Thursday, March 30, 2017

ईवीएम में गड़बड़ी है या दिमाग मे?

ईवीएम में गड़बड़ी है या दिमाग मे?
संजीव खुदशाह
जिसके दिमाग में गड़बड़ी है वह समझते हैं गड़बड़ी ईवीएम में है bsp और sp की करारी हार के बाद इन दोनों पार्टियों समर्थक यह पोस्ट सोशल मीडिया में फैला रहे हैं कि भाजपा की जीत नहीं है जीत ई वी एम की हुई है। मायावती  के द्वारा  इलेक्शन कमिश्नर को इस संबंध में बाकायदा एक शिकायत भी पेश किया गया है। दरअसल ऐसा कहने वाले लोग दो प्रकार के हैं
1) वे लोग जो चुनाव प्रणाली के बारे में अच्छे से नहीं जानते हैं दूसरा वह लोग ,
1) जो अपनी नाकामी को ईवीएम के सर मढ़ना चाहते हैं।

चलो ठीक है यदि उनकी बात पर यकीन कर भी लें कि  EVM गड़बड़ था इसमें बीएसपी को वोट देने पर बीजेपी को वोट चला जाता है तो वही बीजेपी पंजाब, मणिपुर और गोवा में पीछे क्यों रह गई? बिहार और दिल्ली में उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?
 यह बात तो तय है कि जिस प्रकार बैलेट पेपर द्वारा चुनाव में गड़बड़ी की गुंजाइश रहती है, उसी प्रकार EVM में भी गड़बड़ी के जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन वे लोग जो चुनावी प्रक्रिया के जानकार हैं वह  समझ सकते हैं कि यदि ऐसी गड़बड़ी रह गई है, तो यह गड़बड़ी बिना हारने वाली पार्टी के सहयोग के संभव नहीं है।
आइए मैं बताता हूं कि चुनाव में ईवीएम का प्रयोग किस प्रकार किया जाता है।
 (पहला) चुनाव के 2 माह पूर्व ईवीएम की तकनीकी जांच की जाती है यह ठीक काम कर रहा है कि नहीं, इस बारे में इंजीनियर इसकी जांच करते हैं 
(दूसरा) जांच में ठीक पाए जाने पर इसे बूथ में ले जाने हेतु तैयार किया जाता है जैसे बैटरी बैकअप, उम्मीदवार की सूची, टेकिंग आदि 
(तीसरा) मतदान के दिन बूथ में मतदान होने के ठीक पहले इसकी मॉक वोटिंग कराई जाती है जिसमें प्रत्येक राजनीतिक पार्टी के अधिकृत प्रतिनिधि जिन्हें रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा मतदान केंद्र में बैठने की अनुमति दी जाती है यह व्यक्ति उस पार्टी का या उम्मीदवार विशेष का कार्यकर्ता होता है ।
आइए जाने मांक कटिंग क्या है?
माक वोटिंग दरअसल वोटिंग या मत मतदान का पूर्वाभ्यास है। सभी पार्टी या उम्मीदवार के द्वारा अधिकृत कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में मॉक वोटिंग कराई जाती है। जिसमें प्रीसाइडिंग ऑफिसर द्वारा EVM को चालू करके सभी अधिकृत कार्यकर्ताओं या उम्मीदवार द्वारा वोट डलवाया जाता हैं एवं उनको वोट काउंटिंग करके बताया जाता है। यानि किसी उम्मीदवार को 2 वोट डाले गए किसी को 1 या 4 तो तदनुसार रिजल्ट आ रहा है या नहीं इसकी जांच उक्त कार्यकर्ता द्वारा कराई जाती है। सही पाए जाने पर ही वोटिंग प्रक्रिया चालू की जाती है। इसके पहले इनके सभी वोट शून्य कर दिए जाते हैं, उनसे मशीन ठीक होने का प्रमाण पत्र लिया जाता है एवं सील पैक कर दिया जाता है जिसमें इन अधिकृत कार्यकर्ताओं के दस्तखत होते हैं और  पूरी मतदान के दौरान यह कार्यकर्ता कक्ष में उपस्थित रहते हैं। ताकि गलती या अन्य