Tuesday, September 22, 2015

भारत में जाति एक राष्ट्रीय समस्या है

जाति उन्मूलन आंदोलन पर प्रथम राज्य स्तरीय सम्मेलन संपन्न
भारत में जाति एक राष्ट्रीय समस्या है

जाति उन्मूलन आंदोलन छत्तीसगढ़ संयोजक कमेटी द्वारा ‘‘भारत में जाति उन्मूलन कैसे‘‘ विषय पर प्रथम राज्य सम्मेलन दिनांक 19 सितंबर 2015 (शनिवार) को वृन्दावन हाल, सिविल लाईन रायपुर में सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में मुख्य वक्ता तुहिन अखिल भारतीय संयोजक, क्रांतिकारी सांस्कृतिक  मंच (कसम) थे। सम्मेलन की अध्यक्षता प्रसिद्ध चिकित्सक, लेखक व चिंतक डा.आर.के सुखदेवे ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रसिद्ध दलित साहित्यकार व लेखक संजीव खुदशाह, दक्षिण कौशल पत्रिका के संपादक उत्तम कुमार, एम्बस के नरेन्द्र बंसोड, गोल्डी, हेमा भारती व़ समाज सेवी अंजू मेश्राम उपस्थित थी। सम्मेलन में बुद्धिजीवीगण कामरेड सौरा यादव, कामरेड तेजराम, का ए.बी. चैारपगार, भीमराव रामटेके, चन्द्रभूषण कुशवाहा, रवि बौद्ध, राजेन्द्र गायकवाड़, एस.एन. टंडन व निसार अली ने भी अपनी बात रखी। सम्मेलन में जाति उन्मूलन आंदोलन के लिए 25 सदस्यीय नई राज्य समन्वयक परिषद का गठन किया गया। आगामी 31 अक्टूबर-01 नवम्बर 2015 कोे रायपुर में आयोजित होने वाले जाति उन्मूलन आंदोलन के अखिल भारतीय सम्मेलन को सफल बनाने की अपील की गई। सम्मेलन का संचालन चंद्रिका एवं आभार हेमा भारती द्वारा किया गया।
     कार्यक्रम के मुख्य वक्ता तुहिन देब ने कहा कि भारत में नव-जागरण आंदोलन के समय जाति प्रथा का सवाल उठाया गया था। इसके खात्मे के लिए आंदोलन चला था। वामपंथी आंदोलन की जिम्मेदारी थी कि वह इसे आगे ले जाता और इसे अंजाम तक पहुंचाता मगर वह इस कार्यभार को नेतृत्व देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा पाने में असफल रहा, क्योंकि वह भारतीय समाज का सही विश्लेषण नहीं कर सका।  उन्होंने आगे कहा कि परम्परागत वामपंथी आंदोलन ने यह रूख अपनाया कि जाति प्रथा समाज के ऊपरी ढांचे का हिस्सा है, इसलिए आर्थिक आधार में बदलाव के साथ यह स्वतः ही खत्म हो जाएगा। दूसरी तरफ, दलित व जाति आधारित संगठनों ने आर्थिक व राजनीतिक पहलुओं को नजर अंदाज कर इसे केवल एक सामाजिक समस्या तक सीमित कर दिया। इसलिए वर्ग संघर्ष और जाति प्रथा के उन्मूलन के लिए संघर्ष दोनों को आगे ले जाने में असफलता हाथ लगी। यही कारण है कि जाति प्रथा के उन्मूलन के लिए प्रतिबद्ध विभिन्न संगठन एकजुट हुए हैं और जाति उन्मूलन आंदोलन की शुरूआत की गई है। इस प्रक्रिया को तेज कर जातिवादी उत्पीड़न और जाति प्रथा के खिलाफ एक सशक्त आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। श्री देब ने आगे कहा कि भारत में जातिप्रथा एक अभिशाप की तरह है। जो भारतीय समाज को चैतरफे जकड़न में समाये हुए है और इसी कारण भारतीय समाज के प्रगतिशील एवं समतावादी रूपांतरण में यह एक बहुत बड़ी बाधा है। गत् दिनों अखिल भारतीय स्तर पर जाति प्रथा के उन्मूलन के लिए ‘‘जाति उन्मूलन आंदोलन‘‘ का गठन किया गया है। उन्होंने जातिविहीन वर्गविहीन समाज के निर्माण के संघर्ष में शामिल होने हेतु सबका आह्वान किया। उन्होंने बताया कि बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने जाति तोड़ो समाज जोड़ो का नारा दिया था। जिसका अनुसरण आज प्रासंगिक है। वर्तमान समय में ढोंगी बाबाओं एवं दक्षिण पंथी तत्वों द्वारा अंधविश्वास व कर्मकाण्डों का विरोध करने वालों को प्रताड़ित किया जा रहा है, मार दिया जा रहा है। इन कृत्यों का हमें घोर विरोध कर इसके विरूद्ध जनमत तैयार करना है।
