जाति प्रमाण पत्र की समस्या और उसका समाधान

Caste certificate problem and its solution

डाॅ. संजीव खुदशाह

यदि किसी आदिवासी व्यक्ति को जंगली कहकर जलील करना हो या किसी दलित को घोड़ी पर चढ़ने नहीं देना हो या मटका छूने पर जान से मारना हो, इंटरव्यू में नंबर काटना हो या किसी भी प्रकार का भेदभाव करना हो, तो जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन जब इसका लाभ देना हो तो इसके लिए जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए जाति प्रमाण पत्र हासिल करना आज के दिन में एक टेढ़ी खीर हो गई है। 1950 के बंदोबस्त का अभिलेख या स्कूल का रिकॉर्ड मांगा जाता है। जिसमें जाति का उल्लेख हो। अनुसूचित जाति जनजाति के ऐसे सदस्य जिनके पूर्वजों के पास में जमीन जायदाद थी। अथवा शिक्षित थे। उनका तो जाति प्रमाण पत्र आसानी से बन जाता है। लेकिन जिनके पूर्वजों के पास जमीन जायदाद नहीं थी, अशिक्षित, गरीबी के हाल में थे, शोषण के शिकार थे। तो उनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाता है क्योंकि उनके पास 1950 का दस्तावेज नहीं होता है। छत्तीसगढ़ में 13% अनुसूचित जाति एवं 30% अनुसूचित जनजाति की आबादी है। इसमें से एक अनुमान के मुताबिक लगभग आधी आबादी का जाति प्रमाण पत्र 1950 के दस्तावेज नहीं होने के कारण नहीं बन पाता है। इसके पीछे उनकी गरीबी, लाचारी, पूर्वजों की नासमझी भी कहीं जा सकती है। लेकिन यह आज भी वैसे ही भेदभाव के शिकार हो रहे हैं जैसे की और लोग होते हैं। इनकी कुल संख्या में वे लोग शामिल हैं जिनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाता है। यानी जनगणना में गणना, उनकी तो उस जाति के तौर पर हो रही है। इस गणना के हिसाब से योजनाएं बनाई जा रही है,आरक्षण दिए जा रहे हैं, लेकिन जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाने के कारण वे सब, सरकारी योजनाओं से वंचित है। इस कारण एक बड़े तबके में रोष व्याप्त है।

छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण पत्र बनाने की समस्या को लेकर बरसों से मांग की जाती रही है और इसके लिए ज्ञापन पत्र व्यवहार आदि किया जाता रहा है। ऐसे ही पत्र व्यवहार के परिणाम स्वरूप केंद्र शासन ने व्यवहारिक परेशानी से सहमत होते हुए 10 जून 1925 को एक आदेश जारी किया। जिसमें यह स्पष्ट किया गया की जाति प्रमाण पत्र बनाने हेतु अभिलेख प्रस्तुत करने का नया कट ऑफ डेट 25 अगस्त 2000 होगा. इसको लेकर छत्तीसगढ़ में हलचल मची है। छ.ग. जाति प्रमाण पत्र समस्या एवं समाधान संयुक्त संघर्ष समिति के सचिव श्री संतोष बोरकर बताते है कि मुख्य सचिव ने अपने सभी कलेक्टरों को निर्देश पालन करने का पत्र जारी किया है लेकिन फिलहाल यह जमीनी स्तर पर लागू होते हुए नहीं दिख रहा है। इसका कारण है 2013 में शासन द्वारा जारी किए गए नियम। इस नियम में 1950 का दस्तावेज मांगा जाता है और यह नियम अभी भी लागू है। छ.ग. जाति प्रमाण पत्र समस्या एवं समाधान संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा सरकार से यह मांग की गई है कि 10 जून 2025 के आदेश के अनुसार इस नियम में भी परिवर्तन किया जाए और संबंधित जिम्मेदार पीठासीन अधिकारी को आदेशित किया जाए। तब कहीं जाकर इस आदेश को जमीन स्तर पर लागू किया जा सकेगा। गौरतलब है कि उत्तराखंड में इस आदेश को लागू कर दिया है। पीड़ित लोग अपने-अपने स्तर पर नेता, मंत्री, जनप्रतिनिधि एवं अफसरों से भेंट कर रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि यथाशीघ्र यह आदेश लागू किया जाए। ताकि जनता में रोष कम हो और राहत मिल सके।

इस लेख को साझा करें-

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *