डॉं आंबेडकर एवं कार्ल मार्क्स - वर्ण बनाम वर्ग

संजीव खुदशाह
आज हम कार्ल मार्क्स की 200 वी जयंती के उपलक्ष में वर्ग बनाम वर्ण पर बात करने जा रहे हैं। मेरी आप सब से गुज़ारिश है कि मेरी बातों को बिना किसी पूर्वाग्रह के गौर करने का कष्ट करें तभी शायद मैं अपनी बात आप तक सही ढंग से पहुंचाने में सफल हो सकूंगा। दूसरी बिनती मैं यह करना चाहता हूं की यहां पर अपनी बात रखने का मकसद यह नहीं है कि किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे। मैं एक स्वस्थ चर्चा करने पर विश्वास रखता हूं।
Karl Marks
वर्ग बनाम वर्ण की चर्चा इससे पहले भी होती रही है। लेकिन जब हम कार्ल मार्क्स के बरअक्स इस चर्चा को आगे बढ़ाते हैं, तो यहां पर वर्ग के मायने कुछ अलग हो जाते हैं। भारत में वर्ग के मायने होते हैं अमीर वर्ग और गरीब वर्ग। लेकिन कार्ल मार्क्स जिस वर्ग की बात कर रहे हैं। उसमें मालिक वर्ग और मजदूर वर्ग है। इसलिए हमें बहुत ही सावधानी पूर्वक इस अंतर को समझते हुए बात करनी होगी।इसी प्रकार वर्ण की भी विभीन्‍न परिभाषाएं सामने आती है। कई बार वर्ण को रंगों के विभाजन के तौर पर देखा जाता है। तो कई बार वर्णों को जाति व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई के तौर पर भी देखा जाता है। हम यहां पर चर्चा के दौरान इसे इसी परिभाषा के तौर पर आगे बातचीत करेंगे।
मार्क्स ने जिस मालिक और मजदूर की बात की और उनके संघर्ष को महत्वपूर्ण बताया तथा पूंजीवाद को इन वर्ग के सिद्धांतों के आधार पर परिभाषित किया। वह अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है लेकिन इन सिद्धांतों को उसी वर्ग के आधार पर भारत के परिप्रेक्ष में लागू करना कहीं ना कहीं जल्दबाजी करने जैसा रहा है। क्योंकि भारत में वर्ग का अस्त्वि कभी भी मालिक और नौकर की तरह नहीं रहा है। भारत में पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग कहा गया या फिर अमीर वर्ग गरीब वर्ग कहां गया। लेकिन जैसा रिश्ता यूरोप में मालिक और मजदूर के बीच रहा है वैसा रिश्ता भारत में अमीर और गरीब के बीच कभी भी नहीं रहा है।भारत में इन वर्गों के बीच जातीय संरचना भी है जो मालिक और नौकर के सिद्धांत पर नहीं चलती।
Dr B R Ambedkar
मुझे लगता है यह भारत के परिपेक्ष में मार्क्सवादी सिद्धांतों को मालिक और नौकर के नजरिए से नहीं बल्कि जाति व्यवस्था की जटिलताओं उनके बीच भेदभाव उनके बीच अछूतपन और धार्मिक संहीता को ध्यान में रखते हुए देखना होगा।
भारत में एक छोटी जाति का व्यक्ति अमीर तो हो सकता है। उसके कल कारखाने भी हो सकते है। इसके पहले भी हुए हैं। गंगू तेली का उदाहरण सामने पड़ा है। शिवाजी का उदाहरण है लेकिन इन्हें धार्मिक स्वीकृति या कहें सामाजिक राजनीतिक स्वीकृति प्रदान नहीं होती है। इस कारण राजा होने के बावजूद शिवाजी को राज तिलक करवाने के लिए पापड़ बेलने पड़ते हैं। और किसी ब्राम्हण के पैर के अंगुठे से अपने माथे पर राज तिलक करवाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह उदाहरण बेहद महत्वपूर्ण है जब हम वर्ग बनाम वर्ण की बात करते हैं।
गंगू तेली और शिवाजी के उदाहरण से यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आती है कि भारत के परिप्रेक्ष में साम्यवाद या समाजवाद, जिसकी बात कार्ल मार्क्स कहते हैं। वह और उसका आधार आर्थिक नहीं है उससे कहीं आगे है। भारत के परिपेक्ष में आर्थिक समानता कभी भी राजनीतिक और सामाजिक समानता का रूप नहीं ले पाती है। और ना ले पाई है। इसके तमाम उदाहरण इतिहास में मौजूद है। शायद मार्क्सवाद के सिद्धांत को भारत में लागू करने से पहले इन ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया गया।
इस कारण भारत के परिपेक्ष में कम्युनिस्ट विचारधारा फेल हो गई या फिर सिर्फ पूंजी की लड़ाई तक सीमित रह गई या फिर उन जगह ही रह पाई जहां पर फैक्ट्री और मजदूर रहे हैं। यह लड़ाई कभी भी किसानों तक नहीं पहुंच पाई ना ही उन दलित पिछड़ा वर्ग आदिवासियों तक पहुंच पाई जिन्हें समानता साम्यवाद या समाजवाद की जरूरत थी। उन प्राइवेट दुकानों संस्थानों तक नहीं पहुंच पाई जहां पर पढ़ा-लिखा कलम चलाने वाला मजदूर शोषण का शिकार रोज होता है।
जहां एक ओर यूरोप में पूंजीवाद के गर्भ से श्रमिक वर्ग का जन्म हुआ वहीं भारत में श्रमिक वर्ग मां के गर्भ से पैदा होता है।
भारत में युरोप का वर्ग नहीं है और जब वर्ग ही नहीं तो वर्ग संघर्ष का सवाल ही पैदा नहीं होता। बल्कि भारत में वर्ग की जगह वर्ण संघर्ष हो रहा है। जिसे मार्क्स ने भी भूल स्वीकार करते हुए कहा कि भारत में वर्ण संघर्ष ही संभव है और उसके बाद ही वर्ग संघर्ष हो सकता है। इसे इमीएस नम्बूदरीपाद ने भी स्वीकार कियाजिनके नेतृत्व में केरल में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी थी। बी. टी. रणदीवे ने भी स्वीकार कियाक्योंकि भारत में सत्ता और संपत्ति पर सवर्ण वर्ग का ही कब्जा है।
दरअसल हमें मार्क्स के साम्यवाद को नए सिरे से भारत के परिप्रेक्ष में परिभाषित करना पड़ेगा। यहां पर आर्थिक समानता से कहीं ज्यादा जरूरी सामाजिक और राजनीतिक समानता की बात है। कार्ल मार्क्स ने जिन स्थानों पर काम किया वहां पर आर्थिक विषमता तो थी लेकिन सामाजिक तथा राजनीतिक विषमताएं नहीं रही। इसीलिए उन्होंने यह सिद्धांत दिया की पूंजी का समान वितरण होने पर साम्यवाद स्थापित हो सकेगा।
डॉ आंबेडकर अपनी किताब बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स में कार्ल मार्क्स की अवधारणा को 10 बिंदुओं में रेखांकित करते हैं। जिन पर कार्ल मार्क्स के सिद्धांत खड़े हुए हैं।
1 दर्शन का उद्देश्य विश्व का पुनः निर्माण करना है ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या करना नहीं है।
2 जो शक्तियां इतिहास की दिशा को निश्चित करती है वह मुख्यतः आर्थिक होती हैं।
3 समाज दो वर्गों में विभक्त है मालिक तथा मजदूर ।
4 इन दोनों वर्गों के बीच हमेशा संघर्ष चलता रहता है ।
5 मजदूरों का मालिकों द्वारा शोषण किया जाता है। मालिक उस अतिरिक्त मूल्य का दुरुपयोग करते हैं जो उन्हें अपनी मजदूरों के परिश्रम के परिणाम स्वरुप मिलता है।
6 उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण अर्थात व्यक्तिगत संपत्ति का उन्मूलन करके शोषण को समाप्त किया जा सकता है।
7 इस शोषण के फलस्वरुप श्रमिक और अधिकाधिक निर्बल व दरिद्र बनाए जा रहे हैं।
8 श्रमिकों की इस बढ़ती हुई दरिद्रता व निर्बलता के कारण श्रमिकों की क्रांतिकारी भावना उत्पन्न हो रही है और परस्पर विरोध वर्ग संघर्ष के रूप में बदल रहा है।
9 चूंकि श्रमिकों की संख्या स्वामियों की संख्या से अधिक है। अतः श्रमिकों द्वारा राज्य को हथियाना और अपना शासन स्थापित करना स्वाभाविक है। इसे उसने सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के नाम से घोषित किया है।
10 इन तत्वों का प्रतिरोध नहीं किया जा सकता इसलिए समाजवाद अपरिहार्य है.।
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यहां पर आप देख सकते हैं की कंडिका 9 मे इस बात का जिक्र किया गया है कि श्रमिकों द्वारा उनकी संख्या ज्यादा होने के कारण बलपूर्वक अपना शासन स्थापित करना स्वाभाविक है। जिसे उन्होंने सर्वहारा वर्ग की तानाशाही नाम घोषित किया है। यानी कार्ल मार्क्स श्रमिकों के द्वारा तानाशाही शासन की अनुमति देते हैं।
जबकि डॉ आंबेडकर कहते हैं बलपूर्वक प्राप्त किया गया शासन वह भी तानाशाही वाला शासन ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकता। भविष्य में भी संघर्ष की संभावनाएं बनी रहती है। वह कहते हैं "मार्क्सवादी सिद्धांत को 19वी शताब्दी के मध्य में जिस समय प्रस्तुत किया गया था उसी समय से उसकी काफी आलोचना होती रही है इस आलोचना के फलस्वरुप कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत विचारधारा का काफी बड़ा ढांचा ध्वस्त हो चुका है इसमें कोई संदेह नहीं कि मांस का यह दावा कि उसका समाजवाद अपरिहार्य है पूर्णतया असत्य सिद्ध हो चुका है सर्वहारा वर्ग की तानाशाही सर्वप्रथम 19 सौ 17 में उसकी पुस्तक दास कैपिटल समाजवाद का सिद्धांत के प्रकाशित होने के लगभग 70 वर्ष के बाद सिर्फ एक देश में स्थापित हुई थी यहां तक कि साम्यवाद जो कि सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का दूसरा नाम है और उसमें आया तो यह किसी प्रकार की मानवीय प्रयास के बिना किसी अपरिहार्य वस्तु के रूप में नहीं आया था वहां एक क्रांति हुई थी और इसके रूस में आने से पहले भारी रक्तपात हुआ था तथा अत्यधिक हिंसा के साथ वहां सोद्देश्य योजना करनी पड़ी थी शेष विश्व में अभी भी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के आने की प्रतीक्षा की जा रही है मार्क्सवाद का कहना है कि समाजवाद अपरिहार्य है उसके इस सिद्धांत के झूठे पर जाने के अलावा सूचियों में वर्णित अन्य अनेक विचार भी तर्क तथा अनुभव दोनों के द्वारा ध्‍वस्‍त  हो गए हैं अब कोई भी व्यक्ति इतिहास की आर्थिक व्याख्या को यह इतिहास की केवल एक मात्र परिभाषा स्वीकार नहीं करता इस बात को कोई स्वीकार नहीं करता कि सर्वहारा वर्ग को उत्तरोत्तर कंगाल बनाया गया है और यही बात उसके अन्य तर्क के संबंध में भी सही है" पृष्ठ क्रमांक 347 वॉल्यूम 7
 भारत के परिप्रेक्ष्य में वर्ग की लड़ाई
जब आप वर्ग की लड़ाई लड़ते हैं तो आप सिर्फ आर्थिक समानता की बात करते हैं दरअसल भारत में जो वर्गीय अंतर है वह सिर्फ आर्थिक नहीं है। यह समझना होगा। यहां पर जातीय असमानता है। राजनीतिक असमानताएं गहरे पैठ बनाए हुए हैं। और इन जटिलताओं को सुलझाने के लिए समानता लाने के लिए आर्थिक गैरबराबरी को खत्म करना काफी नहीं है। जातीय एवं राजनीतिक असमानता को खत्म करने के लिए तमाम क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व देना जरूरी है । यह प्रतिनिधित्व राजनीति, धार्मिक, समाजिक पदवी में, प्रशासन में, न्यायालय में देना होगा। डॉ अंबेडकर ने इसी प्रतिनिधित्व को रिजर्वेशन का नाम दिया। रिजर्वेशन कभी भी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तौर पर नहीं तैयार किया गया। दरअसल यह भारत में फैली असामान्यताओं को खत्म करने के लिए बेहद जरूरी कार्यक्रम है। इसीलिए डॉक्टर अंबेडकर ने आजादी के पहले गोलमेज सम्मेलन में प्रतिनिधित्व के अधिकार की मांग की थी।
यह बात सही है कि डॉ आंबेडकर और मार्क्स दोनों समाज में समानता चाहते थे। लेकिन दोनों के समानता के उद्देश्य में बुनियादी फर्क है।
एक वर्ण व्यवस्था में समानता की बात करते हैं तो दूसरे वर्ग व्यवस्था में समानता की बात करते हैं।
एक वर्ग व्यवस्था में समानता के लिए संघर्ष की बात करते हैं। चाहे इसके लिए सर्वहारा तानाशाही ही क्यों ना करनी पड़े।
दूसरे वर्ण व्यवस्था में समानता लाने के लिए लोकतांत्रिक उपाय किए जाने की बात करते हैं जिसमें खूनी संघर्ष और तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं है। वे जाति व्‍यवस्‍था का उन्‍मूलन में सबको साथ लेकर चलने की बात करते है। डॉं अंबेडकर कहते है एक ऊंच नीच वाली प्रणाली को खत्‍म करने के लिए नई ऊंच नीच वाली प्रणाली का निर्माण नही किया जाना चाहिए।
जब आप वर्ण यानी जाति व्यवस्था की लड़ाई लड़ते हैं तो आप सामाजिक आर्थिक राजनैतिक तीनों प्रकार की समानता की बात करते हैं।
यह बात शायद भारतीय मार्क्सवादियों ने नजरअंदाज कर दिया होगा। क्योंकि बीमारी डायग्नोसिस करना किसी भी बीमारी के इलाज का पहला चरण होता है। डायग्नोज करने के बाद ही उसी हिसाब से उसका इलाज किया जा सकता है। जहां पर वर्ग की समस्या नहीं है वहां पर आप वर्ग के हिसाब से उसका इलाज करेंगे तो रिजल्ट्स नहीं आने वाले। जहां पर वर्ण की समस्या है, वर्ण संघर्ष की समस्या है वहां पर वर्ण के हिसाब से ही उसका इलाज करना होगा। तब कहीं जाकर उसके परिणाम सामने आ सकेंगे। यही जो बुनियादी फर्क है। वर्ग और वर्ण में। उसे समझना होगा। तब कहीं जाकर हम मार्क्सवाद और अंबेडकरवाद के समानता के सिद्धांत को अमलीजामा पहना पाएंगे।



