Wednesday, October 17, 2012

‎"पिंड दान" एक ब्राम्हणी पाखंड...

‎"पिंड दान" एक ब्राम्हणी पाखंड...
इन दिनों हिन्दू धर्म के अनुसार श्राद्ध या पितृपक्ष का महिना चल रहा है, इस महीने में हिन्दू कोई भी शुभ काम नहीं करते हैं शादी -व्याह करना , कपडे -गहने खरीदना आदि अशुभ माना जाता है. लोग अपने मरे हुए पूर्वजो (पितरो ) का आवाहन करते हैं , पिंडदान, तिलांजलि, दान और सिर्फ ब्राह्मणों को भोजन करवाना आदि कर्मकांड किये जाते हैं. पर क्या सच में श्राद्ध मरे हुए पितरो का ही किया जाता है? कहीं ऐसा तो नहीं की ब्राम्हण (जिसे सबसे ज्यादा फायदा होता है जैसे - भोजन , दान आदि ) ने श्राद्ध में मृत पितरो को पूजने का चलन अपने लाभ के लिए चलाया हो ?क्यों की मृत लोग तो भोजन और दान लेने तो आएंगे नहीं ....चलिए श्राद्ध का सच जानते हैं. श्राद्ध का अर्थ है सत्य का धारण करना अथवा जिसको श्रद्धा से धारण किया जाए ..श्रद्धापूर्वक मन में प्रतिष्ठा रखकर, विद्वान, अतिथि, माता-पिता, गुरु आदि की सेवा करने का नाम श्राद्ध है. श्राद्ध जीवित माता-पिता, आचार्य ,गुरु आदि पुरूषों का ही हो सकता है. मृतकों का नहीं. मृतकों का श्राद्ध तो पौराणिकों की लीला है..वैदिक युग में तो मृतक श्राद्ध का नाम भी नहीं था. मृतक के लिए बर्तन देने चाहिएँ और वे वहाँ पहुँच जाएँगे, मृतक का श्राद्ध होना चाहिए तथा इस प्रकार होना चाहिए और वहाँ पहुँच जाएगा ऐसा किसी भी वेदमंत्र में विधान नहीं है. पितर शब्द "पा रक्षेण" धातु से बनता है, अतः पितर का अर्थ पालक, पोषक, रक्षक तथा पिता होता है..जीवित माता-पिता ही रक्षण और पालन-पोषण कर सकते है.मरा हुआ दूसरों की रक्षा तो क्या करेगा उससे अपनी रक्षा भी नहीं हो सकती, अतः मृतकों को पितर मानना मिथ्या तथा भ्रममूलक और ढोंग, पाखंड है.

अब विचारणीय बात है यह है कि पितरों को भोजन किस प्रकार मिलेगा, भोजन वहाँ पहुँचता है या पितर लोग यहाँ करने आते है..यदि कहो कि वहीँ पहुँचता है तो प्रत्यक्ष के विरुद्ध है. क्योंकि तृप्ति सिर्फ ब्राह्मण की होती है.यदि भोजन पितरों को पहुँच जाता तब तो वह सैकड़ो घरों में भोजन कर सकता था. मान लो भोजन वहाँ जाता है तब प्रश्न यह है कि वही सामान पहुँचता है जो पंडित ब्राम्हणों को खिलाया जाता है या पितर जिस योनि में हो उसके अनुरूप मिलता है. यदि वही सामान मिलता हो और पितर चींटी हो तो दबकर मर जायेगी और यदि पितर हाथी हो तो उसको क्या असर होगा? यदि योनि के अनुसार मिलता है तब यदि पितर मर कर सूअर बन गया हो तो क्या उसको विष्ठा के रूप में भोजन मिलेगा? यह कितना अन्याय और अत्याचार है कि ब्राह्मणों को खीर और पूरी खिलानी पड़ती है और उसके बदले मिलता है मल. इस सिद्धांत के अनुसार श्राद्ध करने वालो को चाहिए कि ब्राह्मणों को कभी घास, कभी मांस, कभी कंकर-पत्थर आदि खिलाये क्योंकि चकोर का वही भोजन है. योनियाँ अनेक है और प्रत्येक का भोजन भिन्न-भिन्न होता है, अतः बदल-बदलकर खाना खिलाना चाहिए, क्योंकि पता नहीं पितर किस योनि में है.

कहते है श्राद्ध करने वाले का पिता पेट में बैठ कर, दादा बाँई कोख में बैठकर, परदादा दाँई कोख में बैठ कर और खाने वाला पीठ में बैठ कर भोजन करता है.
पौराणिकों, ब्राम्हणों... ! यह भोजन करने का क्या तरीका है? पहले पितर खाते है या ब्राह्मण? झूठा कौन खाता है? क्या पितर ब्राह्मण के मल और खून का भोजन करते है? एक बात और पितर शरीर सहित आते है या बिना शरीर के? यदि शरीर के साथ आते है तो पेट में उतनी जगह नहीं कि सब उसमे बैठ जाएँ और साथ ही आते किसी ने देखा भी नहीं अतः शरीर को छोड़ कर ही आते होंगे. पितरों के आने-जाने में ,भोजन परोसने में तथा खाने आदि में समय तो लगता ही है, अतः पितर वहाँ जो शरीर छोड़ कर आये है उसे भस्म कर दिया जाएगा,इस प्रकार सृष्टि बहुत जल्दी नष्ट हो जायेगी. मनुष्यों की आयु दो-तीन मास से अधिक नहीं होगी, जब क्वार का महिना आएगा तभी मृत्यु हो जायेगी, अतः श्राद्ध कदापि नहीं करना चाहिए.

इस प्रकार यह स्पष्ट सिद्ध है कि श्राद्ध जीवित माता -पिता का ही हो सकता है.. दयानंद सरस्वती का भी यही अटल सिद्धांत है..मृतक श्राद्ध अवैदिक और अशास्त्रीय है..यह तर्क से सिद्ध नहीं होता..यह स्वार्थी, टकापंथी और पौराणिकोंका ब्राम्हणों का मायाजाल है......................