संत घासीदास जी की कहानी, जीवन परिचय, सतनाम पंथ का इतिहास और उनके सामाजिक संदेश को विस्तार से जानें। यह लेख प्रेरणा और समानता का संदेश देता है।
संत घासीदास जी का जीवन परिचय
संत घासीदास जी छत्तीसगढ़ की पावन धरती पर जन्मे एक महान समाज सुधारक और आध्यात्मिक गुरु थे। उनका जन्म वर्ष 1756 में रायपुर (वर्तमान बलौदाबाजार-भाटापारा जिला) क्षेत्र में हुआ माना जाता है। वे सतनाम पंथ के संस्थापक थे, जिसने समाज को सत्य, समानता और मानवता का मार्ग दिखाया।
सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष
उस समय समाज में जाति भेदभाव, छुआछूत और अन्याय व्याप्त था। संत घासीदास जी ने इन कुरीतियों का खुलकर विरोध किया। उन्होंने लोगों को यह संदेश दिया कि—
“मनखे-मनखे एक समान”
(सभी मनुष्य समान हैं)
यह विचार आज भी सामाजिक समरसता का मजबूत आधार है।
सतनाम पंथ की स्थापना
संत घासीदास जी ने सतनाम (सत्य का नाम) का प्रचार किया। उनका मानना था कि ईश्वर एक है और सत्य ही सबसे बड़ा धर्म है। सतनाम पंथ ने लोगों को—

- सत्य बोलने
- नशा त्यागने
- हिंसा से दूर रहने
- समानता अपनाने
की सीख दी।
गुरु घासीदास जयंती का महत्व
हर वर्ष 18 दिसंबर को गुरु घासीदास जयंती मनाई जाती है। इस दिन छत्तीसगढ़ सहित देशभर में सतनाम पंथ के अनुयायी भक्ति, सेवा और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
संत घासीदास जी की शिक्षाएँ (मुख्य संदेश)
- सत्य ही ईश्वर है
- सभी मनुष्य समान हैं
- कर्म ही सबसे बड़ा धर्म है
- समाज में प्रेम और भाईचारा आवश्यक है
आज के समय में प्रासंगिकता
आज जब समाज में फिर से भेदभाव और असमानता बढ़ रही है, संत घासीदास जी की शिक्षाएँ हमें एक बेहतर, न्यायपूर्ण और मानवतावादी समाज की दिशा दिखाती हैं।
निष्कर्ष
संत घासीदास जी केवल एक संत नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक थे। उनके विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सत्य और समानता के रास्ते पर चलकर समाज को बदला जा सकता है।
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