सीवर सैप्टिक टैंक में मौत या जीवन का अधिकार

Death or right to life in a sewer septic tank

सुप्रीम कोर्ट भी यह स्पष्ट कर चुका है कि ऐसे मामलों में मुआवजा राज्य की जिम्मेदारी है, पर न्यायालय का मूल उद्देश्य मौत के बाद भुगतान नहीं, मौत को रोकना था। फिर भी वास्तविकता यह है कि मशीनें होने के बावजूद उनका नियमित उपयोग नहीं होता, ठेकेदारी व्यवस्था में जवाबदेही धुंधली है। एक खतरनाक स्थिति सामान्य बात बन चुकी है।

राजु भारतवासी

राज्य संयोजक सफाई कर्मचारी आंदोलन छत्तीसगढ़

 सन् 2000 से 2026 तक सीवर सैप्टिक टैंक में 7 सफाई कर्मियों की छत्तीसगढ़ राज्य में मौत हो चुकी है। सफाई श्रमिक सीवर सैप्टिक टैंक के खतरनाक मेनहोल में उतरकर अपनी जान गवाँ बैठे। यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी. यह हमारी सामूहिक संवेदनहीनता का प्रमाण है। हर बार वही क्रम दोहराया जाता है मौत, शोक, मुआवजा, और फिर मौन हर बार जब कोई सफाई कर्मचारी सीवर या सेप्टिक टैंक की जहरीली, अंधेरी गहराइयों में उतरता है, वह केवल अपना काम नहीं कर रहा होता बल्कि वह अपने जीवन को दांव पर लगा रहा होता है और जब वह लौटकर नहीं आता और शासन-प्रशासन एवं नगर निगमों की लापरवाहियों की भेंट चढ़ जाता है। क्या यही हमारे समय की संवेदना है? क्या 20 या 30 लाख रुपये किसी जीवन का मूल्य तय कर सकते हैं? या हमने यह मान लिया है कि कुछ जिंदगियाँ जोखिम के साथ ही आती हैं और उनकी मृत्यु प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है?

सफाई श्रमिकों का एक परिवार है, एक माँ की सूनी गोद है, एक पत्नी की टूटी दुनिया एक बच्चे का छिन गया सहारा है कानून मौजूद है। 2013 का अधिनियम असुरक्षित सीवर और सेप्टिक टैंक में मानव प्रवेश को अपराध घोषित करता है और स्पष्ट करता है कि बिना सुरक्षा उपकरण, गैस डिटेक्टर, पीपीई किट और प्रशिक्षित टीम के किसी को उतारना दंडनीय है। सुप्रीम कोर्ट भी यह स्पष्ट कर चुका है कि ऐसे मामलों में मुआवजा राज्य की जिम्मेदारी है, पर न्यायालय का मूल उद्देश्य मौत के बाद भुगतान नहीं, मौत को रोकना था। फिर भी वास्तविकता यह है कि मशीनें होने के बावजूद उनका नियमित उपयोग नहीं होता, ठेकेदारी व्यवस्था में जवाबदेही धुंधली है। एक खतरनाक स्थिति सामान्य बात बन चुकी है। प्रश्न यह नहीं कि मुआवजा दिया जाए या नहीं बल्कि प्रश्न यह है कि वही धन पहले सुरक्षा पर क्यों नहीं लगाया जाता? यदि एक राज्य अथवा नगर निगम एक मृत्यु के बाद 20-30 लाख रुपये दे सकता है, तो क्या वही राशि पहले आधुनिक सीवर जेटिंग मशीन, रोबोटिक क्लीनिंग सिस्टम, गैस डिटेक्टर, एससीबीए सेट और प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम पर निवेश नहीं की जा सकता? एक मृत्यु के बाद दिया गया पैसा कई संभावित मौतों को रोक सकता है.।

स्मार्ट सिटी और आधुनिक भारत की बात करते हैं, पर उन्हीं शहरों की सफाई करने वाले हाथ आज भी जहरीली गैसों में दम तोड़ते हैं। यह केवल प्रशासन की विफलता नहीं, यह हमारी सामूहिक चेतना की परीक्षा है।

तय करना होगा कि क्या हम अपने समाज के सफाई कर्मियों श्रमिकों के जीवन को मुआवजे की रकम में तौलते रहेंगे या यह मांग करेंगे कि अब कोई भी सफाई कर्मचारी मौत के अंधे कुएँ में न उतरे। न्याय का अर्थ केवल आर्थिक सहायता नहीं है; न्याय का अर्थ है बाध्यकारी, पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था जो भविष्य में किसी भी श्रमिक को असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर न होने दे।

संवेदना शब्दों से नहीं, संरचनात्मक परिवर्तन से सिद्ध होती है। यदि हम सच में एक संवेदनशील और विकसित भारत का स्वप्न देखते हैं, तो पहला कदम यही होना चाहिए कि हर सीवर में उतरने से पहले मशीन उतरे, हर ट्रैक की सफाई से पहले सुरक्षा जांच हो, हर श्रमिक को उपकरण और प्रशिक्षण मिले और हर अधिकारी को जवाबदेही का भय हो मुआवजा आवश्यक है, पर वह समाधान नहीं है। समाधान है… मृत्यु से पहले व्यवस्था संवेदना तभी सच्ची होगी जब हम मृत्यु के बाद आँसू नहीं, मृत्यु से पहले व्यवस्थाओं को दुरुस्त कर परिवर्तन का साहस दिखाएँगे। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिन हाथों से हम अपने शहरों को स्वच्छ रखते हैं, उन्हीं हाथों को हम सबसे असुरक्षित परिस्थितियों में धकेल देते हैं? यदि हम सच में बदलता हुआ भारत चाहते हैं, तो पहला संकल्प यही होना चाहिए कि कोई भी सफाई कर्मचारी अब अंधेरे कुएं में अपनी जान जोखिम में डालकर न उतरे। हमें मुआवजे की घोषणा से आगे बढ़कर जवाबदेही की मांग करनी होगी, तकनीक और सुरक्षा में निवेश को अनिवार्य बनाना होगा। अब निर्णय राज्य सरकार को करना है. मुआवज़ों से संतोष करेंगे या जीवन की सुरक्षा को अनिवार्य बनाएँगे, क्योंकि जिस विकास की नींव किसी श्रमिक की मृत्यु पर टिके वह विकास नहीं, व्यवस्था की विफलता है।

राजु भारतवासी मोबाईल नं. 9827159252

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