Thursday, March 30, 2017

भगवा की जीत के और मायावती की हार के कारण

भगवा की जीत के और मायावती की हार के कारण

(कँवल भारती)
      इस बार उत्तर प्रदेश में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने स्वयं भाजपा का रास्ता साफ़ किया था. इसलिए अब जब वह अति पिछड़ी और अति दलित जातियों के बल पर प्रचंड बहुमत से सत्ता में आ गयी है और योगी युग का आगाज़ हो चुका है, तब विपक्ष का आरोप है कि दलितों और मुसलमानों के लिए बुरे दिन आने वाले हैं, कह तो ऐसे रहे हैं, जैसे उनके राज में अच्छे दिन चल रहे थे. मायावती, मुलायम और अखिलेश के युग में मुसलमानों और दलितों के नहीं, बल्कि उनके दलालों के अच्छे दिन आये थे. मुसलमानों और दलितों की राजनीति करके उनके उन तथाकथित नेताओं ने अपने साम्राज्य खड़े कर लिए. मुलायम और अखिलेश ने दलितों और मुसलमानों के मुहल्लों में भी झांककर नहीं देखा कि वे किस हाल में हैं? वे अपनी पार्टी के दलित-मुस्लिम नेताओं की खुशी को ही दलितों और मुसलमानों की खुशी समझते रहे. आजम खां ने जो चाहा, और जितना चाहा, मुलायम और अखिलेश ने उन्हें दिया, वगैर यह सोचे हुए कि वह अपना विकास कर रहे हैं या मुसलमानों का? सबसे ज्यादा जुल्म सपा सरकार में मुसलमानों पर ही हुए. अल्पसंख्यक और मलिन बस्तियों के विकास के लिए अल्पसंख्यक विभाग का अधिकांश धन रामपुर में पाश और आवास विकास की कालोनियों में खर्च हुआ. यकीन न हो, तो वहाँ लगे उद्घाटन के पत्थर देखे जा सकते हैं. ‘काम बोलता है’ का ढिढोरा पीटने वाले अखिलेश ने कभी जाकर देखा कि मुसलमानों और दलितों के इलाकों में क्या सचमुच विकास हुआ है? संभल में स्टेशन से सोतीपुरा को जाने वाली सड़क इन पांच सालों में भी इसलिए नहीं बनी, क्योंकि वहाँ जाटवों की बस्ती है. कौन से विकास पर वे जीतना चाहते थे, एक्सप्रेस-वे और मेट्रो के बल पर? इस विकास पर तो लखनऊ के लोगों ने ही उन्हें नकार दिया.
      कोई सिर पर लाल टोपी रखने भर से समाजवादी नहीं हो जाता और न प्रो-मुस्लिम होने से कोई धर्मनिरपेक्षतावादी हो जाता है. समाजवादी वह है, जो आर्थिक समानता लाने के लिए काम करता है, और यह समानता मोबाइल या लेपटॉप बांटने से नहीं आती है. धर्मनिरपेक्षतावादी वह है, जो धर्म मात्र से निरपेक्ष होता है. इस अर्थ में तीन तलाक पर मुस्लिम कट्टरपंथियों का पक्ष लेने वाले समाजवादी और बहुजनवादी भी उसी तरह धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं, जिस तरह तस्लीमा नसरीन को निर्वासन के लिए मजबूर करने वाले कम्युनिस्ट धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं. जब रोम जल रहा था, तो नीरो बंशी बजा रहा था. और जब उत्तरप्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों की आग में जल रहा था, तो मुलायम, अखिलेश और उनका समाजवादी कुनबा सैफई में जश्न मना रहा था. आज इन्हें मुसलमानों की चिंता हो रही है, पर इनके राज में ही मुसलमान सबसे ज्यादा दंगों की भेंट चढ़े हैं.
