लेखकों के जमीनी आंदोलन का नाम है दलित पैंथर

Black Panthers members raising fists in solidarity during a protest with unity umbrella.

संजीव खुदशाह

वंचित वर्ग के आंदोलन का विश्व में एक अलग इतिहास है और उसका एक अपना मकाम है।  विश्व के वंचितों के आंदोलन का इतिहास, दलित पैंथर के जिक्र के बिना पूरा नहीं हो सकता। बहुत थोड़े समय चले इस दलित आंदोलन ने भारत में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। आज जब हम ज वि पवार की किताब “दलित पैंथर एक अधिकारीक इतिहास” पढ़ते हैं तो हमें जानकारी मिलती है की उन्होंने क्या-क्या काम किया और किन हालातों में उपलब्धियां हासिल की?

ऐसा माना जाता रहा है की दलित पैंथर, अमेरिकी अश्वेत आंदोलन के ब्लैक पैंथर से प्रभावित हैं। यदपि ये लगभग समकालीन थे । ब्लैक पैंथर की स्थापना अमेरिका में 15 अक्टूबर 1966 को हुई थी जबकि दलित पैंथर का जन्म भारत में 29 मई 1972 को हुआ।

जिस समय भारत में दलित पैंथर की स्थापना हो रही थी। महाराष्ट्र राज्य में दलितों के प्रति अछूत पन की भावना और जातिगत शोषण की स्थिति चरम में थी। दैनिक अखबार दलितों के शोषण की खबरों से भरे होते थे। बे लगाम सामंती वर्ग जो शोषण कर रहा था। पुलिस प्रशासन शोषको के साथ खड़ा था और राज्य सरकार मानो इस शोषण में मौन सहमति दे रही थी। शिवसेना के गुंडे दलितों के साथ अत्याचार कर रहे थे। कांग्रेस की सरकार दलितों की नहीं सुन रही थी।

दलित महिलाओं के साथ बलात्कार करना। अपने खेतों में बेगारी कराना। दलित बस्तियों के कुओं में मल मूत्र डाल देना। उन्हें बहिष्कृत करना। उच्च जातियों का रोज का काम हो गया था। ऐसी परिस्थिति में उस समय दलितों के लिए काम कर रही राजनीतिक पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया कुछ नहीं कर पा रही थी या कहें शोषक पार्टियों की तरफ थी।

ऐसे समय में दलित पैंथर की स्थापना हुई। ज वि पवार की माने तो दलित पैंथर के शुरुआती दौर में नामदेव ढसाल, ज वि पवार, राजा ढाले, दया पवार, अर्जुन डांगले, विजय गिरकर, प्रहलाद चेदवनकर, रामदास सोरटे, मारुति सरोटे, कुडी राम थोरात, उत्तम खरात और अर्जुन कस्बे जैसे लोग शामिल थे। सभी दलित लेखक थे। कुछ लेखकों की गिनती नामी मराठी  साहित्यकारों में होती थी।

दलित पैंथर के पहले बयान में कहा गया कि “महाराष्ट्र में जातिगत पूर्वाग्रह पर बेलगाम हो गए हैं और धनी किसान, सत्ताधारी और ऊंची जातियों के गुंडे जघन्य अपराध कर रहे हैं। इस तरह के अमानवीय जातिवादी तत्वों से निपटने के लिए मुंबई के विद्रोही युवकों ने एक नए संगठन “दलित पैंथर” की स्थापना की है।”

शुरू में इस संगठन से मुंबई के ढोर चाल (छोटी जातियों के लिए प्रयुक्त शब्द) जहां नामी कवि नामदेव ढसाल रहा करते थे और कमाठीपुरा फर्स्ट लेन सफाई कर्मचारियों के लिए आवंटित मकान जिसे सिद्धार्थनगर भी कहा जाता था। जहां ज वि पवार रहते थे। के मोहल्ले के लोग जुड़ रहे थे । याने यहीं से दलित पैंथर की शुरुआत हुई।

