The arrest of Mr. Nandkumar Baghel periyar of Chhattisgarh's is unconstitutional.

छत्‍तीसगढ के पेरियार श्री नंदकुमार बघेल की गिरफ्तारी असंवैधानिक


छत्तीसगढ़ नागरिक संयुक्त संघर्ष समिति
(छत्तीसगढ़ के सामाजिक, जनवादी, प्रगतिशील और जन संगठनों का संयुक्त मंच)

छत्‍तीसगढ के पेरियार श्री नंदकुमार बघेल की गिरफ्तारी असंवैधानिक

7 सितम्बर 2021

छत्‍तीसगढ के पेरियार के नाम से विख्‍यात 84 वर्षिय श्री

नंदकुमार बघेल की आज गिरफ्तारी हो गई। गौरतलब है कि पिछले दिनों नंदकुमार बघेल ने यूपी में एक स्‍टेटमेंट दिया था जिसे ब्राम्‍हण विरोधी कहा जा रहा है। इसी मामले पर एक ब्राम्‍हण गुट के शिकायत पर उनकी गिरफ्तारी की गई। 

श्री नंदकुमार बघेल ने कहा था *‘’ब्राम्‍हण विदेशी है उन्‍हे गंगा से वोल्‍गा भेजा जाना चाहिए।‘’* यहां पर ब्राम्‍हण को विदेशी कहे जाने पर आपत्‍ती है। अगर ये आपत्‍ती सही है तो *सबसे पहले उन्‍हे जेल भेजा जाना चाहिए जिन ब्राम्‍हणों ने अपने आपको विदेशी होने की बात कही है। जैसे वोल्‍गा से गंगा में महापंडित राहुल सांस्‍कृतियांन, भारत एक खोज में पंडित जवाहर लाल नेहरू, लोकमान्य तिलक आदि आदि।*

ज्ञात हो कि नंद कुमार बघेल को एक वर्ग विशेष के खिलाफ तथाकथित टिप्पणी करने के आरोप में रायपुर पुलिस ने मंगलवार को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया। उन्हें 15 दिनों के लिए ज्यूडिशियल कस्टडी में जेल भेज दिया गया है। अब 21 सितंबर को मामले की अगली सुनवाई होगी।

भारत एक ऐसा देश है जब एक समुदाय विशेष जंतर मंतर दिल्‍ली में संविधान की प्रतियां जलाता है, मनुस्‍मृति को लागू करने के नारे लगाता है तब गिरफ्तारियां नही होती। संविधान के हक-अधिकार, आरक्षण, जाति जनगणना के खिलाफ बोलने या लिखने से गिरफ्तारियां नही होती। लेकिन एक 84 साला बुजुर्ग की गिरफ्तारियां होती है जिन्‍होने उनकी ही बात को दोहराया है।

नंद कुमार बघेल छत्तीसगढ़ में लंबे समय से बहुजन जागृति के संदर्भ में कार्य करते आ रहे है। यह समझने की जरूरत है कि असल परेशानी उन्‍हे इनके भाषण से नही है। शिकायतकर्ताओं की परेशानी है, एक ओबीसी मुख्‍यमंत्री जिन्‍होने ओबीसी आरक्षण हेतु ओबीसी गणना का आदेश दिया है। ताकि ओबीसी के आरक्षण का मार्ग प्रसस्‍त हो सके। उन्‍हे परेशानी है की देश के अजा अजजा ओबीसी एवं अल्‍पसंख्‍यक को जगाने में नंद कुमार बघेल निर्णायक भूमिका में है। भेदभाव पूर्ण ब्राम्‍हणवादी व्यवस्था का वे विरोध करते है, लेकिन कई ब्राम्‍हण उनके शार्गिद है। चंद ब्राम्‍हणों को इसी से परेशानी है की ओबीसी सामाज आज जाग रहा है और जातीय गुलामी को तोड़ने की ओर अग्रसर है। वे आज अपने संवैधानिक हको को  मांग रहे है। इसी बहाने वे ओबीसी मुख्‍यमंत्री को ही निशाना बनाना चाहते है।

वे लोग जो भुपेश बघेल के मुख्‍यमंत्री बनने के पहले से नंदकुमार बघेल को जानते है, उन्‍हे मालूम है कि वे वंचित समुदाय अजा अजजा ओबीसी एवं अल्‍पसंख्‍यक के लिए हमेंशा आवाज उठाते रहे है। उनकी पहचान एक लेखक, किसान नेता एवं ओबीसी-बहुजन नेता के रूप में पहले से है। ऐसी स्थिति में उनकी गिरफ्तारी एक षडयंत्र का हिस्‍सा है। जिसकी हम निंदा करते है। समस्‍त अजा अजजा ओबीसी एवं अल्‍पसंख्‍यक समाज को करनी चाहिए।

विनीत :
डॉक्टर गोल्डी एम जॉर्ज
*छत्तीसगढ़ नागरिक संयुक्त संघर्ष समिति*

सहभागी संगठन :

दलित मुक्ति मोर्चा / दलित स्टडी सर्कल / दलित मूवमेंट असोसीएशन / जाति उन्मूलन आंदोलन - छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ पिछड़ा समाज / सामाजिक न्याय मंच छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ महिला अधिकार मंच / महिला मुक्ति मोर्चा, छत्तीसगढ़ / महिला जागृति संगठन / सबला दल / छत्तीसगढ़ बाल श्रमिक संगठन / राष्ट्रीय आदिवासी संगठन / बिरसा अम्बेडकर छात्र संगठन / संयुक्त ट्रेड यूनियन काऊन्सिल / खीस्तीय जन जागरण मंच / यंग मेन्स क्रिश्चयन ऐसोसिऐशन - रायपुर / छत्तीसगढ़ क्रिश्चयन फैलोशिप / मुस्लिम खिदमत संघ / यंग मुस्लिम सोशल वेलफेयर सोसायटी / छत्तीसगढ़ बैतुलमाल फाऊन्डेश / तथागत संदेश परिवार / इंसाफ छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन / छत्तीसगढ़ नागरिक विकास मंच / सिरसा / कसम - छत्तीसगढ़ / अखिल भारतीय समता सैनिक दल - रायपुर

Why Dr. Radhakrishnan's birthday as Teacher's Day?

