रोहित वेमुला को सच्ची श्रद्धांजलि है यूजीसी का यह अधिनियम

संजीव खुदशाह

हमारे शैक्षणिक संस्थान जहां पर युवा और देश का भविष्य गढ़े जाते हैं ऐसे संस्थान भी भेदभाव से अछूते नहीं है। रोहित वेमुला, पायल तड़वी, दर्शन सोलंकी जैसे तमाम छात्र-छात्राएं इसकी गवाही चीख चीख कर देते हैं। 

हैदराबाद के उच्च शिक्षण संस्थान में शोधार्थी रोहित वेमुला (2016) के साथ जो भेदभाव किया गया था और उनकी संस्थागत हत्या हुई। इसके बाद कोर्ट ने रोहित वेमुला एक्ट बनाने हेतु निर्देश दिया। कर्नाटक सरकार भी चाहती थी कि रोहित वेमुला एक्ट लागू करें। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूजीसी का 2012 को बनाया गया इक्वल ऑपरचुनिटी सेल अब कारगर नहीं रहा और इसे रिफॉर्म करना पड़ेगा। इसीलिए फरवरी 2025 में यूजीसी ने रेगुलेशन एक्ट का एक ड्राफ्ट बनाकर प्रस्तुत किया। लेकिन फिर इसे संसदीय कमिटी शिक्षा को दे दिया गया। कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह इस कमेटी के अध्यक्ष थे। जिन्होंने 8 दिसंबर 2025 को संसदीय कमेटी की इस रिपोर्ट को संसद में रखी और आंकड़ों के साथ बताया कि किस प्रकार इस देश के विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों में न केवल एससी एसटी बल्कि ओबीसी के छात्रों के साथ भी भेदभाव बड़ी मात्रा में हो रहा है। उन्होंने बताया कि आंकड़ों के मुताबिक न केवल यह भेदभाव हो रहा है बल्कि बढ़ रहा है। इसीलिए यूजीसी को शिक्षण संस्थानों में समानता लाने के लिए कड़े कानून या निर्देश बनाने चाहिए। कोर्ट ने भी यही निर्देश दिया। जिसके परिणाम स्वरूप यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को नोटिफिकेशन जारी करके इस निर्देश को कानूनी रूप दिया। इस कानून का नाम है ” उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता के संवर्द्धन संबंधी विनियम, 2026″ (UGC Promotion of Equity in Higher Educational Institutions Regulations, 2026) जिसे यूजीसी (UGC) द्वारा हाल ही में 13 जनवरी 2026 से लागू किया गया। यह कानून उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करने, समानता सुनिश्चित करने और सभी छात्रों के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने हेतु बनाया गया है। इस तरह के कानून में पहले सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को शामिल किया जाता था। पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग, ईडब्ल्यूएस और दिव्यांग छात्रों को भी इस कानून के दायरे में लाया गया है। यह बताना जरूरी है कि रोहित वेमुला भी अन्य पिछड़ा वर्ग से ही आते थे। 

इस कानून का क्या उद्देश्य है? 

इस कानून की धारा 2 उद्देश्य में स्पष्ट उल्लेख है कि “धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों दिव्यांगजनों तथा इनमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हित कारकों के मध्य पूर्ण क्षमता एवं समावेशन को संवर्धन देना।” इस कानून में यह निर्देश दिया गया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में एक कमेटी बनाई जाए जो कि यह देखें की भेदभाव किया जा रहा है या नहीं या उसकी शिकायतों पर कार्यवाही करें।

यह देखना होगा कि यह कानून कहां तक कारगर होगा वह भी उस देश में जहां पर एक दलित को घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया जाता, स्कूल में पानी के मटके छूने पर छात्र को मार दिया जाता है, मूछे रखने पर हत्या कर दिया जाता है, एक आदिवासी के ऊपर पेशाब कर दिया जाता है और एक ओबीसी को कथा कहने से मना कर दिया जाता है उसकी शीखा खींच कर उखाड़ दी जाती है। ऐसे समय में इस तरह के कानून का आना एक सकारात्मक संदेश देता है। हम इस देश को विश्व गुरु बनाना चाहते हैं लेकिन यह बड़ा ही तकलीफदायी सच्चाई है कि हमारे देश का कोई भी विश्वविद्यालय संसार के टाप 100 विश्वविद्यालय रैंकिंग में भी शामिल नहीं है। हमें यह सोचना होगा की कैसे हम विश्व गुरु बने। इसके लिए शिक्षण संस्थानों को आगे बढ़ाना होगा। समता समानता लाना होगा। इस बीच सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार द्वारा जारी निर्देश के आधार पर तैयार किया गया यह कानून मील का पत्थर साबित होगा । प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी को इसके लिए धन्यवाद देना चाहिए। और इस कानून का चौतरफा स्वागत किया जाना चाहिए। जिन्होंने इस देश को और इस देश के शिक्षण संस्थानों को आगे बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

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