Rakshabandhan and the truth behind it?

रक्षाबंधन और उसके पीछे का सच?

संजीव खुदशाह
पूरे विश्व में भारत को छोड़कर भाई बहन का रक्षाबंधन जैसा कोई त्यौहार नहीं मनाया जाता है। क्योंकि रक्षाबंधन एक भेदभाव बढ़ाने वाला त्यौहार है। विदेशों में फ्रेंडशिप डे दोस्ती दिवस जैसे बराबरी वाले त्यौहार जरूर मनाए जाते हैं। 

क्यों रक्षाबंधन एक भेदभाव बढ़ाने वाला त्यौहार है 

भाई का बहन की रक्षा का व्रत लेने का मतलब होता है कि बहन कमजोर है और भाई मजबूत है। क्या बहन सचमुच इतनी कमजोर है कि उसे अपनी रक्षा के लिए भाई का मुंह ताकना पड़े? क्या बहन इतनी मजबूत नहीं बनाई जा सकती कि वह भाई का रक्षा कर सकें। इसे भाई-बहन के मोहब्बत का त्यौहार है ऐसा सामंतवादी मीडिया दिखाने की कोशिश करता है। लेकिन यहां पर भाई-बहन के प्यार से कोई वास्ता नहीं है। यही बहन भाई से अपने पिता की संपत्ति में बराबर का हक चाहती है तो भाई उसका दुश्मन हो जाता है। 

इस त्यौहार के बहाने बहुत ही सस्ते में निपटाया जाता है बहनों को। 

रक्षाबंधन के त्यौहार में बहनों को साड़ी कपड़ा या हजार रुपए देकर बहुत ही आसानी से भाइयों के द्वारा बहनों को निपटाया जाता है। अगर यही बहन अपने पिता अपने पूर्वजों की संपत्ति में हक मांगती है। भाई के बराबर अधिकार मांगती है। यही भाई उसे रक्षाबंधन में गालियां बकता है । उसे अपने घर में घुसने नहीं देता है। यह भारत की कड़वी सच्चाई है। लाखों प्रकरण न्यायालय में लंबित है जहां बहने अपने भाइयों से अधिकार मांग रही है और भाई देना नहीं चाहता। 

इस त्यौहार के मूल में क्या है ? कहां से हुआ इस त्यौहार शुरू? इसकी शुरुआत कब हुई? 

रक्षाबंधन बिल्कुल नया त्यौहार है। बमुश्किल 70-80 साल हुए होंगे इस त्यौहार को शुरू हुए। इससे पहले इसी दिन ब्राह्मण अपने जजमानो को रक्षा सूत्र बांधा करते थे। जिसमें बहनों का कोई रोल नहीं होता था। खासतौर पर ब्राह्मण क्षत्रियों एवं वैश्यो को या फिर राजाओं को रक्षा सूत्र बांधकर अपनी रक्षा करने का शपथ लेते थे। और उसके एवज में दान प्राप्त करते थे। आज भी ब्राह्मण इस त्यौहार में लोगों को रक्षा सूत्र बांधते हुए देखे जाते हैं।
ब्राह्मण रक्षा सूत्र बांधते समय इन मंत्रों का उच्चारण करते हैं
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः | तेन त्वां मनुबध्नामि, रक्षंमाचल माचल ||
इसका अर्थ होता है जिस तरह मैं तुम्हारे महान पराक्रमी दानव राजा बलि को इस सूत्र के माध्यम से बांध रहा हूं इसी प्रकार में तुम्हें भी मैं इस सूत्र से बांध रहा हूं मेरी रक्षा करना। 

अब बताइए रक्षाबंधन के दिन पढ़े जाने वाले इस सूत्र इस मंत्र का भाई बहनों से क्या ताल्लुक है। शुरू से रक्षाबंधन के इस त्यौहार का बौद्धिक लोगों ने विरोध करना प्रारंभ किया और इस पर अपने तर्क दिए इन तर्कों से बचने के लिए ब्राह्मणों ने कई और पुराने संदर्भ देने की कोशिश की। 

कृष्ण-द्रौपदी की कथा का प्रचार इसीलिए किया गया।
एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा खून की धार बह निकली। यह सब द्रौपदी से नहीं देखा गया और उसने तत्काल अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण के हाथ में बांध दिया फलस्वरूप खून बहना बंद हो गया।  