12 अगस्त 1972 को एरण गांव में घटी एक घटना ने पूरे महाराष्ट्र को हिला कर रख दिया वहां रामदास नारनवरे नामक एक दलित किसान की क्रूरता पूर्वक हत्या कर दी गई। उसके पास 8 एकड़ भूमि थी और चार भाई मिलकर शांति और प्रसन्नता पूर्वक जीवन यापन कर रहे थे। अपने आत्म सम्मान और अपनी निर्भरता के कारण वे गांव वालों के आंखों की किरकिरी बने हुए थे। वह गांव वालों की खास करके सामंतों की जी हजूरी नहीं करते थे। इसीलिए गांव वाले उन्हें सबक सिखाने का मौका ढूंढ रहे थे। गांव में हैजा की बीमारी से 2 लोगों की मृत्यु ने उन्हें मौका दे दिया। गांव के लोगों ने बैठक बुलायी और उन्होंने निर्णय लिया कि गांव के देवी से सलाह लेंगे। एक भक्त के ऊपर देवी आई और उन्होंने इसके लिए रामदास नारनवरे को ही जिम्मेदार बताया। उन्होंने बताया कि वे श्मशान घाट जाकर शैतान को प्रसन्न करने के लिए तांत्रिक प्रयोग करते हैं। इसी कारण गांव में हैजा फैला है। इससे बचाव का एक ही तरीका है नारनवरे की बलि।

गांव वालों ने विचार करना शुरू किया की बलि देने का क्या तरीका होगा। वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मनुस्मृति में वर्णित तरीका ही सबसे बढ़िया होगा। वह उन्हें जबर्दस्ती पड़ोसी गांव पाटनसावंगी के मुखिया के पास ले गये। मनुस्मृति में निर्धारित नियमों के अनुसार नारनवरे की बलि दी गई। पहले उसके कान और नाक काटे गए फिर गला। उसके शव को एक कुएं में फेंक दिया गया। शव 2 दिन तक पानी में तैरता रहा। पुलिस ने इस मामले को रफा-दफा कर दिया। पोस्टमार्टम किया गया सरकारी सर्जन ने उसमें लिखा है कि मौत पानी में डूबने से हुई। क्योंकि मृतक दलित था इसलिए इस मामले को दबा दिया गया और लाश को दफना दिया गया। परंतु मीडिया को इस भयावह हत्याकांड की खबर लग गई और इस बारे में दैनिक अखबारों में खबर छपने लगी तो शव को फिर से निकालकर पोस्टमार्टम करवाना पड़ा। तब कहीं जाकर मामला खुला। इस मामले में 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

दलित पैंथर एक समय पूरे महाराष्ट्र में सक्रिय था। जहां कहीं भी दलितों के साथ शोषण की सूचना मिलती। सारे पैंथर वहां पहुंच जाते हैं और दलितों को न्याय दिलाने का प्रयास करते हैं। एक बार राजगुरूनगर तहसील के अस्खेड़गांव में किसी उच्च जाति के व्यक्ति ने दलित किसान बिठूर दगड़ु मोरे की कनपटी पर बंदूक सटाकर 30 एकड़ भूमि को जबरन कब्जा कर लिया और उसमें फसल लेने लगा। जैसे ही दलित पैंथर को इसकी सूचना मिली। मुंबई से 92 दलित पैंथर तुरंत गांव पहुंचे और उस दबाव में आकर उसे  जमीन वापस करना पड़ा, मुआवजा भी देना पड़ा। इस तरह जहां भी शोषण होता दलित पैंथर खड़े हो जाते। साथ साथ पैंथर के सदस्य न्यूज़पेपर साहित्यिक पत्रिकाओं में भी कॉलम लिख रहे थे। कविताएं लिख रहे थे। गौरतलब यह है कि दलित पैंथर के सभी सदस्य गरीबी परिस्थिति से आते थे। कोई  टैक्सी चलाता था। कोई कपड़ा मिल में मजदूर था। कई सरकारी नौकरियों में थे। ज्यादातर लोग तंग गलियों , झुग्गियों, गंदी बस्तियों में रहते थे।

गैर दलितों को भी सहयोग किया।

दलित पैंथर शोषण के खिलाफ खड़े थे। कुछ प्रगतिशील सवर्ण भी दलित पैंथर के साथ थे। इसके कारण उन्हें अपनी नौकरी में समस्या आती थी। बड़े अधिकारी उन्हें सस्पेंड करने या नौकरी से बर्खास्त करने का नोटिस देते । दलित पैंथर ऐसे शोषण के खिलाफ उठ खड़े होते और उन्हें शोषण से मुक्ति दिलाते थे।यह संगठन दलितों में किसी एक जाति तक सिमटा हुआ नहीं था गैर बौद्ध दलित युवक बहुत मात्रा में इस संगठन के सदस्य थे।

दलित पैंथर पर अब तक चार किताबें लिखी जा चुकी है। जिसके लेखक हैं ज वि पवार, नामदेव ढसाल, अजय कुमार, शरण कुमार लिंबाले। दलित आंदोलन को समझने के लिए खास तौर पर दलित पैंथर के आंदोलन को समझने के लिए इन चारों किताबों को पढ़ना जरूरी है।

