A work giving rise to a new debate on backward class discourse

पुस्तक समीक्षा

पिछड़ा वर्ग विमर्श के एक नये बहस जन्म देती कृति

            संतोष सोनी

संजीव खुदशाह ने अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग, (पूर्वाग्रह, मिथक एवं वास्तविकताऐं) में पिछड़ा वर्ग की उत्पत्ति, स्थिति तथा वर्गीकरण पर मानव विकास की वैज्ञानिक अवधारणाओं से लेकर मानव सभ्यताओं के विकास क्रम में वर्ण व्यवस्था एवं इसके इतिहास पर विभिन्न दृष्टिकोण से तथा मान्यताओं व उपलब्ध हिन्दु मुस्लिम एवं इसाई धर्म ग्रंथों के आधार पर प्रकाश


डाला है। इसके लिये ऋग्वेद, शतपथ ब्राम्हण, तैत्रिरीय  ब्राम्हण, रामायण तथा विष्णु पुराण आदि के आधार पर शूद्र एवं उसमें सन्निहित अतिषूद्र की विषद व्याख्या की गई है। लेखक ने विभिन्न प्रकार से यह सिध्द करने का प्रयास किया है कि शूद्र वास्तव में भारत के मूल निवासी थे जिन्हे अनार्य कहा गया एवं आर्यो के व्दारा भारतीय भूभाग में बलात कब्जा कर उन पर शासन करने व उनका दमन करने हेतु षड़यंत्र पूर्वक अपने वर्ग में (वर्ण व्यवस्था मे) शामिल कर शूद्र का दर्जा दिया।

हिन्दू जाति व्यवस्था में पिछड़ा वर्ग के संबंध में लेखक विभिन्न मान्यताओं पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट करते है कि स्मृति एवं पुराण इन्हे सवर्ण जातियों की अवैध संतान बताती है तो दूसरी ओर इन्हे दासों नागों से जोड़कर भ्रम उत्पन्न करती है। यदि कुछ विशेष जातियॉं जो नई अथवा विवादित है उन्हे छोड़ दे तो शेष जातियॉ जो शूद्र के अर्न्तगत आती है(जिसमें अछूत एवं आदिम जाति नही है) पिछड़ा वर्ग के अर्न्तगत गिनी जाती है। हिन्दु जाति व्यवस्था में कार्य के आधार पर चार वर्णो की रचना की गई है, जिनमें ब्राम्हण(पुरोहित), क्षत्रिय (सैनिक), वैश्य (व्यापारी), शूद्र (दास) शामिल है किन्तु समाजिक व्यवस्था चलाने के लिए एक और वर्ग की आवश्यकता होती है जो उत्पादक एवं कामगार वर्ग है जैसे कपड़े, कृषि, औजार, आदि मानव उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन करता हो या अनुत्पादक वर्ग की नाई, धोबी आदि हैं । ये दास में शामिल नही है।

मनुस्मृति अध्याय-एक श्लोक क्रमांक 87 से 91 में यह कहा गया है कि ‘इस सृष्टि का पालन करने हेतु इस महान विभूति ने उन सबके लिए अलग-अलग कर्त्तव्य निर्धारित कर दिये है जो (उनके)’ मुख, भुजा, जांघ और पैर से जन्मे है।

‘‘ब्राम्हणों के लिए उसके अध्ययन अध्यापन, यज्ञ करने (दूसरों से पुरोहित के रूप में) यज्ञ कराने दान लेने, और दान देने का आदेश दिया। ’’

‘‘लोगों की रक्षा करने, दान देने, यज्ञ करने, यज्ञ कराने, पढ़ने और वासनामयी वस्तुओं से उदासीन रहने का आदेश क्षत्रियों को दिया है।’’

‘‘मवेशी पालन, दान देने यज्ञ करने, यज्ञ कराने, पढ़ने, व्यापार करने, घन उधार देने तथा खेती का काम करने की जिम्मेदारी वैश्यों को दी गई।’’

‘‘शूद्रों का अन्य तीन जातियों की सेवा करने का विधान है। वह जितनी अधिक उच्च जाति की सेवा करेगा उतना ही अधिक योग्य कहलायेगा।’’

यहां पर यह स्पष्ट नही है कि कृषि व मवेशी पालन को छोड़कर जो वैश्यों के हिस्से में आये अन्य उत्पादन कार्य जैसे कृषि से संबंधित कार्य, औजार, वस्त्र, आभूषण, हथियार आदि उतपादक जातियां कौन से वर्ग में आयेंगी क्योकि इसके बिना समाज का संचालन संभव नही है। आमतौर पर हम इन उत्पादक जातियों को जो आज वर्तमान में विछड़ा वर्ग में आती है शूद्र में गिनते है।