कुछ समय पश्चात जब दुःशासन ने द्रौपदी की चीरहरण किया तब श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ाकर इस बंधन का उपकार चुकाया। 

इसे रक्षाबंधन से जोड़ का प्रचारित किया जाता है। जबकि आप ही बताइए कि इसमें भाई बहन का रक्षाबंधन जैसा क्या है?
इस त्यौहार को प्रचारित करने में सबसे बड़ा योगदान फिल्मों का है। शुरुआत में फिल्में इस त्यौहार को लोगों के बीच लोकप्रिय बनाती है। बाद में टीवी सीरियल इस पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

महाबली की हत्या का है यह त्यौहार
ऐसा माना जाता है कि रक्षाबंधन बहुजनों दानवों द्रविड़ो के राजा महाबली को आर्यों द्वारा पराजित किया गया था। उसी खुशी में यह त्यौहार प्रतिवर्ष रक्षाबंधन के रूप में ब्राह्मणों द्वारा मनाया जाता है। जिसमें बड़ी संख्या में दलित बहुजन भी शामिल होते हैं जिनका राजा महाबली बताया जाता है।

रक्षाबंधन जैसे त्यौहार की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत का सामंती वर्ग ईसाइयों के त्यौहारो से प्रभावित रहा है। ईसाइयों की तरह भारत में कोई भी त्यौहार ऐसा नहीं है जिसे सब मिलकर मनाते हैं। इसके लिए जातिवाद आड़े आती थी। इसीलिए रक्षाबंधन जैसे त्यौहार गढ़े गए। ताकि विदेशियों को यह बताया जा सके कि हमारे भीतर मोहब्बत और प्यार को फैलाने वाला त्यौहार है। रक्षाबंधन इसी कड़ी में प्रचारित किया गया। इस त्यौहार को प्रचारित करने में पूंजीवाद का भी बहुत बड़ा योगदान है।

धर्म निरपेक्षता के मायने Means of secularism


भारत के संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। धर्म निरपेक्ष का सही मतलब होता है ऐसी सरकार जो किसी धर्म के पक्ष में नहीं है। कुछ लोग धर्म निरपेक्ष का मतलब यह भी निकालते है कि ऐसी सरकार जो सभी धर्म के पक्ष में हो सबको लेकर चलती हो।

पिछले दिनों तमिलनाडु में एक सड़क परियोजना के उद्घाटन में सरकारी अधिकारी ने गलती से सिर्फ ब्राम्‍हण पुजारी को बुला लिया सांसद सैंथिलकुमाल ने पूछा की बाकी धर्म के प्रतिनिधि कहां है । बताना चाहूंगा की तमिलनाडु में सिर्फ एक धर्म के पुजारी से सरकारी योजनाओं में पूजा नहीं कराई जाती, आम तौर पर  पूजा होती ही नहीं है।

दरअसल, तमिलनाडु राज्‍य के धर्मपुरी सीट से लोकसभा सांसद सेंथिलकुमार एक सड़क परियोजना की भूमि पूजा के लिए अपने गृह जिले में पहुंचे थे। यहां पहुंचने पर उन्होंने लोक निर्माण विभाग के कार्यकारी अभियंता से पूछा कि क्या उन्हें पता है कि एक सरकारी समारोह को इस तरह से आयोजित नहीं किया जाना चाहिए, जिसमें केवल एक विशेष धर्म की प्रार्थना शामिल हो। उन्होंने अधिकारी से पूछा कि आप ये बात जानते हैं या नहीं। 

इस दौरान मौके पर मौजूद एक भगवा वस्त्र पहने हिंदू पुजारी को देखकर उन्होंने अधिकारी से पूछा कि अन्य धर्मों के प्रतिनिधि कहां है। उन्होंने अधिकारी से कहा कि, "यह क्या है? अन्य धर्म कहां हैं? ईसाई और मुस्लिम कहां हैं? चर्च के फादर, इमाम को आमंत्रित करें, किसी भी धर्म को नहीं मानने वालों को भी आमंत्रित करें। गौरतलब है कि सामाजिक न्याय के प्रतीक पेरियार ईवी रामासामी द्वारा स्थापित एक तर्कवादी संगठन द्रविड़ कड़गम सत्तारूढ़ द्रमुक का मूल निकाय है।

