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Hundred years journalism of mooknayak Dr ambedkar

डॉक्टर अंबेडकर और उनकी पत्रकारिता के 100 साल

संजीव खुदशाह
वरिष्ठ पत्रकार ललित सुरजन dmaindia.online यूट्यूब चैनल के साथ एक इंटरव्यू के दौरान कहते हैं की "पत्रकारिता निष्पक्ष होकर नही की जा सकती। यह तय करना होगा की आप किस के साथ खड़े है पीड़ित या शोषक।" 

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https://youtu.be/CxwGL24ZGgEj


पत्रकारिता यानी जर्नलिजम इसे लोकतंत्र का चौथा स्‍तंभ भी कहा जाता है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पत्रकारिता कितनी महत्वपूर्ण है। दरअसल पत्रकारिता एक खुशनुमा लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है, इसका उद्देश्य गलत नीतियों की आलोचना और पीड़ितों के हितों की रक्षा करना है। सन् 2020 में डॉक्टर अंबेडकर की पत्रकारिता का सौंवा वर्ष हो रहा है। इस अवसर पर हमें यह मंथन आवश्‍यकता है कि आज की पत्रकारिता दरअसल किस रास्ते जा रही है?
आज की तरह आजादी के पहले भी पत्रकारिता एक समाज सेवा थी। बाद में पेशा और व्यवसाय में बदल गई। धन कमाने की होड़ में पत्रकारिता कामोत्तेजक संसाधन, अंधविश्वास परोसने और नशे का सेवन आदि विज्ञापनों से भरी होती थी। इसके साथ साथ नेताओं की चापलूसी, जातिगत हित को साधने की कोशिशे। पत्रकारिता का मकसद बन गई । बावजूद इसके 19वीं शताब्दी को हिंदी पत्रकारिता का आदर्श युग माना जाता है। इस दशक में ऐसी पत्र पत्रिकाएं भी प्रकाशित की जाती रही हैं, जिनका मकसद  विज्ञापन नहीं, सामाजिक हित था। इसी दौरान 31 जनवरी 1920 से भीमराव अंबेडकर ने अछूतों के सामाजिक उत्थान के उद्देश्य से मूकनायक की शुरुआत की।
अंबेडकर प्रेस की स्वतंत्रता के जबरदस्त हिमायती थे। भारत के संविधान का निर्माण करते समय उन्होंने अभिव्यक्ति और वाणी की स्वतंत्रता को उसमें महत्वपूर्ण स्थान दिया। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में वाक् स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य को मूल अधिकार का दर्जा दिया गया है और इस अधिकार पर राज्य द्वारा, इसी अनुच्छेद के उपखण्ड (2) के अंतर्गत, केवल युक्तियुक्त निर्बंधन ही लगाए जा सकते हैं।

तत्कालीन पत्रकारिता पर डॉक्टर अंबेडकर की राय
मूकनायक के प्रवेशांक में डॉक्टर अंबेडकर लिखते हैं कि "मुंबई इलाके में प्रसिद्ध होने वाले समाचार पत्र विशिष्ट जातियों का संबंध देखने वाले हैं परंतु अन्य जातियों के हित की उन्हें परवाह नहीं होती है। जिन पत्रों में बहिष्कृत समाज की समस्याओं का उल्लेख होता है उनमें ब्राह्मणेत्तर अनेक जातियों के संबंध में विचार आते हैं। परंतु बहिष्कृत समाज की गहन समस्याओं का गहन अभ्यास नहीं होता है। इस कमी को दूर करने के लिए मूकनायक का जन्म हुआ।" आप समझ सकते हैं कि डॉक्टर अंबेडकर तत्कालीन समाचार पत्रों को किस नजरिए से देख रहे थे । आज की तरह ज्यादातर समाचार पत्र सवर्णेा का गुणगान और पीड़ितों की उपेक्षा करते रहे हैं। उन्होंने 3 अप्रैल 1927 को बहिष्कृत भारत का प्रकाशन किया यह समाचार पत्र सामाजिक राजनीतिक साहित्यिक धार्मिक अनेक पहलुओं पर केंद्रित किया गया। डॉ आंबेडकर कहते हैं कि पत्रकारिता धन अर्जन का धंधा नहीं है इसका एक निश्चित उद्देश्य है। जिनको धन अर्जन करना है। उनके लिये और भी पेशे हैं। डॉक्टर अंबेडकर बड़ी कठिन परिस्थिति में पत्रिकाओं का प्रकाशन करते रहे हैं। कर्ज होने के बावजूद भी पैसा बटोरने के सस्ते साधनों से दूर रहे हैं। वे लिखते हैं कि "विज्ञापन द्रव्य लोभ बढ़ाने का कारण है द्रव्य लोभ के कारण अनीति को उत्तेजना देने, भ्रम फैलाने, पाठकों की अनिष्ट कारक वासना उद्दीप्त करने, कामोत्तेजक औषधि सेवन , विलायती दारू के अनेक विज्ञापन प्रकाशित किए जाते हैं। इस तरह कितने ही समाचार पत्र लोगों को मूर्ख बनाने के कारखाने हैं।" इस प्रकार डॉक्टर अंबेडकर अखबारों की विज्ञापन नीति पर गहन अध्ययन कर उस समय की मुख्यधारा की पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करते है।

