट रूप से दलित-पिछड़ी जातियों के खिलाफ है. प्रमाण चाहिए, तो सामन्य वर्ग के लिए दस प्रतिशत आरक्षण पर विचार कीजिये. इनमें तीन सवर्ण जातियां हैं—ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य, और तीन मुस्लिम जातियां हैं—शेख, पठान और सैय्यद. इनको बिना मांगे आरक्षण मिला है. क्या सवर्णों और मुस्लिम उच्च जातियों ने कभी आरक्षण मांगा? अब यह देखिये कि विश्विद्यालयों में विभाग वार आरक्षण का प्राविधान करके किनके विकास को रोका गया है? स्पष्ट है दलित-पिछड़ों के. 
क्या आपको नहीं लग रहा है कि भाजपा ने सत्ता में आने के बाद से ही नफरत की खाई को और चौड़ा कर दिया है? बहुजन और सवर्ण के बीच जो सौहार्द का वातावरण बन रहा था, उसे उसने नफरत में इतना ज्यादा बदल दिया है कि अब ब्राह्मणों और ठाकुरों के खिलाफ बहुजन समाज में नफरत का खतरनाक दौर शुरू हो गया है. पर यही आरएसएस का एजेंडा है. क्योंकि आरएसएस को नफरत से ही आक्सीजन मिलती है. क्या देश को नफरत चाहिए?
आरएसएस का संघर्ष किससे है? नोट कर लीजिये, आरएसएस का भावी संघर्ष दलित पिछड़ों से है, क्योंकि वे मूल निवासी हैं. उसका संघर्ष मुसलमान से नहीं होगा. वह पहले भी नहीं था, आगे भी नहीं होगा. वह तो बस कुछ मुसलमानों को मारकर उन्हें डरा कर रखना चाहता है. सारे अत्याचार दलितों पिछड़ों के साथ होते हैं, चाहे वे बलात्कार हों, आगजनी हो. क्या कभी उच्च मुसलमानों की बस्तियां जलाई गयी हैं? मुसलमानों में कसाई जैसी छोटी जातियों का उत्पीडन किया गया है, क्योंकि वे भी दलित-पिछड़े समुदाय में आते हैं. अत: याद रहे, आरएसएस केवल दलित-पिछड़ी जातियों का शत्रु है. 
देश में कोई विकास का एजेंडा नहीं चल रहा है, एजेंडा सिर्फ हिंदुत्व का चल रहा है. उत्तर प्रदेश में जो विकास पिछली सरकार ने जहाँ छोड़ा था, वह वहीँ पड़ा हुआ है. हाँ, हिंदुत्व का विकास दिन दूनी रात चौगुना तरक्की कर रहा है.
क्या कांग्रेस भाजपा को हराने में सक्षम है? कदापि नहीं. कांग्रेस का नेता बुद्धिजीवी नहीं है. जो नेता अपना जनेऊ दिखाता फिर रहा है, अपना गोत्र बताता फिर रहा है, और मन्दिर-मन्दिर घूम कर हिंदुत्व की राजनीति कर रहा है, वह भाजपा के एजेंडे पर ही चल रहा है. कांग्रेस के नेतृत्व में वह परिपक्वता और वह बौद्धिकता नहीं है, जो नेहरु और इंदिरा गाँधी में थी. प्रियंका गाँधी कभी इंदिरा गाँधी नहीं बन सकती. देश में उनका कोई योगदान नहीं है? ऐशोआराम का जीवन जीने वाली महिला, जिसने कभी खेत की मेढ़ न देखी हो, वह क्या नेतृत्व करेगी? 
और अंत में सपा-बसपा गठबंधन इतिहास की दूसरी बड़ी भूल होने जा रहा है. कैसे? यह चुनाव बाद पता चल जायेगा. पेच प्रधानमन्त्री पद पर फंसेगा. अखिलेश यादव अपने पिता के लिए पलटी मरेंगे, और मायावती के नाम पर कोई पार्टी मुहर नहीं लगाएगी.