सांसद एस सेंथिलकुमार की डांट के बाद लोक निर्माण विभाग के कार्यकारी अभियंता ने सांसद से माफी मांगी। उन्होंने कहा कि  यह शासन का द्रविड़ मॉडल है। सरकार सभी धर्मों के लोगों के लिए है।

ज्ञातव्‍य है कि इसके कुछ दिनों पहले प्रधान मंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने नये संसद भवन में राजकीय चिन्ह अशोक स्तंभ की पूजा सिर्फ ब्राम्‍हण पुजारियों से कराई। जबकि यह देश संविधान से चलता है न कि किसी धर्म के विधान से । कायदे से पूजा नहीं करानी चाहिए थी। यदि करानी पड़ रही है तो भारत में जितने भी धर्म के मानने वाले है उनके पुजारियों से पूजा करानी चाहिए।

यह बताना जरूरी है की संविधान जब निर्माणाधीन था तब इस पर चर्चा हुई जिसमें सभी समाज और स्‍थान के चुने हुये प्रतिनिधि मौजूद थे। ने यह निर्णय लिया था की भारत में एक धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना की जानी चाहिए। ताकि सभी समता समानता एवं सद्भावना से रह सके। बाद में कांग्रेस की सरकार ने संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ दिया। यह संविधान की भावना के हिसाब से एक अच्छा कदम था। इसी तरह यह बात कॉमन हो गई और इसे गंभीरता नहीं लिया गया।

लेकिन तमिलनाडु सांसद डां सेन्थिल कुमार के वीडियो वायरल हो जाने के बाद, यह बात चर्चा में फिर आ गई की भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्‍ट्र है जिसमें सभी धर्मो का समान आदर होना चाहिए। क्योंकि एक आम हिन्दू भी धर्म निरपेक्ष सरकार चाहता है।

 

 

सरकर को धर्म निरपेक्ष क्‍यो होना चाहिए:

भारत एक ऐसा देश है कि जिसमें कई धर्मों, सैकड़ो पंथो को मानने वाले लोग रहते  है। देश को अखण्‍ड बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि सभी धर्म एवं पंथो का बराबर सम्मान किया जाय। यह सम्मान तभी हो सकता है जब आप सरकार और धर्म में दूरियां रखेगें। आप उत्‍तर भारत के सरकारी कार्यलयों में एक खास धर्म के देवी देवता की तस्वीर या पूजा स्‍थल पाते है। जबकि तमिलनाडु सरकार ने पूर्व में भी संविधान के भावना का आदर करते हुये सरकारी कार्यालय में मंदिर मस्जिद या किसी भी पूजा स्‍थल, तस्वीर न लगाने का आदेश जारी किया था। दर असल तमिलनाडु एवं उसकी सरकार पर प्रसिध्‍द तर्कशास्त्री इ वी रामास्‍वामी पेरियार का प्रभाव रहा है। यही कारण है तमिलनाडु देश का सबसे उन्‍नत राज्‍य है।

 

सरकारी धन का दुरूपयोग:

चूकि सरकार को टैक्‍स सभी धर्म पंथ को मानने वाले लोग देते है । इसलिए सरकार को इस टैक्‍स के पैसे को किसी खास धर्म के उपर खर्च करने से बचना चाहिए। यह संविधान के भावना के खिलाफ है। जनता चाहती है उसे सड़क बिजली पानी मिले, गरीबी दूर हो, बेरोजगारी से देश निजात पाये । सरकारी मेडिकल, इंजिनीयरीग कालेज खुले शिक्षा चिकित्सा सस्ती हो। आज भारत के दूर दराज में ऐसे कई गांव है जहां बिजली पानी सड़क अब तक नहीं पहुची है। इन सामरिक चीजों में टैक्स का पैसा खर्च होना चाहिए।

 

संविधान कहता है तर्क शील बनों अंधविश्वास से निजात पाओ:

संविधान की धारा 51 क की उपधारा ज कहती है कि भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जाये। लोग तर्क शील बने। धर्म एक निजी मामला है उसे घर एवं पूजा स्थलों तक सीमित होना चाहिए। आज अंधविश्वास के कारण पूरा देश पिछड़े पन का शिकार है । कई मौतें सिर्फ अंधविश्वास के कारण होती है। लोग अपनी मानसिक एवं शारीरिक बीमारियों के इलाज के लिए आज भी ओझा, बैगा, मौलवी के भरोसे रहते है। इस कारण स्‍वास्‍थ सूचकांक में भारत पिछड़ता जा रहा है। हमें उन यूरोपीय देशों से सीख लेनी चाहिए जिन्होंने धर्म के बजाए वैज्ञानिक विचारधारा एवं तकनीक अपनाया और विकसित देशों में अपना मुकाम बनाए हुए है।

संजीव खुदशाह

जाति अत्याचार के खिलाफ राजधानी रायपुर में होगा नग्न प्रदर्शन

जाति अत्याचार के खिलाफ हम लोग नंगा ( निर्वस्त्र ) होकर राजधानी रायपुर में प्रदर्शन करने जा रहे हैं।
जिस तरीके से आरक्षित वर्ग के जनप्रतिनिधि और पढ़े लिखे अधिकारी कर्मचारी अपने वर्ग के साथ हो रहे अन्याय अत्याचार और प्रशासनिक दमन के खिलाफ मुंह

खोलने के बजाए चुप्पी साध कर पेटखोर रहते हुए आरक्षण का लाभ उठाते रहना चाहते हैं। 
लेकिन अब हमें अत्याचार की घटनाओं को सुनते हुए देखते हुए जीवन यापन करना सहन नहीं हो रहा है, हम नहीं चाहते हैं कि हमारे बच्चे भी अपने जीवनकाल  में जातिगत प्रताड़ना एवं अत्याचार वाला दिन देखकर धरना प्रदर्शन रैली आंदोलन करता रहे। 
गरिमामय जीवन और समान नागरिक अधिकार के साथ जीने के लिए धरना प्रदर्शन रैली आंदोलन करना अगर हमारे जाति वर्ग के हिस्से में परंपरा बन गया है तो हम इस परंपरा को खत्म करना चाहते हैं।
 हमारी जाति ऐसी है कि पुलिस हमारी सुनती नहीं है, प्रशासन हम पर यकीन करती नहीं है।
हमारे राजनीतिक वोट को बिकाऊ समझा जाता है हमारे समाज के सामाजिक ठेकेदारों को रूपए और पद की लालच देकर वोट प्रभावित किया जाता है पदलोलुपता के वजह से सामाजिक ठेकेदारों की आवाज सत्ता के सामने दबी रहती है और इसलिए सरकार हमारे अस्तित्व को स्वीकार करती नहीं है।
हमारी गिनती जनगणना के समय हिंदू धर्म में गिना जाता है लेकिन जब तक हिंदू के सामने मुस्लिम न हो तब तक हिंदू धर्म हमें अपना मानती नहीं है।
 हमारे वर्ग के ऊपर अत्याचार करने वाले एवं हमारे आरक्षण के खिलाफ खड़ा होते हमने सदैव हिंदू धर्मी को ही देखा है।
जब हमारे लोगों पर कोई हिंदू धर्मी अत्याचार करता है तब कोई दूसरा हिंदू धर्मी को हमारे पक्ष में खड़ा होते कभी नहीं देखा है।
हम भारत का संविधान पर विश्वास करते हुए पुलिस से निवेदन किए, प्रशासन को आवेदन दिए, सरकार से गुहार लगाए और न्यायपालिका से न्याय मिलने की उम्मीद लगाए रहे अफसोस हर जगह से हमें निराशा हाथ लगी।
अब हमें एहसास होने लगा है कि हमें इस भारत देश में दोयम दर्जे के नागरिक समझा जाने लगा है।
जहां हमारे सारे संवैधानिक अधिकार को धीरे-धीरे निलंबित किए जाने लगा है और मनुस्मृति के अनुसार हम पर शासन करने का योजना बनाए जाने लगा है।
मजबूरन अब हमें खुद को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए  नंगा (निर्वस्त्र) होकर प्रदर्शन करने की आवश्यकता हो गई है।
आइए शोषित समाज के युवा स्वाभिमानी साथियों हमें बढ़ चढ़कर साथ और सहयोग करें।
हमारा कदम अपने शोषित समाज के स्वाभिमान के लिए है। स्वाभिमान एवं अस्तित्व के खातिर हम अपनी जान की परवाह नहीं करते हैं।
बाबा साहब डॉ भीमराव आंबेडकर प्रतिमा स्थल रायपुर में नंगरा ( नग्न ) होकर प्रदर्शन करने वालों में
संजीत बर्मन
मनीष गायकवाड़ 
विनय कौशल 
पंकज भास्कर

ऩोट :- प्रदर्शन करने वाले साथियों की संख्या बढ़ सकती है।
प्रदर्शन की संभावित तिथी 18/07/2022 
दिन सोमवार 
स्थान बाबा साहब डॉ भीमराव आंबेडकर प्रतिमा स्थल (कलेक्टर आफिस के सामने) रायपुर छत्तीसगढ़। 

#DalitLivesMatter 
#JusticeForGangaPrasadMarkande

शंकराचार्य यूनिवर्सिटी में द्वितीय स्थापना दिवस की रही धूम

 शंकराचार्य यूनिवर्सिटी में द्वितीय स्थापना दिवस की रही धूम 


भिलाई। श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी भिलाई द्वारा दिनांक-09/06/ 2022 को अपना द्वितीय स्थापना दिवस का कार्यक्रम मनाया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री आई. पी. मिश्रा, कुलाधिपति, श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, भिलाई रहें। अति विशिष्ट अतिथि के रूप में श्रीमती जया मिश्रा, महानिदेशक एवं विशिष्ट अतिथि श्री पी. के. मिश्रा, कुलसचिव, श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, भिलाई की गरिमामयी उपस्थिति रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. (डॉ.) एल.एस. निगम, कुलपति, श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, भिलाई ने किया। कार्यक्रम में स्वागत व्यक्तव्य श्री पी. के. मिश्रा, कुलसचिव ने दिया। उन्होंने यूनिवर्सिटी के दुसरे स्थापना दिवस पर यूनिवर्सिटी परिवार को बधाई देते हुए छात्रों से कहा कि यूनिवर्सिटी का लक्ष्य एक्सिलेंस इन एजुकेशन प्रदान करने हेतु निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री में हर रोज नए-नए बदलाव हो रहे हैं, जिसके लिए अपने आप को अपडेट रखना जरूरी है। एक स्टूडेंट्स के लिए जितना जरूरी किताबें पढ़ना है उतना ही जरूरी इंडस्ट्री पर नजर रखना भी है। कार्यक्रम के इस अवसर पर कुलाधिपति श्री आई.पी. मिश्रा जी ने ऑनलाइन माध्यम से अपने उद्बोधन में कहा कि यूनिवर्सिटी ने अपने नाम की अनुरूपता को स्थापना दिवस पर हुए कार्यक्रम में साकार करने का कार्य किया है । तात्पर्य यह कि भारतीय संस्कृति में किसी भी नाम का मतलब बिना अर्थ के नहीं होता। नाम के पीछे कुछ ऐसा छुपा रहता है जो उसकी सार्थकता को प्रमाणित करता है। यूनिवर्सिटी श्री शंकराचार्य जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को सार्थक करने का पूरा-पूरा प्रयास कर रही है। साथ ही उन्होंने छत्तीसगढ़ शासन का धन्यवाद देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ में शिक्षा के लिए बेहतर वातावरण प्रदान कर रही है उनके सार्थक सहयोग से हम मध्यभारत का गुणवत्तापूर्ण यूनिवर्सिटी संचालित कर पा रहें हैं। विशिष्ट अतिथि श्रीमती जया मिश्रा ने अपने भाषण में कहा कि यूनिवर्सिटी बरगद के वृक्ष की तरह होती है जिसकी हर एक शाखा नए वृक्ष का रूप ले लेने में सक्षम होती है। साथ ही उन्होंने कहा कि समाज उन्नयन के हर क्षेत्र में श्री शंकराचार्य यूनिवर्सिटी अगुवा के रूप में कार्य करें जिससे विश्व बंधुत्व जैसी उदात्त भावनाओं की उपजाऊ भूमि के रूप में स्थापित हो सकें। स्थापना दिवस को गरिमा प्रदान करते हुए महानिदेशक श्रीमती जया मिश्रा ने प्रावीण्य सूची में आने वाले छात्रों के लिए छात्रवृति की घोषणा की। 

