डॉ. संजीव खुदशाह
भारत में अगर कोई व्यक्ति कहता है कि वह ईसाई है, तो वह 100% सच नहीं है या कहे, वह 100% ईसाई नहीं है। उसमें 30% हिंदू संस्कृति भी होगी। मंदिरों के प्रति भी उसके अंदर आदर होगा। अगर कोई व्यक्ति कहता है कि वह हिंदू है, तो यकीन मानिए, वह 100% हिंदू तो हो ही नहीं सकता। 20% ईसाई और मुसलमान भी होगा। दुख पड़ेगा तो मजार में जाकर दुआ माँगेगा। हो सकता है 20% उसके भीतर नास्तिक भी हो। तभी तो वह सभी धर्मों को बराबर समझता है।
यही बात मुसलमानों पर भी लागू होती है। भारत का कोई भी मुसलमान 100% मुस्लिम नहीं है। 30% हिंदू संस्कृति भी है उसके अंदर, मुस्लिम तो वह 70% है। यहाँ के रीति-रिवाज, परंपराएँ हैं उसके अंदर, जिसे वह नए नामों से निभाता है।
यही बात सभी विचारधाराओं पर भी समान रूप से लागू होती है। चाहे वह हिंदूवादी विचारधारा हो, कम्युनिस्ट विचारधारा हो, गांधीवादी हो, राष्ट्रवादी विचारधारा हो, अंबेडकरवादी विचारधारा हो या फिर नास्तिक विचारधारा हो। यदि कोई कहता है कि वह नास्तिक विचारधारा का है, तो उसके भीतर 10% कम्युनिस्ट और 10% अंबेडकरवादी विचारधारा जरूर होगी। यदि कोई कहता है कि वह अंबेडकरवादी विचारधारा का है, तो उसमें थोड़ी नास्तिकता और थोड़ा हिंदू संस्कृति भी होगा। इसी प्रकार अगर वह बौद्ध है, तो 30% हिंदू भी होगा। क्योंकि गौतम और गणेश दोनों के आराध्य हैं। अगर कोई ब्राह्मण कम्युनिस्ट है, तो 20% ब्राह्मण भी है, सिर्फ 80 प्रतिशत कम्युनिस्ट है, यह नहीं भूलना चाहिए। जाति की पहचान पीछा नहीं छोड़ती है। और यह भी सच है कि कई व्यक्ति जाति पहचान से पीछा नहीं छुड़ाना चाहते। अपनी जाति के व्यक्ति को देखकर प्रेम उमड़ ही जाता है, चाहे वह कितना ही बड़ा नास्तिक होगा। तभी तो जाति नहीं छूट रही है भारत में।
डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि डायनामाइट से धर्मग्रंथों को उड़ाने पर भी जाति नहीं टूट सकती। क्योंकि जाति समस्या नहीं है। समस्या है जातियों के बीच ऊँच-नीच, भेदभाव, असमानता और आपस में बैर। जब आपस में भेदभाव, बैर खत्म हो जाएगा। सब एक-दूसरे को समान मानेंगे, तो जाति रहे न रहे, कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
यहाँ कोई पूरा-पूरा जातिवादी भी नहीं है। डॉ. आंबेडकर जातिवादी होते, तो ब्राह्मण स्त्री से विवाह क्यों करते? ब्राह्मण यदि पूरे के पूरे जातिवादी होते, तो अपनी बेटियों का विवाह मुस्लिमों से, दलितों से क्यों होने देते? यानी एक व्यक्ति किसी एक मामले में 100% नहीं होता। उसके अंदर कई छोटे-छोटे प्रतिशत मिलकर 100% होते हैं। इसीलिए कभी किसी नास्तिक व्यक्ति में आपको हिंदु संस्कृति दिख जाए, तो घबराइएगा नहीं। किसी कट्टर हिंदू में यदि आपको कोई वामपंथ दिख जाए, तो उसे पैनी नजर से मत देखिएगा।
इस प्रकार आपको सिख, जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, हिंदू, कबीरपंथ को मानने वाले तमाम छोटे-छोटे फिरके के लोग एक जैसे दिखेंगे। उनके बीच अंतर इतना बारीक हो जाएगा कि आप उसे पहचान भी नहीं सकेंगे। उनकी श्रद्धा को लेकर के भी घालमेल दिखेगा। सिंधी के लिए गुरु नानक देव उतने ही पूज्य हैं, जितना कि एक सिख के लिए। दीपावली में ये सब श्रद्धा में खड़े हुए दिखेंगे, चाहे वह जैन हो, बौद्ध हो, सिख हो या भारतीय मुस्लिम।
इसीलिए आपको व्यक्तियों में विरोधाभास मिलेगा। कई बार वह कहता कुछ है और दिखता कुछ। यहाँ पर भी प्रतिशत का खेल है। एक व्यक्ति, जिसे आप नास्तिक मानते हो, वह किसी और एंगल से आस्तिक भी हो सकता है। किसी के लिए गुस्सैल तो किसी के लिए खुशमिजाज भी हो सकता है। यानी एक व्यक्ति कई छोटे-छोटे प्रतिशत मिलकर 100 होता है। आपने उसके किस हिस्से को पहचाना है, वह आप पर डिपेंड करता है।
ऐसा नहीं हो सकता कि वह दलित है, जाति से पीड़ित है, तो जातिवादी नहीं होगा। यदि दलित जातिवाद से ग्रसित नहीं होता, तो दलितों में आरक्षण वर्गीकरण का विरोध क्यों करता? क्यों अपने से छोटी दलित जाति को लज्जित करता? जिस डॉ. आंबेडकर ने जाति तोड़ने पर किताब लिखी, वह जातियों के संगठन में क्यों जाते थे? क्योंकि वह यह मानते थे, जाति जब संगठित होकर तरक्की करेगी और बाकी जातियों के समान हो जाएगी, तो जाति का अस्तित्व वैसे ही कम हो जाएगा। यानी समस्या जाति में नहीं, बल्कि भेदभाव, ऊँच-नीच और असमानता में है।
भारत की संस्कृति ऐसी है, जिसमें हजारों संस्कृतियाँ आकर समा गईं और अपने अस्तित्व को खो दिया। कोई इसे गंगा-जमुनी तहजीब कहता है, तो कोई इसे सहिष्णुता कहता है। इसीलिए भारत को अनेक प्रकार के फूलों का गुलिस्ता कहा जाता है। और भारत का एक-एक व्यक्ति हर रंग से रंगा हुआ गुलदस्ता प्रतीत होता है। इस गुलदस्ते को सहेजने की जिम्मेदारी हमारी है। इसी को विभिन्नता में एकता भी कहते हैं। आप इसकी पहचान किसी एक रंग से कर ही नहीं सकते। एक रंग से पहचान करने वाले कितने आए और कितने चले गए, उनकी खुद की पहचान मिट गई। लेकिन इंद्रधनुष रंग-बिरंगा ही बना रहा।
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