Tuesday, March 22, 2011

हीरा डोम की कविता


प्रथम हिन्दी दलित कविता

हीरा डोम की कविता

हमनी के रात दिन दुखवा भोगत बानी
हमनी के सहेबे से मिनती कराइबी । 
हमनी के दुख भगवनवो न देखत जे
हमनी के कबले कलेसवा उठाइबी  
पदरी साहब की कचहरी में जाइबजा । 
बेधरम हो के अंगरेज बन जाइबी ॥ 
हाय राम धरम न हमसे छोड़त बाजे । 
बेशरम होके कहाँ मुहवाँ दिखाईबी ॥ 
खंभवा को फारी प्रह्लाद के बचवले जा । 
ग्राह के मुंह से गजराज के बचवले ॥ 
धोती जुरजोधना के भइया छोरत रहे । 
परगट होके तहां कपड़ा बढ़वले ॥
मारले खानवा के पत ले विभीखना के ।
कानी उंगली पे धैके पथरा उठाइबे ॥
कहाँ लो सुतल बाटे सुनत न बाटे अब ।
डोम जानी हमनी के छुए से डेरइले ॥ 
हमनी के इनरा के निगीचे ना जाइबजा ।
पांकि में से भरी भरी पियतानी पानी ॥
पनही से पीटी पीटी हाथ गोड़ तोड़ ले हों ।
हमनी के इतना काहेको हलकानी 
हमनी के रात दिन दुखवा भोगत बानी
हमनी के सहेबे से मिनती कराइबी...
(1913
में हंस में प्रकाशित)