Thursday, July 14, 2011

यदि देना ही था तो संजीव खुदशाह और ओमप्रकाश वाल्मीकि दोनों

यह तथ्‍य डंक उपन्‍यास मे आया कि संजीव खुदशाह की प़सिध्‍द पुस्‍तक सफाइ कामगार समुदाय से ओमप़काश वाल्‍‍मीकि ने  सामग़ी चुराइ। विस्‍तृत विवरण इस लिंक मे पढे। 

न्याय की कसौटी पर साहित्यीक चोरी ..........!


उपन्यास के प्रमुख पात्र विराट और संध्या भी ऐसी ही द्घुमक्कड़ प्रवृत्ति के हैं और भारत के विभिन्न राज्यों में भ्रमण करने के लिए निकलते हैं। गौरतलब है कि उपन्यास का प्रमुख पात्र विराट दलित है और उसकी प्रेमिका संध्या ठाकुर द्घराने से ताल्लुक रखती है। उनके द्घूमने से ही उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है। उपन्यास का प्रारंभ मध्यप्रदेश के एक आदिवासी गांव टिनहरीया से होता है। आदिवासी युवक को विवाह से पहले अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना पड़ता है। इसके लिए उसे रीछ से भी लड़ना पड़ता है और अपनी प्रेमिका को डण्डा बनाकर रस्सी पर भी चलना पड़ता है।
उपन्यास में लेखक बीच-बीच में नीतिपरक सूक्तियों का भी प्रयोग करता है जैसे- 'यदि आपके अन्दर किसी चीज को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा है तो आप प्राप्त कर सकते हैं। हिम्मतीसाहसीविवेकशील और मृत्यु से भय न करने वाले पुरुष ही अपनी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।(पृष्ठ १६) उपन्यास में लेखक दर्शाते हैंं कि सामाजिक कुरीतियां सुनामी लहरों से ज्यादा भयंकर होती हैं। पुल बनाने के लिए दलितों-पिछड़ों की बलि देना सामाजिक कुप्रथाओं का उदाहरण है। भारतीय समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था एवं रूढ़ियों पर लेखक बार-बार प्रहार करता है कि किस तरह ये दलितों को डस रही हैं। उनके डंक से वे किस तरह छटपटा रहे हैं। ठाकुर जाति की एक लड़की वाल्मीकि जाति के ड्राइवर के साथ भागकर शादी कर लेती है तो ठाकुर परिवार के लोग वाल्मीकि ड्राइवर के पूरे परिवार का कत्ल कर देते हैं। ऐसी खाप पंचायतों के फतवे निर्दोषों की जान ले लेते हैं इज्जत के नाम पर। किन्तु लेखक उन्हें निरीह नहीं दर्शाता बल्कि यह भी बताता है कि किस तरह वे अपनी मानवीय गरिमा के लिए संद्घर्ष कर रहे हैं।
इस उपन्यास में पर्यावरण पर विशेष ध्यान दिया गया है। पर्यावरण के नष्ट होने के खतरे की ओर संकेत करते हुए उपन्यास बताता है कि संपूर्ण विश्व खतरे में है। विश्व की संपूर्ण मानवता के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लग गया है। ग्लेशियर पिद्घल रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग का खेल शुरू हो गया है। यह संकेत है कि पशु-पक्षियों और मानव जाति के संपूर्ण नष्ट होने का। (पृष्ठ ६७) उपन्यास सामाजिक समस्याओं मे ं'भ्रूण हत्या' 'मैला ढोने की प्रथाआदि पर भी विस्तार से चर्चा करता है और उसके समाधान बताता है।