डा. राधाकृष्णन का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में क्यों?

(कँवल भारती)


यह सवाल हैरान करने वाला है कि डा. राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में क्यों मान्यता दी गई? उनकी किस विशेषता के आधार पर उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस घोषित किया गया? क्या सोचकर उस समय की कांग्रेस सरकार ने राधाकृष्णन का महिमा-मंडन एक शिक्षक के रूप में किया, जबकि वह कूप-मंडूक विचारों के घोर जातिवादी थे? भारत में शिक्षा के विकास में उनका कोई योगदान नहीं थाI अलबत्ता 1948 में उन्हें विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का अध्यक्ष जरूर बनाया गया था, जिसकी अधिकांश सिफारिशें दकियानूसी और देश को पीछे ले जाने वाली थींI नारी-शिक्षा के बारे में उनकी सिफारिश थी कि ‘स्त्री और पुरुष समान ही होते हैं, पर उनका कार्य-क्षेत्र भिन्न होता हैI अत: स्त्री शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वह सुमाता और सुगृहिणी बन सकेंI’[1] इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह किस स्तर के शिक्षक रहे होंगे?

क्या ही दिलचस्प है कि हम जिस आरएसएस और भाजपा पर ब्राह्मणवाद को फैलाने का आरोप लगाते हैं, उसको स्थापित करने का सारा श्रेय कांग्रेस को ही जाता हैI उसने वेद-उपनिषदों और भारत की वर्णव्यवस्था पर मुग्ध घोर हिन्दुत्ववादी राधाकृष्णन को शिक्षक के रूप में पूरे देश पर थोप दियाI वर्णव्यवस्था को आदर्श व्यवस्था मानने वाला व्यक्ति सार्वजनिक शिक्षा का हिमायती कैसे हो सकता है? भारत में शिक्षा को सार्वजनिक बनाने का श्रेय किसी भी हिन्दू शासक को नहीं जाता, अगर जाता है, तो सिर्फ अंग्रेजों को जाता हैI अगर उन्होंने शिक्षा को सार्वजनिक नहीं बनाया होता, तो क्या जोतिबा फुले को शिक्षा मिलती? उन्होंने अंग्रेजी राज में शिक्षित होकर ही शिक्षा के महत्व को समझा और भारत में बहुजन समाज और स्त्रियों के लिए पहला स्कूल खोलाI इस दृष्टि से यदि भारत में किसी महामानव के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में याद किया जाना चाहिए, तो वह महामानव बहुजन नायक जोतिबा फुले के सिवा कोई नहीं हो सकताI उनका स्थान सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन कैसे ले सकते हैं?

सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन को भारत का महान दार्शनिक कहा जाता हैI पर सच यह है कि वह दार्शनिक नहीं, धर्म के व्याख्याता थेI लेकिन बड़े सुनियोजित तरीके से उन्हें आदि शंकराचार्य की दर्शन-परम्परा में अंतिम दार्शनिक के रूप में स्थापित करने का काम किया गयाI जिस तरह आदि शंकराचार्य ने मनुस्मृति में प्रतिपादित काले कानूनों का समर्थन किया था, उसी तरह सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन भी मनु के जबर्दस्त समर्थक थेI देखिए, वह क्या कहते हैं, ‘मनुस्मृति मूल रूप में एक धर्मशास्त्र है, नैतिक नियमों का एक विधान हैI इसने रिवाजों एवं परम्पराओं को, ऐसे समय में जबकि उनका मूलोच्छेदन हो रहा था, गौरव प्रदान कियाI[2] परम्परागत सिद्धांत को शिथिल कर देने से रूढ़ि और प्रामाण्य का बल भी हल्का पड़ गयाI वह वैदिक यज्ञों को मान्यता देता है और वर्ण (जन्मपरक जाति) को ईश्वर का आदेश मानता हैI अत: एकाग्रमन होकर अध्ययन करना ही ब्राह्मण का तप है, क्षत्रिय के लिए तप है निर्बलों की रक्षा करना, व्यापार, वाणिज्य तथा कृषि वैश्य के लिए तप है और शूद्र के लिए अन्यों की सेवा करना ही तप हैI’[3] वर्णव्यवस्था में विश्वास करने वाला एक धर्मप्रचारक तो हो सकता है, पर शिक्षक नहीं हो सकताI
इन्हीं सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दू व्यू ऑफ़ लाइफ’ में वही डींगें मारी हैं, जो आरएसएस मारता है कि ‘हिन्दूसभ्यता कोई अर्वाचीन सभ्यता नहीं हैI उसके ऐतिहासिक साक्ष्य चार हजार वर्ष से ज्यादा पुराने हैंI वह उस समय से आज तक निरंतर गतिमान हैI’[4] बाबासाहेब डा. आंबेडकर ने अपनी बहुचर्चित व्याख्यान-पुस्तक ‘जाति का विनाश’ में इस गर्वोक्ति का जबरदस्त खंडन किया हैI वे कहते हैं, ‘प्रश्न यह नहीं है कि ‘कोई समुदाय बचा रहता है, या मर जाता है, बल्कि प्रश्न यह है कि वह किस स्थिति में बचा हुआ है? बचे रहने के कई स्तर हैं, लेकिन इनमें से सभी समान रूप से सम्मानपूर्ण नहीं हैंI व्यक्ति के लिए भी और समाज के लिए भी, सिर्फ जीवित रहने और सम्मानपूर्ण तरीके से जीवित रहने के बीच एक खाई हैI युद्ध में लड़ना और गौरवपूर्वक जीना एक तरीका हैI पीछे लौट जाना, आत्मसमर्पण करना और एक कैदी की तरह जीवित रहना—यह भी एक तरीका हैI हिन्दू के लिए इस तथ्य में आश्वासन खोजना बेकार है कि वह और उसके लोग बचे रहे हैंI उसे इस पर विचार करना चाहिए कि इस जीवन का स्तर क्या है? अगर लोग इस पर विचार करे, तो मुझे विश्वास है कि वह अपने बचे रहने पर गर्व करना छोड़ देगाI हिन्दू का जीवन लगातार पराजय का जीवन रहा है और उसे जो चीज सतत जीवन-युक्त लगती है, वह सतत जीवनदायी नहीं है, बल्कि वास्तव में ऐसा जीवन है, जो सतत विनाश-युक्त हैI यह बचे रहने का एक ऐसा तरीका है, जिस पर कोई भी स्वस्थ दिमाग का व्यक्ति, जो सत्य को स्वीकार करने से डरता नहीं, शर्मिंदगी महसूस करेगाI’[5]

