श्री राम वन गमन मार्ग के नाम से सांप्रदायिक भावना बढ़ाने एवं राजनीतिकरण करने के नाम से एफ आई आर दर्ज करने की शिकायत

श्यामा देवी साहू एवं खूब लाल ध्रुव द्वारा ओझि राजनीति करते हुए
पिछले दोनों ग्राम तुमरा बहार के आश्रित ग्राम  बिश्रामपुर के "तुमा" में जय बूढ़ादेव अनुसंधान केंद्र द्वारा आयुर्वेदिक अनुसंधान केंद्र स्थापन हेतु  मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिताजी श्री नंद कुमार बघेल द्वारा भूमि पूजन  कार्यक्रम को बौद्ध धर्म एवं राम लक्ष्मण मन्दिर से जोड़कर सांप्रदायिक राजनीति कर रहे हैं, जिस की हम विश्रामपुर एवं तुमा खुर्द के समस्त ग्रामवासी कड़ी निंदा करते है 
और उनके के द्वारा लगाया गया आरोप राम वन गमन का बोर्ड हटाकर बौद्ध विहार लिखा गया यह सब बेबुनियाद है
 कि नंद कुमार बघेल के द्वार ग्रामीणों को बरगला के बौद्ध धर्म का प्रचार करना यह सब गलत बात है उनका आने का उद्देश्य *बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार बिल्कुल ही नहीं था* ये सब झूठे दोषारोपण की राजनीति है सम्मानीय व्यक्ति के ऊपर झुठा आरोप
जिस समिति के द्वारा यह लोग यहां की शिकायत कर रहे हैं उस  समिति में ग्राम से कोई भी व्यक्ति सदस्य नहीं है
 विकास कार्यों के भूमि पूजन के आमंत्रण में आसपास गांव के आदिवासी समाज प्रमुख द्वारा बस्तर जड़ी बूटी आयुर्वेद अनुसंधान केंद्र की स्थापना के लिए भूमि पूजन का कार्यक्रम किया गया था।
 राम राम टेकरी रामेश्वरम धाम भजन विकास समिति ऐसा कोई भी संस्था हमारे गांव नहीं है हम इसका खंडन करते हैं

 *ग्राम बिश्रामपुर के तुमा में पर्यटन संबंधी हो रहे विकास कार्य को राम वन गमन मार्ग से जोड़कर राजनीति की जा रही है* जिसका हम समस्त ग्रामवासी घोर विरोध करते हैं एवं आज समस्त ग्राम प्रमुखों द्बारा पूर्व जिला पंचायत सदस्य *श्रीमती श्यामा देवी साहू एवं क्षेत्र क्रमांक 10 के जिला पंचायत सदस्य खूब लाल ध्रुव* के ऊपर राम वन गमन मार्ग के नाम से राजनीति कर सांप्रदायिक भावना बढ़ाने के नाम से
पुलिस अधीक्षक एवं अपर कलेक्टर से एफ आई आर दर्ज करने की मांग करते है 

 *समस्त ग्रामवासी ग्राम विश्रामपुर "तुमाखुर्द" जिला धमतरी।*

पदोन्नति जारी होने से अनुसूचित जाति व जनजाति के संवैधानिक हितों की हो रही है अनदेखी

सभी शासकीय विभागों में अनारक्षित बिंदु पर पदोन्नति जारी होने से अनुसूचित जाति व जनजाति के संवैधानिक हितों की हो रही है अनदेखी