लेखक आर्थिक समृद्धि को जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए जरूरी समझता है। आर्थिक उपलब्धियों ने ये सारी द्घिसी-पिटी परंपराएं तोड़ दी हैं। डॉक्टर अम्बेडकर द्वारा दिए गये ज्ञान ने इनको शिक्षित बना दिया है। इनमें एकता आ गयी है। खटीक,चमारकोरीबउरीयामेहतरसचानयादव सभी इस बारात में सम्मिलित हैं। आप इनकी बारात को न रोकें क्योंकि इस बारात में विवेकशीलब्राह्मणक्षत्रिय और बनिया भी शामिल हैं। (पृष्ठ ८१) यह युग आपसी भाईचारेप्यारमोहब्बत और जातिविहीन समाज के निर्माण का युग है। कौन छोटा है और कौन बड़ा इस विकृति भरी सोच को दफन कर दो। आज के युग में न कोई छोटा है और न ही कोई बड़ा। आदमी अपने कर्मोंयोग्यता और शिक्षा से छोटा-बड़ा हो सकता है। एक दलित प्रोफेसर एक अनपढ़गंवारब्राह्मणठाकुर से बड़ा हो सकता है।(पृष्ठ ८२) जिस दिन दलित आर्थिक रूप से समृद्ध हो जाएंगे उस दिन इस देश से विषमताएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी। (पृष्ठ १३३)
लेखक समाज के शोषकों की तुलना अमरबेल से करता है। 'इन अमरबेल की तरह समाज में चारो तरफ फैली विंसगतियों,असमानताओंछुआछूत को नष्ट किया जा सकता है। अमरबेल हरे-भरे पेड़ का शोषण करती है। उनको मिलने वाली खुराक को हजम कर जाती है। बिना मेहनत के पलती है।'(पृष्ठ ९५) इस भारत देश में सदियों से जातिवादछुआछूतअसमानताऊंच-नीच की जहरीली जड़ें मजबूती से विकसित होती रही हैं।(पृष्ठ ११७) लेखक पाठक में आत्मविश्वास पैदा करता है कि देश में बुराइयां हैं पर इन्हें नष्ट किया जाना संभव है। इस तरह उपन्यास पाठक पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ता है।
पर उपन्यास में कुछ कमियां भी दृष्टिगोचर होती हैं जिनसे बचा जा सकता था। जैसे इस उपन्यास के प्रमुख पात्र विराट और संध्या प्रेमचंद की कहानी 'कफनऔर रूपनारायण सोनकर की 'कफनकी आपस में तुलना करते हैं। (देखें पृष्ठ १२६-१३०)। इसी प्रकार पृष्ठ १३२-१३३ में ओमप्रकाश वाल्मीकि वाला प्रकरण है। ये दो प्रसंग लेखक के कद को छोटा करते हैं। क्योंकि इसमें एक तो अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने जैसी प्रवृत्ति झलकती है। पाठक इतने बेवकूफ नहीं होंगे कि ये समझ न सके कि भले ही ये चर्चा विराट और संध्या कर रहे हों और विराट संतुलित बातें भी कर रहा हो पर हैं तो ये रूपनारायण सोनकर के ही पात्र। कोई और लेखक इस तरह अपने किसी उपन्यास में जिक्र करता तो और बात होती। दूसरी बात ओमप्रकाश वाल्मीकि प्रकरण को भी उपन्यास में शामिल करने की आवश्यकता नहीं थी। यदि देना ही था तो संजीव खुदशाह और ओमप्रकाश वाल्मीकि दोनों से बात कर उनकी बातों को उनके ही शब्दों में यथावत्‌ दिया जाता क्योंकि ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित साहित्य के एक वरिष्ठ लेखक हैं और इस तरह की चर्चा से उनका कद छोटा नहीं होगा। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं एक निष्पक्ष बात कह रहा हूं। ओमप्रकाश वाल्मीकि का पक्ष लेने का मेरा मकसद नहीं है और न ओमप्रकाश वाल्मीकि को मेरे पक्ष की आवश्यकता है। मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि ऐसे प्रकरणों से रूपनारायण सोनकर की छवि धूमिल होती है। हालांकि रूपनारायण सोनकर आज के चर्चित लेखक हैं। वे अपने उपन्यास में ये दो प्रकरण न भी देते तो भी उनकी प्रसिद्धि में कोई कमी नहीं आती। 
इन कुछ छोटी-सी कमियों को छोड़ दिया जाए तो यह कहा जा सकता है कि यह उपन्यास व्यवस्था के डंक तोड़ने का निशंक प्रयास है। उपन्यास केवल देश ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर की समस्याओं पर भी विचार करता है जो कि आमतौर पर दलित उपन्यासों में नहीं उठाई जाती। कुल मिलाकर यह बेहद पठनीय एवं पाठकों को जागरूक करने वाला उपन्यास है।

