Monday, March 31, 2014

स्त्री चेतना और गुलाबी गैंग



• संजीव खुदशाह

आज जब शहर की पढी लिखी महिलाएं अपना वक्त किटी पार्टी, बीसी पार्टी, रेव पार्टी और विभिन्न धार्मिक आयोजनों में बिताती है। तो वे इस भ्रम में जीती है की वे अतिआधुनिक और विकसित हो चुकी है। वे खुले विचार की है। लेकिन जब गुलाबी गैंग जैसे संगठनों के क्रिया कलापो से सामना होता है तो पता चलता है की वास्तविक स्त्री चेतना क्या है। ऐसी महिलाओं के लिए ये एक सीख लेकर आती है गुलाबी गैंग (फिल्म नही) जिसका जन्म बुदेलखंड बांदा के बीहडो में हुआ।

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर फेसबुक के एक मित्र ने मुझे एक स्टेटस टैग किया जिससे मै बहुत प्रभावित हुआ। उसका मसला कुछ इस तरह था “अंतराष्ट्रीय महिला दिवस स्पा डिस्काउंट, ब्युटीपार्लर, मात्रत्व, स्त्रीत्व के लिए नही मनाया जाता बल्कि इतिहास में इन सब के विरूद्ध हुए संघर्ष को याद करने के लिए मनाया जाता है।“ कितना अंतर है वास्तविक महिला चेतना और उसके भ्रम में। पुरूष को खुश करने की तैयारी में दिन के 24 में से 22 घंटे खर्च करने वाली महिला क्या वास्तविक महिला चेतना से बा वास्ता है। आज की धार्मिक, व्यावसायिक एवं मीडिया व्यवस्था ने स्त्री चेतना को सुंदर, अतिसुंदर, नरम, कोमल नाम के डिब्बे में बंद कर दिया है। आज की आधुनिक चेतन शील स्त्री वही मानी जाती है जो ज्यादा से ज्यादा समय ब्युटीपार्लर में देती है। महिला संगठन में पुरूष के खिलाफ लंबे भाषण दे सकती है।

विज्ञापन के रूप में किन्हे बढावा दिया जाता है? विज्ञापन में वास्तविक नायिकाये कहां है कल्पना चावला, मलाला, उर्मिला सिरोम, किरन बेदी कहीं नजर नही आती। नजर आती है तो सिर्फ सनी लियोन सहित वे फिल्मी अभिनेत्रियां जिन्होंने स्त्री चेतना को कमजोर ही किया है। दुखद तथ्य है कि सरकारी विज्ञापन भी इसी राह पर चलते है।

हाल ही में रिलीज हुई मूवी गुलाब गैंग इन दिनों काफी चर्चा में है। इस फिल्म के बहाने मै इस गैंग पर चर्चा करने का मजबूर हुआ। गुलाबी गैंग के जन्म की कहानी कुछ इस प्रकार है--

गुलाबी गैंग की संस्थापक सदस्य संपत पाल का जन्म वर्ष 1960 में बांदा के बैसकी गांव के एक पिछड़े परिवार में हुआ। 12 साल की उम्र में एक सब्ज़ी बेचने वाले से शादी हो गई थी। शादी के चार साल बाद गौना होने के बाद संपत अपने ससुराल चित्र कूट ज़िले के रौलीपुर-कल्याणपुर आ गई थी।

उनका सामाजिक सफ़र तब शुरु हुआ जब उन्होंने गांव के एक दलित परिवार को अपने घर से पानी पीने के लिए दिया, जिस कारण उन्हें गांव से निकाल दिया गया, लेकिन संपत कमज़ोर नहीं पड़ी और गांव छोड़ परिवार के साथ बांदा के कैरी गांव में आ बसी।

संपत कहती है, क़रीब दस साल पहले जब उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ उसके पति को मार-पीट करते हुए देखा तो उन्होंने उसे रोकने की कोशिश की और तब उस व्यक्ति ने इसे अपना पारिवारिक मामला बता कर उन्हें बीच-बचाव करने से रोक दिया था।