कार्ल मार्क्स के 200वें जन्म दिवस पर कार्ल मार्क्स और उनका योगदान

कार्ल मार्क्स के 200वें जन्म दिवस पर
कार्ल मार्क्स और उनका योगदान
  - तुहिन देब
कार्ल मार्क्स, जिनका जन्म 5 मई 1818 को हुआ था, इस दौर के सबसे महान चिन्तक थे । उनके क्रांतिकारी विचारों ने दुनिया के मजदूरों को मुक्ति का रास्ता दिखाया और समाजवाद के लिए संघर्ष की प्रेरणा प्रदान की । इस वर्ष 5 मई को कार्ल मार्क्स का 200वां जन्म दिवस है । महान नेताओं का जन्म दिवस या मृत्यु दिवस और उनसे जुड़े ऐतिहासिक क्षणों की जयंती का समय एक आदर्श परिस्थिति होती है जब उनके द्वारा किये गये काम और उनके योगदानों का मूल्यांकन करते हुए वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर गहन चर्चा और बहस की जाये । कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा लिखित कम्युनिस्ट घोषणापत्र का प्रकाशन फरवरी 1848 में हुआ था, जिसकी 170वीं जयंती फरवरी 2018 में मनाई गई । इसके ठीक पहले 2017 की शरद ऋतु में पूंजी की 150वीं जयंती मनाई गई थी, जिसके प्रथम खण्ड का प्रकाशन 1867 में हुआ था । 
कहा जाता है कि उनके विचारों ने मानवजाति के इतिहास में सबसे ज्यादा प्रभाव डाला है । मार्क्स के विचार व्यापक और बहुआयामी हैं । उन्होंने वैज्ञानिक समाजवाद के विचार को विकसित किया जिसका तीन मुख्य घटक तत्व थे: द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद, राजनैतिक अर्थशास्त्र और वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त । संक्षेप में, उन्होंने ठोस परिस्थिति का ठोस विश्लेषण किया । इस तरह के विश्लेषण के आधार पर मार्क्स ने इतिहास की सही व्याख्या की, पूंजीवाद की बारीकियों को उजागर किया तथा समाजवादी और साम्यवादी क्रांति की जरूरत को रेखांकित किया । 
उन्होंने अर्थनीति, राजनीति, दर्शन, इतिहास, संस्कृति, समाजशास्त्र, विज्ञान और अन्य विषयों पर विस्तार से लिखा । उन्होंने वैज्ञानिक समाजवाद की नींव रखी और सर्वहारा महिला आन्दोलन व पर्यावरण आन्दोलन के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान किया । उन्होंने नस्लवाद-विरोधी और जाति-विरोधी जैसे आन्दोलन को भी देखा ।
लेकिन उनका मजबूत किला केवल उनके विचार नहीं थे । वे अलग-अलग देशों के विभिन्न टेªड यूनियन संगठनों द्वारा गठित प्रथम वर्किंगमेन एशोसिएशन (कामगार संघ जिसे प्रथम कम्युनिस्ट लीग कहा जाता था) में सक्रिय थे । उन्होंने जर्मन वर्कर्स एसोशिएशन का गठन किया (हालांकि वे उस समय बेल्जियम में रह रहे थे) । कम्युनिस्ट लीग की ओर से ही मार्क्स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखा था । इस प्रकार, उन्होंने सर्वहारा अन्तर्राष्ट्रवाद के सिद्धान्त को व्यवहार में लागू किया था, जिसे उन्होंने पूंजीवादी राष्ट्रवाद के विरोध में प्रतिपादित किया था ।
इस सभी गतिविधियों के लिए मार्क्स को व्यक्तिगत रूप से भारी कुर्बानी देनी पड़ी थी । उन्हें और उनके परिवार को प्रायः हमेशा गरीबी और पुलिस दमन का सामना करना पड़ा था । उन्हें कई बार देश निकाला का सामना करना पड़ा (दो बार फ्रान्स से और एक बार बेल्जियम से) और आखिरकार राज्यहीन व्यक्ति के रूप में इंगलैण्ड में रहना पड़ा था, क्योंकि इंगलैण्ड ने उन्हें नागरिकता प्रदान करने से इन्कार कर दिया था, जबकि प्रशिया ने उनकी नागरिकता को बहाल करने से मना कर दिया था । इस प्रकार, उन्हें अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में अपना काम जारी रखना पड़ा था । ऐसे कठोर जीवन के कारण उनकी पत्नी और परिवार को भारी कष्ट उठाना पड़ा था । इसकी वजह से उनके सात में से चार बच्चे बहुत कम उम्र में ही मर गये थे ।
कार्ल मार्क्स ने अर्थशास्त्र, इतिहास, समाजशास्त्र जैसे विभिन्न क्षेत्रों में जिन विचारों का प्रतिपादन किया, कई लोग उसकी सच्चाई को स्वीकार करते हैं । फिर भी वे कहते हैं कि क्रांति के उनके विचार सही नहीं हैं और यह उनके अन्य विचारों में समाहित नहीं है । साफ तौर पर यह कहना गलत है । कार्ल मार्क्स के विचारों का सारतत्व क्रांति के बारे में उनकी अवधारणा है । यह उनके कामों की जीवनरेखा है । (क्रांति के विचार के बिना मार्क्स के विचार कुछ भी नहीं हैं) ।
मार्क्स के देहान्त पर उनकी कब्रगाह पर फ्रेडरिक एंगेल्स ने कहा था: ‘‘उनका नाम युगों-युगों तक बना रहेगा और इसलिए उनका काम भी ।’’ यहां तक कि मार्क्सवाद-विरोधी भी एंगेल्स के इस बयान से असहमत नहीं होंगे, क्योंकि मार्क्स ऐसे विद्वान थे जिन्हें उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से अब तक सबसे ज्यादा सम्मान मिला है और सबसे ज्यादा पढ़ा गया है । मार्क्स के देहान्त के बाद, उनके महान काम को, जिसमें ऐसी रचनाएं भी शामिल रहे हैं जो कुछ समय तक लोगों की नजर में नहीं थे और जो केवल एंगेल्स और यूरोप के वामपंथी बुद्धिजीवियों के लेखों और भाषणों तक सीमित रह गये थे, लेनिन और रूस की अक्टूबर समाजवादी क्रांति ने दुनिया के मंच पर ला दिया । आज इक्कीसवीं सदी में जब पूंजीवाद दीर्घकालीक संकटों के दौर से गुजर रहा है, एक बार फिर से मार्क्स के प्रति आकर्षण और उनकी किताबों को पढ़ने में रूचि बढ़ने लगी है । निश्चित ही, मार्क्सवाद के प्रति यह आकर्षण केवल तभी प्रासंगिक होगा जब मार्क्स और एंगेल्स की रचनाओं और उनके राजनैतिक हस्तक्षेप को उस ऐतिहासिक संदर्भ के साथ जोड़कर समझा जायेगा जिसमें वे रहे थे और काम किया था । धार्मिक किताबों के विपरीत, चूंकि मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक सिद्धान्त और समग्र विश्व दृष्टिकोण है, इसलिए यह कभी भी जड़सूत्र (लकीर का फकीर), या बन्द किताब, या अंतिम पाठ नहीं हो सकता है । यह कई अनसुलझे सवाल और रिक्त स्थान छोड़ जाता है जिसे आगामी क्रांतियों के द्वारा ही भरा जा सकता है और इसके आसन्न कामयाबियों को मार्क्सवादी सिद्धान्त व व्यवहार के ‘देश’ व ‘काल’ में उचित ढंग से शामिल किया जा सकता है ।
सभी समय के महानतम विद्वानों में से एक कार्ल मार्क्स एक राजनैतिक कार्यकर्ता थे जो क्रांतिकारी संघर्षों में लगे हुए थे और इसलिए उन्हें कई देशों से निष्कासित किया गया था । वे 1871 में पेरिस कम्युन के पक्ष में दृढ़ता के साथ खड़े हुए थे जो मजदूर वर्ग के नेतृत्व में पहला समाजवादी प्रयोग था । अपने अवस्थानों के साथ कठमुल्ला की तरह चिपके रहने के बजाय, मार्क्स हमेशा ही तथ्यों की सत्य की खोज करने का तरीका अपनाकर अपने मत में बदलाव के लिए तैयार रहते थे । कार्ल मार्क्स की महानता केवल इस बात में नहीं है कि ठोस वास्तविकाताओं के प्रति उनके विचार पैने और स्पष्ट थे, बल्कि वे उन वास्तविकताओं को बदलने का वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी रखते थे । ये मार्क्स ही थे जिन्होंने जोर देकर कहा था कि परिवर्तन के नियम को छोड़कर अन्य सभी चीजें निरंतर परिवर्तनशील हैं । मार्क्सवाद पर भी परिवर्तन का यह नियम लागू होता है ।
मार्क्सवाद और उसकी पद्धति
हालांकि मार्क्स ने मात्र 29 वर्ष की उम्र में एंगेल्स के साथ मिलकर कम्युनिस्ट घोषणापत्र को एक राजनैतिक बयान के रूप में, कम्युनिस्ट लीग के कार्यक्रम के रूप में लिखा था, तथापि उनका महानतम योगदान पूंजी लिखकर पूंजीवाद के गति के नियमों को उजागर करना था । उन्होंने जिस तरह से इसकी रचना की वह जर्मन दर्शन, ब्रिटिश राजनैतिक अर्थशास्त्र और फ्रान्सिसी राजनैतिक सिद्धान्त की विभिन्न विचारधाराओं के उनके समसामयिक विद्वानों से मूलभूत रूप से अलग था । लेकिन इस बीच पूंजीवाद ने लम्बा सफर तय किया है । उन्नीसवीं सदी के अन्त में पूंजीवाद का साम्राज्यवाद में रूपांतरण हुआ जिसके बारे में लेनिन ने ‘‘साम्राज्यवाद: पूंजीवाद की चरम अवस्था’’ लिखकर युगांतरकारी अध्ययन किया था । बीसवीं सदी में यह लम्बे समय तक उपनिवेशवाद और फिर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अवधि में नव-उपनिवेशवाद के रास्ते पर चला और इक्कीसवीं सदी में वैश्विकृत नव-उदारवादी साम्राज्यवाद के रूप में इसने आगे और विस्तार किया । इस लम्बे सफर में पूंजीवादी अपनी उपयोगिता खो चुका है और मार्क्स के समय की अपेक्षा हजार गुना ज्यादा दमनकारी, शोषणकारी और घृणित हो चुका है । इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि आज की ठोस परिस्थितियों के अनुरूप मार्क्सवाद और मार्क्स की पद्धति को ज्यादा सख्त तरीके से लागू किया जाये । 
दूसरी तरफ, वैचारिक और राजनैतिक कमजोरियों के चलते आम तौर पर समूचा वामपंथ (या विचारों की विभिन्न मार्क्सवादी धाराएं) इस स्थिति में नहीं हैं कि वे इस संबंध में वैचारिक और राजनैतिक जिम्मेदारियों को अपने हाथों में ले सके, जिसकी आज सख्त जरूरत है । उदाहरण के लिए, पूंजी और श्रम के बीच अन्तर्विरोध की यांत्रिक रूप से व्याख्या या महज तोतरटंत आज शोषण और उत्पीड़न की उजागर हो रही जटिल प्रक्रिया का यथेष्ट विश्लेषण नहीं है, क्योंकि तीखा होता अन्तर्विरोध अन्य परिक्षेत्रों में भी उभर रहा है जो बहुआयामी है । असल में, मार्क्स अपने विश्लेषण की ऐतिहासिक और स्थानिक सीमाओं से स्वयं अच्छी तरह वाकिफ थे, इसलिए उन्होंने उत्पादन की पंूजीवादी विधि के बारे में अपने मानक विश्लेषण को विभिन्न सामाजिक गठनों में लागू करने के लिए और आगे विस्तार करने की गुंजाइश रखी थी ।
