दलितों का जितना बड़ा दुशमन ब्राम्हणवाद है उतना बड़ा दुश्मन पूंजीवाद है – प्रोफेसर जितेंद्र प्रेमी

Brahminism is as big an enemy of Dalits as capitalism is – Professor Jitendra Premi

रायपुर वृंदावन भवन में संविधान दिवस पर कार्यक्रम 

 26 नवंबर का दिन संविधान दिवस के रूप में मनाने का पिछले कुछ वर्षों से प्रचलन में आया है । समाज के अलग अलग वर्गों के लोग और राजनीतिक पार्टियाँ एवं सरकारें संविधान दिवस पर विशेष आयोजन करने लगे हैं । कुछ वर्ग या राजनीतिक दल महज़ औपचारिकता या ध्यानाकर्षण के संविधान दिवस मनाने का दिखावा करते हैं, लेकिन समाज का दलित वर्ग शुरुवात से संविधान का सच्चा सम्मान करता आया है और लगातार हर वर्ष शिद्दत से संविधान की रक्षा के लिए कृत संकल्पित रहा है। इसी संकल्प को आगे बढ़ाते हुये देश की प्रतिष्ठित संस्था डीएमए इंडिया और अस्मिता विमर्श ने संविधान दिवस पर संविधान का महत्व विषय पर शहर के चिर परिचित हॉल, वृंदावन हॉल सिविल लाइन में परिचर्चा का आयोजन किया जिसमें शहर के बौद्धिक की प्रमुख हिस्सेदारी थी । यह गौर करने वाली बात है कि समाज को दिशा में बौद्धिक वर्ग की विशेष भागीदारी होती है इसलिए यह परिचर्चा बहुत महत्व की हो जाती है ।

      कार्यक्रम के शुरुवात में डीएमए इंडिया के संयोजक संजीव खुदशाह ने दर्शकों के समक्ष कार्यक्रम का प्रस्तावना रखा । उन्होंने कहा कि दलित समाज के लिए संविधान का बहुत महत्व है। आज संविधान लागू होने के बावजूद दलित समाज पर अत्याचार हो रहा तो अगर संविधान नहीं होता तो दलित समाज की स्थिति क्या होती ? उन्होंने संविधान के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि संविधान में सभी वर्गों को समान रूप से अधिकार दिया गया है। संविधान में उच्च वर्ग को भी वही अधिकार प्राप्त है जो अधिकार समाज के दबे कुचले वर्ग को प्राप्त है।  शेखर नाग ने जन गीत से प्रथम सत्र की शुरुआत की तत्पश्चात अलग वक्ताओं ने विमर्श को आगे बढ़ाया। गांड़ा महासभा के रघुचन्द निहाल ने कहा संविधान के पहले और संविधान के बाद दलित वर्ग के स्थिति में ज़बरदस्त विरोधाभास था । संविधान के पहले दलित वर्ग भयंकर शोषण का शिकार था और संविधान लागू होने के बाद शोषण में उत्तरोत्तर कमी आ रही है । कार्यक्रम में युवा साथी उमेश महिलानी ने कहा कि आज संविधान के दिखावे के आयोजन हो रहे हैं । आज संविधान के साथ पौराणिक पात्रों को जोड़ा जा रहा जबकि संविधान में वैज्ञानिक चिंतन परंपरा की वकालत की गई है । प्रोफ़ेसर आर टंडन ने वर्तमान समय में संविधान पर मंडरा रहे ख़तरे पर चिंता जाहिर की । किस तरह से संविधान को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है । ग़ैर संवैधानिक ढ़ंग से प्रतीकों को स्थापित किया जा रहा है । एक ख़ास विचारधारा बढ़ावा दिया जा रहा है । योग्यता का गला घोंटकर अयोग्य लोगों की अकादमियों में घुसपैठ करवाई जा रही है जो समाज और देश के लिए बहुत घातक है । 