इस घटना के बाद संपत ने पांच महिलाओं को एकजुट कर उस व्यक्ति को खेतों में पीट डाला और यहीं से उनके 'गुलाबी गैंग' की नींव रखी गई। गुलाबी गैंग ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, जहां कहीं भी उन्होंने किसी तरह की ज़्यादती होते देखी तो वहां दल-बल के साथ पहुंच गईं और ग़रीबों, औरतों, पिछड़ों, पीड़ितों, बेरोज़गारों के लिए लड़ाई लड़नी शुरु कर दी.

स्थानीय लोग कहते हैं,''संपत ना तो कभी पुलिस-प्रशासन के सामने झुकीं ना ही उन्होंने कभी इलाक़े के दस्यु सरगनाओं के आगे हथियार डाले.'' वर्ष 2006 में संपत एक बार फिर चर्चा में आईं जब उन्होंने दुराचार के एक मामले में अतर्रा के तत्कालीन थानाध्यक्ष को बंधक बना लिया था। मऊ थाने में अवैध खनन के आरोप में पकड़े गए मज़दूरों को छोड़ने की मांग को लेकर तहसील परिसर में धरने पर बैठी गुलाबी गैंग की महिलाओं पर जब पुलिस ने बल प्रयोग किया तब गुलाबी गैंग की महिलाओं ने एसडीएम और सीओ को दौड़ा-दौड़ा कर ना सिर्फ मारा बल्कि उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया। इन घटनाओं के बाद राज्य के पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह ने गुलाबी गैंग को नक्सली संगठन करार देते हुए संपत पाल सहित कई महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन तब तक संपत काफ़ी आगे निकल चुकीं थी।

गुलाबी साड़ी पहनने वाली महिलाओं का गुलाबी गैंग, यूपी की सपा सरकार के खिलाफ बुंदेलखंड में एक अनोखा महिला आंदोलन चला रहा है। इस गैंग में 10 हजार से ज्यादा महिलाएं हैं। ये महिलाएं अपने साथ डंडा और रस्सी लेकर चलती हैं।

बुंदेलखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में फैला हुआ बेहद पिछड़ा और अपेक्षित अंचल है। पिछले 5 सालों से यहां भयंकर सूखा पड़ रहा है। बड़ी तादाद में यहां किसान आत्महत्याएँ कर रहे हैं। रोजी-रोटी की तलाश में गांवों से सामूहिक पलायन हो रहा है। इस पृष्ठभूमि में गुलाबी गैंग का जन्म हुआ। गैंग की कमांडर संपत देवी कहती हैं कि बुंदेलखंड के सात जन पदों झांसी, बांदा, चित्रकूट, महोबा, ललितपुर, हमीरपुर और जालौन के गाँवों में किसानों और खेत मज़दूरों की हालत बहुत बुरी है। उस पर दुर्भाग्य यह है कि केंद्र सरकार की सामाजिक सुरक्षा के तहत चलाई जाने वाली विभिन्न योजनाओं का लाभ यूपी की राज्य सरकार आम आदमियों तक नहीं पहुंचने दे रही।

आज जहां गांधी गिरी अन्नागिरी फेल हो रही है, वहीं गुलाबी गैंग की महिलाओं के काम करने का तरीका बड़ा ही मौलिक और अनोखा है। मगर वास्तविक जीवन में कठिन संघर्ष करने वाले इस गुलाबी गैंग का नाम अभी बुंदेलखंड के बाहर कम ही जाना जाता है। 