इस प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए लेखक डॉ0 अम्बेडकर के माध्यम से यह स्पष्ट करता हैं कि ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण और तैत्तरीय ब्राह्मण के अनुसार पूर्व में हिन्दुओं (आर्यों) में केवल तीन वर्ग था पुरुष सूक्त एक क्षेपक है जो कि बाद में जोड़ा गया एवं शूद्र का एक अलग वर्ण के रूप में उल्लेख नहीं हैं दूसरा साक्ष्य के रूप ब्राह्मण ग्रंथ, शतपथ और तैत्तरीय दोनों ही ग्रंथ केवल तीन ही वर्णों का उल्लेख मिलता है शूद्र की अलग से उत्पत्ति के बारे में वे मौन है।

इस प्रकार ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण तथा तैत्तरीय ब्राह्मण जो कि आर्यो के प्रारंभिक ग्रंथ है में शूद्र एक पृथक वर्ग नही बल्कि द्वितीय वर्ण का ही एक भाग है एवं वास्तव में चार वर्णों की अवधारणा स्मृतिकाल के ग्रंथों में आई। (पृष्ठ क्र. 25, 26, 27)

मनुस्मृति के अनुसार चार वर्ण जो कि मुख, भुजाओं, जंघाओं एवं पैरों से जन्में है और अन्य ग्रंथों में शूद्र की उत्पत्ति आर्यों की त्रिवर्णीय जाति प्रथा (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) में आवश्यक सोलह संस्कार जिसमें उपनयन संस्कार (जनऊ संस्कार) प्रमुख थे लागू होते थे कालांतर में ब्राह्मण-क्षत्रियों के संर्घष के पश्चात् ब्राह्मणों के द्वारा जिन क्षत्रियों का उपनयन संस्कार बंद कर दिये गये वे शूद्रों में आ गये तथा वे सामजिक दृष्टि से तिरस्कृत हो गये। इस प्रकार शूद्र वर्ण की उत्पत्ति हुई। इसमें से अनार्य जो नाग, दानव, असुर, वानर, गंधर्व, किन्नर आदि के नामों से वेदों व पुराणों में पुकारी जाती है। डॉ0 अम्बेडकर के अनुसार क्षत्रिय से बने शूद्र - अछूत या अति शूद्र में मिल गई। (पृष्ठ 27)। यहॉ पर कामगार श्रेणी के शूद्र जो कि पिछड़ा वर्ग के अन्तर्गत आते है। स्मृतियों के अनुसार जैसे धोबी, चमार, नर बैसफोड़, लुहार, सिलावट, नाई, रक्षक, तेली, नाविक, भेद, भील, सुवर्णकार, दर्जी, मकान बनाने वाले, सुनी, धनुषधारी ओ ध्वजाधारी ग्राम चाण्डाल कहलाते है। इनका दर्शन, स्पर्श, भाषण, स्नान, भोजन, जप, होम, देवपूजन, के समय निषिद्ध है। यदि ऐसा होता हो तो प्रायश्चित करना पेड़गा।

अतः उस समय उक्त सभी जातियॉ एक अछूत की तरह थी। इसके अलावा एक दुःखद स्थिति और थी स्मृति व पुराण लगभग सभी पिछड़ा वर्ग कामगार जातियों की किसी न किसी सवर्ण जातियों की अवैध सन्तान ठहराते है। उच्चवर्गीय पिता निम्नवर्गीय माता की सन्तान स्पर्षय एवं उच्चवर्गीय माता व निम्नवर्गीय पिता की सन्तान अस्पर्शय कहा गया (पृ. सं. 28 एवं 29 मे स्पर्षय एवं अस्पृर्शय संतानों की सूची दी गई है।)

श्री नवल वियोगी को उद्घृत करते हुए शूद्रों को दो मूल भागों में बांटा गया है। 1. अबहिस्कृत शूद्र - जिसे पिछड़ा वर्ग कहा गया है। 2. बहिस्कृत शूद्र - ये वे जातियॉं थी जो आर्यों के सामने आसानी से घुटने नहीं टेके, जिसे आज अति शूद्र या अछूत में गिना जाता हैं। (यहॉ पर पृ. क्र. 39 में दो सूचियॉ दी गई हैं, जिसमें पिछड़ा वर्ग की जातियों का वर्गीकरण उत्पादक व अनुत्पादक जातियों के आधार की गई हैं, एवं स्पष्ट किया गया है कि उत्पादक वर्ग के शूद्रों की श्रेणी अनुत्पादक वर्ग की श्रेणी से सामाजिक दर्जा अधिक श्रेष्ठ थी।)