           अगले वक्ता के रूप में अपनी बात रखते हुए देश के प्रसिद्ध वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी निसार अली जी ने क्रांतिकारी शायर आदमी गोंड़वी की मशहूर पंक्ति *हिन्दू या मुस्लिम के अहसेसात को छेड़िये*……से अपने वक्तव्य की शुरुवात की। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुये एक और क्रांतिकारी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का मशहूर कलाम ऐ ख़ाक नाशीनो उठ बैठो वो वक़्त करीब आ पहुंचा है …….उल्लेखित किया। उन्होंने आज के ख़ाक नाशीनो की पहचान बताई और संघर्ष के दिन नज़दीक आ गये हैं इस बात की तरफ़ साफ़ इशारा किया। दलित वर्ग की हालत सिर्फ़ और जन संघर्ष से बदलेंगे । 

       अगले वक्ता के तौर पर आमंत्रित वरिष्ठ दलित बुद्विजीवी साथी देवलाल भारती जी दलित वर्ग के साथ होने वाले साज़िशों को रेखांकित किया । उन्होंने कहा कि किस तरह साज़िशन शासकीय नौकरियों को ख़त्म कर दलित वर्गों के संविधान प्रदत्त हक़ अधिकारों को कुचला जा रहा है। रोस्टर का पालन नहीं किया जा रहा है । 

अगली कड़ी में अपनी बात को मुखरता से रखते हुए प्रोफेसर जितेंद्र प्रेमी ने कहा कि दलितों का जितना बड़ा दुशमन ब्राम्हणवाद है उतना बड़ा दुश्मन पूंजीवाद है । इसलिए दलितों को ब्राम्हणवाद और पूंजीवाद के ख़िलाफ़ बराबर का संघर्ष चलाना होगा । पहले सत्र के अंत में आजक्स के वरिष्ठ साथी लक्ष्मण भारती ने विस्तार से अपनी बात रखा । उन्होंने दलित वर्ग के तथाकथित दोगले जनप्रतिनिधियों के दोगलेपन को बेनक़ाब करते हुए कहा कि चुनाव पूर्व दलित जन प्रतिनिधि किस तरह दलित हितैषी होने का दिखावा करते हैं और चुनावी विजय के बाद किस तरह दलित प्रश्नों पर मौन साध लेते हैं और बुर्जुआ राजनैतिक दल के एजेंट बन दलितों के विरुद्ध ही काम करने लगते हैं ऐसे लोगों से सावधान रहने की आवश्यकता है । भारती जी ने वर्तमान में मताधिकार पर मंडरा रहे बहुत बड़े संकट की तरफ़ लोगों का ध्यान आकृष्ट किया । कार्यक्रम का संचालन शेखर नाग ने किया।

              पहले सत्र के समापन के पश्चात दूसरे सत्र में जाति प्रमाण के निर्माण में कठिनाई और निदान विषय पर डीएमए इंडिया के संयोजक संजीव खुदशाह ने अपने पीपीटी के माध्यम से लोगों को विस्तारपूर्वक बताया। क्रमवार अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि क्यों 1950 के पहले का दस्तावेज़ और कौन कौन से दस्तावेज़ मंगा जाता है । इसके साथ ही जाति प्रमाण की जटिल प्रक्रिया का राज्य सरकार ने अब तक क्या सरलीकरण क्या है वह भी उन्होंने बताया । उनके वक्तव्य से जाति प्रमाण निर्माण की प्रक्रिया संबंधित शंकाओं का अधिकतम समाधान हुआ । इस अंतिम सत्र में इसके पश्चात वरिष्ठ साथी बसंत निकोसे ने भी अपनी बात रखी। इस सत्र में आमंत्रित समाज के वरिष्ठ साथी संजय गजघाटे जी ने भविष्य की आशंकाओं को ध्यान में रखते हुये दलित समाज को अधिक अधिक से उद्यमी बनने की दिशा में बढ़ने के लिए बल देना होगा क्योंकि धीरे धीरे शासकीय नौकरियाँ कम हो रही है । रोज़गार के साधन सीमित हो रहे हैं इसलिए दलित वर्ग को उद्यमिता विकास की तरफ़ ध्यान देना चाहिए । 

कार्यक्रम में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव पवन सक्सेना, ट्रेड यूनियन से दलीप भगत, जय भीम कल्चरल ग्रुप के सुरेंद्र कोल्हेकर, भारतीय बौद्ध महासभा और समता सैनिक दल से विजय गजघाटे, संदीप खुदशाह, गांडा महासभा से नरेंद्र बाघ, युवा साथी भावेश परमार, बबलू महानंद, उमाशंकर और शहर के अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे ।

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