इस मामले में एक अच्छा उदाहरण है मार्क्स की ‘‘उत्पादन की एशियाई विधि’’ की अवधारणा । उन्होंने यह अवधारणा ‘‘ब्रिटिश ताज के कोहिनूर’’, भारत में जाति प्रथा के बारे में अपनी समझदारी के संदर्भ में रखी थी जिसे समझे बिना दुनिया के इस हिस्से की उत्पादन विधि, श्रम के विभाजन और अतिरिक्त मूल्य के दोहन का द्वन्द्वात्मक रूप से विश्लेषण नहीं किया जा सकता है । हालांकि वे उस समय अग्रणी पूंजीवादी देश ब्रिटेन में रह रहे थे और अपना अधिकांश वक्त पूंजीवाद का विश्लेषण करने में लगा रहे थे, तथापि इस तथ्य पर उतना ध्यान नहीं दिया गया कि मार्क्स ने गैर-यूरोपीय समाजों तथा एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद की विनाशकारी भूमिका के अध्ययन के लिए भी अपना काफी वक्त दिया था । बाद के दिनों के ‘‘मार्क्सवादियों’’ के विपरीत, मार्क्स इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ थे कि अनोखी और कुख्यात रूप से अमानवीय जाति प्रथा की जड़ें गहरी हैं और यह अधिरचना और ऊपरी ढांचे में दोनों को अविभाज्य रूप से प्रभावित करती है, जिसे ध्यान में रखे बिना एशियाई समाज का कोई भी वर्ग विश्लेषण अमूर्त होगा । 
मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार, किसी सामाजिक व्यवस्था का पूरा सारतत्व अन्ततः उत्पादन के साधनों के मालिकाना के चरित्र द्वारा तय होता है । इस संदर्भ मंे, सम्पत्ति के मालिकाना और उत्पादन विधि का ‘यूरोप-केन्द्रित’ विश्लेषण, उदाहरण के लिए, भारत जैसे देश के लिए (जहां आज 130 करोड़ की आबादी है) नामुनासिब है, जहां आबादी के एक बड़े हिस्से, उत्पीड़ित जातियांे को सदियों से हाशिए पर रहने के लिए बाध्य किया गया है, यहां तक कि शासन व्यवस्था के ढांचे से दूर रखा गया है और ‘‘सामाजिक संबंधों की विशिष्ट टुकड़ी’’ होने के नाते जमीन समेत उत्पादन के साधनों के मालिकाना से ऐतिहासिक रूप से वंचित रखा गया है जिसके फलस्वरूप यहां अर्थव्यवस्था, राजनीति, समाज और संस्कृति का अनूठा पैटर्न (स्वरूप) तैयार हुआ है । कुल मिलाकर, मार्क्स के तकरीबन सभी रचनाओं मंे, जैसे कि जर्मन विचारधारा, दर्शन की दरिद्रता, राजनैतिक अर्थशास्त्र की आलोचना में एक योगदान और सबसे बढ़कर उनकी कालजयी रचना पूंजी में तथा न्यूयार्क डेली ट्राइब्यून अखबार के लिए लिख गये ‘‘भारत में ब्रिटिश राज भावी परिणाम’’ जैसे लेखों में उन्होंने भारतीय उप-महाद्वीप में जाति की महत्वपूर्ण भूमिका का खास तौर पर जिक्र किया है । यह अद्वितीय दूरदर्शीता और प्रतिभा, जिसका मार्क्स ने शुरू से ही प्रदर्शन किया है, उनकी अवधारणा और पद्धति को, विभिन्न सामाजिक गठनों की अपनी खासियतों के बावजूद, सार्वभौमिक बनाती है ।
हम इस दिन मार्क्स को केवल अतीत की उनकी उपलब्धियों के लिए सम्मान देने के लिए याद नहीं कर रहे हैं । हम विशेष रूप से इस बात पर जोर देते हैं कि कार्ल मार्क्स का विचार ही भविष्य है, यह कि विभिन्न किस्म के संकटों कृ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, नस्लीय और पर्यावरणीय संकटों से ग्रसित दुनिया में वैज्ञानिक समाजवाद ही भविष्य है । ऐसी एक दुनिया मंे कार्ल मार्क्स ने हमें एक ऐसी दुनिया की रचना का मौका दिया है जो वर्गविहीन होगा, जहां नस्ल, प्रजाति, लिंग, जाति और इस प्रकार के अन्य पक्षपात नहीं होंगे। यह एक ऐसी दुनिया होगी जहां उत्पादन के साधनों पर कृ जमीन और उद्योग पर कृ निजी मालिकाना नहीं रहेगा, जहां से मानवजाति के असली इतिहास की शुरुआत होगी।
आइए, हम सब मिलकर कार्ल मार्क्स को सही अर्थों में याद करने का प्रयत्न करें । आइए, हम सर्वहारा अन्तर्राष्ट्रवाद की भावना को बुलन्द रखने, जनवाद और आजादी के लिए, समाजवाद और साम्यवाद के लिए लड़ने तथा कार्ल मार्क्स ने जैसी दुनिया की दृष्टि प्रदान की है वैसी दुनिया के लिए संघर्ष करने के अपने प्रण और उत्साह नये सिरे से दुहरायें । ’’क्र्रांतिकारी पार्टियों व संगठनों के अंतरराष्ट्रीय समन्वय (आईकोर)’’ ने सभी कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों से अपील की है कि कार्ल मार्क्स के 200वें जन्म दिवस पर ‘‘मार्क्स द्वारा दिखाये गये क्रांतिकारी रास्ते पर चलने के लिए नौजवानों को प्रेरित करने के लिए’’ तथा ‘‘दुनिया को समाजवाद और साम्यवाद की दिशा में बदलने’’ के नारे की रूह को बुलन्द करने के लिए मार्क्स के विचारों को प्रचारित करें ।
आज नव-उदारवाद के तहत, पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था अपने लम्बे इतिहास में सबसे बदतर और दीर्घकालिक संकट से गुजर रही है । सामाजिक जीवन के सभी परिक्षेत्र, जिसमें विज्ञान और तकनीकी की ताजा उन्नत्ति भी शामिल है, मुट्ठीभर कॉरपोरेट अबरपतियों के कब्जे में है । गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, विस्थापन, सम्पत्तिहरण, गैर-बराबरी, असुरक्षा, युद्ध का खतरा, पर्यावरण का विनाश, सांस्कृतिक अधःपतन इत्यादि अत्यन्त बुरी स्थिति में पहुंच गये हैं । एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में पूंजीवाद-साम्राज्यवाद आज काल-दोष का शिकार है ।
इस अनुकूल वस्तुनिष्ठ परिस्थिति के बावजूद, वामपंथी और कम्युनिस्ट आन्दोलन कमजोर है और इस स्थिति में नहीं है कि वह मजदूरों और उत्पीड़ित जन समुदायों के खदबदाते असंतोष को क्रांति के रास्ते में नेतृत्व प्रदान कर सके । वामपंथी और प्रगतिशील नेतृत्व की एक मुख्य कमजोरी यह है कि वह पूर्ववर्ती समाजवादी प्रयोगों से उचित सबक लेने में तथा इसके अनुरूप राजनीति का विकास करने में अक्षम है । अन्य चीजों के अलावा, मुख्यतः भूतपूर्व समाजवादी देशों के नौकरशाही और केन्द्रीकृत राज्य तंत्र के नाम पर (जिसका नवीनतम प्रतीक चीन का नौकरशाही राजकीय इजारेदार पूंजीवाद है), मुक्त बाजार के प्रवक्ता और नव-उदारवाद के वैचारिक पैरोकार उत्तर-आधुनिकतावादी मार्क्सवाद पर जोरदार हमला कर रहे हैं । 
मार्क्सवादी पाठों से यांत्रिक और कठमुल्लावादी ढंग से चिपके रहने के साथ-साथ, ऐतिहासिक और सामाजिक विशेषताओं और परिस्थितियों के अनुरूप मार्क्सवाद का विकास करने में अक्षम रहने से भी दुश्मन खेमे को ‘‘मार्क्सवाद की मौत’’ का ऐलान करने का बल मिला है । इसके साथ ही, ‘‘विचारधारा का अन्त’’, ‘‘इतिहास का अन्त’’, ‘‘उत्तर-वैचारिक राजनीति’’, जैसी चरम-दक्षिणपंथी भविष्यवाणी करने के लिए अनुकूल माहौल बना है ।
वहीं यह ऐसा समय भी है जब सभी जगहों पर मजदूर और उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है । आज दुनिया में अनौपचारिक और असंगठित तबकों की बड़े पैमाने पर गोलबन्दी भी देखी जा रही है । किसान, महिलाएं, प्रवासी, शरणार्थी और उत्पीड़ित जातियां, वर्ग व तबके अपनी दावेदारी कर रहे हैं, जैसा कि भारत में देखा जा रहा है । यह दिनांेदिन साफ होता जा रहा है कि मौजूदा नव-उदारवादी व्यवस्था के अन्तर्गत चौतरफा संकट का समाधान नहीं किया जा सकता है ।
इस नाजुक मोड़ पर मार्क्स के महान योगदान को पढ़ना और भी महत्वपूर्ण हो गया है । जैसा कि बहुत से लोग गलत समझते हैं, मार्क्सवाद विचार का कोई अमूर्त संकलन नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक और व्यवहारिक दोनों है । यह कोई चीज थोपता नहीं है, बल्कि वस्तुनिष्ठ रूप से मौजूद सामाजिक संबंधों से शुरुआत करता है । इससे पार पाने की प्रक्रिया में मार्क्सवाद का आगे विकास होता है । कोई मसीहा नहीं होता है; जनता को स्वयं राजनैतिक चेतना से लैस होकर अपने अस्तित्व को बदलना है । आज जब हम मार्क्स के 200वें जन्मदिवस पर उन्हें पुनः याद कर रहे हैं तो यह उनके लेखों के अमूर्त पाठ के बजाय चेतना को बढ़ाने का प्रयास होना चाहिए । 
’’दुनिया के मजदूरों व उत्पीड़ितों एक हों’’
  (लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।) 
संपर्क: तुहिन देब
फोन:  095899-57708 
ई-मेल: tuhin_dev@yahoo.com

Personality of the week with Dr dinesh mishra Part-2 episode- 10 dmaindiaonline

डी एम ए इंडिया आनलाईन यूट्यब चैनल के पर्सनालिटी आफ द वीक में अंधश्रध्‍दा निर्मूलन समिति के अध्‍यक्ष डॉं दिनेश मिश्र बता रहे है आज का पढ़ा लिखा व्‍यक्ति भी अंधविश्‍वास के गिरफ्त में है। इसके लिए जरुरी है कि पहली क्‍लास से अंध्‍द श्रध्‍दा पर एक पाठ्यक्रम होना चाहिए। वे और भी रोचक बाते बता रहे है देखे उनका यह एक्‍सक्‍लूसीव इंटरव्‍यू दो भागों में।

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Personality of the week with Dr dinesh mishra Part-1 episode- 9 dmaindiaonline