     संजीव खुदशाह ने अपने उद्बोधन में कहा कि यह गैर राजनैतिक आंदोलन है। सभी को साथ मिलकर जाति विहीन समाज की रचना में योगदान देना होगा। पिछले कई दशको से इस समस्या का समाधान अपने तरह से किया जाता रहा है। कुछ कोशिश बुद्ध महावीर, कबीर, रैदास व साबित्री बाई फुले के काल मे हुई थी। लेकिन यह प्रयास था जाति की पकड़ ढीली हुई लेकिन जाति का उन्मूलन रंज मात्र भी नही हुआ। डा. अंबेडकर के साहित्य में जाति उन्मूलन का खाका समूचित अर्थ में देखने को मिलता है। उन्होंने जातिभेद, लिंगभेद, रंगभेद व धर्मभेद के मुद्दे पर काम किया न कि किसी जाति विशेष के लिए। उन्होंने जाति का खात्मा कैसे हो पर अपना आलेख प्रस्तुत करते हुए कहा कि अंतरजातिय भोज का आयोजन एवं अंधविश्वास, अज्ञानता, स्वर्णीम अतीत पूजा, लिंगभेद आदि के बारे में लोगों में वैज्ञानिक चेतना पैदा कर इसका खात्मा किया जा सकता।
  अंजू मेश्राम ने अपना आलेख प्रस्तुत करते हुए पूना पैक्ट पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि यह एक्ट केवल अछूतों के लिए ही बनाया गया था। लेकिन इसका सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं हुआ। हम लोग अंगे्रजों की गुलामी से छूट गये पर आज भी हम जातिगत तौर पर गुलामी की जंजीरों से बंधे हुए है। हम सबको इस शोषणकारी व अमानवीय जाति प्रथा से बाहर आना है तभी हम सामाजिक समानता ला पायेंगे।
     दक्षिण कौसल के संपादक उत्तम कुमार ने कहा कि पूर्व में विद्यानों ने जाति के रहस्यों को खोलने का प्रयास किया किंतु अभी तक इस समस्या से निजात नहीं पाया जा सका। वर्ग आधारित राजनीति में जातियता के उन्मूलन के बिना समाजिक परिवर्तन संभव नहीं है। और न ही राजनीतिक परिवर्तन से समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व व न्याय आधारित समाज की स्थापना संभव हो सकती है। हिंदू समाज जब एक जाति विहीन समाज बन जायेगा तब इसके पास स्वयं को बचाने के लिए शक्ति होगी। कल्पना जातिविहीन समाज व्यवस्था के बिना स्वदेशीय आजादी की अधूरी है।
सम्मेलन में अपना अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुऐ डा. सुखदेवे ने कहा कि जाति तोड़ो आन्दोलन को पूरी तेजी के साथ आगे बढाना होगा। गांव-गांव जाकर लोगो को जागरूक करना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि दलित वर्ग के लोग उच्च पदों पर जाने के बाद अपनी सामाजिक जिम्मेदारी नहीं निभाते। भावना में बहकर लोग वोट देते है, भावनाओं से समाज नही चलता। दलितों को भूमि सुधार के लिए, अपने हक के लिए संख्या बल बढाना चाहिए। उन्होंने सामाजिक समानता बनाने के लिए जातिवाद खत्म करने पर जोर दिया और कहा कि यह प्रयास हम अपने घर से शुरू करें।
     सम्मेलन में जाति उन्मूलन आंदोलन के कार्यक्रम पर चर्चा की गई एवं संकल्प पारित किया गया। संजीव को सर्वसम्मति से राज्य संयोजक चुना गया। सम्मेलन में जातिगत उत्पीड़न, किसानों की बिगड़ती गंभीर हालातों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर होने वाले बर्बर हमलों, इतिहास संस्कृति के विकृतिकरण, सांप्रदायीकरण व शिक्षा के भगवाकरण, दिन प्रतिदिन बढ़ रही गरीबी मंहगाई व बेरोजगारी आदि विभिन्न विषयों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया।
     सम्मेलन में चंद्रिका द्वारा क्रांतिकारी जनगीत प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में तेजराम, संतोषी, कुमुद, रामकिशोर, रंजना, संतोष, माखनलाल, नर्मदा, सवित्री, प्रहलाद, राजमंहत रामदयाल, रत्नमाला, हेमंत, पतंजलि, रविन्द्र सहित अनेक गणमान्य बुद्धिजीवी व चिंतक उपस्थित थे।