(यह टिप्पणी धीरज कुमार शील और मेरे बीच हुई वार्ता का सारांश है)

India women born for burn only


भारत में नारी जलने के लिए ही पैदा होती है।
संजीव खुदशाह
यू तो पूरे संसार में कुछ न कुछ जलता ही  है लेकिन भारत में नारी का जलना सदियों से वर्ल्‍ड रिकार्ड रहा है। इस रिकार्ड को कोई भी देशछूना तो दूर करीब तक नही पहुच पाया है। ऐसा हो भी क्‍यू न भला, यहां नारियों का जलना आम बात है। तभी तो संजली के जल जाने पर किसी  ने चू तक नही किया। वहीं पुरूष जला होता तो उसके नाम से राजीव चौक फिर बाद में मेट्रो स्‍टेशन बना दिया जाता। लेकिन नारी का जलना एक आम बात है। शान की बात है तभी तो सती को माता का दर्जा दिया जाता है लाखो करोडो के मंदिर बना दिये जाते है । ताकि उसके सती होने को न्‍याय संगत ठहराया जा सके। आपने कभी सोचा है भारतीय पुरूष कभी क्‍यो नही सती होता। कुछ मंदिर तो उसके नाम पर बनना चाहिए था। लेकिन ऐसा नही हुआ। क्‍योकि खान दान की इज्‍जत जो नारी के शरीर में ही कही पर समाई हुई है। इज्‍जत बचाने के लिए सती हुई। वाह भई मर्द, कुछ इज्‍जत आप भी तो बचाओं। वैसे भारत में नारी का जलना उत्‍सव की भी बात है। रात के बारह बजे उसे जलाओं और दूसरे दिन खुशियां मनाओं एक दूसरे को होली की बधाईयां दो।
नारियों को जलाना हमारे संस्‍क़ति का भी हिस्‍सा है। कोई माई का लाल इसका विरोध नही कर सकता। अगर विरोध किया तो मजाल है, कि वह जलने से बच जाये। तमाम सेना, संस्‍क़ति रक्षक जो तैनात खडे है आपके लिए। आखिर उन्‍हे ठेका जो मिला है। नारी कई बार इसलिए भी जलाई जाती की उसने किसी का प्रणय निवेदन नही स्‍वीकार किया। अपने अहम से आहत हुये मर्द के लिए बदला लेने का सबसे अच्‍छा साधन है तेजाब। बस तेजाब डाल दो चेहरे पर और भाग जाओं। बच गई तो पूरी जिन्‍दगी अपने आपको ही कोसती रहेगी। दूसरे भी उसे ही गलत ठहराते रहेगे।
अगर दहेज नही लाई या कुल्‍टा है तो बस जला दो उसे ऊफ तक नही करेगी। मृत्‍यु पूर्व बयान भी वह आपके खिलाफ नही देगी। क्‍योकि सनातन परंपरा जो उसे निभानी है। यह एक खोज का विषय है कि क्‍यो खाना बनाते हुये सिर्फ भारत की बहुयें ही जलती है। अरे भई पुरूष भी तो खाना बनाते है सुना है उसे जल के मरते हुये? कुआरी लड़किया भी तो खाना बनाती है सुना है उसे जल के मरते हुये? विदेशो में भी तो स्त्रियां खाना बनाती है। उसी साधन से जिस साधन से हमारे यहां की औरते बनाती है। जरूर गलती आग की होगी और पास खाना बनाती औरत को वह लप-लपाती लपटो में घेर कर निगल लेती होगी। तभी तो भारत की बहुयें इतनी बड़ी संख्‍या में सिर्फ खाना बनाते जल कर मरती है।
मरे भी क्‍यो न। भई परंपरा जो है। तभी तो धोबी की बातों मे आकर उसे लांच्‍छन दिया गया है और परीक्षा देनी पड़ी अग्‍नि‍ की। यहां हर हालत में पुरूष को अग्नि परिक्षा नही देनी पड़ती। अरे भई जो खुद परीक्षा लेता है वह क्‍या कभी परिक्षा दे सकता है। तंदूर कांड तो याद होगा आपको सुशील शर्मा ने किस प्रकार अपनी ही पत्‍नी की बोटी-बोटी काट कर तंदूर में मक्‍खन के साथ जला रहा था। नैना साहनीभवरी देवी से लेकर संजली तक एक लंबी फेहरिस्‍त है, भारत की नारियों के जलने की। इससे कई गुना तो थानो कचहरियों तक नही पहुच पाती।
जो नारी जलने के खिलाफ लड़ती है उसकी हालत संजली के परिवार की तरह हो जाती है। संजली को जलाये जाने के बाद आगरा की पुलिस ने संजली के परिवार को ही घेरे में लिया और चचरे भाई योगेश से दो दिनों तक थाने में बिठाकर पूछताछ किया की वह बिचारा परेशान, जहर खाकर मौत को गले लगा लिया। पुलिस भी यहां की पूरी संस्‍कृति रक्षक जो ठहरी मजाल है कोई संजली के जलने पर आवाज उठाये चाहे वो उसके परिवार का ही क्‍यो न हो। जांच उसके खिलाफ ही कि जायेगी जो पीडि़त होगा यह एक नियम बन चुका है आजकल। भले ही उसका अपना ही थानेदार क्‍यो न मारा जाय। ऐसे में भारत की नारी वह भी दलित आदिवासी हो तो उसकी क्‍या औकात।