Wednesday, September 6, 2017

सामाजिक बहिष्‍कार मृत्यु से भी बड़ी सजा ....... संजीव खुदशाह



जाति उन्मूलन आंदोलन द्वारा छत्तीसगढ़ सामाजिक बहिष्‍कार (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम कितना प्रासंगिक विषय पर संगोष्‍ठी  संपन्न


रायपुर, 4 सितंबर 2017। जाति उन्मूलन आंदोलन छत्तीसगढ़ द्वारा छत्तीसगढ़ सामाजिक बहिष्‍कार (रोकथाम, निशेध और निवारण) अधिनियम कितना प्रासंगिक विशय पर संगोश्ठी का आयोजन वाई एम सी ए प्रोग्राम सेटर रायपुर में किया गया। कार्यक्रम में प्रमुख वक्ता के तौर पर जाति उन्मूलन आंदोलन के अखिल भारतीय कार्यकारी संयोजक संजीव खुदशाह, अंधश्रद्धा निमूर्लन समिति छत्तीयगढ़ के अध्यक्ष व ख्यातिप्राप्त नेत्र चिकित्सक डा. दिनेश मिश्र, क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के राश्ट्रीय संयोजक व विकल्प अवाम का घोशणापत्र के संपादक तुहिन व एडवोकेट जन्मेजय सोना उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पीयूसीएल के नंद कश्यप ने की। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में व्याप्त जाति प्रथा के खिलाफ जनमत तैयार करना व सामाजिक प्रताड़ना व बहिष्‍कार की रोकथाम के लिए सक्षम कानून बनाने की दिशा में सरकार पर दबाव बनाने की पहल करना था। इस अवसर पर बंगाल के तेभागा आंदोलन (1946-50) के  महान क्रांतिकारी का. प्रकाश राय जिनका असली नाम अशोक बोस था को स्मरण करते हुए उनकी याद में दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजली दी गई। संगोश्ठी में जाति बहिष्‍कार से पीड़ित दीपा (बेलटुकरी राजिम), निहाल सिंह, तेजशंकर सिन्हा व रमन सिंह बघेल ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम में सामाजिक बहिष्‍कार के खिलाफ शीघ्र कानून बनाने हेतु प्रस्ताव रखा गया जिसे उपस्थितजनों ने सर्वसम्मति से पास किया। इस अवसर पर राज्य के विभिन्न, जनसंगठनों, प्रबुद्धजन, पत्रकारगण, छात्र/छात्राएं, महिला अधिकार व महिला समानता की दिशा में सक्रिय आमजन उपस्थित थे। कार्यक्रम में प्रख्यात जनगायिका बिपाशा राव व रवि बौद्ध ने जनगीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन रतन गोंडाने व आभार रेखा गोंडाने ने किया।
इस अवसर पर तुहिन ने का. प्रकाश राय (अशोक बोस) को स्मरण करते हुए कहा कि वे चालीस के दशक के बंगाल के जमींदार परिवार से होते हुए भी समाज के हित में परिवार से विद्रोह कर ब्रिटिश साम्राज्यवाद व सामंतवाद के खिलाफ किसान, दलित व मेहनतकश जनता को समानता व बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व निछावर कर दिया। वे 1952 में बंगाल से आकर राजनांदगांव में बस गए। और 3 सितंबर 1983 में उनकी मृत्यु तक राजनांदगांव, भिलाई और दिल्ली राजहरा के मेहनतकशों के आंदोलन से जुड़े रहे। लेकिन इन महान क्रांतिकारियों के कई दशकों के कठोर संघर्शो से उत्पीड़ित तबकों ने जिन जनवादी, आर्थिक व सामाजिक अधिकारों को हासिल किया था वर्तमान में उसे निश्ठुरता से छीना जा रहा है।