डी एम ए इंडिया आनलाईन यूट्यब चैनल के पर्सनालिटी आफ द वीक में अंधश्रध्‍दा निर्मूलन समिति के अध्‍यक्ष डॉं दिनेश मिश्र बता रहे है आज का पढ़ा लिखा व्‍यक्ति भी अंधविश्‍वास के गिरफ्त में है। इसके लिए जरुरी है कि पहली क्‍लास से अंध्‍द श्रध्‍दा पर एक पाठ्यक्रम होना चाहिए। वे और भी रोचक बाते बता रहे है देखे उनका यह एक्‍सक्‍लूसीव इंटरव्‍यू दो भागों में।
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Riddles of Hinduism किताबों की दुनिया से एपिसोड नंबर 3 dmaindiaonline

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर की किताब द रिडल्स ऑफ हिंदुइजम पर आज बातचीत कर रहे हैं रवि बौद्ध जी। वह बता रहे हैं कि यह किताब पढ़ना क्यों जरूरी है दरअसल यदि आप को हिंदू धर्म की पहेलियों को समझना है। तो यह आपके लिए बेहद जरूरी किताब है। इस वीडियो को देखें और कोई सलाह हो तो कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट जरुर करें। Friends welcome to youtube channel DMAINDIA ONLINE please go through the link for subscription. You will got alert for live & new post. https://goo.gl/BtJmKS only scientific temperament Please subscribe this channel, you can get notification for new upload and live broadcast. केवल वैज्ञानिक सोच आप इस चैनल को सबस्क्रांईब करने के लिए यहां क्लिक कर सकते है.। ताकि आपको नियमित पोस्टो एवं सीधे प्रसारण की सूचना मिल सके।

Ratan gondane in personality of the week dmaindia online dmaindia online

रंगकर्मी श्री रतन गोंडानेजी बता रहे हैं कि उन्हें पढ़ने का ऐसा शौक था कि गरीबी परिस्थिति होने के कारण वह रद्दी की दुकान से किताबें खरीद कर पढ़ा करते थे. वह जबलपुर में रहने के दौरान हरिशंकर परसाई, मलय घोष, कमला प्रसाद जैसे नामी लेखकों के साथ करीबी तालुकात थे. Friends welcome to youtube channel DMAINDIA ONLINE please go through the link for subscription. You will got alert for live & new post. https://goo.gl/BtJmKS

हिन्दू जाति का उत्थान पतन | किताबो की दुनिया से

लेखक रजनीकांत शास्त्री. हिंदू जाति का उत्थान पतन काफी पुरानी किताब है जो जाति व्यवस्था पर लिखी गई है यह सबसे पहले 1940 में प्रकाशित हुई थी किताब महल के द्वारा और काफी डिमांड होने के बाद यह 2005 में पुनः प्रकाशित हुई है इस किताब में हिंदू धर्म ग्रंथों के रिफरेंस का प्रयोग किया गया है तथा बड़ी सावधानी पूर्वक निष्पक्ष होकर उनका विश्लेषण किया गया है जाति व्यवस्था किस प्रकार खत्म की जा सकेगी इसका भी एक निष्कर्ष दिया गया है यह जरूरी किताब है पड़नी चाहिए

डीएमए इंडिया ऑनलाइन चैनल के किताबों की दुनिया से की इस कड़ी में

DMAindia online channel present episode on FROM WORLD OF BOOK in this episode we discuss about cast system. Dilip C mandal was on facebook live and talking about the book cast system written by bharat patankar, he analysis about gail omvedt conclusion about caste system in india.This video is published after his permission. 

 डीएमए इंडिया ऑनलाइन चैनल के किताबों की दुनिया से की इस कड़ी में दिलीप मंडल जाति प्रथा के बारे में गेल ओमवेट के निष्कर्षों पर बातचीत कर रहे हैं। देखिए उनकी एक महत्वपूर्ण चर्चा।

जन गायिका को झुग्गी बस्ती बचाने के लिए जेल यात्रा भी करना पड़ी

डीएमए इंडिया ऑनलाइन YouTube चैनल *पर्सनालिटी ऑफ द वीक* की इस कड़ी में आप देखिए 
जन गायिका एवं समाजिक कार्यकर्ता चंद्रिका कौशल से उन्हे अपनी झुग्गी बस्ती बचाने के लिए जेल यात्रा भी करना पड़ी । वे महिला एवं परिवार मुद्दे पर लगातार काम कर रही है अपनी गीतों के माध्यम से। वे रायपुर कोर्ट में काउसलर के पद पर भी रह चुकी है। वे एक प्रसिद्ध पंडवानी गायिका भी है। देखिये उनका यह संगीतमय साक्षात्कार।

आंबेडकरी आंदोलन छोटी दलित जातियों तक कैसे पहुंचे ?

डीएमए इंडिया ऑनलाइन YouTube चैनल *पर्सनालिटी ऑफ द वीक* की इस कड़ी में आप देखिए 
अंबेडकरवादी फुले आंदोलन के विचारक श्री शुभ्रांशु हरपाल बता रहे हैं कि किस प्रकार उन्होंने स्टूडेंट लाइफ से इस आंदोलन को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए काम किया। वह अभी बता रहे हैं कि छोटी-छोटी तमाम दलित जातियां जो कि अंबेडकरी आंदोलन से महरूम है। उन्हें किस प्रकार अंबेडकरी आंदोलन में जोड़ा जाए दरअसल 5 या 6 जातियां जो कि अंबेडकरी आंदोलन से जुड़ी हुई है। वह समझती है कि पूरा देश अंबेडकर मय हो गया है। लेकिन सच्चाई यह है कि अनुसूचित जाति में ही तमाम ऐसी छोटी-छोटी जातियां हैं। जिनके पास अभी तक अंबेडकर मिशन नहीं पहुंच पाया है। वह बता रहे हैं कि इनसे, पहले एक दोस्ताना संबंध बनाना होगा। तभी वह आपकी बात सुनेंगे और मिशन को समझ पाएंगे। देखिए इनका यह महत्वपूर्ण साक्षात्कार।

Personality of the week with Vishnu baghel

डीएमए इंडिया ऑनलाइन YouTube चैनल *पर्सनालिटी ऑफ द वीक* की इस कड़ी में आप देखिए पिछड़ा वर्ग आंदोलन के साथी विष्णु बघेल से बातचीत।

श्री विष्णु बघेल बता रहे हैं कि पिछड़ा वर्ग अपने सवर्ण होने के भ्रम में जी रहा है. इस कारण ओबीसी में सामाजिक चेतना नहीं आ पाई. यदि ओबीसी को अपने बारे में जानना है समझना है तो उन्हें मंडल आयोग की रिपोर्ट और रामजी महाजन आयोग की रिपोर्ट जरूर पढ़नी चाहिए. यही उनके लिए रामायण और गीता है.




Please click here to download mandal commission report part 1
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Personality of the week Rajendra Gaikwad




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लेखक और केंद्रीय जेल अधीक्षक श्री राजेंद्र गायकवाड बता रहे हैं कि किस प्रकार वह साहित्य और जेल के बीच सामंजस्य बैठाते हैं। वह यह भी बताते हैं कि पिछले साल कैदियों ने श्रम करके दो करोड़ रुपया कमाया। इसमें से आधी रकम उन पीड़ितों को दी गई जिन्हें इन कैदियों के द्वारा हानि पहुंचाया गया था। देखिए राजेंद्र गायकवाड़ का यह महत्वपूर्ण वीडियो। https://www.youtube.com/channel/UCvKf... contact.dmaindia@gmail.com Web www.damindia.online

प्रस्तुत है 3 जनवरी 1954को फिलॉसफर एरिक गुटकिंड को जर्मन भाषा में लिखे आइंस्टीन के खत का हिंदी अनुवाद

आइंस्टीन का ईश्वर के सम्बन्ध में एक खत


3 जनवरी 1954 को आइंस्टीन ने फिलॉसफर एरिक गुटकिंड को एक खत लिखा, जो आगे चलकर बहुत मशहूर हो गया। दरअसल एरिक ने अपनी नई किताब - Choose Life: The Biblical Call to Revolt 


आइंस्टीन को पढ़ने के लिए भेजी थी,जिसके जवाब में आइंस्टीन ने चिट्ठी में अपने व्यक्तिगत विचार अभिव्यक्त किए थे। ये बात कम ही लोगों को मालूम है कि जन्म से यहूदी आइंस्टीन को इस्राइल से द्वितीय राष्ट्रपति बनने का आमंत्रण मिला था, जिसे उन्होंने एकदम से ठुकरा दिया था,क्योंकि वो यहूदी धर्म की इस बात में यकीन नहीं रखते थे कि - यहूदी ईश्वर की सबसे प्रिय संतानें हैं। ऐसे ही एक दूसरे अवसर पर जब आइंस्टीन येरुशलेम गये थे, तो उन्होंने वहां की प्रसिद्ध 'वेलिंग वॉल' पर कई युवा यहूदियों को प्रार्थना करते,नाक रगड़ते और रोते हुए देखा। ये देखकर आइंस्टीन ने कहा - ये भावुक नौजवान बीते हुए वक्त से दीवानगी की हद तकचिपके हुए हैं, इन्होंने भूतकाल को गले से लगा रखा है, जबकि भविष्य की ओर पीठ कर रखी है। 


प्रस्तुत है 3 जनवरी 1954को फिलॉसफर एरिक गुटकिंड को जर्मन भाषा में लिखे आइंस्टीन के खत का हिंदी अनुवाद -


"....भगवान शब्द मेरे लिए मानवीय कमजोरी की अभिव्यक्ति से ज्यादा कुछ और नहीं। बाईबिल, आदरणीय लेकिन बचकानी कहानियों के संग्रह से ज्यादा कुछ और नहीं है। और इसकी कोई भी व्याख्या, चाहे वो कितनी भी परिष्कृत क्यों न हो, इनके बारे में मेरे विचार नहीं बदल सकती। इनकी व्याख्याएं विविधताओं से भरी हैं और मूल लेखन से इनका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरे सभी धर्मों की तरह यहूदी धर्म भी बचकाने अंधविश्वास के अवतार से ज्यादा कुछ और नहीं है। यहूदी लोग,जिनमें गर्व के साथ मैं भी शामिल हूं और जिनकी मानसिकता से मैं गहराई से जुड़ा हुआ हूं, उनमें ऐसी कोई विशिष्टता नहीं है जो दूसरे लोगों में न हो। मैं अगर अपने अनुभव की बात करूं तो यहूदी लोग दूसरे लोगों से किसी भी तरह बेहतर नहीं हैं। हालांकि वो सत्ता विहीन हैं, इसलिए संवेदनाएं उनके साथ हैं, अगर इस बात को छोड़ दिया जाए तो मैं उनमें ऐसी कोई खास बात नहीं देखता जो इस धार्मिक धारणा को सही साबित करता हो कि यहूदी लोग ईश्वर की सबसे प्यारी संतानें हैं।


सामान्य तौर पर मैं इसे काफी दुखदायी पाता हूं कि एक तरह आप विशिष्ट होने का दावा करते हैं, और दूसरी ओर आप गर्व के बनावटी दोहरे आवरणों के बीच बचने और छिपने की कोशिश करते हैं। इनमें पहला आवरण बाहरी है जिसमें आप एक व्यक्ति होते हैं, जबकि दूसरा आवरण आंतरिक है जिसमें आप यहूदी हो जाते हैं। अब मैं खुले तौर पर कहता हूं कि जहां तक बौद्धिक प्रतिबद्धता का सवाल है, हमारे विचार नहीं मिलते, लेकिन मानवीय व्यवहार की मूलभूत बातों पर हमारे विचार एक-दूसरे के काफी करीब हैं। इसलिए मैं समझता हूं कि अगर हम वास्तविक मुद्दों की बात करें तो हम एक-दूसरे को कहीं बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।"


एक दोस्ताना शुक्रिया और शुभकामनाओं के साथ


आपका

ए.आइंस्टीन

DMAINDIA ONLINE YOUTUBE CHANNEL

हमें यह बताते हुये खुशी हो रही है कि हम YOUTUBE चैनल प्रारंभ कर रहे है। यह चैनल आम जनता के बीच काम कर रहे जन पत्रकारों के द्वारा दिये जाने वाले समाचार पर आधारित होगा। ऐसे मुद्दे पर बातचीत होगी जिन पर मेन स्ट्रीम मीडिया अक्सर खामोश रहता है। इस चैनल में समाज के वंचित वर्ग खासकर दबे कुचले पिछड़े महिलाओं एवं ट्रांसजेडर सेक्शन के मुद्दों को शामिल किया जावेगा। चैनल का विशेष सप्ताहिक कार्यक्रम साक्षात्कार पर केंद्रित होगा। ऐसे लोग जो अंधविश्वास मुक्तिप्रगतिशील,बहुजन,अंबेडकरवादी एवं कम्युनिस्ट विचारधारा को लेकर काम कर रहे हैं या उससे संबंधित हैं उन्हें शामिल किया जावेगा।
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यदि कोई सुझाव हो तो हम स्वागत करते है।  समाचार की वीडियो एवं साक्षात्कार हमे भेज सकते है। शर्त यह है कि वह अप्रकाशित हो।
अंतिम निर्णय 6 सदस्यीय योगदानी संपादकों की टीम करेगी ।