यह हैरान करने वाली बात है कि डा. राधाकृष्णन के हिन्दू ज्ञान पर न केवल आरएसएस मुग्ध है, जो हिंदुत्व को एक जीवन-शैली बताते हुए उनके कथन को आधार बनाती है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी 11 दिसम्बर 1995 को आर.वाई. प्रभु बनाम पी.के. कुंडे मामले में यह फैसला देते हुए कि हिन्दूधर्म का मतलब एक जीवन शैली है, और वह एक सहिष्णु धर्म है, डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पुस्तक ‘भारतीय दर्शन’ में की गई व्याख्या को ही अपना आधार बनाया थाI जबकि इस मामले में दूसरा पक्ष, जोकि निश्चित रूप से डा. आंबेडकर हैं, उनको पढ़े वगैर हिन्दूधर्म पर कोई निर्णय न निष्पक्ष होगा, और न न्यायसंगतI डा. धर्मवीर[6] ने इस पर सटीक टिप्पणी की थी, ‘लेकिन माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह लिखते समय इस बात पर विचार नहीं किया, कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने डा. एस. राधाकृष्णन को पुराने ढर्रे का ‘धर्म-प्रचारक’ कहा हैI’[7]

राहुल सांकृत्यायन ने ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ की भूमिका में लिखा है कि ‘सर राधाकृष्णन जैसे पुराने ढर्रे के धर्म-प्रचारक का कहना है- ‘प्राचीन भारत में दर्शन किसी भी दूसरी साइंस या कला का लग्गू-भग्गू न हो, सदा एक स्वतंत्र स्थान रखता रहा हैI’[8] इसके जवाब में राहुल जी ने लिखा है, ‘भारतीय दर्शन साइंस या कला का लग्गू-भग्गू न रहा हो, किन्तु धर्म का लग्गू-भग्गू तो वह सदा से चला आता है और धर्म की गुलामी से बदतर और क्या हो सकती है?’[9]
डा. राधाकृष्णन के बारे में यह भ्रम फैलाया जाता है कि वह महान दार्शनिक थे, जबकि सच यह है कि यह केवल दुष्प्रचार हैI वह एक ऐसे ब्राह्मण लेखक थे, जिन्होंने हिंदुत्व को भारतीय दर्शन में, और ख़ास तौर से बौद्धदर्शन में वेद-वेदांत को घुसेड़ने का काम किया हैI राहुल सांकृत्यायन ने ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ में एक स्थान पर उन्हें ‘हिन्दू लेखक’ की संज्ञा दी हैI उन्होंने लिखा है, कि बुद्ध को ध्यान और प्रार्थना मार्गी तथा परम सत्ता को मानने वाला लिखने की गैर जिम्मवारी धृष्टता सर राधाकृष्णन[10] जैसे हिन्दू लेखक ही कर सकते हैंI[11] डा. आंबेडकर ने भी अपने निबन्ध ‘Krishna and his Gita’[12] में डा. राधाकृष्णन के इस मत का जोरदार खंडन किया है कि गीता बौद्धकाल से पहले की रचना हैI डा. आंबेडकर ने डा. राधाकृष्णन जैसे हिन्दू लेखकों को सप्रमाण बताया है कि गीता बौद्धधर्म के ‘काउंटर रेवोलुशन’ में लिखी गई रचना हैI[13]

भारतीय दर्शन में डा. राधाकृष्णन के हिन्दू ज्ञान की लीपापोती का विचारोत्तेजक खंडन राहुल सांकृत्यायन ने अपनी दूसरी पुस्तक ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ में किया हैI वह लिखते हैं, ‘कितने ही लोग—हाँ, भारत के अंग्रेजी शिक्षितों में ही—यह समझने की बहुत भारी गलती करते हैं कि सर राधाकृष्णन जबर्दस्त दार्शनिक हैंI....इसके सबूत के लिए पढ़िए—‘मार पड़ने पर बुद्धि भक्ति (की गोद) में शरण ले सकती है’..राधाकृष्णन यथा नाम तथा गुण भक्तिमार्गी हैंI...शरण लेना कायरों का काम है, उसे जूझ मरना चाहिएI बुद्धि पर मार पड़ रही है, आगे बढ़ने के लिएI जो बुद्धि में अग्रसर है, उस पर मार पड़ती भी नहींI’[14]

राधाकृष्णन के इस कथन पर कि ‘भारत में मानव भगवान की उपज है, और भारतीय संस्कृति और सभ्यता की सफलता का रहस्य उसका अनुदारात्मक उदारवाद है’, राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं, ‘भारतीय सभ्यता और संस्कृति ने हिन्दुओं में से एक-तिहाई को अछूत बनाने में किस तरह सफलता पाई? किस तरह जातिभेद को ब्रह्मा के मुख से निकली व्यवस्था पर आधारित कर जातीय एकता को कभी बनने नहीं दिया?.....यह सब अनुदारात्मक उदारवाद से है और इसलिए कि भारत में मानव भगवान की उपज हैI...यह हम जानते हैं कि सर राधाकृष्णन जैसे भक्तों और दार्शनिकों ने शताब्दियों से भारत की ऐसी रेड़ मारी है, कि वह जिन्दा से मुर्दा ज्यादा हैI’[15]