Monday, July 4, 2011

दलित साहित्य के तहत संजीव खुदशाह सुधीर सागर, गुलाब सिंह, सतनाम शाह, मुलख चांद, बब्बन रावत, रामनाथ चंदेलिया तथा और भी कई लोग हैं, जिन्होंने अपने लेखन में सिर पर मैला ढोने वालों के विषय में चर्चा की है।


सफाई कामगारों की व्यथा से दूर हिंदी साहित्य

साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है। साहित्य मे हमें समाज की प्राचीन एवंनवीन- हर तरह की जानकारी मिलती है। हिंदी साहित्य में उन उपेक्षित औरलाचार लोगों का भी साहित्य है, जिन्हें समाज से केवल दुत्कार,उपेक्षा,तिरस्कार और अस्पृश्यता ही मिली है। ऐसे लोगों के दर्द के दर्पण दलितसाहित्य को हिंदी साहित्य में अपना स्थान बनाने के लिए कई तरह के विरोधोंका सामना करना पड़ा। कई साहित्यकार इसे अलग साहित्य का नाम देने के पक्षमे नहीं थे। परंतु दलित साहित्य ने हर विरोध का सामना करते हुए साहित्यमें अपनी अलग जगह और अस्तित्व बनाया और आज इसे प्रोत्साहन भी मिल रहाहै।…………..सुरेखा पुरुषार्थीपरंतु दलितों में भी एक ऐसा महादलित समाज है, जिसकी वास्तविकता की असलीकहानी से किसी भी लेखक ने समाज को अवगत नहीं कराया। वो महादलित समाज है-सफाई कामगारों का। इस समाज के विषय पर साहित्य में ज्यादा चर्चा नहीं हुईहै। महादलित सफाई कामगार वर्ग, 'जो हजारों साल से नरक का जीवन जीते आयाहै और आज आधुनिकता के युग में भी वही नरक का जीवन जी रहा है।'साहित्यकारों का मानना है की दलित साहित्य की शुरुआत तो प्रेमचंद केकाल से ही हो गई थी। अपने साहित्य मे उन्होंने हमेशा दलितों के दुःख-दर्दका वर्णन किया,जिसका एक उदाहरण उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना- गोदान- है। परंतुप्रेमचंद ने भी अपने साहित्य मे सफाई कामगारों का वर्णन नहीं किया है। एकऔर ऐसे साहित्यकार हैं, जो दलितों पर लिखने के लिए जाने जाते हैं-अमृतलाल नागर। उन्होंने साहित्य को नाच्यो बहुत गोपाल, बगुले के पंख, आदिजैसी रचनाएं दी है। नागरजी ने अपनी इन दोनों रचनाओ में मेहतर जाति(दलितों की ही एक जाति) को विषय बनाया है। परंतु उन्होंने भी अपनी रचनामें सफाई कर्मी की पीड़ा और व्यथा का वर्णन करने की जगह अपने ही मन केद्वेष को उड़ेल कर रख दिया है। उनके उपन्यास "बगुले के पंख" का नाम हीसफाई कामगार का मजाक उड़ाता जान पड़ता है। बहुत से अन्य साहित्यकारो ने
भी लगभग ऐसा ही किया है।
सफाई कामगार वो लोग हैं, जो सुबह सूरज की किरणों के साथ ही दूसरे लोगोंका मैला अपने सिर पर ढोने के लिए निकल पड़ते हैं। मानव का मानव पर येकैसा जुल्म है, जहा एक मनुष्य दुसरे मनुष्य का मैला अपने सिर पर ढोने केलिए बाध्य है। सिर पर मैला ढोने वाले इन लोगों का जिक्र तो दलित साहित्यमें मिलता है, पर सफाई कामगारों के तहत वे लोग भी हैं, जो हर रोज कहीं नाकहीं, किसी ना किसी जगह गंदे नाले (सीवर) में सफाई के लिए उतरते हैं।इनकी निर्मम दशा के विषय मे कहीं भी, किसी भी साहित्यकार ने बात तक नहींकी है। साधारण शब्दों में कहें तो समाज के इस वर्ग को साहित्य ने
उपेक्षित रखा है।
दलित साहित्य के तहत संजीव खुदशाह, सुधीर सागर, गुलाब सिंह, सतनाम शाह,मुलख चांद, बब्बन रावत, रामनाथ चंदेलिया तथा और भी कई लोग हैं, जिन्होंनेअपने लेखन में सिर पर मैला ढोने वालों के विषय में चर्चा की है। परंतुसीवर साफ़ करने वाले इन लोगों का जिक्र किसी ने नहीं किया। लेकिन इनमहादलित लोगों की सही हालत और उनकी व्यथा का स्पष्ट वर्णन मैंने हाल हीमें दर्शन रतन रावण जी की पुस्तक 'आंबेडकर से विमुख सफाई कामगार समाज'में पढ़ा है।दर्शन रतन रावण हालांकि लेखक या साहित्यकार नहीं हैं, और उनकी पुस्तकउनका पहला प्रयास भी है, लेकिन अपने इस प्रयास मे ही उन्होंने सफाईकामगार लोगों की जहालत की जिंदगी का इतना सजीव वर्णन किया है कि पाठक केमन में उन पलों की तस्वीर स्पष्ट उभरती है, जब एक सफाई मजदूर सीवर मेउतरता होगा। दर्शन रतन रावण ने केवल उनकी अमानवीय दशा का ही वर्णन नहींकिया है, बल्कि ये भी बताया है की हर वर्ष कितनी बड़ी संख्या मे सीवरसाफ करने वाले सफाई कर्मी बीमारी या सीवर में ही दम घुटने की वजह से मरजाते हैं और सरकार को इसकी कोई खबर तक नहीं होती।यानी आज समाज में ऐसे लोग हैं, जिन्होंने इन लोगो के दुख दर्द से समाज कोअवगत कराने का बीड़ा उठाया और उनमें दर्शन रतन रावण, हरकिशन संतोषी जैसेलोग शामिल हैं। ये प्रयास केवल कलम और पन्नों तक ही सीमित नहीं है।दर्शनरतन रावण स्वयं इसी जमीन से जुड़े हुए हैं और "आदि धर्म समाज" जैसे संगठनके माध्यम से पूरे भारत मे सफाई कर्मियों के विकास, सांस्कृतिक परिवर्तनएवं सम्मानजनक पहचान के लिए कार्य कर रहे हैं।आज समाज हर वर्ग उन्नति केशिखर पर पहुंच रहा है, पर महादलित वर्ग आज भी वहीं जी रहा जहां सदियोंसे जीता आया है। अब साहित्यकारों को इन लोगो के दर्द को साहित्य में जगहदेकर अपना कर्त्तव्य निभाना चाहिए।
(साभार – सामयिक वार्ता)