VINOD  KOSHLE 

छत्तीसगढ़ राज्य के सभी विभागों में पदोन्नति सूची लगातार जारी हो रही है। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पदोन्नति में आरक्षण नियम 2003 के उपनियम 5 को 2 माह के लिए स्टे प्रदान किया गया था। राज्य शासन के महाधिवक्ता द्वारा कोर्ट में पदोन्नति में आरक्षण नियम 2003 के उपनियम 5 में आंशिक त्रुटि माना था और इसे युद्ध स्तर पर संशोधन कर नियम प्रतिस्थापित कर नए नियम फ्रेम करने कोर्ट में कहा था । कोर्ट में सुनवाई 16 अप्रैल के लिए निर्धारित की गई थी । 21 मार्च से कोरोना के वजह से लॉक डाउन की स्थिति निर्मित हो गई । पदोन्नति में आरक्षण केस की सुनवाई आगे नहीं बढ़ पाई और आज पर्यंत कोर्ट में विचाराधीन है। लॉक डाउन की स्थिति में सभी विभागों ने लगातार अनारक्षित बिंदु पर पदोन्नति देना शुरू कर दिया है जबकि छत्तीसगढ़ पदोन्नति नियम 2003 के उप नियम 5 पर ही रोक लगी है बाकी सारी कंडिकाएं अभी भी लागू हैं । विभागों में रिक्त पदों को अनारक्षित श्रेणी में ही भरने के लिए किसी भी प्रकार के पदोन्नति नियम नहीं बने है।*अनुसूचित जाति जनजाति रोस्टर बिंदु रोक का मतलब एससी एसटी के पदों को खत्म करना नहीं है बल्कि विद्यमान पदोन्नति नियमों के अनुसार रिक्त पदों को अनारक्षित ,अनुसूचित जाति व  जनजाति  श्रेणी में बांटकर पदोन्नति देते हुए अनुसूचित जाति व जनजाति के पदों को सुरक्षित रखना चाहिए था। इस तरह नियमों का पालन विभागों द्वारा नही किया जा रहा है। सोशल जस्टिस लीगल सेल  के द्वारा  सामान्य प्रशासन विभाग , मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ शासन व डीजीपी पुलिस मुख्यालय नवा रायपुर को तीन बार पत्र के माध्यम से अवगत कराया जा चुका है। इसके बावजूद सारे पदों पर अनारक्षित बिंदु में पदोन्नति देने की कार्यवाही अनवरत जारी है । विभागों द्वारा समस्त पद अनारक्षित श्रेणी में भरना अनुसूचित जाति व जनजाति के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। इसके साथ ही सभी विभागों को पदोन्नति नियम 2003 के नियमानुसार बैकलॉग पदों पर भी पदोन्नति प्रदान करनी थी। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा छ ग.लोक सेवा  पदोन्नति नियम 2003 के उप नियम को 5 को नए सिरे से प्रतिस्थापित करना प्रक्रियाधीन है। लगातार पदोन्नति अनारक्षित बिंदु पर भरने से अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए रिक्त पद नहीं बच पाएंगे।परिणामस्वरूप अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकारी कर्मचारियों को पदोन्नति के लिए कई वर्ष इंतजार करने पड़ सकते हैं। सबसे ज्यादा पुलिस विभाग द्वारा पदोन्नति सूची जारी की जा रही है ।
*प्रदेश भर में 1 लाख से अधिक अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के अधिकारी कर्मचारियों द्वारा सभी विभागो के कुल रिक्त पदों में से अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए पद संरक्षित करने  एवं पदों को संरक्षित करने की सूचना सार्वजनिक करने मांग की जाती है। विभागों द्वारा रिक्त सारे पदों को अनारक्षित श्रेणी में भरने के दुष्चक्र से 1 लाख से अधिक अनुसूचित जाति व जनजाति अधिकारी कर्मचारियों में रोष व्याप्त है। हम लॉक डाउन का पालन करते हुए केवल पत्र व्यवहार से विभागो को अवगत करा रहे है। हम कोई विरोध प्रदर्शन नहीं करना चाहते हैं । यदि हमारी जायज मांगों को अनदेखा किया जाता है तो हम धरना प्रदर्शन के लिए बाध्य होंगे जिसकी समस्त जिम्मेदारी शासन प्रशासन की होगी ।उक्त जानकारी सोशल जस्टिस लीगल सेल संगठन के कोऑर्डिनेटर विनोद कुमार कोसले द्वारा दी गई है।
✍🏻 सोशल जस्टिस लीगल सेल

2024 के लोकसभा चुनाव में पिछड़े वर्ग की विशेष भूमिका होगी

2024 के लोकसभा चुनाव में पिछड़े वर्ग की विशेष भूमिका होगी 
नंद कुमार बघेल
राष्ट्रीय मतदाता जागृति मंच के अध्यक्ष श्री नंद कुमार बघेल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब किसी भी चुनाव में जीत नहीं पाएंगे । क्योंकि वह जितना झूठ बोल सकते थे बोल चुके । जनता उनके झूठ को समझ चुकी है। श्री नरेंद्र मोदी मोहन भागवत के साथ है और श्री मोहन भागवत घोर ब्राह्मणवादी हैं । वह इस देश के पिछड़े वर्ग को गर्व से कहो हिंदू हैं कहकर वोट लेना चाहते हैं। लेकिन पिछड़ा वर्ग को कोई भी अधिकार नहीं देना चाहते। आर एस एस के मुखिया कोई पिछड़े वर्ग का नहीं बनेगा ना ही महिला बनेगी। केवल ब्राह्मण बनेगा। वह भी चितपावन ब्राह्मण। वे पिछड़े वर्ग को आर एस एस का कार्यकर्ता जरूर बनाएंगे। आर एस एस का सभी प्रकार के हमाली पिछड़ा वर्ग के लोग करेंगे । और उनको ना नौकरी में स्थान होगा और ना ही कोई पद प्रतिष्ठा मिलेगी । यदि धोखे से पिछड़ा वर्ग का विधायक, एससी एसटी के विधायक सांसद बन भी जाए । तो लोकसभा, राज्यसभा , विधानसभा में अपने समाज के बारे में उन्हें बोलने का कोई अधिकार नहीं होता। यदि बोलने का अधिकार की मांग करेंगे हैं तो उन्हें पार्टी से निकाल दिया जाएगा।
श्री बघेल ने कहा कि यह सब उपरोक्त बातें निराशाजनक है। लेकिन आशा जनक यह है कि आज हमारी लड़कियां पड़ रही हैं । और हर क्षेत्र में वह टॉपर हैं। जब लड़कियां मां बनेगी, घर की प्रमुख बनेगी, तब नई क्रांति आएगी। और पत्थर के भगवान को स्वयं नहीं पूजेगी और समाज को नहीं पूजने देगी। चीनी कोरोना एवं मोदी करोना ने हमें समझा दिया है कि एससी एसटी ओबीसी और अल्पसंख्यक के मंदिर मस्जिद का विचार बिल्कुल गलत है । सारे मंदिरों के भगवान करोना को समाप्त नहीं कर सके। एससी एसटी ओबीसी के लोग मंदिर में चढ़ावा देना बंद कर दिए हैं। भगवान ने अपने पुजारियों का पेट पालना बंद कर दिए हैं। ब्राह्मण पुजारी चढ़ोतरी नहीं होने के कारण सरकार से  क्षतिपूर्ति की मांग रहे हैं । 
हम तो मोहन भागवत और मोदी से प्रार्थना करते हैं कि यदि किसी कारण से पुजारी का निश्चित आए नहीं आता है तो भारत सरकार उन्हें मुआवजा दे। इसके साथ प्रधानमंत्री मोदी तेली होने के कारण भारत के समस्त मंदिरों का राष्ट्रीयकरण कर दें। और  मंदिर के सोने चांदी को देश के खजाने में शामिल कर दें। तो देश आर्थिक संकट से बच पाएगा और मोदी जी क्योंकि तेली है इसलिए इस देश के मूल निवासी हैं। वह मोहन भागवत के आज्ञाकारी प्रधानमंत्री ना बने। जब गंगा से वोल्गा जाने की बात होगी तो नरेंद्र मोदी को वोल्गा नहीं भेजा जाएगा। वोल्गा जाने के लिए मोहन भागवत ही होंगे।
 रिपोर्ट संजीव 29 अप्रैल 2020

मनुवादी गुलाब कोठारी पत्रिका न्यूज़ के मालिक होश में आओ

लेखक विनोद कोसले

हम विनोद कोसले का यह महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित कर रहे हैं जिसमें गुलाब कोठारी के पत्रिका में प्रकाशित संपादकीय दिनांक 28 अप्रैल 2020 का जवाब दिया गया है

     गुलाब कोठारी जी सम्पादक पत्रिका न्यूज आपकी लेख पुनर्विचार आवश्यक का जवाब आशा है अपनी सम्पादकीय में स्थान देंगे।
आज दिनांक 28 अप्रैल 2020 को आपने आरक्षण के मुद्दे पर
पुनर्विचार आवश्यक लेख लिखा। आपकी लेखन से देशभर के अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़ा वर्ग समुदाय के लोग आहत हुए है।आपने अनुचित तरीके से उद्धरण देकर आरक्षण पर समीक्षा की बात की है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने चर्चा के बिंदु में आरक्षण पर समीक्षा की बात कही लेकिन केस का मुद्दा अनुसूचित क्षेत्रों में 100%  आरक्षण देने पर रोक लगाने को लेकर था। अनुसूचित क्षेत्रों में  100% आरक्षण क्यों नही दिया जा सकता है ।वहां उनकी शत प्रतिशत आबादी रहती है। 5वी अनुसूची अनुसूचित क्षेत्र में राज्यपाल को विशेषाधिकार सँविधान में उपबन्धित है।जिसे स्थानीय भाषा की ज्ञान नही,वह कैसे वहां उचित संप्रेषण कर पाएंगे।क्या गैर अनुसूचित लोग उनकी समस्याओं से अवगत हो पाएंगे?बिल्कुल नही।अनुसूचित क्षेत्र में भाषायी समस्या होती है।  बस्तर छत्तीसगढ़ आकर देखिए। पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में बाहरी लोगों का ज्यादा दखल बढ़ गए हैं।हम अनुसूचित क्षेत्र में 100%प्रतिनिधित्व की मांग करते है।जल जंगल जमीन हमारी है।हम सदा प्रकृति पूजक रहे है।

आपने आरक्षण को आत्मा का विषय कहा है ।आरक्षण कोई गरीबी उलमूलन कार्यक्रम, रोजगार गारंटी योजना या फिल्म के लिए सीट आरक्षण नही है,यह एक प्रतिनिधित्व है ।आपको उदाहरण देकर अवधारणा स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ,शायद मेरी लेख पढ़ने के बाद आपकी विचार बदल जाए।मान लीजिए यदि संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधित्व के लिए पोस्ट निकलती है तो इस बात का फर्क नहीं पड़ता कि भारत में चुना जाने वाला व्यक्ति अमीर है या गरीब ।लेकिन उसका भारतीय होना जरूरी है ।साथ ही यह भी समझने की कोशिश करें कि संयुक्त राष्ट्र ने एक जॉब इसलिए नहीं निकाली कि उसे किसी एक भारतीय की गरीबी इस जॉब से मिटानी हैं बल्कि इसलिए निकाली ताकि कोई चुना हुआ व्यक्ति भारत की आवाज संयुक्त राष्ट्र में रख सकें ।अब यदि व्यक्ति संयुक्त राष्ट्र के निर्धारण किए गए मापदंडों को पूरा करता है तो बाकी के भारतीय क्या यह कह सकते हैं कि चुना गया भारतीय बाकि भारतीयों को आगे बढ़ने नहीं दे रहा है?यही बात भारत में आरक्षण के मामले में हैं।

इतिहास के पन्नों में झांक कर देखिए प्रतिनिधित्व सदियों से सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वंचित व सताए हुए अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों को समान अवसर प्रदान करने की एक व्यवस्था है। समान अवसर इसलिए क्योंकि रेस की लाइन एक नहीं है ।इसलिए रेस के लाइन एक करने व विशेष अवसर प्रदान करने प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई है। जिसे देशभर में आरक्षण आरक्षण के नाम से समीक्षा की बात की जा रही है।