संजीव खुदशाह ने कहा कि प्रदेश में लगातार सामाजिक बहिष्‍कार की घटनाएं हो रही है जिससे सरकार पर जाति उन्मूलन आंदोलन सहित तमाम प्रगतिशील संगठनों द्वारा दबाव बनाया जा रहा है कि महाराश्ट्र की तरह छत्तीसगढ़ में भी सामाजिक बहिष्‍कार पर कानून बनाया जाए। जिससे तमाम जातियों मे चल रहे जाति पंचायतों के तुगलकी फैसलों एवं न्यायपालिका के अधिकार का हनन करने की प्रक्रिया पर अंकुश लगे। उन्होंने कहा कि डा. बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने कहा है कि सामाजिक बहिष्‍कार मृत्यु से भी बड़ी सजा है। सामाजिक बहिष्‍कार के प्रकरण में अधिकांश गरीब, दलित, महिलाएं व हाशिए पर रहने वाले ही पीड़ित होते हैं जो कि कुछ कर नहीं पाते। यह संविधान के अनुच्छेद 21 का खुला उल्लंघन है जिसमें सभी को स्वतंत्रता का अधिकार मिला हुआ है। कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी की स्वतंत्रता को बाधित नही कर सकता साथ ही यह मानवाधिकार का भी हनन है। ग्राम पंचायत व जातीय पंचायत समाज बहिष्‍कार करती हैं लेकिन ग्राम पंचायत शासकीय प्रणाली होने के बाद भी ऐसा करती हैं। सामाजिक बहिष्‍कार के नाम पर उत्पीड़ित करने वाले ज्यादातर जातीय संगठन व उनके मुखिया अपना प्रभुत्व बनाये रखने के लिए इस अमानवीय प्रथा को बनाये रखने के पक्ष में सक्रीय हैं। जाति उन्मूलन आंदोलन ऐसे संगठनों के प्रति लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है जिससे इसके रोकथाम हेतु कानून बनाने का मार्ग प्रशस्त हो। 
डा. दिनेश मिश्र ने कहा कि वैज्ञानिक युग और लोकतंत्र में इस तरह की घटनाएं शर्मसार करती है। ऐसी जाति व समाज किस काम का जो अपने लोगों को ही अपनों से दूर कर दे। हमारे प्रदेश में अलग-अलग कारणों से 203 परिवारों का सामाजिक बहिष्‍कार कर दिया गया है। बहिष्‍कार के मामलों पर उन्होंने बताया कि किसी ने अपने समाज को सरकार द्वारा दी गई सहायता के संबंध में जानकारी मांगी तो परिवार बहिश्कृत, किसी ने मुंडन नही कराया, अन्र्तजातीय विवाह आदि पर बहिष्‍कार की घटनाएं सामने आ रही है। क्या हमारे देश में सभी समाज के लिए अलग-अलग कानून बनांऐगे। यह कुछ नहीं केवल भय का माहौल बनाने के लिए व अपनी प्रभुता स्थापित करने हेतु दबंगों द्वारा किया जा रहा है। इसलिए हम सबकी जिम्मेदारी है कि समाज के अलिखित नियम जो कि वास्तव में शोशण के लिए बने हैं का बहिष्‍कार किया जाना चाहिए।
एडवोकेट जन्मेजय सोना ने कहा कि कानून की दृश्टि में सभी बराबर है। सभी को गरिमामय जीवन जीने का अधिकार है। ये कानून बनना अतिआवश्यक है साथ ही इसका क्रियान्वयन भी जमीनी स्तर पर होना चाहिए और लोगो को इस कानून के बारे में जागरूक करने की जिम्मेदारी भी हमारी होनी चाहिए।
अध्यक्षीय उद्बोधन में नंद कश्यप ने कहा कि 21 वीं सदी का प्रबुद्ध समाज इस तरह की घटनाओं को चुपचाप देख रहा है और गलत का विरोध नहीं कर रहा है। हमें समाज में घट रही ऐसी घटनाओं का पुरजोर विरोध करना होगा। सामाजिक बहिष्‍कार से पीड़ित व्यक्तियों के साथ खड़ा होना होगा तभी इस सामाजिक बुराई से निजात मिलेगी। साथ ही कानून बनने से निश्चित ही इस तरह की घटनाओं पर विराम लगेगा। पिछले तीन वर्शों से राश्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित सरकार आने के बाद इस तरह की घटनाओं में असाधारण वृद्धि देखी जा रही है। लोगों के खान-पान, रहन-सहन, पहनावे आदि पर रोक लगाने एवं भारत के इतिहास व संस्कृति के विकृतिकरण का कुत्सिक प्रयास लगातार जारी है। यही कारण है कि इन लोगों द्वारा समाज को बांटना और समाज में व्याप्त जाति प्रथा को मजबूती से बनाये रखने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है। जिसके परिणामस्वरूप ही सामाजिक बहिष्‍कार जैसी अमानवीय घटनाएं हो रही है। हमें इस तरह की घटनाओं के प्रति लोगों को जागरूक करने की जरूरत है और कानून बनाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने हेतु सभी को एकजुट होना होगा।