हिन्दू जाति का उत्थान एवं पतन‘ के लेखक रजनीकांत शास्त्री को उद्घृत करते हुए लेखक यह स्पष्ट करते है कि उस काल में सभी जातियों में यौन संबंध इस कदर व्याप्त था कि कोई भी सवर्ण, गैर सवर्ण  जाति अपने आप को शुध्द रक्त होने का दावा नही कर सकती थी, (पृ क. 34)। इसी परिप्रेक्ष्य में डा. नवल वियोगी के व्दारा लेखक को भेजे पत्र का विवरण देते हुए लेखक उनके कुछ अंश उल्लेखित करते है कि ‘वास्तव में भारत की सभी आदिवासी जातियां नाग जातियों की संतान है जिनमें तक्षक या टांक वंष प्रमुख है। जिसने अधिकतर राजवंशों को जन्म दिया उन राजवंशों की जनजातियों ने BC, SC , ST तीनों वर्गो को जन्म दिया।’ श्री देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय के अनुसार भारत में जनगणना की विश्वसनीय रिर्पोट 1871-1872 से मिलनी शुरू हुई जिसके अनुसार भारत में ब्रिटिश शासन के अधीन लगभग 18 करोड़ 60 लाख लोग थे जिसमें 11 करोड़ से अधिक लोग जिन्हे मिली-जुली आबादी कहा गया वे मुख्यतया अनार्य लोगों में उत्पन्न हुई जिन्हे जनगणना रिर्पोट में आदिवासी कहा गया था। (पृ.क्र. 35)

पुस्तक में जाति एवं गोत्र पर भी बहुत कुछ लिखा गया है।

स्मृति व पुराणों के आधार पर कोई भी पिछड़ा वर्ग अथवा शूद्र अपने उपर गर्व नही कर सकता क्योंकि वे यदि इन धर्म ग्रन्थों को मान्यता देते है तो उन्हे यह मानना होगा कि वे किसी न किसी सवर्ण की अवैध संतान है यहां यह भी स्पष्ट किया गया है कि सत्ता की शक्ति तथा धन के बल पर किस प्रकार कई जातियां अपने को उच्च वर्णो में स्थापित कर समाज की जाति प्रथा में उंचे पायदान में आने का प्रयास करती रही है। यहां पर बंगाल के सेन वंश तथा मराठों के शासक शिवाजी भोसले के बारे में श्री सच्चिदानंद सिन्हा के हवाले से क्षत्रिय वर्ग के रूप  में प्रतिष्ठा पाने के प्रयास व सामाजिक श्रेष्ठता की आकांक्षा पर प्रकाश डाला गया है (पृ.क्र. 45-48) इसी संदर्भ में बंगाल की कायस्थ जाति व उड़ीसा की उच्च जातियों के बारे में भी नरवंश शास्त्री सर हिरवर्ट होप रिसले के विचार को स्थान दिया गया है एवं कायस्थों की जाति को सवर्ण जाति में से भिन्न मानते है।

आर्य व्यवस्था में ब्राम्हण, क्षत्रिय, एवं वैश्य अर्थात पुजारी, सैन्यकर्मी तथा व्यवसायी को छोड़कर सभी कलाकार, शिल्पकार, लेखक, वेज्ञानिक शूद्र में ही गिने गये जो कि भारत के मूल निवासी थे।

मराठा वंष, सेन वंष, सूद, भूमिहार जो कि स्वयं को क्षत्रिय या ब्राम्हण कहते रहे इसके लिए अपने गोत्र उच्च वर्णीय होने का तर्क देते रहे। इस बारे में लेखक का मन्तव्य है कि आर्यो में ब्राम्हण या पुरोहित अपने जजमानों को अपना गोत्र धारण करने पर विवश करते थे ताकि उनकी जजमानी बढ़ती जाये कालांतर में इसी गोत्रों को सहारा लेकर विभिन्न वंषों व्दारा स्वयं को क्षत्रिय या ब्राम्हण प्रमाणित किये जाने का प्रयास किया गया। वस्तुतः पिता या माता का नाम, राजा का नाम, उपाधि गोत्र के रूप में उनकी पहचान होती थी आर्यो व्दारा सप्रयास मिटा दिया गया जो उनकी षड़यंत्र कारी कूटनीति थी एवं पिछड़े वर्ग में हर छोटी जाति दूसरी छोटी जाति से खुद की जाति को श्रेष्ठ बताने की होड़ में संगठित नही हो पाये एवं गुलामी की मानसिकता से उबर नही पाये।

विदेशों में आरक्षण कि स्थितियों, काकाकालेलकर आयोग, मण्डल आयोग की सिफारिषों पर विषद अध्ययन प्रस्तुत किया गया है एवं इस दिषा में कांशीराम जी के राजनैतिक प्रयासों पर प्रकाश डाला गया है साथ ही दलित व पिछड़े मुसलमानों को  जोड़ने के प्रयास को उल्लेखित किया गया है।