संपर्क
संजीव खुदशाह
मुख्य संपादक
Cell no - 09977082331

आखिर क्यों हार गई त्रिपुरा की माणिक सरकार

त्रिपुरा के चुनाव नतीजो के निहितार्थ और आदिवासी प्रश्न
विद्या भूषण रावत 
March 6, 2018 विद्या भूषण रावत त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से खबरे आ रही है के संघी कार्यकर्ताओ ने लेनिन की मूर्ति को बड़ी बेशर्मी से गिरा दिया है. वहा के संघी राज्यपाल तथागत राय को इसमें कोई गलत नहीं दिखा वो कहते है के यह भी एक लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुए सरकार की इच्छा है और उसका सम्मान होना चाहिए हालंकि अभी सरकार बनी नहीं है. वैसे खबरे आ रही है के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे है और कई लोग अपने घरो से भी नहीं निकल पा रहे है. ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और खतरनाक है. क्या यह भविष्य का संकेत है के अगले पांच साल केंद्र की तर्ज पर कोई काम नहीं होगा केवल पिछली सरकार की बुराइया और उसके समर्थको पर हमला होता रहेगा . नयी सरकार को चाहिए के वह अपने अजेंडे पर चले और सकारात्मक कार्य करे नहीं तो उत्तर पूर्व में भयावह स्थिति हो सकती है. खैर इन चुनावो के बारे में बहुत कुछ लिखा जा रहा है लेकिन पहले नतीजों की समीक्षा कर ली जाए बाकी प्रश्नों पर बाद में आया जाएगा. ६० सदस्यीय विधान सभा में ५९ में मतदान हुआ था और भाजपा को ४३% वोट मिले और माकपा को ४२.७% वोट प्राप्त हुए. लेकिन बराबर वोट प्रतिशत के बावजूद भाजपा को ३५ सीटे और भाकपा को मात्र १९ सीटें मिली जो वर्तमान चुनाव प्रणाली की खामियों को दर्शाता है. हकीकत ये है अगर देश में आनुपातिक चुनाव प्रणाली लागू होती तो दोनों पार्टियों को लगभग बराबर सीटे मिलती क्योंकि उनका वोट शेयर लगभग बराबर है.  हमारे जैसे बहुत से लोग पिछले एक दशक से भारतीय चुनाव प्रणाली में परिवर्तन की बात कर रहे है लेकिन ताकत पार्टिया उसका समर्थन नहीं करती क्योकी वर्तमान प्रणाली एक अल्पमत आधारित हा जो विपक्षियो के मतों को विभाजित कर बनती है और इसमें माफिया, मनी और मीडिया की बड़ी भूमिका है. तीनो के रोल अलग अलग है लेकिन मिलकर काम कर रहे है ताकि देश में एक पार्टी का राज्य कायम हो सके. वैसे कम्युनिज्म के नाम पर दुनिया भर में ऐसा हुआ है लेकिन ब्राह्मणवादी संघी तंत्र ये सब ‘पारदर्शी’ और ‘लोकंतांत्रिक’ तरीके से करेगा और त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में जो हुआ है वो उस तंत्र की कार्यशैली का प्रतीक है जिनका असली स्वरुप हमें अगले चुनावो में दिखाई देगा. त्रिपुरा की हार से बहुत लोग सदमे में है. बहुत लोग कह रहे है के मानिक सरकार जैसे इमानदार आदमी को हरा कर त्रिपुरा ने गलत संकेत दिए है और ये भी के भारत में ईमानदार व्यक्ति राजनीति में नहीं रह सकते. मेरे हिसाब से ये उत्तर पूर्व की राजनीती का सरलीकरण है. अगर लोग ईमानदार व्यक्ति को नहीं चाहते तो मानक सरकार इतने वर्षो तक मुख्यमंत्री कैसे रहते ? ईमानदार होना और असरदार होने में बहुत फर्क है. मानक सरकार की सी पी एम् ने केरल और बंगाल से भिन्न कोई कार्य नहीं किया और त्रिपुरा की कम्युनिस्ट पार्टी भी बंगाली सवर्णों की डोमेन कायम रखने वाली पार्टी बनी रही और त्रिपुरा और उत्तरपूर्व की भौगौलिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को कभी भी अपनी राजनीती में नहीं ला पायी लिहाजा एक बड़े वर्ग की पार्टी बन कर रह गयी. सी पी एम् को देखना पड़ेगा के आज २५ वर्षो के राज के बावजूद भी वह कभी भी वहा की जनजातियो का दिल नहीं जीत पायी. आखिर ऐसा क्यों ? अभी लगातार त्रिपुरा में जनजातीय संघटनो के साथियो के संपर्क में हूँ और वो बता रहे के वामपंथियों को हराना इसलिए जरुरी था क्योंकि उन्होंने आदिवासी हको को ख़त्म करने के प्रयास किये. आखिर त्रिपुरा जैसे राज्य में जहाँ १९०१ में आदिवासियों की जनसँख्या ५८% थी वह १९८१ तक २८% रह गयी हालाँकि अभी के आंकड़े ये कह रहे है के यह ३१% है. अनुसूचित जातियों की आबादी १७% और पिछड़ी जातियों की आबादी २४%. सभी को अगर जोड़ दे तो ७२% आबादी देश के सबसे सीमान्त तबको है लेकिन संसाधनों पर इनकी भागीदारी कहा है ? त्रिपुरा में दलितों और आदिवासियों के आरक्षण की वो ही हालात है जैसे बंगाल और केरल में और त्रिपुरा सरकार उनकी संख्या २४% बताती है लेकिन उनके आरक्षण को लागु करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किये गए. त्रिपुरा देश के उन राज्यों में है जहा मंडल आधार पर आरक्षण लागू नहीं है. आखिर इसका दोषी कौन ? सत्ता पर बंगाली भद्रलोक का कब्ज़ा है और अगर वह के दबे कुचले लोग अपना हिस्सा मांग रहे है तो किसका दोष ? हमें बताया जा रहा है के त्रिपुरा में ओबीसी आरक्षण इसलिए लागू नहीं किया गया क्योंकि अनुसूचित जाति और जनजातियो के आरक्षण से ही ४८% कोटा जा रहा है और सुप्रीम कोर्ट ने ५०% की लिमिट लगाई हुई है इसलिए उससे आगे नहीं बढ़ा जा सकता. पहली बात यह के क्या वाकई में त्रिपुरा सरकार के हर लेवल पर आदिवासियों की संख्या ३१% और दलितों की १७% है. क्या दलित आदिवासियों की भागीदारी बनाये रखने के लिए त्रिपुरा की सरकार ने कोई कोशिश की या ये डाटा केवल दिखाने का है. सभी जानते है के ओबीसी आबादी सत्ता के ढांचे से बाहर है और क्या त्रिपुरा सरकार का ये कर्त्तव्य नहीं था का उनको सत्ता में भागीदारी देने के प्रयास करती और सुप्रीम कोर्ट में ये बात रखती आखिर तमिलनाडु और कर्नाटक में भी तो सरकारों ने ५०% की सीमा को लांघा है और इससे कही भी मेरिट प्रभावित नहीं होती . क्या त्रिपुरा की वामपंथी सरकार ने कभी इन प्रश्नों को कोई महत्व दिया ? त्रिपुरा के जनजातीय लोग अपनी स्वायत्ता और अस्मिता को बचाने का संघर्ष कर रहे है. उनका साफ़ मानना है के उनके प्राकृतिक संशाधनो को चालाकी से उनके नियंत्रण से बाहर किया जा रहा है और त्रिपुरा में बाहर से आये लोगो के कारण उनके अल्पसंख्यक होने का खतरा है. दिल्ली में हम सब लोग देश के सारी समसयाओ को हिन्दू मुस्लिमान के चश्मे से देखते है लेकिन उत्तर पूर्व के मसले में इन सबके बावजूद अन्य बाते भी है जिनको समझना जरुरी है. बांग्लादेश से आ रहे शर्णार्थियो का मसला स्थानीय स्तर पर है और भाजपा ने उसको और हवा दी है लेकिन ये कहना के कोई मसला ही नहीं है झूठ है. उत्तरपूर्व में अनेक जनजातिया है और उनके अपने अंतर्विरोध भी है इसलिए उनको समझना जरुरी भी है और उनके हल के लिए स्थानीय स्तर पर प्रयास करने होंगे लेकिन ये बात जरुर है के उत्तर पूर्व की स्वायत्ता के नाम पर भी दमदार लोगो का बर्चस्व कभी न कभी तो विरोध और विर्दोह झेलेगा ही. भाजपा ने बहुत चालाकी इन अंतर्द्वंदो को देखा और सत्ता के लिए वो सब तिकडम की जिनका वो विरोध करने का दावा करती रही है. इन अंतर्द्वंदो को उत्तर भारतीय राष्ट्रवाद के चश्मे से देखना आग से खेलना होगा . त्रिपुरा में वन अधिकार कानून के तहत भी आदिवासियों को लाभ नहीं हुआ. वह अभी भी सवाल कर रहे है के ये कानून क्या वाकई में उनके लिए बना है या नहीं ? शिक्षा और नौकरियों में दलित आदिवासियों की स्थिति तो नगण्य है और तकनीक तौर पर ओबीसी आरक्षण भी नहीं है. एक रिपोर्ट के मुताबिक त्रिपुरा में अभी भी चतुर्थ वेतन आयोग के अनुसार ही वेतन दिया जा रहा है जबकि देश भर में अभी ७ वे वेतन आयोग की बातो के आधार पर बात चल रही है. सरकारी कर्मचारियों का असंतोष भी सरकार के विरुद्ध काम किया. और ये भी सही है के २५ वर्षो तक भी एक पार्टी की सत्ता नहीं होनी चाहिए लेकिन अगर विपक्ष नहीं है तो वो ताकते हावी होंगी ही जो नकारात्मकता के बहाने पे अपने अजेंडा थोपना चाहती है. वैसे त्रिपुरा और उत्तर पूर्व में भाजपा का अजेंडा बहुत पहले से चल रहा है और वो खतरनाक भी है. तथागत राय को बिना सोचे समझे वहा नहीं भेजा गया था और वह राज्यपाल बन्ने के शुरू से ही बेहद ही घटिया दर्जे की राजनीती कर रहे है और अपने पद की गरिमा के विरुद्ध काम किये जा रहे थे लेकिन उनका काम ही था के वह संघ के लिए माहौल बनाए और उसके कार्यकर्ताओं को अपना सुरक्षा कवच पहनाये. पहले भाजपा ने लोगो से बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियो को वापस भेजने की बात की लेकिन अब भारतीय नागरिकता कानून १९५५ में संशोधन कर संघ के शिष्यों ने इसका भी संप्रदायीकरण कर दिया है और उसका पूरा चुनावी फायदा लिया गया. भाजपा अब कह रही है बांग्लादेश से आने वाले हिन्दुओ को तो वो नागरिकता देगी लेकिन मुसलमानों को नहीं. इसके दुसरे मायने भी है, अब बाहर से आने वाला गैर क़ानूनी हिन्दू भी भारत की नागरिकता ले लेगा लेकिन देश में ईमानदारी से रह रहा मुस्लिम नागरिक हमेशा दवाब में रहेगा और उसको संघी सेना बंगलादेशी कह कर प्रताड़ित करती रहेगी. त्रिपुरा के चुनावो की इस पृष्ठभूमि को हम नहीं नकार सकते . सबसे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है के भाजपा को छोड़ अन्य राष्ट्रिय पार्टियों ने इसमें कुछ नहीं किया. कांग्रेस ने शर्मनाक तौर पर विपक्ष का पूरा स्पेस संघ को सौंप दिया और नतीजा ये हुआ जो आज हम भुगत रहे है. वामपंथियों और अन्य दलों ने उत्तर पूर्व की हालातो पर कोई विशेष धयान नहीं दिया जिसके नतीजे में संघी प्रोपगंडा सफल हो गया . उत्तर पूर्व के संवेदनाओं को समझने की जरुरत है और उस पर हम दिल्ली की बहस न थोपे. जरुरत इस बात की भी है के तथाकथित राष्ट्रीय पार्टिया स्थानीय भावनाओं को समझे, सार्थक बहस चलाये और मुद्दों को छिपाने की कोशिश ने करें. त्रिपुरा का पूरा प्रश्न आदिवासियों के मुद्दों को किनारे करके बहस नहीं किया जा सकता. ये हकीकत है के बांग्लादेश में चकमा आदिवासियों के प्रति बेहद ही ख़राब रवैय्या चल रहा है. गत वर्ष एक अन्तराष्ट्रीय सम्मेल्लन में मेरी मुलाकात बांग्लादेश के चटगाँव क्षेत्र में कार्य कर रहे एक चकमा कार्यकर्ता से हुई जिसने वहा की सेना और इस्लामिक उग्रपंथियो द्वारा उन पर हमले की दास्तान सुनाई. वो इंटरव्यू प्रकाशित भी हुआ लेकिन उस साथी ने सुरक्षा कारणों से अपना नाम बदल देने की शर्त पर मुझे इतना विस्तृत इंटरव्यू दिया. कहने का आशय यह के अब समय आ गया है जब भारत, बांग्लादेश, मयन्मार, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और श्रीलंका गंभीरता से एक दूसरे के साथ बैठे और इन प्रश्नों पर विचार करें. जरुरत इस बात की है के हम अपने अपने देशो में धार्मिक, भाषाई अल्प संख्यको को पूर्ण सुरक्षा दे और उनकी समस्याओं को अपने देश के अन्दर की राजनीती में न लपेटे. अगर ऐसा नहीं हुआ तो ये सभी लोगो के नाम पर अलग अलग देशो में बहुलतावादी राजनीती चलेगी और जिन लोगो की किसी भी देश में राजनितिक पैठ नहीं होगी वे फिर अपना अलग रास्ता तय करेंगे . त्रिपुरा में चुनाव के नतीजो से एक बात साफ़ है के तथाकथित राजनैतिक दल अभी भी ब्रह्मवादी मुख्यधारा की राजनीती में लगे जिसके फलस्वरूप हासिये में रह रहे लोगो के प्रश्न हमेशा हासिये पर ही रह जाते है और ताकतवर जातीय अपने राजनैतिक समीकरण बदल देते है. त्रिपुरा में कुछ नहीं हुआ केवल ताकतवर लोगो ने अपने को बचाने के लिए नए तेवर अपना लिए है और लाल की जगह अब  गेरुआ ओढ़ लिया है. देखना यह है के दलित आदिवासियों-पिछडो की 72% आबादी वाले त्रिपुरा को अभी  अपना मुख्यमंत्री बनाने में और सम्मानपूर्वक राजनैतिक भागीदारी करने के लिए.क्तिने और वर्षो का इंतज़ार करना पड़ेगा . क्या संघ देश की राजनीती को ध्यान में रखते हुए कोई आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने का दांव खेलेगा या एक बंगाली भद्रलोक की जगह में उसी बिरादरी का दूसरा नेता थोप कर ‘ताकतवर’ लोगो को खुश करेगा ताकि त्रिपुरा के सहारे बंगाल के माहौल को भी गरमाया जा सके ? 