श्री पवार अपनी किताब में बताते हैं कि जगन्नाथ पुरी के शंकराचार्य निरंजन तीर्थ ने एक बार कहा था कि कोई मोची चाहे कितना ही पढ़ लिख ले वह मोची ही रहेगा और एक अछूत हमेशा अछूत ही रहेगा। दलित पैंथर को यह बर्दाश्त नहीं था। दलित पैंथर ने जगह-जगह शंकराचार्य का विरोध किया और महाराष्ट्र में उनके हर कार्यक्रम में बाधा डाली गई। शंकराचार्य इतना डर गए कि कई सालों तक महाराष्ट्र का दौरा नहीं किए।

एक बार दलित पैंथर ने महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे हमले के विरोध में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की रैली में विरोध करने का प्रेस रिलीज जारी किया। इससे पहले भी बड़े बड़े नेताओं के कार्यक्रमों और रैलियों में बाधा डाल चुके थे। प्रशासन भय ग्रस्त थी। उन्होंने प्रधानमंत्री से दलित पैंथर के नेताओं की मुलाकात करवाई ताकि कार्यक्रम निर्विघ्न रूप से आयोजित किया जा सके। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि दलित पैंथर कितना प्रभावशाली थे।

दलित पैंथर हमेशा राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं लेकिन उनका दावा था कि वह एक गैर राजनीतिक सामाजिक संगठन है। वह डॉक्टर अंबेडकर के आदर्श पर चलते हैं। दलित पैंथर ने अपने 5 साल के कार्यकाल में संघर्ष के दौरान कइ पैंथरों को जान से हाथ धोना पड़ा कई पुलिस की मुठभेड़ में मारे गए।

दलित पैंथर के बाद कोई भी ऐसा संगठन सामने नहीं आया जो इसकी कमी पूरी करता हो। कुछ लोगों ने जरूर दावा किया कि वह दलित पैंथर अभी भी चला रहे हैं। लेकिन वह सिर्फ कागजों में था। वर्तमान में भीम आर्मी की सक्रियता बढ़ी है और भीम आर्मी के सदस्य दलित पैंथर की तरह ही काम कर रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि भीम आर्मी को दलित लेखकों का साथ नहीं मिला। जबकि दलित पैंथर को लेखकों ने ही खड़ा किया था। दलित पैंथर और भीम आर्मी में बेसिक फर्क यह है कि दलित पैंथर का दावा था कि वह अंबेडकरी सिद्धांत को लेकर काम कर रहे हैं। जबकि भीम आर्मी के नेता कहते हैं की वह संविधान की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। 

ज वी पवार अपनी किताब में बताते हैं कि दलित पैंथर के पतन का सबसे बड़ा कारण था। पैंथर के बीच में कई गुटों का उभर जाना। कई बार यह होता था कि एक ही शहर में दलित पैंथर के अलग-अलग कार्यक्रम, अलग-अलग गुट के लोग करते थे। इससे आम जनता और कार्यकर्ताओं में कन्फ्यूजन पैदा होता था। कुछ जगह दलित पैंथर के लोग पद में आने के बाद वसूली का धंधा करते थे और खुद दलितों का शोषण करने लगे थे। इसीलिए एक प्रेस रिलीज जारी करके दलित पैंथर को आधिकारिक रूप से भंग कर दिया गया।

ब्लैक पैंथर की तरह दलित पैंथर का भी कार्यकाल बेहद कम था। ब्लैक पैंथर का कार्यकाल सिर्फ 2 साल का था। लेकिन उन्हें अमेरिका में पूर्ण सफलता मिल गई। दलित पैंथर का कार्यकाल सिर्फ 5 वर्ष का था जिसने पूरे भारत के दलित आंदोलन को प्रभावित किया और आज भी प्रेरणा का एक स्रोत है। लेकिन आज भी दलितों के साथ होने वाले शोषण और भेदभाव में कोई कमी नहीं आई है।

यह दलित आंदोलन, दलित लेखकों ने ही खड़ा किया था। आज की तरह जब दलित लेखक एक दूसरे की टांग खींचने में आमादा है । व्यक्तिवाद और जातिवाद का खेल, खेल रहे हैं । बहुत हुआ तो अपने आप को लेखन तक सीमित कर के आत्ममुग्धता में खोए हुए हैं। केवल लिखकर अपने काम का इतिश्री मानते हैं। उनके लिए दलित पैंथर एक  मिसाल की तरह है। देखना यह है क्या आज के दलित लेखक इससे कोई सबक ले पाएंगे?

PUBLISH IN NAVBHARAT 29/12/2019

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