जीवन में सफलता तभी मिलेगी, जब आपका लक्ष्य निर्धारित हो। इसके अभाव में आपकी सारी मेहनत बेकार है। स्थापना दिवस पर अध्यक्षीय उद्बोधन में उपस्थित छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए प्रो. निगम ने यह बातें कही। उन्होंने कहा कि यदि लक्ष्य क्लीयरिटी के साथ तय नहीं हो, तो फिर किसी भी मिशन की तैयारी का कोई मतलब नहीं रह जाता। यदि आप जिम्मेवारी के साथ आगे बढ़ेंगे, तो सिर्फ समाज ही नहीं पूरी कायनात आपके सहयोग के लिए आगे आ जाएगी। लेकिन बिना प्रयास किए आप सिर्फ यह सोचकर बैठे रहेंगे कि लोग स्वत: मदद करेंगे, तो आप इंतजार करते रह जाएंगे और गाड़ी छूट जाएगी। डिग्री व विद्वता दोनों में काफी फर्क है। विद्वान बनने के लिए अच्छी पुस्तकों का गहन अध्ययन जरूरी है। उन्होंने बताया कि श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, भिलाई केवल शिक्षा पर ही केंद्रित नहीं है बल्कि यह 360 डिग्री के तरीके से काम करता है। यह आपके अन्दर सभी तरह के नेतृत्व, टीम वर्क, दृढ़ संकल्प, लचीलापन, आत्मविश्वास, सम्मान इत्यादि जैसे व्यक्तिगत गुणों का विकास करने का काम करता है ताकि आप एक बहुमुखी व्यक्ति के रूप में विकास कर सकें। कुलपति महोदय ने कहा कि हम समय के अनुरूप अध्ययन के साथ-साथ खेल, लेखन, कला, नृत्य, संगीत आदि जैसे अन्य क्षेत्रों को भी बराबरी का दर्जा देने का प्रयास कर रहे हैं, साथ ही हमारा लक्ष्य एक समग्र शिक्षण वातावरण बनाने पर केंद्रित है।

 इस अवसर पर श्री विनय पीताम्बरन, उप-कुलसचिव ने यूनिवर्सिटी के दो वर्षों के शानदार उपलब्धियों को विद्यार्थियों एवं उपस्थित अतिथियों के समक्ष रखा। कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के सत्र-2020-21 एवं 2021-22 में प्रावीण्य सूची में उत्तीर्ण 120 छात्र-छात्राओं एवं विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में सफल 30 छात्र-छात्राओं को को प्रशस्ति प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। 

तत्पश्चात विद्यार्थियों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी गई, जिसमें शानदार एकल गायन अमनदीप, अखिल एवं विनय पीताम्बरन, उपकुलसचिव ने गया । एकल नृत्य भूमिका त्रिपाठी प्रियांशु कुर्रे आस्था त्रिपाठी, कृष्णा बहेती एवं मनजोत द्वारा प्रस्तुति दी गई। युगल नृत्य आस्था त्रिपाठी, कृष्णा बहेती ने किया वही समूह नृत्य पत्रकारिता एवं जनसंचार के छात्रों राखी भंडारी एवं उनके समूह द्वारा छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध गीत “डरा लोर गे हे रे” पर दिया गया एवं अभिनय नुक्कड़ क्लब के सदस्यों ने “मोबाईल प्रयोग के बढ़ते खतरे” पर अपनी उत्कृष्ट अभिनय की प्रस्तुति दी साथ ही तुलसी ने मोनो एक्ट व रागिनी ने वीर रस की कविता प्रस्तुत की. कार्यक्रम का संचालन आरुषी जायसवाल बीटेक कंप्यूटर साइंस द्वितीय सेमेस्टर एवं इशिता बिस्वास, बीबीए द्वितीय सेमेस्टर द्वारा एवं आभार प्रदर्शन प्रो.(डॉ.) शिल्पी देवांगन, अकादमिक समन्वयक ने किया गया। स्थापना दिवस के गरिमामयी क्षण पर गणमान्य नागरिकों, विद्यार्थियों, प्राध्यापकों, कर्मचारियों एवं अधिकारीयों की उपस्थिति रही।
विनय पीताम्बरन
उप-कुलसचिव