 हम भी रोज-रोज आरक्षण की समीक्षा बातों को सुनकर अब हम भी समीक्षा चाहते हैं ।लेकिन शर्त है पूरे भारतवर्ष की सारी संपतिया पूरे लोगों में बराबर बांट दी जाए और जिन लोगों ने जाति की व्यवस्था बनाई ।उनको केवल 1 पीढ़ी को  शिक्षा से वंचित रखा जाए।तब रेस की लाइन एक होगी।और मुकाबला भी बराबर का होगा।

मनुष्य और पशु पक्षी की विकास मैं थोड़ी भिन्नता है दोनों का चलन पाद व प्रजनन अलग अलग है तो फिर कैसे मनुष्य पक्षी जन्म ले सकता है। एक निश्चित उम्र के बाद मनुष्य व पशु पक्षी मृत हो जाते है।मृत पश्चात शरीर जटिल कार्बनिक पदार्थो से सरल कार्बनिक पदार्थो में अपघटित हो जाता है।यह विकास का क्रम है।
दो समान जीवधारियों से प्रजनन पश्चात सन्तति उतपन्न होती है।हमने डार्विन व मेंडल के सिद्धांत में पढ़ा है।।

राष्ट्र की समुचित विकास के लिए ही भारतीय संविधान में सभी भारत के नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान किए ।सँविधान में 'किसी व्यक्ति को धर्म मूल वंश जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता,उपबन्धित है।
संविधान निर्माण के पूर्व हजारों वर्षों से जन्म के आधार पर भेदभाव होता था। तेली के तेली,  चमार के घर चमार ,लोहार के घर लोहार ,खटीक के घर खटीक,नाई के घर नाई, गोंड के घर गोंड़  पैदा होता था ।संविधान निर्माण के बाद प्रतिनिधित्व व अवसर की समता पश्चात एक चमार का बेटा आईएएस भी बनने लगा।  मात्र आजादी के 70 वर्षों बाद अब आरक्षण की समीक्षा की बात होने लगी।हमारे पूर्वजो ने तो सदियां त्रासदियां झेलीं है।मुँह से उफ्फ तक नही निकली।

इतिहास उठाकर देखें जातियां किसने बनाएं? जाति में ऊंच-नीच भेदभाव किसने पैदा किए? जवाब आपको पता है।

 मंडल कमीशन का इतिहास लिखता हूं, 1953 चौहान में काका कालेकर आयोग से शुरू हुआ सफर 1990 में मंडल कमीशन के रूप में पिछड़े वर्गों के पहचान के लिए 3743 जातियां की चिन्हांकित किए। काफी मुश्किलों से ओबीसी आरक्षण बिल पास हुआ।यह बिल भी कोर्ट में चैलेंज हुआ।कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण सही माना। जब भी नई वैकेंसी रिक्रूट होती है ।तो उस वैकेंसी को प्राप्त करने के लिए कई शर्ते होती हैं। तब कहीं जाकर कोई भी व्यक्ति उस पद के काबिल होता है ।क्या कभी आज तक ऐसा हुआ है ,कि किसी आठवीं पास एससी एसटी ओबीसी को आईएएस आईपीएस बनाए गए हो?हमने सारे सरकारी पदों को प्राप्त करने के लिए उसके लायक योग्यता हासिल की है।

 गांव में निवास करने वाले एससी एसटी ओबीसी समुदाय आज भी  कठिन परिश्रम से अनाज उत्पन्न कर रहे हैं ।जिसका उपभोग देश विदेश के लोग कर रहे हैं ।आजादी के 70 वर्ष बाद भी देश की उच्च शिक्षा संस्थानों में महज sc.st.obc की भागीदारी मात्र कुछ प्रतिशत है। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट में आरक्षित वर्गों की भागीदारी कुछ एक या नही के बतौर है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया ,बिजनेसमैन,मॉल फैक्ट्रियां के मालिको की संख्या
SC, ST ओबीसी की  कितनी है?
रिकॉर्ड आपके पास मौजूद है।

