Sunday, October 1, 2017

इस संसार में जितने भी त्यौहार है वह वहां की खेती किसानी उपज मौसम पर आधारित है।


संजीव खुदशाह की वाल से.
भारत में दशहरा खरीफ फसल की बुआई के बाद बारिश खत्म होने पर मनाया जाता है। जिसमें अपने स्थानीय देवताओं का जुलूस निकाला जाता है। बस्तर में होने वाले दशहरा कार्यक्रम में राम रावण का नामोनिशान नहीं है। उसी प्रकार मैसूर का प्रसिद्ध दशहरा, हिमाचल प्रदेश का दशहरा और दक्षिण भारत के दशहरे में लोग राम रावण को नहीं जानते। इस समय आदिवासी लोग जो दशहरा मनाते हैं वह भी राम रावण के बारे में अनभिज्ञ हैं। यानी दशहरे का  त्यौहार कृषि आधारित है है ना कि धर्म पर आधारित। यह बात हमें समझनी होगी। बाद में धर्म के ठेकेदारों ने उस पर अपना प्रभाव दिखाने के लिए काल्पनिक कहानियों को जोड़ दिया और वह उससे अपने धर्म को जोड़ने लगे. इसी प्रकार दशहरे पर हिंदू बौद्ध जैन धर्म के लोग अपना कब्जा जताने की कोशिश करने लगे। और इसे अपने धर्म प्रचार का हिस्सा बनाने लगे। भारत में पोंगल त्यौहार के पीछे भी यही कहानी है। यह त्यौहार रवि फसल की बुवाई के बाद मनाया जाता है जिसे अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है। इस त्यौहार को मनाने का दूसरा कारण यह भी है। इस समय सूरज उत्तर से दक्षिण की ओर जाता है।

भारत में दीवाली त्योहार भी बड़े जोर शोर से मनाया जाता है। इसके पृष्ठभूमि में कृषि है। इस समय खरीफ फसल पकने की स्थिति में होती है खासकर धान की फसल । और बारीक माहूर कीट जिसे स्थानीय भाषा में दिवाली के कीड़े भी कहते हैं। फसल की ओर जाने लगते हैं। इस समय तमाम लोग दीप जलाकर इन कीड़ों को आकर्षित करते हैं ताकि वे कीट मर जाएं। फसल काटने के पहले या उसके आसपास यह त्योहार मनाया जाता है। इसके पीछे फसल की कीटों से सुरक्षा और फसल पकने की खुशी निहित है । जिसे बाद में धर्म से जोड़ दिया गया।

यूरोप में क्रिसमस ईसा मसीह के जन्म के पहले से मनाया जाता था। उसी प्रकार अरब में ईद का त्यौहार मोहम्मद साहब के आने के पहले से मनाया जाता है। भारत में रवि फसल की खुशी में होली मनाई जाती है। लेकिन यह धार्मिक ठेकेदारों की मजबूरी कहें या उनका शातिराना चाल कि वह एक नेचुरल त्यौहार को धर्म से जोड़ने लगे, और इन त्यौहारों को अपने धर्म प्रचार का हिस्सा बनाने लगे। जिससे वह त्यौहार खुशी का नहीं बल्कि आपसी द्वेष का कारण बनता गया। इसीलिए अपने स्थानीय ढंग से इन त्योहारों को मनाना चाहिए और इसकी खुशी को आपस में बांटना चाहिए।
बिना द्वेष बिना नफरत के सिर्फ मोहब्बत के साथ।
संजीव खुदशाह की वाल से साभार