Light of Asia Lord Gautam Buddha

 बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष

भगवान बुद्ध यानी एशिया का प्रकाश

संजीव खुदशाह

बुद्ध को एशिया का प्रकाश यानी Light of Asia कहा जाता है। जापान, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, चीन, वियतनाम, ताइवान, तिब्बत, भूटान, कंबोडिया, हांगकांग, मंगोलिया, थाईलैंड, मकाउ, वर्मा, लागोस और श्रीलंका की गिनती बुद्धिस्ट देशों में होती है। वैसे तो बुद्ध का जन्म नेपाल में हुआ था। लेकिन बुद्धत्व प्राप्ति से लेकर परिनिर्वाण तक पूरा जीवन भारत के भू भाग में ही बीता। बावजूद इसके भारत में बुद्ध को पूरी तरह भुला दिया गया था। आज भी भारत के लगभग सभी भागों में खुदाई के दौरान बुद्ध की प्रतिमा प्राप्त होती रहती है। इसी प्रकार सम्राट अशोक को भी पूरी तरह भुला दिया गया था 1838 में जब अशोक स्तंभ को पढ़ा गया तब ज्ञात हुआ कि कोई अशोक नाम का सम्राट भी यहां हुआ करता था। हालांकि जनमानस में बुध और अशोक बसे हुए हैं। अशोक के लगाए पेड़ उन्हीं के नाम से आज भी जाने जाते हैं।

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प्रसंगवश यह बताना जरूरी है कि वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध का जन्म नेपाल के लुंबिनी वन में इसवी सन से 563 वर्ष पूर्व हुआ था। उनकी माता महामाया देवी जब अपने नैहर देवदह जा रही थी तो कपिलवस्तु और देवदह के बीच लुंबिनी वन हुआ करता था। इसी वन में भगवान बुद्ध का जन्म हुआ। इसी दिन 528 ईसा पूर्व बोधगया में एक पीपल वृक्ष के नीचे गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ और वह बोधिसत्व कहलाए। मान्‍यता है कि इसी दिन यानी वैशाख पूर्णिमा के दिन 483 ईसा पूर्व 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में भगवान बुद्ध का परिनिर्वाण हुआ।

शोध बताते हैं कि दुनिया में सर्वाधिक प्रवचन बुद्ध के ही रहे हैं। यह रिकॉर्ड है कि बुद्ध ने जितना कहा और जितना समझाया उतना किसी और ने नहीं। धरती पर अभी तक ऐसा कोई नहीं हुआ जो बुद्ध के बराबर कह गया। सैकड़ों ग्रंथ है जो उनके प्रवचनों से भरे पड़े हैं और आश्चर्य कि उनमें कहीं भी दोहराव नहीं है। 35 की उम्र के बाद बुद्ध ने जीवन के प्रत्येक विषय और धर्म के प्रत्येक रहस्य पर जो कुछ भी कहा वह त्रिपिटक में संकलित है। त्रिपिटक अर्थात तीन पिटक- विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक। सुत्तपिटक के खुद्दक निकाय के एक अंश धम्मपद को पढ़ने का ज्यादा प्रचलन है। इसके अलावा बौद्ध जातक कथाएं विश्व प्रसिद्ध हैं।

आज हम जितना उनके बारे में जानते हैं। पूरी जानकारी का केवल 20% है। बौद्ध साहित्य जो त्रिपिटक के रूप में था। काफी पहले नष्ट हो गया। अच्छी बात यह थी कि यह साहित्य पाली से तिब्बती भाषा में अनूदित हो चुका था। राहुल सांकृत्यायन ने इसे हिंदी भाषा में अनुवाद करके उपलब्ध कराया। कट्टरपंथियों ने नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय पर हमले किये उसे जलाया, 3 महीने तक किताबे जलती रही।  न जाने कितनी बहुमूल्य किताबें, कीमती जानकारियां रही होगी , सब राख में तब्दील हो गई।