इसी पुस्तक में राहुल सांकृत्यायन एक जगह लिखते हैं, ‘सर राधाकृष्णन जैसे लोग भारत में शोषण के पोषण के लिए वही काम कर रहे हैं, जो कि इंग्लैंड में वहां के शासक प्रभु वर्ग के स्वार्थों की रक्षा में सर आर्थर एडिग्टन जैसे वैज्ञानिकों का रहा हैI’[16]
घोर जातिवादी और घोर हिंदूवादी अर्थात ब्राह्मणवादी डा. राधाकृष्णन को शिक्षक के रूप में याद करना किसी तरह से भी न्यायसंगत नहीं हैI

(4/9/2018)
[1] भारतीय शिक्षा का इतिहास, डा. सीताराम जायसवाल, 1981, प्रकाशन केंद्र, सीतापुर रोड, लखनऊ, पृष्ठ 259
[2] यह इशारा बौद्धकाल की ओर हैI इससे स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति बौद्धकाल के बाद की रचना हैI
[3] भारतीय दर्शन, खंड 1, 2004, राजपाल एंड संज, दिल्ली, पृष्ठ 422
[4] डा. बाबासाहेब आंबेडकर राइटिंग एंड स्पीचेस, खंड 1, 1989, महाराष्ट्र सरकार, मुंबई, पृष्ठ 66
[5] जाति का विनाश, डा. बाबासाहेब आंबेडकर का प्रसिद्ध व्याख्यान, अनुवादक : राजकिशोर, 2018, फारवर्ड बुक्स, नयी दिल्ली, पृष्ठ 96
[6] डा. धर्मवीर, दलित भारतीयता बनाम न्यायपालिका में द्विज तत्व, 1996, पृष्ठ 6
[7] राहुल सांकृत्यायन, दर्शन-दिग्दर्शन, 1944, भूमिका, पृष्ठ (5), संस्करण 1998 की भूमिका में पृष्ठ (i) हैI किताब महल, इलाहाबादI
[8] डा. राधाकृष्णन, हिस्ट्री ऑफ़ फिलोसोफी, वाल्यूम I, पेज 2, (नन्दकिशोर गोभिल द्वारा किये गये हिंदी अनुवाद ‘भारतीय दर्शन, खंड 1, 2004, पृष्ठ 18)
[9] राहुल सांकृत्यायन, दर्शन-दिग्दर्शन, 1998, पृष्ठ (i)
[10] इंडियन फिलोसोफी, वाल्यूम I, फर्स्ट एडिशन, पेज 355
[11] दर्शन-दिग्दर्शन, 1998, पृष्ठ 408
[12] देखिए, डा. बाबासाहेब आंबेडकर : राइटिंग एंड स्पीचेस, वाल्यूम 3, 1987, चैप्टर 13
[13] वही, पेज 369
[14] राहुल सांकृत्यायन, वैज्ञानिक भौतिकवाद, 1981, लोकभारती इलाहाबाद, पृष्ठ 64-65
[15] वही, पृष्ठ 80-81
[16] वही, पृष्ठ 85

Journalism University, the laboratory of Godse's thoughts

"गोडसे के विचारों की प्रयोगशाला पत्रकारिता विश्वविद्यालय"
Dr Dhanesh Joshi


शिक्षा और शिक्षक समाज के धुरी हैं, परन्तु शिक्षा केवल किसी खास विचार धारा से प्रभावित हो जाए तो शिक्षा और शिक्षक दोनों पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक है? एक जमाना था, जब राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखने वाले लोग राजनीती की बारीकियों को समझने के लिए शिक्षकों के पास जाकर मार्गदर्शन लिया करते थे. गोया कि वे शिक्षक किसी विचार धारा से प्रभावित हुए बिना अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करते रहे. जिसे हम अनेक लेखों एवं धर्मग्रंथों में देख सकते है. बात पत्रकारिता एवं पत्रकारिता शिक्षा की करें, तो चूंकि पत्रकारिता के पास ताकत है, इसलिए राजनीतिक दल भी चाहते हैं कि हर अखबार में, हर चैनल में उनकी विचारधारा वाले पत्रकार हों. किसी भी पत्रकार के लिए किसी ख़ास विचारधारा का अनुयायी होना कोई गलत बात नहीं होती. हाँ, गलत बात तब मानी जाती है, जब वह पत्रकार खबर लिखते हुए अपनी विचारधारा का प्रयोग करता है. शिक्षक भी एक इंसान है. किसी राजनीतिक पार्टी की तरफ उसका झुकाव हो सकता है. आखिर वह भी मतदान करता है. किसी न किसी राजनीतिक दल को अपना वोट देकर आता है. किसी राजनीतिक पार्टी के लिए अपना रुझान रखना अलग बात है, और किसी राजनीतिक पार्टी के लिए समर्पित हो जाना और बात है. शिक्षक किसी राजनीतिक पार्टी के लिए अपने रुझान के आधार पर काम करता हुआ दिखे, यह राष्ट्र निर्माण के लिए खतरनाक संकेत है.