जानिये क्यों जरूरी है भीमा कोरेगांव को याद रखना


भीमा कोरेगांव आज बहुजन समाज के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल बन चुका है. लेकिन क्याा आपको मालूम है इसे तीर्थ बनाने में लोगो ने अपने जान की बाजी लगा दी. यह समय था आज से लगभग 200 साल पहले 1818 का. जब कहने को तो शिवाजी के वंश मराठों का शासन था पर दरअसल हुक़ूमत पेशवाओं (चितपावन ब्राम्हपणों) की चलती थी. कहा जाता है कि पेशवाओं ने मनुस्मृ(ति के कानून को लागू कर रखा था. वहां पिछड़ी जाति के लोगों को संपत्ति, वस्त्रम, गहने आदि खरीदने के अधिकार नही था. दुकानदार नये वस्त्रे बेचते समय दलितों के बेचे गये वस्त्रृ बीच से फाड़ दिया करते थे. उनका कहना था ऐसा पेशवा का फरमान है. मनुस्मृेति में दिये गये आदेश के अनुसार अन्य्थे जों ( दलितों) के परछाई से भी परहेज करना था. पेशवओं ने दलितों को अपने पीठ में झाड़ू एवं गले में गड़गा बांधने के लिए मजबूर कर दिया था. मकसद था चलते समय उनके पद चिन्ह़ मिट जाये और उनकी थूक सड़क पर न गिरे. एक खास प्रकार का आवाज़ भी उन्हेन निकालना पड़ता था ताकि सवर्ण यह जान जाये की कोई दलित आ रहा है और वे उनकी परछाई से दूर हो जाये. वह अपवित्र हाने से बचे रहे. बड़ी ही जलालत भरी जिन्दलगी थी उस वक्तस दलितों की. जिससे मानवता भी शर्मशार हो जाये.
इस वक्त अंग्रेज शैने शैने अपने पांव जमा रहे थे. पूणे का कुछ हिस्सा उनके कब्जेत में आ चुका था. शनिवारवाड़ा समेत महत्वंपूर्ण हिस्साप अब भी पेशवाओ के हक में ही था. अंग्रेजो ने महार रेजिमेंट का गठन किया जिसमें अन्यत दलित जातियों के साथ साथ ज्याादातर महार जाति के भी लोग थे. दलितों को अपनी गुलामी से निजात पानी थी. लड़ाई में अंग्रेजो का मकसद तो जगजाहिर था लेकिन दलितो ने इस लड़ाई को अपनी अस्मिता का प्रश्नज बना दिया. 1 जनवरी 1818 को संशाधनो की कमी के बावजूद वे पूर दमखम के साथ लड़े. यह निर्णायक लड़ाई पूणे के पास स्थित कोरेगाव जो भीमा नदी से लगा हुआ था पर हुई. दस्ताावेजी तथ्यप के मुताबिक महार रेजिमेन्ट की ओर से करीब 900 सैनिक एवं पेशवाओं की 25000 फौज आपने सामने लड़ी. जिसमें पेशवाओं की बुरी तरह हार हुई. इस लड़ाई ने पेशवा राज को हमेशा हमेशा के लिए खत्मड कर दिया. जो एक इन्सातन की गुलामी का प्रतीक था. बाद में यहां पर एक स्मायरक बनाया गया है जिसमें महार रेजिमेंट के सैनिको के नाम लिखे है. 1927 में डॉं अंबेडकर के यहां आने के बाद इस स्थाहन को तीर्थ का दर्जा मिल गया.
कुछ सामंतवादी लोग इस घटना को देशद्रोह के नजरिये से देखने की कोशिश करते है. वे कहते है अंग्रेज पूंजीवादियों के साथ मिलकर देशी राजाओं से लड़ना देशद्रोह है. जबकि ये लड़ाई देश से भी ऊपर मानव स्तरर की जिन्द़गी पाने के लिए थी. यहां पर अंग्रेज जो उन्हेअ एक इन्साशन का दर्जा दे रहे थे और उन्हेर सैनिक के रूप में स्वी कार कर रहे थे दूसरी ओर भारतीय राज व्यीवस्थाज उन्हेर पालतू जानवर तक का दर्जा भी देने के लिए तैयार नही थी.
क्योी महत्वयपूर्ण है यह लड़ाई?
इस लड़ाई को याद रखा जाना इसलिए जरूरी है, क्यो कि आज महार समुदाय के लोग बहुत तरक्की कर चुके है. ये घटना इस बात को दर्शाती है कि उन्होंजने इस मुकाम को पाने के लिए क्या‍ क्याह नहीं किया. आज तमाम दलित पिछड़ी जातियां जिस मानव निहीत सुविधा के हकदार हैं वे उस महार रेजिमेंट के हमेशा ऋणी रहेगे. और सभी वंचित जातियों को प्रेरणा देते रहेगे. हालांकि बाद में अंग्रेजों ने इसी तर्ज पर चमार रेजिमेंट एवं मेहतर रेजिमेंट का भी गठन किया था. लेकिन जब अन्यि सवर्ण जाति के लड़ाके भर्ती किये जाने लगे तो इन रेजिमेंट को बंद कर दिया गया.
इस लड़ाई के बाद अंग्रेजी शासन ने दलितों के लिए शिक्षा, संपत्ति के द्वार खोल दिये गये. महात्माल फुले पढ़कर निकले, पहली महिला शिक्षिका सावित्र बाई फुले बनी. यानि इस लड़ाई ने पूरे वंचित जातियों को प्रभावित किया. जो समाजिक,आर्थिक,बौध्दिक दृष्टिकोण से मील का पत्थ र साबित हुआ.
  • लेखक- संजीव खुदशाह

राष्ट्र निर्माण का कार्यक्रम है आरक्षण


लेखक: दिलीप मंडल
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आरक्षण पर चल रहे विवाद में नया मोड़ ला दिया है। उन्होंने कहा ‘जीवन में आगे बढ़ने के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं है। बिना आरक्षण भी सफलता पाई जा सकती है।’ इसे लेकर एक निरर्थक विवाद खड़ा हो गया है, जबकि राष्ट्रपति महोदय ने यह बात सदिच्छा से कही है और उनकी बात सही है। संविधान में आरक्षण का प्रावधान इसलिए नहीं किया गया कि वंचित समुदायों के लोग या कोई भी इसका लाभ उठाए और तरक्की करे। संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की कल्पना व्यक्तिगत उपलब्धियां हासिल करने के जरिए के तौर पर नहीं की थी। रिजर्वेशन का निजी तरक्की से कोई लेना-देना नहीं है। सरकारी क्षेत्र में इतनी नौकरियां और सरकारी शिक्षा संस्थानों में इतनी सीटें भी नहीं हैं कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में इनके बल पर किसी समुदाय की तरक्की हो जाए।
भेदभाव का समाज
संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को राष्ट्र निर्माण का कार्यक्रम माना था और ‘एक बनते हुए राष्ट्र’ के लिए जरूरी समझकर इसे संविधान में जगह दी थी। यही वजह है कि इसे मूल अधिकारों के अध्याय में रखा गया। संविधान निर्माता भारत को एक समावेशी देश बनाना चाहते थे, ताकि हर समूह और समुदाय को लगे कि वह भी राष्ट्र निर्माण में हिस्सेदार है। यह पूना पैक्ट के समय वंचित जातियों से किए गए वादे का पालन भी है। दलित, पिछड़े और आदिवासी मिलकर देश की तीन चौथाई से भी ज्यादा आबादी बनाते हैं। इतनी बड़ी आबादी को किनारे रखकर भला कोई देश कैसे बन सकता है? आरक्षण सबको साथ लेकर चलने का सिद्धांत है। इसे सिर्फ करियर और तरक्की से जोड़कर देखना सही नहीं है।

रिजर्वेशन ने वंचित समूहों के लिए तरक्की के अवसर खोले हैं। इतिहास में यह पहला मौका है जब भारत की इतनी बड़ी वंचित आबादी, खासकर एक समय अछूत मानी जाने वाली जातियों के लोग शिक्षा और राजकाज में योगदान कर रहे हैं। किसान, पशुपालक, कारीगर और कमेरा जातियों की भी राजकाज में हिस्सेदारी बढ़ी है, जिससे देश मजबूत हुआ है। आरक्षण विरोधी तर्कों के जवाब में सिर्फ इतना कहना जरूरी लगता है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए आरक्षण कतई जरूरी नहीं है, बशर्ते जन्म के आधार पर समाज में भेदभाव न हो। भारत में ऊंच-नीच को धार्मिक साहित्य में मान्यता प्राप्त है। इसलिए बाबा साहेब ने इन ग्रंथों को खारिज करने की बात ‘एनिहिलिशेन ऑफ कास्ट’ नामक किताब में प्रमुखता से की है। यहां हर आदमी एक वोट दे सकता है और हर वोट की बराबर कीमत है लेकिन समानता का यह चरम बिंदु है। हर आदमी की बराबर कीमत या औकात यहां नहीं है और यह हैसियत अक्सर जन्म के संयोग से तय होती है।