पिछड़ेपन के कारणों पर प्रकाश डालते हुए लेखक ने अंधविश्वास एवं निवारण पर अपने विचार प्रस्तुत किये है साथ ही पिछड़े व अन्य वर्ग से उत्पन्न सुधारवादी संतो व साहित्यकारों जिनमें गौतम बुध्द, संतकबीर, महात्मा फुले, रविदास चमार, चोखा मेला महार, सदन कसाई, नामदेव दर्जी, तथा कन्नड़ साहित्य के बसनेष्वर, अल्लभप्रभु, अक्कमहादेवी, महार संकव्या, विविध स्तर के संत एवं कवि आदि के व्दारा अपने-अपने समय काल में दलित व पिछड़ों के उत्थान के लिये प्रयास किये व जाति भेद पर, बली प्रथा पर, मंदिर प्रवेष हेतु तथा अंधविष्वासों को दूर करने के लिए अपना जीवन लगा दिया। संत नामदेव, गुरूनानक देव, सावता माली, नरहरी सुनार, संत चोखामेला, गोरा कुम्हार , संत गाडगेबाबा, संत सेनजी नाई, पेरियार ई.वी. रामास्वामी, नारायण गुरू, संत रैदास, अयंकाली आदि के योगदानों का संक्षिप्त विवरण दिया है। विभिन्न पिछड़े जातियों के पौराणिक व विभिन्न विद्वान तथा इतिहास वेत्तओं के  लेखन व साहित्य के माध्यम से उनके प्रारंभ, उत्थान एवं वर्तमान विवरण के रूप में लेखक द्वारा अपना दृष्टिकोण भी सम्माहित किया है। अंत में लेखक व्दारा संपूर्ण स्थान पर अपनी राय रखी है। इन जातियों के उत्थान हेतु अपने सुझाव रखे है।

बड़ी शिद्दत के साथ लिखी गई पुस्तक, अकाट्य प्रमाणों के साथ विद्वानों के विचार भी उल्लेखित किया गया है, जहां कई शास्त्रों, वेदों को खगांलकर प्रमाण जुटाए है। वही अपनी विचारों को भी उल्लेखित किया है।

लेखक व्दारा संपूर्ण दलित व पिछड़ा वर्ग की एतिहासिक व पौराणिक पृष्ठभूमि की विस्तृत जानकारी, वर्गीकरण के सभी समुचित संदर्भो तथा सांख्यकीय आधिकरिक विवरणों के साथ सहज व सरल भाषा में सामान्य तथा विशेषकर पिछड़े व दलित वर्ग हेतु एवं शोधपरक पुस्तक प्रस्तुत किया है, जो सभी के लिए उपयोगी व प्रेरणास्पद है। इस पुस्तक ‘‘आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग’’ लेखक द्वारा उल्लेखित ‘‘पिछड़ो को सवर्ण न होने का क्षोभ है तो अस्पृष्य न होने का गुमान भी है।’’ इसी बीच की स्थिति के इर्द-गिर्द पूरी पुस्तक घूमती है। लेखक इन विचारों पर व्यवस्था को बहुत ही करीब से महसूस किया है। पर ये पुस्तक अब एक नए विषय को जन्म देती है कि आखिर पिछड़ा अपने आप को कहां स्थापित करे ? इतिहास बताता है कि सैकड़ो सालो से पिछड़ा हमेशा से उपेक्षित रहा है। तो आखिर कब तक ? इस विषय में बुध्दजीवियों में बहस होनी चाहिए। पुस्तक अच्छी साज-सज्जा के साथ प्रकाशित हुई  है इसमें कोई दो मत नही है। पुस्तक के महत्व के हिसाब से मूल्य ज्यादा प्रतीत नही होता है। सारगर्भित साहित्य के लेखन के लिए श्री संजीव खुदशाह प्रशंसा वा साधुवाद के पात्र है।

 

           

संतोष सोनी

हेमु नगर तोरवा

गुड़ाखु फैक्ट्री के पीछे

बिलासपुर (छत्तीसगढ) 495004

मोबाईल-09981830496

 पुस्तक का नाम    आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग

(पूर्वाग्रहमिथक एवं वास्तविकताएं)   

लेखक   संजीव खुदशाह   

ISBN               97881899378 

मूल्य      200.00 रू.       

संस्करण 2010    पृष्ठ-142

प्रकाशक

शिल्पायन 10295, लेन नं.1

वैस्ट गोरखपार्कशाहदरा,

दिल्ली -110032  फोन-011-22821174

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