आरक्षण ने हिंदुओं को नहीं बांटा। बल्कि  हिंदू पहले से ही हजारों जातियों में बैठे थे ।यह कैसी व्यवस्था है एक दूसरे के ऊपर पानी भी पड़ जाए तो ताकतवर जातियां कमजोर वर्गों के खून की प्यासी हो जाती है ।मध्य प्रदेश की घटना याद होगी उच्च जातियों के खेत में वाल्मीकि समुदाय अनुसूचित जाति के बच्चे खेत में टॉयलेट के लिए गए तो तथाकथित उच्च कहे जाने वाले जातियों के ठेकेदारों ने लाठी से पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी।
 रोहित वेमुला की आत्महत्या,पायल तड़वी की आत्महत्या हम आज भी नहीं भूले हैं ।क्या यह टुकड़े आरक्षण ने किया है बिल्कुल नहीं यह पहले से खुद समाज के सिपल हारों ने इंसान को इंसान में भेद अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए किया।

 अंतिम बात भारत में तीन भारत नहीं केवल एक भारत जिसमें समता ,स्वतंत्रता,बंधुता व न्याय स्थापित करने की बात कही गई है, जो भारतीय संविधान के प्रस्तावना में वर्णित हैं ।प्रतिनिधित्व का पैमाना सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़ापन है ना कि आर्थिक। अनुसूचित जाति व जनजाति का व्यक्ति कितना भी बड़ा अफसर भी बन जाए लेकिन उसे संबोधित असंवैधानिक शब्दों से करते आए हैं ।इतनी असमानताओ के बावजूद आरक्षण में पुनर्विचार की आवश्यकता कह रहे हैं ।यह बड़ी विडंबना है। देश संकट के दौर से गुजर रहा है और आप आरक्षण की समस्या को लेकर कठोर फैसले लेने की ओर इशारा कर रहे हैं ।यह आरक्षित वर्गों के प्रति आपकी अनुचित मानसिकता को प्रदर्शित करती है।
vinodkumar160788@gmail.com

Slave civic among the free countrie - The scavengers

"आजाद देश के गुलाम नागरिक : सफाई कर्मचारी"

देश मे राष्ट्रीय आपदा अधिनियम 2005 व सम्पूर्ण भारत को लॉक डाउन घोषित किया गया है। किसी को भी बिना किसी उचित व पर्याप्त कारण के घर से बहार निकलना प्रतिबंध है। जिस कारण पूरे देश मे अलग अलग राज्यों में प्रवासी मजदूर फंसे हुए हैं और वे अपने बुजुर्ग माता पिता बीवी बच्चे परिवार तक पंहुच नही पा रहें हैं।पूरी दुनिया मे कोहराम मचा  रहा कोरोना वैश्विक महामारी  से बचने के लिए देश के हित को देखते हुए यह अति आवश्यक भी है अन्यथा अन्य देशों की तरह कहीं भारत मे भी कॅरोना महामारी कोहराम न मचा दे।

परंतु, एक तरफ सफाई कर्मचारी है जिनको रोबोट बना दिया गया है। तमाम कानून कायदा सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट के द्वारा जारी गाइड लाइन...आदि को नजर अंदाज करते हुए सफाई कर्मचरियो को मौत की मुंह मे धकेला जा रहा है।

शायद हमारे मीडिया बंधुयों के पास भी टाइम नहीं है या उन्हें रुचि नहीं है जो सफाई कर्मचारियों के मुद्दे को नही उठा पा रहें है लेकिन मैं निवेदन करता हूँ कृपया समय निकालिए और इनकी आवाज शासन प्रशासन तक पंहुचाने में मदद कीजिये।

(1)इनके चेहरे में N-95 मास्क तो छोड़िए एक नार्मल मास्क ढूंढ़िए ???