ऐसे में शिक्षक अपने रुझान वाली पार्टी की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाता. देखने में आया कि अगर किसी संदर्भ में उनकी पसंद की पार्टी की या उसके किसी नेता की किसी मसले पर आलोचना हो रही हो तो वह तुरंत अपनी टिप्पणी/ लेख से उस तथ्य को नकारने की कोशिश करता है. उसकी पूरी कोशिश होती है कि उसके रुझान वाली पार्टी के प्रति किसी तरह का आक्षेप न लगे. कई बार वह विद्यार्थियों के सामने ऐसे तर्क ढूंढता है कि अमुक घटना तो दूसरी पार्टियों के समय भी हुई थी. इसका फर्क यह होता है कि अगर किसी पार्टी पर कोई आक्षेप लगता है तो वह शिक्षक ढाल बनकर आने की कोशिश करता है. इन स्थितियों में घटनाओं को मोड़ने, उसके तथ्यों को हल्का करने की कोशिश होती है. किसी विषय पर अपनी राय बनाना, उसके संदर्भ में वाद-विवाद होना, टिप्पणियों के साथ अपने मत को रखना और बात है. लेकिन ढाल की तरह खड़े हो जाना और बात है. इसका नुकसान यह है कि मूल इतिहास को वह गलत तरीके से विद्यार्थियों के समक्ष रखता है और छात्र सही तथ्यों से भटक जाते हैं. इन परिस्थितियों में वह शिक्षक ऐसे तर्क ढूंढता है जिससे विपरीत विचारधारा पर खड़ी पार्टी को दिक्कत हो. इसमें घटनाओ की तह में जाने के बजाय ऐसे तर्क तलाशे जाते हैं, जिससे विपरीत रुझान वाली पार्टी के लिए मुश्किल पैदा हो. तर्क ढूंढना गलत नहीं, लेकिन कई बार बहुत हल्के तर्कों का सहारा लिया जाता है. संघ और बीजेपी की पक्ष-विपक्ष टकराहट वाली घटनाओं को कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर के संदर्भ में देखेंगे तो पाएंगे की यहाँ के संघ परस्त शिक्षकगण, विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों के माध्यम से संघ एवं बीजेपी के समर्थन में विद्यार्थिओं को  जोड़ते रहें है. 
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में घटित घटना और पठानकोट की आतंकवादी घटना हर दृष्टि से मानव समाज के खिलाफ हैं. इस घटना को लेकर देश और दुनिया में आलोचना हुई और होना भी चाहिए परन्तु क्या इस घटना के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जबकि वह सत्ता में भी नहीं थी. कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के संघ समर्थित शिक्षकों के द्वारा आतंकवादी घटना के आड़ में कांग्रेस पार्टी को सरे आम गाली देना और संघ और बीजेपी का समर्थन करना कहाँ तक उचित है. विश्वविद्याल नए ज्ञान और सिद्धांतों का सृजनकर्ता होता है, वहीं पत्रकारिता विश्वविद्यालय गोडसे के विचारों का प्रयोगशाला बन कर रह गया. आम जन पत्रकारिता विश्वविद्यालय को संघ और बीजेपी के आत्मपरिसर के नाम से पुकारने लगे हैं. विश्वविद्यालय में संघ के कार्यकर्ताओं को शोधपीठ में अध्यक्ष के रूप में पुरस्कृत करना संघ के विचार को आगे बढ़ने का ही कार्य था. जिनके चयन में योग्यता सिर्फ संघ के जुड़े होना ही थी. पत्रकारिता विश्वविद्यालय का पठन-पाठन से कोई सरोकार नहीं दिखता. जिसे लेकर प्रख्यात शिक्षाविद प्रोफ़ेसर रमेश अनुपम देशबंधु के सम्पादकीय पृष्ठ में अपनी चिंता जाहिर कर चुके है. छत्तीसगढ़ के प्रख्यात पत्रकार, सामाजिक चिन्तक,  सांध्य दैनिक "छत्तीसगढ़" के संपादक श्री सुनील कुमार ने पत्रकरिता विश्वविद्यालय के शिक्षा के दशा और दिशा पर सम्पादकीय लिखी, जो छत्तीसगढ़ के शिक्षा इतिहास में पहली बार हुआ. कुलपति के रूप में नियुक्त कुलपति डॉ.मानसिंह परमार की योग्यता एवं शैक्षणिक अनुभव को लेकर माननीय उच्च न्यायालय, माननीय छत्तीसगढ़ लोक आयोग में मामला लंबित है. कुलपति ने विश्वविद्यालय परिसर को को संघ परिसर में परिवर्तित करने का कार्य किया. टीवी और रेडिओ केंद्र के निर्माण कार्य में हुए भ्रष्टाचार के आधार पर छत्तीसगढ़ शासन ने उन्हें हटाया. इस कदम पर संघ समर्थित शिक्षकों एवं संघ के कार्यकर्ताओं  द्वारा अयोग्य एवं भ्रष्ट कुलपति के समर्थन में  सोशल मीडिया एवं दुसरे अभिव्यक्ति के माध्यमों द्वारा बदले की भावना करार देना, किसी भी तरह से  उचित नहीं ठहराया जा सकता. प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘द रिपब्लिक’ में कहा है कि समाज के लिए सरकारें एवं लोकतान्त्रिक शिक्षा क्यों जरूरी हैं. सरकार किस प्रकार की है, या उसकी गुणवत्ता का व्यक्ति के जीवन के हर पहलू पर क्या असर होता है. व्यक्ति की भौतिक कुशलता ही नहीं, प्रत्येक आयाम इससे निर्धारित हो सकता है.जैसे उसके आध्यात्मिक विकास का स्तर, वह क्या खाता है, उसका परिवार कितना बड़ा हो सकता है, कौन-सी सूचना उसे मिले तथा कौन-सी नहीं, उसे कैसा काम मिलता है, वह कैसे मनोरंजन का अधिकारी है, वह कैसे आराधना करता है, उसे आराधना करने की इजाजत होनी भी चाहिए या नहीं. दूसरे शब्दों में प्लेटो के अनुसार किसी समाज को बनाने या बिगाडऩे के पीछे सरकार एवं उसकी शिक्षा प्रणाली का बड़ा हाथ होता है. दुनिया में भारत देश एक जीता-जागता उदाहरण है, जहां शिक्षा प्रणाली राजनीति की शिकार है. कभी प्रबंधन के  स्तर पर, कभी शिक्षक के  स्तर पर, कभी छात्र के  स्तर पर और कभी दोनों स्तरों पर. जब संस्थाओं का निर्माण ही विचार धारा के  आधार पर होने लगे , तो शिक्षा का भविष्य क्या होगा ?