मूकनायक के बाद डॉक्टर अंबेडकर ने समता समाज संघ के मुखपत्र के रूप में ‘समता’ समाचार पत्र की शुरुआत की बाद में इसका नाम ‘जनता’ कर दिया गया 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने इसी पत्र का नाम ’प्रबुद्ध भारत’ किया। जिसमें समय-समय पर वे सामाजिक कार्यकर्ताओं राजनीतिक नेताओं के प्रश्नों का जवाब देते थे। और अपना संदेश आम जनता तक पहुंचाने का काम करते थे।

वर्तमान में मुख्य धारा की पत्रकारिता

मुख्य धारा की पत्रकारिता मे वैसे तो दलित समाज का कोई संपादक या एंकर आपको नहीं मिलेगा जो अपनी जातिगत पहचान के साथ वहां उपस्थित हो । वर्तमान में मुख्य धारा की पत्रकारिता को आप देख सकते हैं कि किस प्रकार से न्यूज़ चैनल और उसके एंकर अपने जाति के मुताबिक समाचारों को पलटते हैं या उस में फेरबदल कर देते हैं। ज्यादातर मुआमलों में जब अपराधी उनकी सवर्ण जाति का होता है। तो केवल ‘दबंग’ लिखकर अपराधियों की पहचान छिपा जाते हैं। वही अपराधी यदि ओबीसी या दलित वर्ग का होता है तो उसकी जाति के नाम से दिखाया जाता है जैसे रामू स्वीपर, नंदू कुर्मी, लल्लू महार आदि। कई बार किसी मजबूरीवश सवर्ण अपराधी के नाम लिखे जाते हैं। लेकिन सरनेम नहीं लिखे जाते ताकि उनकी पहचान को शातिराना ढंग से छिपाया जा सके। उन्नाव केस में पीड़िता को जिंदा जला देने वाले सवर्ण अपराधियों के साथ यही हुआ। मुख्य मीडिया ने उनकी पहचान को बेरहमी से छिपा दिया।

ज्यातर मुख्यधारा की मीडिया कारपोरेट द्वारा संचालित है। बहुत सारे इलेक्ट्रॉनिक चैनल, समाचार पत्र और संस्थान पत्रकारिता की आड़ में बिजनेस करते हैं। और ब्लैक मनी को कंज्यूम करने का काम करते हैं। कुछेक मीडिया सच्चाई की पत्रकारिता करती लेकिन वे अंतिम सांसे गिन रहे हैं। या कोर्ट के चक्‍कर काट रही है। नेताओं की चापलूसी, अफसरों की ब्लैक मेलिंग करना पत्रकारिता का काम रह गया है।
मुख्यधारा की मीडिया के संपादकों, एंकरो, मालिकों के पास अकूत धन संपत्ति कहां से आई है। यह पूछने वाला कोई नहीं है। जाहिर है। पत्रकारिता की आड़ में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो पत्रकारिता के आदर्श के खिलाफ है।