किसी गड़बड़ी को रोका जा सके। मतदान पूर्ण होने के बाद ई वी एम को लॉक कर दिया जाता है जिसमें फिर से सील पैक कर इन कार्यकर्ताओं के हस्ताक्षर लिए जाते हैं। तत्पश्चात स्ट्रांगरूम में ईवीएम को रख दिया जाता है। इ वी एम मतगणना दिनांक तक इसी स स्ट्रांगरूम में सुरक्षित रहता है। सुरक्षा के दृष्टिकोण से इस स्ट्रांगरूम को सैनिक छावनी में तब्दील कर दिया जाता है, जिसमें इन अधिकृत कार्यकर्ताओं की मौजूदगी रहती है। ताकि कोई राजनीतिक दल या उम्मीदवार गड़बड़ी ना कर सके।
मतगणना के समय इ वी एम को इन्ही कार्यकर्ताओं से पुष्टि की जाती है की इसके शील एवं दस्तखत ठीक है या नहीं । इत्मीनान कराया जाता है कि इ वी एम से कोई छेड़छाड़ तो नहीं हुई।  इसके बाद ही इवीएम की काउंटिंग शुरू की जाती है यह सारी प्रक्रिया उम्मीदवार और उसके कार्यकर्ताओं की देखरेख में होता है।
अब आप ही बताइए क्या इस प्रक्रिया में गड़बड़ी किया जाना संभव है? जब तक की अन्य दल इससे सहमत ना हो।
दरअसल ईवीएम में गड़बड़ी है ऐसा कहने वाले लोग इस हार को, जनता के आदेश को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, हार को स्वीकार नहीं करने के कारण वे अपनी कमजोरियों और गलतियों की समीक्षा भी नहीं कर पा रहे हैं जोकि राजनीतिक दल के लिए बेहद जरूरी है।
यह बताना बेहद जरूरी है कि आज की जनता जाग चुकी है। आम जनता को आपका काम चाहिए अपना उत्थान चाहिए। सिर्फ भय दिखा कर उनके वोट नहीं ले जा सकते। एक ओर जनता गुंडाराज, जाति-पाति से परेशान हैं तो दूसरी ओर हिटलर शाही, खुद की मूर्ति राज से परेशान। पार्टी का नाम समाजवादी होने मात्र से जनता आकर्षित नहीं होती। नाही बहुजन का नाम होने से बहुजन आकर्षित होता है। अंबेडकर का नाम लेने मात्र से लोग आप को वोट देने लगेंगे इस भ्रम से निकलना होगा। इसी भ्रम में पढ़े लोग जो जातिगत वोट पर अपना पुश्तैनी अधिकार समझते हैं। वही अपने हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
यह प्रश्न मुह बाय खड़ा है कि मायावती के मुख्यमंत्री कार्यकाल में दलितों आदिवासियों का कितना जीडीपी रेट बढ़ा, उनके लिए कितनी आवास या शिक्षा हेतु प्रबंध किए गए? कौन-कौन सी जातियों या उनके समूह का विकास हुआ? अंबेडकर के सिद्धांत को कितना अमल किया गया कितना पैरों तले रौंदा गया? और इन योजनाओं के बरअक्स आंकड़े क्या कहते हैं?
बहुत से लोगों का यह आरोप है कि मायावती के हारने पर लोग की कमियां गिना आ रहे हैं दरअसल जो लोग कमियां की गिना  रहे हैं, ये वही लोग हैं जो उन्हें जीतते हुए देखना चाहते थे। आज उनके कार्यकर्ता उनके आलोचकों पर अमर्यादित व्यवहार कर रहे हैं ।
जनता के सम्मान के लिए यह बेहद जरूरी है कि आप उनके आदेश को स्वीकार करें। क्योंकि यह वही जनता है जो आप को एक बार मौका देकर आजमा चुकी है। लंबे राजनीतिक भविष्य के लिए जनता के आदेश का सम्मान एवं आत्म विवेचना बेहद जरूरी है। ऐसे समय में आलोचक आपके सबसे हितैषी साथी हैं।
 इस लोकतंत्र में जिसने भी जनता को मूर्ख समझा वह इसी प्रकार धोखा खाया है कम से कम इतिहास तो यही सिखाता है।