पत्रकारिता शिक्षा में राजनीति वे लोग कर रहे हैं जिन्होंने राजनीति की शिक्षा संघ से पायी हैं. ऐसे में शिक्षक किसी विचारधारा विशेष को बढा़ने की शिक्षा-दीक्षा अपने विद्यार्थियों को प्रदान कर रहें हैं तो निराश और हताश होने की बात हैं. क्योंकि ‘अंधा सुखी जब सबका फूटे’ वह सबकी आंखें फोड़ने का उपक्रम करेगा. उसे सुख चाहिए, अपने तरह का सुख. यही खेल जारी है. तब तक जारी रहेगा, जब तक शिक्षा में राजनीति, राजनीति में अशिक्षा, शिक्षा का व्यवसायीकरण, समाज विहीन शिक्षा जारी रहेगी. अंतत: जब ईमानदारी तथा शिक्षा का स्तर अत्यधिक गिर जाते हैं, तो उसका स्वरूप सबसे खराब तरह की सरकार का बन जाता है. इसमें अधिक जोर शिक्षा पर दिया गया है, ऐसे में न सिर्फ सरकार के प्रमुख का दार्शनिक और योद्धा होना आवश्यक है, बल्कि शिक्षा का प्रबुद्ध स्वरूप  अच्छे जीवन के लिए आवश्यक है.

डॉ. धनेश जोशी
(स्वतंत्र लेखक)

Know the difference between your exploiter and your savior

अपने शोषक और उद्धारक में फर्क जानो 


जो अपनी डोमार जाति का इतिहास नही जानते। वे अपने पूर्वजो के साथ हुये दमन को भूल गये, वे भूल गये की यही सवर्ण हिन्दू  लोग उनके पूर्वजो के सीने में गडगा लगाने के लिए बाध्यत करते थे, वे भूल गये ये वे ही लोग है जो आज भी अपने मंदिरो में प्रवेश नही देना चाहते। यह वही हिंदू हैं जिन्होंने हमारे पूर्वजों को सफाई पेशा, मैला उठाने जैसे घृणित पेशा को करने के लिए मजबूर किया। 
डोमार जाति का कभी गौरवशाली इतिहास रहा है और हिंदूओ के आने के पहले वह इस देश के शासक थे। लेकिन इन्होंने डोमारो का दमन किया और मैला प्रथा से जोड़ दिया। हमें फिर इस देश का शासक बनना है।
आज से 50 साल पहले तक डोमारो में जो गैर ब्राह्मणी सभ्यता थी संस्कृति थी अपने देवी देवता थे। जो कि किसी भी हिंदू ग्रंथों में नहीं पाए जाते उन्हें डोमारो ने भुला दिया। 
ये वे लोग है जो नही जानते की डोमार सहित सभी दलित जाति को किस कारण अनुसूचित जाति में जोडा गया। वे दस बिन्दु जिसके कारण उन्हे  अनुसूचित जाति या अछूत जाति में जोडा गया। उनमें से प्रमुख है उनका हिन्दु न होना। डोमार सहित सभी दलित जाति न कभी हिन्दू थी न कभी  हिन्दू हो सकती है। आप भले हिन्दू  अपने आप को मानो लेकिन सवर्ण हिन्दू कभी भी आपको हिन्दू नही मानते है. न ही आपको मंदिर में प्रवेश देते है। पिछले हफ्ते ही मंदिर प्रवेश के प्रयास में सवर्णो ने ऐसे दलितो पर लात घूसे बरसाये थे। ऐसी खबरें लगातार मीडिया में आते रहती है।
जिन डोमारो को अपने हिंदू होने का भ्रम है वह किसी मेन रोड में अपने जातीय पहचान के साथ दुकान खोलें और देखे कितने हिंदू उनसे सामान खरीदते हैं हिंदू होने का भ्रम खत्म हो जाएगा । आज भी मनीषा वाल्मीकि से लेकर मध्य प्रदेश शिवपुरी मे डोमार समाज की दो बच्चियों की निर्मम हत्या किसने की  यह जान जाओगे तो पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। 

ऐसे में कट्टर हिन्दूु समर्थक दो प्रकार के लोग ही बचे है 
1. जिन्हे अपने इतिहास का ज्ञान नही है। 
2. जिन्हे आर आर एस ने हिन्दु धर्म प्रचार के लिए पैसे दिये है या पद पुरस्कार देने का लालच दिया है। 

आईये अब ये भी जान ले वे कौन सी 10 कसौटी थी जिन आधारो पर डोमारो को अनुसूचित जाति में शामिल किया गया। ये दस कसौटी या बिन्दु 1930 के जनगणना के दौरान तैयार की गई, आज भी गजेटियर में इसके दस्ताावेज मौजूद है।  
1.    जो ब्राम्हण की प्रधानता नही मानतें।
2.    जो किसी ब्राम्हण अथवा अन्य किसी माने हुए हिन्दु गुरू से मन्त्र नही लेते।
3.    जो वेदों को प्रमाण नही मानते।
4.    जो हिन्दु-देवताओं को नही पूजते।
5.    जिनका अच्छे ब्राम्हण पौरोहित्य नही करते।
6.    जो कोई ब्राम्हण पुरोहित नही रखते।
7.    जो हिन्दु मंदिर के भीतर नही जा सकते।
8.    जो अस्पृष्य नही है अथवा निर्धारित सीमा के भीतर आ जाने से अपवित्रता  का कारण होते है।
9.    जो अपने मुर्दो को गाड़ते है।
10.    जो गोमांस खाते है और गौ का किसी प्रकार से आदर नही करते।
इसीलिए अपने शोषणकर्ता और उद्धारकर्ता में फर्क जानो। आज जो समता समानता और तमाम प्रकार के सुविधाएं संविधान से मिल रही है वह सिर्फ बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की बदौलत है। इसे बचा कर रखो और उनके द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करो। जिन जातियों ने बाबा साहब के संघर्ष वाले पथ को अपनाया है वह आज कहां से कहां पहुंच गई। लेकिन हमारा समाज आज भी वहीं है। 
बड़ों को प्रणाम, बराबर वालों को प्यार और अपने से छोटे को आशीर्वाद मिले।
जय भीम
संजीव खुदशाह 

Who is jhola chap Doctors?