महिला उत्पीड़न, दहेज़ प्रथा, बाल विवाह, जैसे कई मोर्चों के साथ भ्रष्टाचार से लड़ रहे गुलाबी गैंग को कई बार पुलिस के दमन का भी मुकाबला करना पड़ा है। गुलाबी गैंग जब किसी बड़े अधिकारी के खिलाफ आंदोलन चलाता है तो पुलिस हर गुलाबी साड़ी वाली महिला की गिरफ्तारी में जुट जाती है। ऐसे में इलाके की महिलाएं गुलाबी साड़ी पहनने से बचने लगती हैं। वहीं दूसरा पहलू यह है कि जब किसी महिला का किसी सरकारी दफ्तर में कोई काम अटका होता है तो वह गुलाबी साड़ी पहनकर दफ्तर चली जाती है और उसका काम हो जाता है।

गुलाबी गैंग का धरना-प्रदर्शन का अपना तरीका है। गैंग की मेंबर काम न करने वाले अधिकारी के दफ्तर में घुस जाती है और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लेती हैं। पहले एक-दो घंटे चुपचाप बैठी रहती हैं। अगर तब भी वह काम नहीं करता है, तो फिर उसके टेबल पर तब तक मुक्के बरसाए जाते हैं, जब तक कि वह हाथ जोड़कर माफी नहीं मांगने लगता। दफ्तर के बाहर उनका स्टाइल यह होता है कि अधिकारी को गाड़ी से उतार कर पैदल चलवाया जाता है।

वर्ष 2011 में अंतरराष्ट्रीय 'द गार्जियन' पत्रिका ने गुलाबी गैंग की कमांडर संपत पाल को दुनिया की सौ प्रभावशाली प्रेरक महिलाओं की सूची में शामिल किया, कई संस्थाओं ने गैंग पर डॉक्यूमेंटरी फिल्में तक बना डाली. गुलाब गैंग की नेत्रियों ने फ्रांस की ओह पत्रिका में जगह बनाई, और अंतरराष्ट्रीय महिला संगठनों द्वारा आयोजित महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम में भाग लेने पेरिस और इटली भी जा चुकी है।

मीडिया की सुर्खियों मे आने के बाद गुलाबी गैंग किसी षड.यंत्र का शिकार हो गई। उसकी जङे कमजोर हुई है। लेकिन बुंदेलखण्ड में इनकी सक्रियता आज भी देखी जा सकती है। आज शहरी शिक्षित महिलाओं को इन अशिक्षित ग्रामीण महिलाओं से सीखने की जरूरत है। गुलाबी गैंग भले ही उन रीति रिवाज़ों, धार्मिक क्रिया कलापों को तोड़ने का कभी प्रयास नही करती जो स्त्री के सम्मान के विरूद्ध है। लेकिन उनकी एक जुटता और साहस क़ाबिले तारीफ है।

ये चुनौती आज महिला संगठनों के सामने सीना ताने खड़ी है कि क्या कभी स्त्री उन धार्मिक रीति रिवाजों के विरूद्ध खड़ी हो सकेगी जो उसे हलाला, इद्दत की मुद्दत के लिए बाध्य करती तो कभी ढोर गवार का दर्जा देती ? क्या कभी उन बंधनों को तोङ सकेगी जो उसे एक दान की वस्तु समझते है ? क्या कभी ऐसे ग्रंन्थों की होली जलायेगी जो उसे नरक का द्वार कहती, सती प्रथा, कन्या वध प्रथा, भ्रूण हत्या करने को उकसाती ? क्या ऐसे नायकों की पूजा करने से मना करेगी जो गर्भवती स्त्री को घर से निकालना आदर्श समझता हो ? अक्सर ऐसा देखा जाता है। स्त्री उन्ही कुरितियों की जङे सींचती आई है जो उसे बेङियों में जकङती है। दरअसल स्त्रियों की पहली लङाई अपने आप से है।

मेरा मानना है स्त्री चेतना सही मायने में तब शिखर पर पहुँचेगी जब वह इन चुनौतियों के विरूद्ध खड़ी होकर संघर्ष करेगी। क्योंकि यही स्त्री शोषण की जन्म स्थली है।