Friday, August 26, 2011

अन्ना, क्या यह गांधी की भाषा है ?

कविता
अन्ना, क्या यह गांधी की भाषा है ?
भारत माँ की शान में,
बुर्जुग अन्ना बैठ गये है
रामलीला मैदान में।
अन्ना आपसे देश को
बहुत आशा है।
मिल रहा समर्थन भी,
अच्छा खासा है।
            
सिर पर गांधी टोपी पहने,
हाथ में लेकर झण्डा,
जय जयकारे लगा रहे है,
भ्रष्टों के कारनामे बांच रहे है
भ्रष्टाचार पर नाच रहे है,
क्या खूब
करप्शन उत्सव है !
कहा जा रहा है,
यह क्रान्ति है, यह विप्लव है।
गली गली से
रामलीला तक
`मैं अन्ना हूँ`
का अजब तमाशा है।
पर लेन देन ही भ्रष्टाचार है
लोकपाल  में करप्शन की
इतनी सीमित क्यों परिभाषा है ?
अन्ना आपसे देश को बहुत आशा है।
            
इस आन्दोलन से -
बरसों बाद लोग फिर जागे है।
गांधी के हत्यारे सबसे आगे है।
सिब्बल को वे `कुत्ता` कहते,
दिग्गी को वे `चूहा` मानते।
उनके लिये -
सोनिया भ्रष्टाचार की मम्मी है।
राजनीति को कहते, बहुत निकम्मी है।
वे सरकार को नंगा करेंगे,
नही तो जमकर पंगा करेंगे।
विरोधियो  को भेजेंेगे पागलखाने
फिर क्या होगा, रामजाने।
किरण जी ने कह दिया है-
अन्ना ही भारत है,
भारत है वो अन्ना है।कुछ भी कहते, कुछ भी बकते
ना ही रूकते, ना ही थकते।
मचा रखा एक शोर चारो ओर है,
जो अन्ना संग नहीं , वे सब चोर है।
बोलो गां धीवादिय़ॉ
क्या यह भाषा, गांधी की भाषा है ?
उत्तर दो अन्ना ,देश को जिज्ञासा है।
अन्ना आपसे देश को बहुत आशा है।
            
अब `से ` अन्ना `है
और है ` ` से ` अराजकता `
`` से आवारा भीड़ भी है
और है उसके खतरे भी,
आज अगर ये जीत जायेंगे
कल फिर से ये दिल्ली आयेंगे
दुगने जोर से चिल्लायेंगे
आरक्षण को खत्म करायेंगे
संविधान को नष्ट करायेंगे
लोकतंत्र की जगह
तानाशाही राज लायेंगे
फिर वो होगा, जिसकी हम को
सपने में भी नहीं आशा है।
जन मानस में बढ़ने
लगी हताशा है।
अन्ना आपसे देश को बहुत आशा है।
            
मगर निराश न हों
हताश न हों
उठो, देशवासियो ,
गरीब, गुरबों,
मजदूरों, किसानों
दलितों, आदिवासियों
जवाब दो
इस अराजक आवारा भीड़ को
कि कोई हमारे लोकतंत्र को
`बंधक` नहीं बना सकता
और अपनी शर्तों पर
डेमोक्रेसी को नहीं चला सकता।
हमें अपनी आजादी
अपना संविधान
अपना लोकतंत्र
और अपना मुल्क
बेहद प्यारा है जिसे एक ` हजारे ` ने नहीं `हजारो ने
लाखों और करोड ने
अपने खून, पसीने से संवारा है।
यह प्रण है हमारा -
हम `जनता` के नाम पर
असंवैधानिक आचरण चलने नहीं देंगे
`जनलोकपाल ` की आस्तीन में
`तानाशाही` के सांप को पलने नहीं देंगे।
            
हाँ, हम उठ खड़े होंगे
चीखेंगे और चिल्लायेंगे
कि हमें हमारा लोकतंत्र चाहिए
हमें हमारा सं विधान चाहिए
हमें हमारी आजादी चाहिए।
कि हम निर्भीक होकर
खुली हवा मे सांस लेना चाहते है,
हमंे मजबूर मत करो,
हमें पानी में चांद मत दिखाओं
जन लोकपाल के नाम पर मत भरमाओं,
हम जानते है
एक कानून नहीं बदल सकता है
देश की तकदीर
लोकपाल नहीं मिटा सकता है
भ्रष्टाचार
क्योंकि भ्र ष्टाचार तो
इन चतुर सयानों के दिमागों में है
इनकी वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा
और पुरातन संहिताओं में है।
हम उस भ्रष्टाचार से सदियों से सन्तप्त है
उसके अत्याचार, उत्पीड़न और अत्याचार से त्रस्त है
जिसमें लिप्त है सब।
            
और अन्ना आप भी,
कभी नहीं बोले -
छुआछूत पर,
दलितों पर हो रहे अत्याचारों
के विरूद्ध,
आदिवासियों के विस्थापन के खिलाफ,
क्यों चुप रहे
अन्ना आप ?
खैरलांजी पर, सिंगुर, नंदीग्राम,
पोस्को, जेतापुर
क्या क्या गिनाऊं
क्या यह भी कहूँकि आपके ही आदर्श गांव रालेगण सिद्धि में
दलितों को
क्यों नहीं मिल पाया सामाजिक न्याय
और आपके ही राज्य में
आत्महत्या करने वाले लाखों किसानों को,
क्यों नहीं बचा पाये ?
तीन साल की एक बच्ची
जो नहीं समझती
कि `जनलोकपाल` क्या है ?
और क्या है भ्र ष्टाचार ?
उसका तो अनशन तुड़वाकर
खूब बटोरे गये बाइटस मीडिया पर
लेकिन क्या
ग्यारह बरस से अनशन पर बैठी
पूर्वोत्तर की बेटी
इरोम शर्मिला चानू
आपको अपनी बेटी नहीं लगताी,
उसका अनशन कौन तुड़वायेगा,
इन सब पर कब सोचेंगे आप
मराणी मानुष राजठाकरे
और हजारो बेगुनाहों के
नरसंहार के साक्षी
नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा
से फुर्सत मिले,
तो जरा सोचना
इनके लिये भी,
क्योंकि अन्ना आपसे देश को बहुत आशा है।
- भँवर मेघवंशी
(डायमंड इंडिया के सम्पादक है
जिनसे -  -bhanwarmeghwanshi@gmail.com तथा मोबाइल -९४६०३२५९४८
पर सम्पर्क किया जा सकता है)

No comments:

Post a Comment

We are waiting for your feedback.
ये सामग्री आपको कैसी लगी अपनी राय अवश्य देवे, धन्यवाद