 कौन है झोलाछाप डॉक्टर ? 

डॉक्टर के बी बनसोडे

पिछले दिनों में बीजेपी सरकार ने आयुर्वेदिक चिकित्सकों को सीधे एलोपैथी पोस्ट ग्रेजुएशन कराने की तथा उसके बाद उन्होंने आयुर्वेदिक चिकित्सकों को भी विभिन्न प्रकार की सर्जरी करने की अनुमति दिये जाने की बात की थी । 


जिसके अनुसार आयर्वेदिक चिकित्सक भी कई प्रकार की आंख , नाक , कान , गले के अलावा अनेक प्रकार की जनरल सर्जरी की ट्रेनिग देकर उन्हें लाइसेंस देने को कहा था ।


इस मुद्दे के खिलाफ देश भर के एलोपैथी चिकित्सक तथा उनकी संस्था आईएमए ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया था ।

उनके अनुसार कोई स्पेशलिस्ट ENT , Ophthalmic या General Surgeon बनाने के लिये पहले MBBS की पढ़ाई करवाई जाती है । जिसमें विद्यार्थी को विशेषज्ञ बनने के पहले सभी विषयों का ज्ञान गहराई से पढ़ाया जाता है । 

वैसी शिक्षा आयुर्वेद में नही पढ़ाई या सिखाई  जाती है ।

इसके अलावा एलोपैथी का भी कोई एक विशेषज्ञ किसी भी अन्य फील्ड में  काम नही कर सकता है । क्योकि उसकी विशेषज्ञता अलग क्षेत्र में है । जैसे कि कोई हड्डी रोग विशेषज्ञ नेत्र रोग विशेषज्ञ का काम नही कर सकता है ।

उसी तरह कोई महिला रोग विशेषज्ञ ENT का काम नही कर सकता है ..... इसी तरह सभी विषय के विशेषज्ञ का अपना फील्ड होता है ।


अब यदि आयुर्वेदिक चिकित्सक को ट्रेनिग देकर भी सर्जरी करवाना है , तो उसके लिये उसे उसके शुरुवात से आयुर्वेदिक विषयों को छोड़ना पड़ेगा । जैसे उनका फार्मेकोलॉजी , पैथोलॉजी वगैरह को त्यागना पड़ेगा ।

और तब वह एलोपैथी के अनुसार सभी विषयों को पढ़कर तथा सीखकर ही विशेषज्ञ बन सकता है ।


*अब सरकार अपनी समझदारी या अज्ञानता का परिचय ना देकर इस जरूरी मापदंड को खारिज करके किसी को भी विशेषज्ञ बनाने की जिद को छोड़ देना ही सही होगा , अन्यथा यह कोशिश वास्तव में जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करना है ।*


फिलहाल तो वह मुद्दा अभी कोरोना के बाद से ठंडे बस्ते में है ।

अब आप झोला छाप चिकित्सकों को मान्यता देने की बात करते हैं , तो फिर झाड़फूंक वाले बाबाओं , बैगा गुनिया , तांत्रिक बाबा , हस्तरेखा विशेषज्ञ , तथा ग्रह दशा शांत करने वालों शनिदेव को शांत करने वाले लोगों तथा वास्तु शास्त्र के लोगों को भी फ्रंट लाईन वर्कर का दर्जा क्यों नही दे देना चाहिये ?? आखिरकार वह भी तो जनता की तकलीफ के उपचार में ही हजारों सालों से निर्बाध अपना काम करके जनता को उनके कष्ट से *??* राहत पहुंचाते ही हैं ।


गोबर तथा गोमूत्र से उपचार करने वालों को भी कोरोना से बचाने वाले फ्रंट लाईन वारियर कहने में क्या समस्या है ??

आजकल सोशल मीडिया में भी अनेक लोग विभिन्न प्रकार के उपचार से लोगों का ज्ञानवर्धन कर रहे है , तो उन्हें भी फ्रंट लाईन वारियर का खिताब मिलना ही चाहिये ???


*अब देश को आधुनिकता की बुराइयों से बचाकर वापस 5000 साल पीछे ले जाने वाले सभी बातों का समर्थन हमें क्यों नही करना चाहिये ??*


अवश्य करना चाहिये ।


वैसे भी शहरी लोग , आधुनिक लोग पश्चिमी सभ्यता वाले लोग तो केवल हम सब भारतीय तथा पवित्र लोगों को बर्बाद कर रहे हैं । तो इसलिये फिर हमे वापस जंगली जीवन , शिकारी जीवन को सही मान लेना ही बुद्धिमानी है । 

कृषि में भी आधुनिक विज्ञान का सहारा लेना बंद करना चाहिये ।

देशभर के सभी लोगों को मोटरसाइकिल कार , मोबाईल वगैरह आधुनिक विज्ञान द्वारा निर्मित सब आविष्कारों का प्रयोग करना  बन्द करना चाहिये ।

सभी बड़े अस्पताल जिसमें आधुनिक ईलाज होता है , उन्हें बन्द कर देना चाहिये ।


*और सबसे बड़ी बात आधुनिक युग की पढ़ाई लिखाई( शिक्षा )  भी खत्म किया जाना चाहिये ।*

सभी फैक्ट्रियों को तत्काल बन्द करना चाहिये ।जिसमे कपड़े वगैरह समस्त आधुनिक वस्तुओं का उत्पादन होता है तथा जिसका हम रोजमर्रा के जीवन में लगातार उपयोग करते हैं ।


दरअसल कुछ लोग अपने अधूरे ज्ञान को जस्टिफाई करना चाहते हैं । इसलिये अपने देश की जनता को सबसे अच्छा ज्ञान ( शिक्षा ) देने के विरोध में अज्ञानता को सही साबित करने में लगे रहते हैं ।


इसी सिलसिले में हमे इसे देखना होगा ।

झोलाछाप चिकित्सक कोई कैसे बनता है ??