कहने का तात्पर्य यह है कि जिस बुद्ध के पीछे सारी दुनिया पागल थी। उस बुद्ध को उसी के जन्म और कार्यस्‍थली में लगभग भुला दिया गया। ऐसा क्यों हुआ? इसके पीछे विभिन्न मत है जिसकी चर्चा यहां गैर जरूरी है।

गौतम बुद्ध को लाइट ऑफ एशिया के नाम से पुकारने का सबसे महत्वपूर्ण कारण है उनके विचार, उनकी शिक्षाएं। वे दुख का कारण और उसका निवारण बताते हैं। गृहस्थों के लिए जीवन जीने की पद्धति बताते हैं जिसे पंचशील कहा जाता है। वे दुनिया के पहले ऐसे विचारक हैं जो यह कहते हैं कि अपना दीपक खुद बनोयानी अत्त दीपो भव। वे कहते हैं कि कोई बात इसलिए नहीं मानो कि कोई बड़ा व्यक्ति कह रहा है या किसी पवित्र ग्रंथ में लिखा है या मैं कह रहा हूं। इस बात का स्वयं मूल्यांकन करो और खुद अनुभव करो तभी वह बात को मानो। यही वे पहलू थे जिसके कारण बुद्ध सर्वत्र स्वीकार किये गये।

दुनिया के अन्य धर्मों की तरह बुद्ध उपासना की कोई एक पद्धति या रिवाज या कोई ड्रेस कोड अथवा कोई रूमानी आदेश नहीं है। जिससे यह तय हो की आप बुद्धिस्ट हो। सिर्फ बुद्ध के विचारों को मानना जरूरी है। जिसे सम्यक विचार कहते हैं। यही कारण है संसार के सारे बुद्धिस्ट की उपासना पद्धति अलग-अलग है। जापान के बुद्ध वहां की संस्कृति में रचे बसे हैं। ठीक उसी प्रकार चीन के बुद्ध वहां की संस्कृति में समाये है। बुद्ध को मानने के लिए संस्कृति को बदलने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन सभी जगहों में पंचशील अष्टशील पाली भाषा में ही स्मरण किए जाते हैं।

भगवान बुद्ध कहते हैं कि जीवन ऐसे जियो जैसे वीणा के तार। वीणा के तारों को इतना ढीला ना रखो कि उसकी ध्वनि बेसुरी लगे और इतना ना कसो कि उसकी ध्वनि कानों में चुभे। वीणा के तारों को ऐसे एडजस्ट करो कि उससे मधुर संगीत की उत्पत्ति हो। लोगों को खुशी मिले। यानी जीवन को वीणा के तारो की तरह जीने की बात बुद्ध कहते हैं।

दुनिया का ऐसा कोई हिस्सा नहीं बचा था जहां बौद्ध भिक्षुओं के कदम न पड़े हों। दुनिया भर के हर इलाके से खुदाई में भगवान बुद्ध की प्रतिमा निकलती है। दुनिया की सर्वाधिक प्रतिमाओं का रिकॉर्ड भी बुद्ध के नाम दर्ज है। बुत परस्ती शब्द की उत्पत्ति ही बुद्ध शब्द से हुई है। बुद्ध के ध्यान और ज्ञान पर बहुत से मुल्कों में शोध जारी है

पश्चिम देशो के बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक बुद्ध को पिछले कुछ वर्षों से बड़ी ही गंभीरता से ले रहे हैं। चीन, जापान, श्रीलंका और भारत सहित दुनिया के अनेक बौद्ध राष्ट्रों के बौद्ध मठों में पश्चिमी जगत की तादाद बढ़ी है। वे बुद्ध के बारे मे और जानना चाहते है। वे उन रहस्यों से पर्दा उठाना चाहते है की किन कारणो से बुद्ध को भारत से भुला दिये गये। वे क्या कारण है कि सारे विश्व में अपने विचार का परचम लहराने वाले बुद्ध के अनुयायी भारत से गायब हो गये। भगवान बुद्ध की खोज अभी भी जारी है।

नवभारत संडे कवर स्‍टोरी में 15 मई 2022 को प्रकाशित