भारत की जाति व्यवस्था प्राचीन काल से चलती आ रही सामाजिक प्रणाली है, जिसने समाज को जन्म‑आधारित श्रेणियों में विभाजित किया है। इस व्यवस्था का इतिहास कई सदियों पुराना है, और यह सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालती है। इतिहासकारों के अनुसार, इस प्रणाली ने समाज को वर्णों में बांटा—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—और इन वर्णों के बाहरी समूह जैसे दलितों को कट्टर भेदभाव का सामना करना पड़ा।
जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा तय करना, उसके अवसरों तक पहुँच को सीमित करना और समुदाय के भीतर उसकी पहचान को स्थापित करना इस व्यवस्था के मूल पहलू हैं। इसके परिणामस्वरूप, लोगों के विवाह, पेशे और सामाजिक सम्मान तक पर प्रभाव पड़ा है। आधुनिक भारत में चेतना के विकास और संविधान के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद, जाति‑आधारित भेदभाव आज भी कई रूपों में मौजूद है—जैसे शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सहभागिता में विषमताएँ।
समाज के कुछ हिस्सों में जाति की यह परंपरा अब भी प्रचलित है और इसके खिलाफ निरंतर संघर्ष जारी है। सामाजिक न्याय के लिए आंदोलन, कानून के तहत समान अवसर की मांग और शिक्षा के माध्यम से जागरूकता फैलाना इस प्रणाली को मतभेदों से मुक्त करने के प्रयास हैं—एक ऐसा प्रयास जो आज के भारत में सभी के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित कर सकता है।
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