दूसरे, तरक्की के लिए भी आरक्षण जरूरी नहीं, बशर्ते हमारा समाज ऐसा हो, जिसमें किसी खास समुदाय में पैदा होना किसी एक की कामयाबी और दूसरे की नाकामी का कारण न बने। जैसे, काफी संभावना है कि कॉर्पोरेट सेक्टर में आपका जॉब इंटरव्यू कोई सवर्ण पुरुष ले रहा हो और आपके प्रमोशन का फैसला भी किसी सवर्ण हिंदू पुरुष के हाथ में हो। ऐसा इसलिए नहीं है कि आप जातिवादी हैं या इंटरव्यू लेने वाले जातिवादी हैं। यह भारतीय समाज की संचरना का नतीजा है। ऊपर के पदों पर खास जातियों का वर्चस्व एक सामाजिक सच्चाई है। यही सुविधा पिछड़े और दलितों को भी हासिल हो, तब कहा जा सकता है कि तरक्की करने के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं है। अभी तो जन्म का संयोग जीवन में किसी के सफल या असफल होने में एक बड़ा फैक्टर है।
तीसरे, अगर तरक्की करने के लिए आरक्षण जरूरी न होता तो भारत में आजादी के बाद बना शहरी दलित-पिछड़ा मध्यवर्ग सरकारी नौकरियों के अलावा और क्षेत्रों से भी आता। आज लगभग सारा दलित मध्य वर्ग सरकारी नौकरियों में आरक्षण की वजह से तैयार हुआ है। अगर सब कुछ प्रतिभा और मेहनत से ही तय हो रहा है तो शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करने वाले दलित निजी क्षेत्र के शिखर पदों पर लापता क्यों हैं? कानून और न्याय के क्षेत्र में भी यह सच है। उच्च न्यायपालिका में आरक्षण नहीं है। नतीजा यह है कि सुप्रीम कोर्ट में आज एक भी दलित जज नहीं है, और तो और, कोई सीनियर एडवोकेट भी नहीं है।
चौथी बात। महामहिम राष्ट्रपति की बात का अर्थ यदि यह है कि आरक्षण से तरक्की के दरवाजे बेशक खुल जाते हैं, पर कामयाबी मेहनत से ही मिलती है, तो वह बिल्कुल वाजिब बात कह रहे हैं। किसी इंस्टिट्यूट में प्रवेश बेशक आरक्षण से मिल सकता है, पर सभी स्टूडेंट्स को एक ही परीक्षा एक ही मापदंड से पास करनी होती है। इसलिए जब स्टूडेंट पास होकर निकलता है, तो उसके पास बुनियादी क्वालिफिकेशन और काबिलियत जरूर होती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका ऐडमिशन कोटे से हुआ है या नहीं।
सपनों से दूर
भारत में तरक्की करना परीक्षा पास करने और नौकरी पा लेने का मामला नहीं है। उससे पहले वंचित समुदाय के व्यक्ति को, खुद से एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। वह लड़ाई है महत्वाकांक्षा जगाने की। वंचित समुदाय के व्यक्ति के लिए अक्सर बड़े सपने देखना आसान नही होता। दरअसल सपने इस बात पर निर्भर करते हैं कि व्यक्ति के आसपास का वातावरण उन सपनों के अनुकूल है या नहीं, और उन सपनों की प्रतिष्ठा है या नहीं। कमजोर तबके अक्सर इस कल्चरल कैपिटल से वंचित होते हैं। प्रतिभा और मेहनत के बावजूद ऊंचे पद कई बार उनकी कल्पना में ही नहीं होते। इसलिए आरक्षण जरूरी है। किसी की निजी तरक्की के लिए नहीं, बेशक राष्ट्र निर्माण के लिए।
courtesy navbharat times

दलितों का ब्राहमणी करण आखिर कब तक चलेगा?

यह दौर दलितों के तालिबानीकरण का है !
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राजसमन्द में हुई आतं?की वारदात के पक्ष में बड़ी संख्या में चरमपंथी हन्दू सोशल मीडिया पर अपने विचार खुल कर ज़ाहिर कर रहे है ,लोगों ने आतंकी शम्भू की तस्वीर को " माई हीरो शम्भू भवानी " हेज टैग के साथ अपनी प्रोफाइल पिक्चर तक बना डाली है ,इन शम्भू समर्थकों के नाम के साथ लगी जाति का विश्लेषण करने पर चोंकाने वाला सत्य सामने आता है ,इस दुर्दांत हत्याकांड का खुलकर समर्थन कर रहे लोगों का 95 फीसदी अपर कास्ट हिन्दू है ,जो शम्भू लाल रेगर नामक एक दलित के कृत्य को जायज ठहरा रहे है ।

कातिल के चाहने वाले लोगों के तर्क लगभग वही है जो संघी दुष्प्रचार के साहित्य में बर्षों से विष वमन किये जा रहे है ,लोग राजसमन्द की वारदात को जायज ठहराने के लिए अजीबोग़रीब कुतर्क उछाल रहे है ,लोगों के बीच यह झूठ फैलाया जा रहा है कि आतंकी हमले का शिकार हुआ बंगाली मजदूर अफराजुल ने हत्यारे शम्भू की बहन से शादी कर रखी थी और उसे भगा कर पश्चिमी बंगाल ले गया था ,जबकि सच्चाई तो यह है कि कातिल की बहन तो छोड़िए उसकी किसी रिश्तेदार से भी अफराजुल का किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं था ,वह तो     नफरत की विचारधारा द्वारा प्रशिक्षित हत्यारे शम्भू को ठीक से जानता तक नहीं था ,बावजूद उसे कातिल ने महज़ मुसलमान होने की वजह से हमले का शिकार बनाया और बड़ी बेरहमी से पहले तो काटा और फिर जला डाला ।

इस आतंकी वारदात को सिर्फ सनकी आदमी की सनक में किया आम अपराध बता देना उन घृणा के कारोबारी संगठनों की तरफदारी करना है जो अपनी विषैली विचारधारा से कमजोर दिमाग युवाओं को फंसा कर आत्मघाती दस्ते तैयार कर रहे है ,राजसमन्द का जघन्य हत्याकांड यह भी साबित करता है कि दलित युवाओं का तालिबानीकरण किया जा रहा है ,उनके ज़रिए मौत के सौदागर अपना आतंकी खेल खेलने में सफल हो रहे है ।

इससे उच्च जाति के साम्प्रदायिक तत्व एक तीर से कईं शिकार करने की कोशिस कर रहे है ,वे दलितों और मुसलमानों को आमने सामने की एक अंतहीन लड़ाई में झोंक कर खुद सुरक्षित होने के प्रयास में है ,इसी के साथ वे दलित नोजवान पीढ़ी के अपराधीकरण का काम भी कर रहे ताकि वे हत्या ,दंगे ,लूट ,हमले जैसी वारदातें करते रहे और जेलों में बरसों सड़ते रहें ,इस तरह एक व्यक्ति ही नहीं बल्कि पूरा परिवार ही बर्बाद हो जाये और अन्ततः सम्पूर्ण समुदाय ही नष्ट हो जाये ।

दलित और मुस्लिम्स को आपसी युद्ध मे धकेल कर भारत के मनुवादी तत्व सारे अवसरों ,साधनों व संशाधनों पर काबिज हो कर ऐश्वर्य भोगते रहना चाहते है ,यह एक दीर्घकालिक भयानक हिन्दू षड्यंत्र है जिसका दलित शिकार हो चुका है ।

बड़े पैमाने पर दलित युवाओं को उन उग्र हिन्दू संगठनों से जोड़ा जा रहा ,जिनके जरिये हिंसक गतिविधिया करवाई जा सके ,हुड़दंग करने ,दंगे फैलाने ,त्रिशूल बांटने ,शस्त्र पूजा करवाने ,चाकूबाजी और मुकदमे करवाने ,हत्याएं करवाने तथा जैल भेजने के लिए ये नवनिर्मित हिन्दू बहुत काम आते है ,हालांकि ये हिन्दू तभी तक माने जाते हैं ,जब तक कि सामने मुसलमान हो या चुनाव हो ,बाकी समय मे इनको नीच हिन्दू के तौर पर ही माना जाता है ,हिंदुत्व की प्रयोगशाला में आज दलितों की औकात चीरे फाड़े जाने वाले मेढकों जैसी हो गयी है ,फिर भी दलित खुशी खुशी हिंदुत्व के हरावल दस्ते बने हुए है ।

एक फर्जी किस्म का ऊपरी ऊपरी क्षणिक आदर भाव मिल जाने और थोड़ी बहुत आर्थिक मदद पा कर आज का भ्रमित दलित नोजवान आत्मघाती हमलावर तक बनने को तत्पर हैं ,वह कुछ भी सोच विचार नही कर पा रहा है ,उसके मन मस्तिष्क पर हिदुत्व कुप्रचार इतना हावी हो गया है कि वह स्वयं को धर्म यौद्धा समझ कर मरने मारने पर उतारू है ,वस्तुतः आज देश का दलित किशोर और नोजवान ज़िंदा बम बन कर खुदकशी की राह पर चल पड़ा है ।

दलित युवाओं का यह तालिबानीकरण अब रंग दिखा रहा है ,उन्हें  इतना भर दिया गया है कि वे अब भस्मासुर बनकर खुद का ही नुकसान कर रहे है ,वे अब मनु के गीत गा रहे है ,वे अब आरक्षण हटाने की मांग कर रहे है ,कल वे संविधान को मिटाने की बात करेंगे और लोकतंत्र की जगह तानशाही की वकालत भी करने लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी ।

दलितों को आतंकी बनानेे का सबसे सटीक उदाहरण राजसमन्द को माना जा सकता है, किसी भी हिन्दू संगठन ने अफराजुल की निर्मम हत्या की निंदा नही की ,एक दो दिन की खामोशी के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद इंटरनेट हिन्दू आर्मी सक्रिय हो गई और हत्यारे शम्भू को हीरो बना डाला ,उसे एक भटका हुआ नोजवान बताते हुए उससे बात करने और उसके प्रति सहानुभूति दिखाने की अपीलें जारी होने लगी है ।

हैरत की बात तो यह है कि जितने भी लोग सोशल मीडिया और अन्यत्र शम्भू के पक्ष में मोर्चा खोले हुए है वे लगभग ऊपर के तीन वर्णों से आते है और उनका सीधा जुड़ाव संघ और उसके समविचारी संगठनों से है ,हद तो यह है कि एक नराधम के कुकृत्य को धर्मसम्मत और राष्ट्रभक्ति का पर्याय बताया जा रहा है ,उसको शम्भू नाथ बाहुबली कह कर गौरवान्वित किया जा रहा है ,एक निर्दोष ,निरपराध व्यक्ति को धोखे से बुलाकर पीछे से वार करने वाले अव्वल दर्जे के कायर को महान शूरवीर बता कर उसको महिमामण्डित इसलिए किया जा रहा है ताकि अन्य दलित युवाओं को भी इससे प्रेरणा मिल सके और वे भी इस धर्मयुद्ध में शामिल हो जाएं ।

आतंक को पालने पोषने और उसका समर्थन करने के लिए टेरर फंडिंग भी शुरू हो चुकी है ,हत्यारे शम्भू भवानी के मुकदमे के लिए पैसे एकत्र हो रहे है ,उसके परिवार को मदद करने के लिए उसकी पत्नी का बैंक अकाउंट नम्बर सबको भेजा गया है ,यह गतिविधियां इसलिए हो रही है कि इस तरह की आतंकी वारदातों को अंजाम देने वाले स्वयं को अकेला नही समझें ,उग्र हिदू समूह उनके साथ खड़े है ,वे बेझिझक विधर्मियों,लव जिहादियों ,पाकपरस्त म्लेच्छों को मार सकते है।

यह दौर भारत के दलितों के तालिबानीकरण का है । 

-भंवर मेघवंशी
( सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार )

बाबासाहेब डाॅ.भीमराव अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस के अवसर पर ’साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्म निरपेक्षता’ विषय पर संगोष्ठी संपन्न

