डॉ संजीव खुदशाह
पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के रायपुर में रामकृष्ण नामक एक निजी अस्पताल में सीवर को साफ करते समय तीन सफाई कर्मियों की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि यह तीनों सफाई कर्मचारी बिना उपकरण के सीवर में घुसे थे जहां पर जहरीली गैस रिलीज होने के कारण उनकी मौत हो गई। रायपुर में ऐसे सैकड़ो निजी अस्पताल हैं, कल कारखाने हैं, होटल, मॉल है, जहां पर हर महीने सीवर की सफाई करनी पड़ती है। इससे पहले भी अशोका बिरियानी नामक होटल में सीवर के भीतर जाने के कारण दो व्यक्तियों की मौत हो गई थी।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार 1993 से 2025 तक पूरे देश में 1313 व्यक्तियों की मौत सीवर में जाने के कारण हुई है। यह आंकड़ा गंभीर है आधुनिक युग में जब विज्ञानिक तकनीक की सारी सुविधाएं मौजूद हैं सीवर साफ करने के लिए। मशीन का आविष्कार हो चुका है। इसके बावजूद आखिर क्यों एक मनुष्य को मानव मल साफ करने के लिए सीवर में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। यह एक बहुत ही घृणित कार्य है। इसके लिए पूरी भारतीय सभ्यता को शर्मिंदा होना पड़ता है। एक ओर हम जहां चांद में कदम रख रहे हैं दूसरी ओर हमारे पास सीवर साफ करने के लिए मशीन का प्रयोग करने की इच्छा शक्ति नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि थोड़े पैसे बचाने के लिए एक गरीब मजलूम को महीने पर, दिहाड़ी पर, काम करने वाले मजदूर को हम सीवर जैसी गंदगी साफ करने के लिए टैंक के भीतर घुसने को मजबूर कर देते हैं। यह एक मानवीय अपराध तो है ही साथ-साथ संवैधानिक अपराध भी है। उसके लिए जो मजदूर को यह घृणित कार्य करने के लिए मजबूर कर रहा है।
केंद्र शासन का हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 का कानून कहता है कि किसी मनुष्य को सीवर में उतारना अपराध है और यदि मौत होती है तो नियोक्ता को सजा और पीड़ित को भारी भरकम मुआवजा देना पड़ेगा। बावजूद इसके सीवर में मौत का सिलसिला नहीं थम रहा है। बहुत सारे नियोक्ता अपने संस्थान में व्यक्तियों को मल उठाने, सीवर में घुसने और घृणित कार्य में लगाए हुए हैं।
सोंच में बदलाव की जरूरत
भारत के कुछ लोगों की सोच आज भी सामंती है वह गरीब पिछड़े और दलितों से चंद पैसे के एवज में ख़तरनाक एवं घृणित काम में लगा देते हैं। उनको लगता है की इनके जान की कोई कीमत नहीं है। कानून का भी इन्हें कोई डर नहीं है तभी लगातार ऐसी घटनाएं घट रही हैं।
करीब 20-25 वर्षों से सफाई कर्मचारियों की बीच काम करने वाले सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बैजवाड़ा विल्सन कहते हैं की “सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार सीवर में मौत होने पर 30 लाख रुपए मुआवजा एवं परिवार का पुनर्वास किये जाने का प्रावधान है। लेकिन करीब 50% लोगों को यह मुआवजा अब तक नहीं मिला है। वह कहते हैं कि मैन्युअल स्कैवेंजिंग में काम आने वाली मशीन का निर्माण भारत में नहीं होता है न ही इसे बड़ी मात्रा में एक्सपोर्ट किया जाता है। इसलिए भारत में इस तरह की मशीन की भारी कमी है। जिस नगर निगम में ऐसी 100 मशीन होनी चाहिए वहां पर दो या तीन मशीन होती है। कई नगर निगम/पंचायत के पास में ये मशीन है भी नहीं।” वह कहते हैं कि “सरकार को इस मामले में पहल करना चाहिए ताकि बहुत बड़ी मात्रा में मशीनों का उत्पादन हो सके। हम चंद्रयान के लिए तो संसाधन जुटा लेते हैं लेकिन इस मामले में मौन हो जाते हैं।”
सफाई कर्मचारी आंदोलन के राज्य संयोजक राजू भारतवासी कहते हैं की “ज्यादातर मामलों में रसूखदार नियोक्ता राजनीतिक पकड़ होने के कारण बच जाते हैं थोड़ा बहुत पैसा देकर मामले को रफा दफा कर देते हैं और पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता है।” उनका कहना है कि “छत्तीसगढ़ में करीब 7 ऐसे मामले हैं जिन्हें मुआवजे का इंतजार है।”
कौन है जो इस काम में लगे हुए हैं ?
वैसे तो इस काम में हर वर्ग के लोग लगे हुए हैं लेकिन सबसे ज्यादा संख्या दलित और पिछड़े वर्ग की है। ऐसे लोग जो बाहर से शहर आए हुए हैं, जिन्हें काम की तलाश है, बेरोजगारी और घर पालने के लिए, जीवन यापन के लिए वे कोई भी काम करने के लिए मजबूर हैं। ऐसे लोग ही इस काम में शामिल हो जाते हैं। कॉलोनी में भी सीवर को साफ करने के लिए इनकी जरूरत पड़ती है। घर, माल, रेस्टोरेंट, होटल, कारखाने, अस्पताल के मालिक पैसे बचाने के चक्कर में इन लोगों से साफ सफाई करवाते है। क्योंकि मशीन की कमी होने के कारण इसका प्रयोग महंगा पड़ता है।
विकल्प क्या है ?
वैज्ञानिक युग में सीवर और गंदगी साफ करने के लिए बहुत सारे यंत्रों का आविष्कार हो चुका है। उन्हें भारत में मंगवाने की जरूरत है। कई लोग किराए में भी इस मशीन को उपलब्ध करा सकते हैं। कई नगर पालिकाओं के पास भी यह मशीन होती है और उसका प्रयोग किया जाता है। किसी व्यक्ति के जान को जोखिम में डालने के बजाय हमें इन सक्शन मशीन का प्रयोग करना चाहिए। ताकि मानव मल उठाने जैसे घृणित कार्य में किसी मनुष्य को लगाने से बचाया जा सके। उनकी जिंदगी बचाई जा सके। प्रश्न ये है कि आखिर हम इन विकल्पों का प्रयोग करने से पहले और कितनी मौतों का इंतजार करेगे?
नजरिया बदलना होगा
बहुत सारे सामाचार इस तरह के मामले में हरिजन, स्वीपर, मेहतर, भंगी जैसे आपत्तिजनक/ प्रतिबंधित शब्दों का प्रयोग कर रहे है। हमें इन शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए क्योंकि ये लोग भी एक इंसान हैं। इनका भी आत्मसम्मान है। सीवर में काम करने वाले लोग किसी खास जाति समुदाय तक सीमित नही है।






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