(2)यदि किसी को मिला भी है तो कितने दिन के लिए एक मास्क दिया जाता है पूछिये ???
(3)ग्लोब्स ढूंढ़िए ???
(4)गमबूट ढूंढ़िए ???
(5)सैनिटाइजर ढूंढ़िए ??
(6)महीने में कितने बेतन मिलता है , जानिए???
(7स्वंतंत्रता दिवस से ले कर रविवार या अन्य त्योहार में कोई छुट्टी इनको मिल रही है तो पूछिये ??
(8)अब तक कितना ईपीएफ जमा हो गया है पूछिये ???
(9)इनको कभी कोई बीमा दिया गया है तो पूछिये ???
(10)सफाई के दौरान कोई घायल होता है अथवा संक्रमित बीमारी से मर जाता है तो इनको कोई बीमा  राशि मिलता है तो पूछिये ???
(11)सफाई कर्मचारियों के औसत जीवन का रिसर्च करिए ???
(12)महिला सफाई कर्मचारी जब गर्भवती कभी हुई थी कभी उनको प्रसूति का लाभ अर्थात बिना काम के बेतन मिला है तो पूछिये ???

जब कि आप सभी जानते हैं बाबासाहब के समय से कई कानून बने हुए हैं :
(1) Minimum Wages Act 1948 न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948
(2) Employee Provident Act 
ईपीएफ एक्ट 1952
(3)Employee State Insurance Corporation Act 1948 
राज्य कर्मचारी बीमा निगम अधिनियम 1948
(4) Maternity Benefit Act 1961 and Amendment Act 2020 प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम 1961 तथा संशोधित अधिनियम 2020
(5) The Prohibition of Employment of Manual Scavengers and Their  Rehabilitation Act 2013 हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों का नियोजन का प्रतिषेध तथा उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 छग नियम 2014
(6) Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities ) Act, 1989 and Amended Act 2020

का खुला उल्लंघन है। आप जितना चिल्लाते रहिए इन वर्गों के लिए कोई सोचने वाला नही है। हजारों वर्ष पहले मनु के व्यवस्था के अनुसार एक वर्ग विशेष को  मानव मल को उठाने के लिए लगाया गया था जो कई हजार वर्ष चलता रहा । हालांकि संविधान लागू होते ही उक्त व्यवस्था को सम्पूर्ण रूपसे समाप्त कर सिया गया था लेकिम  आज भी निरंतर जारी है ।

देश के प्रधान सेवक जी ने स्मार्ट सिटी योजना लाये जो बहुत ही गर्व की बात है लेकिन सफाई कर्मचारियों को स्मार्ट नहीं बनाने से शर्म भी लगता है। केंद्र से लेकर राज्य और निगम, पालिका, परिषद, ग्राम पंचायत , शासकीय व अर्ध शासकीय निकाय आदि में कार्यरत सफाई कर्मचरियो का  शोषण हो रहा है व उनको समवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।

हाल ही में महाराष्ट्र के धारावी बस्ती में कोरोना का कहर टूटने की खबर मिल रही है। इस प्रकार यदि किसी एक सफाई कर्मचारी  कोरोना संक्रमित होता है तो जबरदस्त तरीके से हजारों लोगों संक्रमित हो सकते है ।चूंकि यह वर्ग झुग्गियों में, छोटी छोटी कमरे में 4-5 लोग एक साथ रहतें है। झुग्गियों में आबादी बहुत ज्यादा होता है (density not population is very high in slums areas)। आर्थिक स्थिति भी खराब होने के कारण  से सैनिटाइजर व अन्य सुरक्षा की समान भी afford अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते।

इसलिए सभी केंद्र और राज्य शासन प्रशासन से निवेदन है कृपया इन वर्गों के लिए गंभीर होइए

निवेदक

एडवोकेट जन्मेजय सोना
राष्ट्रीय महासचिव
भारतीय सफाई कर्मचारी महासंघ
86022-00999
88390-92600

(टिप: यह तस्वीर रायपुर सहर के जोन क्रमांक 6 का है जिसको हमारे एक साथी के द्वारा आज फ़ोटो खींच कर हमें सूचना दिया गया है )