विमर्श,कसम,जाति उन्मूलन आंदोलन एवं दलित मूवमेंट एसोसिएशन का संयुक्त आयोजन

रायपुर, 07.12.2017। समाज में साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष माहौल बनाने हेतु विमर्श छत्तीसगढ़, क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच छत्तीसगढ़, जाति उन्मूलन आंदोलन छत्तीसगढ़ व दलित मूवमेंट एसोसिएशन ने बाबासाहेब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस एवं बाबरी मस्जिद के विध्वंस दिवस के अवसर पर ’साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्म निरपेक्षता’ विषय पर रायपुर में संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच कसम व जाति उन्मूलन आंदोलन की राज्य कमेटी सदस्य रेखा गोंडाने ने की। इस अवसर पर विशिष्ट वक्ता के रूप में जाति उन्मूलन आंदोलन के अखिल भारतीय कार्यकारी संयोजक व छत्तीसगढ़ संयोजक संजीव खुदशाह,क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के अखिल भारतीय संयोजक तुहिन, अम्बेडकर,फुले,पेरियार छात्र संगठन के सदस्य व टीस मुंबई के शोधार्थी श्रीकांत,अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान संगठन के छत्तीसगढ़ राज्य सचिव काॅ. तेजराम विद्रोही एवं वरिष्ठ वामपंथी विचारक काॅ.मृदुलसेन गुप्ता उपस्थित थे। कार्यक्रम में जाति उन्मूलन आंदोलन के सदस्य रवि बौद्ध,एडवोकेट रामकृष्ण जांगडे़ व गुरू घासीदास सेवादार संघ के दिनेश सतनाम ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम का संचालन विमर्श के रविन्द्र व आभार क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के सदस्य रतन गोंडाने ने किया। इस अवसर पर प्रख्यात जनगायिका बिपाशा राव ने जनगीत प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में आगामी 17 दिसंबर 2017 को रायपुर में आयोजित जाति उन्मूलन आंदोलन के राज्य सम्मेलन को तथा नागपुर में आगामी 13-14 जनवरी 2018 को जाति उन्मूलन आंदोलन के अखिल भारतीय सम्मेलन को सफल बनाने की अपील की गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं रेखा गोंडाने ने कहा कि बाबासाहेब सभी समाज को अपना घर समझते थे। यह हमें समता,समानता और न्याय आधारित संविधान की रचना में दिखता है। हमें दकियानूसी विचारों को छोड़ना व नये विचारों से युवा वर्ग को अवगत कराना होगा जिससे नवीन समाज की स्थापना हो और महिला-पुरूष में भेदभाव रहित समाज की ओर आगे बढ़ना है।
कार्यक्रम में प्रारंभिक वक्तव्य रखते हुए तुहिन ने कहा कि आज ही के दिन 25वर्ष पूर्व अयोध्या में धर्म निरपेक्षता को तार-तार किया गया था और इसके लिए डाॅ.बी.आर. अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस को जानबुझकर चुना गया। 1826 से पूर्व बाबरी मस्जिद व रामजन्म भूमि कोई मुद्दा नहीं था। सभी समुदाय भारत की बहुलतावादी संस्कृति के तहत एक साथ रहते आए । सबसे पहले अंग्रेज इतिहासकार लिडेन व बेबरीज ने बाबरी मस्जिद व रामजन्म भूमि विवाद को पैदा किया और इसे अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम समुदाय को लड़ाने के लिए मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल किया। 7वीं सदी में व्हेनसांग के जीवन वृतांत में उल्लेख है कि अयोध्या बौद्ध धर्म का प्रमुख केन्द्र रहा है। बाबरनामा से पता चलता है कि बाबर कला प्रेमी था और किसी भी साक्ष्य में यह पता नहीं चलता कि अयोध्या में मस्जिद  उसने बनवाई थी। बाद में दक्षिणपंथी कट्टरवादियों ने झूठ की बुनियाद पर साम्प्रदायिकता की आग भड़काई जिससे पूरे देश मेें दंगे हुए और भय का माहौल बना। वर्तमान दौर में देश में धुर दक्षिणपंथी शासक वर्ग द्वारा हमारी सामाजिक विरासत गंगा-जमुनी तहजीब के ताने-बाने को छिन्न भिन्न करने की लगातार कोशिश हो रही है इसे आमजनों तक सही बात को पहुंचाना होगा। लोगों के खान पान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले हो रहे हैं। मेहनतकश मजदूरों,किसानों,दलितों,आदिवासियों,महिलाओं व अल्पसंख्यकों की आवाज को दबाया जा रहा है। एैसे माहौल में प्रगतिशील संगठनांे, बुद्धिजीवियों व छात्र-नौजवानों को आगे आकर लोगों को सही बातों को बताने और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है।
संजीव खुदशाह ने कहा कि विचारोें की प्रासंगिकता वक्त के साथ बदल सकती है लेकिन डाॅ. भीमराव अम्बेडकर की सोच प्रगतिशील लोकतांत्रिक व्यवस्था में थी जिसके कारण उनकेे विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि धर्म निरपेक्षता का मतलब है कि शासन प्रणाली व राजनीति धर्म से अलग होगी। धर्म एक व्यक्तिगत मुद्दा है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि धर्म व राजनीति का घालमेल हो व धर्म राजनीति से उपर हो। हमारे पड़ोसी मुल्क में कानून के उपर धर्म है जिसके दुष्परिणाम हम देखते हैं। हमारे देश में तमिलनाडु में आदेश निकाला गया है कि सरकारी संस्थानों में किसी भी तरह के धार्मिक क्रियाकलाप नहीं होगा। वहीं अन्य प्रदेशों में यह लगातार जारी है। आज के समय बुद्धिजीवी वर्ग की जिम्मेदारी है कि बाबासाहेब के विचारों को आगे बढ़ाने की ताकि ऊंच-नीच,जाति भेद,लिंग भेद तोड़कर एक भेदभाव मुक्त समतावादी भारत की कल्पना को साकार किया जा सके। उन्होंने उपस्थित जनों से बाबा साहब के दिखाये पथ पर जाति उन्मूलन आंदोलन से जुड़ने की अपील की।
टीस मुंबई के शोधार्थी श्रीकांत ने कहा कि शोषितों से शोषक बनाने वाली शिक्षा व्यवस्था जब तक है तब तक समाज में बदलाव नहीं आऐगा। आमजन को मिथकों से दूर रहने के लिए सही बात बताना होगा। हमारे सामने इतिहास को विकृत कर प्रस्तुत किया गया है। इसलिए इतिहास पढ़ना ही नहीं इतिहास बनाना भी हमारी जिम्मेदारी है। रस्सी को सांप बताने वालों से हमें सावधान रहने की जरूरत है। शोषितों में सबसे शोषित महिला होती है और महिलाओं के लिए जाति व्यवस्था शोषण का प्रवेश द्वार है। विषमतावादी समाज को खत्म कर समतावादी समाज बनाना, जाति प्रथा को खत्म करना हमारी जिम्मेदारी है। 
इस अवसर पर बड़ी संख्या में बुद्धिजीवीगण,सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि,लेखक,साहित्यकार,संस्कृतिकर्मी व छात्र/छात्राएं उपस्थित थे।

शिक्षाकर्मियों की हड़ताल हर बार असफल क्‍यों हो जाती है?

शिक्षाकर्मियों की हड़ताल हर बार असफल क्‍यों हो जाती है?
सचिन खुदशाह
लोगों के मन में यह सवाल हमेशा से आता रहा है कि शिक्षाकर्मी बार-बार हरताल क्यों करते है? इसके जवाब में तमाम मैसेज सोशल मीडिया में तैर रहे हैं जो इस तथ्‍य को बता रहे हैं कि क्यों शिक्षाकर्मी हड़ताल करने के लिए मजबूर हैं। उनकी परेशानियां उनकी आर्थिक स्थिति किसी से भी छिपी नहीं है। क्या राजनेता, क्या प्रशासक, पत्रकार मीडिया सभी उनकी परेशानियों से बावास्‍ता है।
शिक्षाकर्मी की मजबूरी
शिक्षाकर्मी संगठन की शिकायत है कि उन्हे कई कई महिने वेतन नही मिलता। इस कारण आर्थिक समस्‍या बनी रहती है। उनकी खास मांगों में शिक्षाकर्मी से शिक्षक मे संविलियन (यानी सरकारी कर्मचारी का दर्जा चाहिए जो वर्तमान में उन्‍हे नही मिल रहा है), उचित स्‍थानांतरण नीति शामिल है।
अब प्रश्न या होता है कि वे कौन से कारण है जिसके कारण शिक्षाकर्मी हड़ताल सफल नहीं हो पाती। इसकी पड़ताल भी जरूरी है आज हम इस मुद्दे पर बात करेंगे।
सरकार की मजबूरी
पहली बात तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि शिक्षाकर्मी फॉर्म भरने के पहले खासकर शुरुआती दौर में तकरीबन 22 साल पहले जब शिक्षाकर्मी जैसे पद का सृजन किया गया उसमें यह शर्त खुले तौर पर शासन के द्वारा प्रसारित किया गया था कि यह सेवा केवल 3 वर्ष के लिए है। और उसके बाद उन्हें सेवा से पृथक कर दिया जाएगा। किंतु बाद में इनकी सेवाएं बढ़ाई जाने लगी और वह कभी भी स्थाई शिक्षकों के तौर पर भर्ती नहीं किए गए। हालांकि कुछ शिक्षकों को स्थाई शिक्षक के तौर पर पदोन्नति भी मिली।
अब मैं आपको बताना चाहूंगा की शिक्षा कर्मी की भर्ती 3 वर्ष के लिए क्यों की जाती रही है। दरअसल उस समय इस बात को सामने रखा गया की शिक्षाकर्मी के इस पद हेतु रुपयों का इंतजाम वर्ल्ड बैंक के द्वारा होता है। और वर्ल्ड बैंक यह राशि ऋण के रूप में स्टेट गवर्नमेंट को 3 साल के लिए देता है। बाद में परिस्थिति का जायजा लेने के बाद यह राशि अगले तीन वर्षो के लिए बढ़ा दी जाती है।
दावा है छत्तीसगढ़ राज्य में करीब ढाई लाख शिक्षाकर्मी कार्यरत है निश्चित तौर पर इन्हें स्थाई करने के बाद और वर्ल्ड बैंक द्वारा राशि नहीं देने की स्थिति में वेतन देना राज सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी। इसलिए राज्‍य सरकार इन्‍हे स्‍थाई करने में हिचकिचाती है।
दूसरी मजबूरी है यूजीसी की गाईडलाईन जिनके अनुसार स्‍थाई शिक्षको को भारी भरकम वेतन देना जरूरी है। इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते है मान लिजिये किसी शिक्षाकर्मी का वेतन 30000 प्रतिमाह है तो यदि उसे शिक्षक पद पर बहाल किया जायेगा तो उसे यू जी सी के गाईडलाईन के अनुसार करीब डेढ गुना ज्‍यादा वेतन (75000) देना होगा। ऐसा करना सरकार के लिए एक टेढ़ी खीर है।
अब हम इस मुद्दे पर आते हैं कि क्यों शिक्षाकर्मियों का हड़ताल जो तमाम छोटी-छोटी मांगों पर आधारित होता है वह अक्सर असफल हो जाता पिछले बार के हड़ताल में तो करीब 25 शिक्षा कर्मी को मौत के मुंह में जाना पड़ा इनमें 4 आत्‍महत्‍या शामिल है बावजूद इसके सरकार का मन नहीं डोला इसके कुछ कारण है।
इसके कई कारण है जैसे शिक्षाकर्मियों के संगठन में कई गुट है अक्‍सर वह एकमत नहीं हो पाते हैं।  शिक्षाकर्मी में पोस्टिंग को लेकर बहुत मारा मारी है। शहर के आसपास पोस्टिंग कराने में वह मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक की एप्रोच रहते हैं। और जिन दमदार शिक्षाकर्मियों की पहुच उन तक रहती है वह शहर के आसपास वर्षों से काबिज है। बहुसंख्‍यक शिक्षाकर्मी सरकारा के निर्देशानुसार ग्राम पंचायत के मुख्‍यालय में नही रहते है। सरकारी काम के बटवारे  को लेकर महिला पुरूष में मतभेद की खबरे आम है। जनसमर्थन जुटाने में कमजोर साबित होते है। शिक्षाकर्मियों को चाहिए कि वह अपनी परेशानियों को पालको के आगे रखें और उनसे जनसमर्थन मांगे।
मताधिकार पर कमजोर - सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि इतनी बड़ी संख्या में होने के बावजूद वे सरकार बदलने का माद्दा नहीं रखते हैं वे और उनके परिवार चाहे जातिगत कारण हो या धर्मगत या अन्य कारण हो। वह उसी पार्टी को वोट देते हैं जिनके खिलाफ हड़ताल पर खड़े रहते हैं। इसीलिए कोई भी पार्टी उनसे खौफ नहीं खाती। इसीलिए हड़ताल पर जाने से पहले शिक्षाकर्मियों को मनन और विश्लेषण करना होगा और पूरी तैयारी के साथ हड़ताल पर बैठना होगा। तब कहीं जाकर उनका आंदोलन सफल हो सकेगा। क्योंकि उनकी सेवाओं से उनके परिवार की रोजी रोटी बंधी हुई है। वहीं बच्चों का भविष्य भी जुड़ा हुआ है।
सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए यह समस्‍या आने वाली है।

 यदि कोई केन्‍द्र या राज्‍य सरकार का कर्मचारी यह समझे की यह समस्‍या सिर्फ शिक्षाकर्मियों की है। वह इस समस्‍या से सुरक्षित है तो मै यह बताना चाहूंगा की नई नई पूंजी वादी एवं उदारवादी नीति में यही योजना बनाई जा रही है। अब चपरासी से लेकर आई ए एस तक ठेके पर लिये जायेगे। सरकार शिक्षा स्‍वास्‍थ अन्‍य जनहित वाली योजना से हाथ खीचना चाहती है। सरकार का काम केवल दो ही होगा। जनता से भूमि छीन कर पूंजीवादियों को देना और टैक्‍स वसूलना। राजस्‍थान सहित कई राज्‍यों में इसकी शुरूआत भी हो चुकी है। शिक्षाकर्मी की तरह पुलिस, पटवारी, ग्रामसेवक,कलर्क और अधिकारी ठेके पर भर्ती किये जा रहे है। इसलिए अन्य संगठन को भी समस्‍या को गंभीरता से लेने की जरूरत है।