भारतीय प्रेस के बारे में आंबेडकर के विचार और पत्रकार बतौर उनका आचरण, आज भी उन लोगों के लिए आदर्श हैं, जो मीडिया का मानव विकास के उपकरण के रूप में उपयोग करना चाहते हैं। उन्होंने लिखा कि ”भारत में पत्रकारिता पहले एक पेशा थी। अब वह एक व्यापार बन गई है। अखबार चलाने वालों को नैतिकता से उतना ही मतलब रहता है जितना कि किसी साबुन बनाने वाले को। पत्रकारिता स्वयं को जनता के जिम्मेदार सलाहकार के रूप में नहीं देखती। भारत में पत्रकार यह नहीं मानते कि बिना किसी प्रयोजन के समाचार देना, निर्भयता पूर्वक उन लोगों की निंदा करना जो गलत रास्ते पर जा रहें हों-फिर चाहे वे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, पूरे समुदाय के हितों की रक्षा करने वाली नीति को प्रतिपादित करना उनका पहला और प्राथमिक कर्तव्य है। व्यक्ति पूजा उनका मुख्य कर्तव्य बन गया है। भारतीय प्रेस में समाचार को सनसनीखेज बनाना, तार्किक विचारों के स्थान पर अतार्किक जुनूनी बातें लिखना और जिम्मेदार लोगों की बुद्धि को जाग्रत करने की बजाए गैर-जिम्मेदार लोगों की भावनाएं भड़काना आम हैं।…व्यक्ति पूजा के खातिर देश के हितों की इतनी विवेकहीन बलि इसके पहले कभी नहीं दी गई। व्यक्ति पूजा कभी इतनी अंधी नहीं थी जितनी की वह आज के भारत में है। मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता होती है कि इसके कुछ सम्मानित अपवाद हैं परंतु उनकी संख्या बहुत कम है और उनकी आवाज़ कभी सुनी नहीं जाती।’’

अंबेडकरवादी पत्रकारिता की परंपरा

डॉक्टर अंबेडकर ने मूकनायक के माध्यम से अंबेडकरवादी पत्रकारिता की जो  नीव रखी थी। वह आज विशालकाय इमारत का रूप ले चुकी है। तमाम लोग धड़ल्ले से लिख रहे हैं और अपनी बात को रख रहे हैं। हिंदी अंग्रेजी समेत भारत की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में डेढ़ हजार से ज्यादा पत्र पत्रिकाएं निरंतर प्रकाशित हो रही है। जिसमें वे अपने दुख-दर्द शोषण और संघर्ष को साझा कर रहे हैं। इसमें खुशी की बात यह है कि अंबेडकरवादी पत्रकारिता या जिसे  प्रगतिशील पत्रकारिता भी कह सकते हैं। जाति का बंधन टूटा  हैं। दलित आदिवासी पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक वर्ग समेत प्रगतिशील सवर्ण भी इस पत्रकारिता में व्यस्त हैं और वंचितों की आवाज बन चुके हैं। आदिवासी अनुसूचित जातियों के मुद्दे, पिछड़ा वर्ग के मुद्दे, बहुजन मुद्दे पूंजीवाद के खिलाफ और खुद ब्राह्मणवाद के खिलाफ भी लोग लगातार लिख रहे हैं । सोशल मीडिया के आ जाने के बाद मानो की अंबेडकरवादी पत्रकारिता को पंख लग गया है। फेसबुक, व्हाट्सएप, टि्वटर में लगातार इस पर लिखा जा रहा हैं और वह हजारों बार शेयर किए जाते हैं। सोशल मीडिया ने आम लोगों तक अपनी पहुंच बनाई है। जिसके माध्यम से अंबेडकरवादी पत्रकारिता घरों घर पहुंची है। लोगों को चेतन सील करने और अपने शोषण के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा दे रहे हैं।

यदि आज अंबेडकर होते तो क्या करते?

यह प्रश्न जायज है कि आज डॉक्टर अंबेडकर होते तो क्या करते ? निश्चित तौर पर जिस प्रकार से सोशल मीडिया की पहुंच एक विशाल जनसमुदाय तक है। डॉक्टर अंबेडकर होते तो वे ट्विटर पर होते, फेसबुक एवं ब्लॉक लिखते, व्हाट्सएप पर उनके संदेशों को फैलाया जाता और उनका एक विशाल चैनल यूट्यूब पर होता। वे जिन बातों को मूक नायक, समता, जनता और प्रबुद्ध भारत में कह रहे थे। उन्हीं बातों को आज के संदर्भ में यूट्यूब चैनल में कहते होते।

आधुनिक पत्रकारिता और उसका अध्ययन बिना डॉक्टर अंबेडकर के पूरा नहीं हो सकता। डॉक्टर अंबेडकर का जो योगदान पत्रकारिता के संबंध में है वह अमूल्य है। वह ना केवल एक रास्ता दिखाते हैं बल्कि उसका अनुसरण भी वे स्वयं करते हैं। निश्चित तौर पर आने वाली पीढ़ी उनकी पत्रकारिता से प्रेरणा लेगी और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ को मजबूत करने में अपना योगदान देगी।
Publish on navbharat 2 February 2020

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