  कोई एक कम पढ़ा लिखा व्यक्ति , जो किसी मेडिकल शॉप में काम करते करते तथा , किसी अन्य चिकित्सक के साथ काम करते करते उसे कुछ दवाओं के बार में कुछ ज्ञान हासिल कर लेता है या उसको दवाओं की कुछ सामान्य जानकारी मिल जाती है कि , किस तरह की तकलीफ (लक्षण) में कौन सी दवा काम करती है ।

एक दो इंजेक्शन की जानकारी लेकर वह लोगों का इलाज शुरू कर देता है । 

जब ऐसे आधे - अधूरे या कम जानकार व्यक्ति के ईलाज से कुछ लोगों को छोटी मोटी बीमारियों में आराम मिल जाता है , तो आम जनता उसे चिकित्सक मान लेती है । जनता को भी उसके बेहद अल्प ज्ञान से ही जब राहत मिल जाती है , तो वह दूर शहर के किसी बड़े चिकित्सक के पास जाकर अपना समय तथा पैसा बचाने में ही अपनी समझदारी समझता है ।

इस तरह के झोला छाप चिकित्सकों को सरकार वैसे तो कोई मान्यता नही देती है , लेकिन अघोषित तौर पर इनका कारोबार अत्यंत व्यवस्थित रूप से फल फूल रहा है । इन झोला छाप चिकित्सकों के कारण बड़े बड़े कॉरपोरेट अस्पताल भी अपनी कमाई में इजाफा करते है । इसलिये वे भी उन्हें एक प्रकार से प्रश्रय ही देते हैं ।


अब यदि हम इस समस्या के निदान की बात भी कर लें तो बेहतर होगा ।

झोलाछाप चिकित्सक यदि कहें कि ग्रामीण जन जीवन के अच्छे मित्र हैं , और इसलिये वे आराम से कार्यरत रहते भी हैं ।

आम जनता को सरकार से कोई सहूलियत भी नही मिलती , तो वे झोलाछाप चिकित्सकों के शरणागत होने को मजबूर भी हैं ।

भारत की सरकार ने आजादी के बाद से अब तक गांव गांव में शिक्षा , स्वास्थ्य एवम अन्य समस्त मूलभूत सुविधा प्रदान करने में असफल रही है ।

कहने को मिनी पीएचसी , सीएचसी एवम जिला अस्पताल खोले हुवे है , लेकिन उसमें  से अधिकांश जगहों पर ना चिकित्सक हैं और ना पैरामेडिकल स्टॉफ और ना दवाइयाँ या एडमिशन की सहूलियत ।

ऐसी स्तिथि में झोलाछाप ही ग्रामीण जनता के लिये मददगार है ।

अब यदि इस सिस्टम को ठीक करना है , तो सरकार को फिलहाल एक काम करना चाहिये । वह ये कि जितने भी झोलाछाप चिकित्सक हैं , उनकी पहचान करके उन्हें पहली बार , लगभग एक साल की ट्रेनिग देकर , कुछ निश्चित बीमरियों के उपचार के लिये लाइसेंस दे देना चाहिये । फिर कुछ निश्चित दवाओं का किट उपलब्ध करवाना चाहिये एवम उनकी सेलरी निर्धारित करके ग्रामपंचायत से दिलवाई जानी चाहिये ।

हालाकि सरकार ने आशा दीदी इत्यादि को इसके लिये नियुक्त किया है , लेकिन उतना ही पर्याप्त नही है ।

प्रत्येक झोलाछाप चिकित्सक को उसके बाद प्रतिवर्ष 15 दिनों की ट्रेनिंग देना चाहिये , जिससे वह समय समय पर अपडेट होते रहें ।


सरकार सबको सही एवम वैज्ञानिक शिक्षा पद्धति से शिक्षित करने के लिये मुफ्त शिक्षा दे । सभी प्राइवेट शिक्षा संस्थान बन्द किये जाने चाहिये , तथा सभी जगह एक तरह की शिक्षा दी जानी चाहिये । स्टेट बोर्ड , या केंद्रीय बोर्ड ( (ICSE &CBSE) वगैरह बन्द करके समान शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिये । कुछ राज्य अपनी मातृभाषा में शिक्षा देना चाहते हैं , तो उसके लिये यह सुविधा गई जानी चाहिये । शिक्षा हासिल करने का मकसद ज्ञान हासिल करना होना चाहिये , ना की  डिग्रीधारी बनकर केवल नौकरी हासिल करने की मानसिकता से बच्चों को तथा जनता को मुक्त किया जाना चाहिये । 

सबको रोजगार प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार को लेनी चाहिये ।

यही सब समानता चूंकि विकसित देशों में लगभग 150 साल पहले ही अपना ली थी , जिनके चलते आज वे विकसित समाज हैं । और हम अभी भी अविकसित समाज और दुनिया के पिछड़े तथा गरीब देश में एक देश है ।

इसमें भी हमें अपनी अज्ञानता पर गर्व करना छोड़कर वास्तविक उन्नति की दिशा में अपनी सोच विकसित करना जरूरी है ।

धन्यवाद ।