      आज मायावती कह रही हैं कि आरएसएस योगी को आगे करके हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने वाली है. इस पर हंसा जाए या सिर धुना जाए? मायावती को आरएसएस का एजेंडा अब पता चला है? भाजपा के समर्थन से तीन बार मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती आरएसएस के एजेंडे से इतनी अनजान कैसे हो सकती हैं? क्या उन्हें नहीं मालूम कि आरएसएस की सहमति  से ही भाजपा ने उन्हें समर्थन दिया था? क्या उन्हें नहीं मालूम कि शिक्षा और संस्कृति की सारी संस्थाओं की बागडोर उन्होंने अपने राज में भाजपा को ही सौंपी थी? तब क्या वहाँ उन्हें आरएसएस का लागू होता हुआ एजेंडा दिखाई नहीं दे रहा था? क्या वह यह भी भूल गयीं कि गुजरात दंगों के बाद वह मोदी जी के लिए गुजरात में दलितों से वोट मांगने गयीं थीं? तब उनके राजनीतिक गुरु कांशीराम जी जीवित थे, और उन्होंने भाजपा को एक ‘गैर-साम्प्रदायिक’ पार्टी बताया था. तब उन्हें इसका अन्दाजा क्यों नहीं हुआ था कि जो हिंदुत्व उन्हें मुख्यमंत्री बना रहा है, उनकी पार्टी के लिए उसका भविष्य क्या होगा? अगर उस समय हिंदुत्व उन्हें अच्छा लग रहा था, तो आज वह कैसे बुरा हो गया? क्या इसलिए कि उनकी बोई हुई फसल से आज हार के फल मिले हैं? आज वह 19 सीटों पर सिमट कर रह गयीं. पर अब मैं यह नहीं कहूँगा कि अगर वह 80-90 सीटें पा जातीं, तो भाजपा से समझौता नहीं करतीं, क्योंकि वह पहले ही घोषणा कर चुकीं थीं कि किसी से समझौता नहीं करेंगी. पर, जनता यह भी जानती है कि राजनीति में दिखाने और खाने के दांत अलग-अलग होते हैं.
      मायावती ने कभी भी यह अनुभव नहीं किया कि आरएसएस ने उनके शासन-काल में ही दलितों और पिछडों का हिन्दूकरण करने का अभियान शुरू किया था, क्योंकि वह स्वयं भी ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ का नारा देकर बहुजनों का हिन्दूकरण कर रहीं थीं. सच तो यह है कि मायावती और आरएसएस दोनों ने मिलकर बहुजनों का हिन्दूकरण किया. ऐसा नहीं है कि इस हिन्दूकरण की धारा में केवल गैर-जाटव दलित ही बहे हैं, जाटव भी खूब बहे हैं, सिवाए उनके, जिन पर बुद्ध और अम्बेडकर का रंग चढ़ चुका है.
मायावती की यह आखिरी पारी थी, जिसमें उनकी शर्मनाक हार हुई है. 19 सीटों पर सिमट कर उन्होंने अपनी पार्टी का अस्तित्व तो बचा लिया है, परन्तु अब उनका खेल खत्म ही समझो. मायावती ने अपनी यह स्थिति अपने आप पैदा की है. मुसलमानों को सौ टिकट देकर एक तरह से उन्होंने भाजपा की झोली में ही सौ सीटें डाल दी थीं. रही-सही कसर उन्होंने चुनाव रैलियों में पूरी कर दी, जिनमें उनका सारा फोकस मुसलमानों को ही अपनी ओर मोड़ने में लगा  रहा था. उन्होंने जनहित के किसी मुद्दे पर कभी कोई फोकस नहीं किया. तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह आज तक जननेता नहीं बन सकीं. आज भी वह लिखा हुआ भाषण ही पढ़ती हैं. जनता से सीधे संवाद करने का जो जरूरी गुण एक नेता में होना चाहिए, वह उनमें नहीं है. हारने के बाद भी उन्होंने अपनी कमियां नहीं देखीं, बल्कि अपनी हार का ठीकरा वोटिंग मशीन पर फोड़ दिया. ऐसी नेता को क्या समझाया जाय! अगर वोटिंग मशीन पर उनके आरोप को मान भी लिया जाए, तो उनकी 19 सीटें कैसे आ गयीं, और सपा-कांग्रेस को 54 सीटें कैसे मिल गयीं? अपनी नाकामी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ना आसान है, पर अपनी कमियों को पहिचानना उतना ही मुश्किल.
अब इसे क्या कहा जाए कि वह केवल टिकट बांटने की रणनीति को ही सोशल इंजिनियरिंग कहती हैं. यह कितनी हास्यास्पद व्याख्या है सोशल इंजिनियरिंग की. उनके दिमाग से यह फितूर अभी तक नहीं निकला है कि 2007 के चुनाव में इसी सोशल इंजिनियरिंग ने उन्हें बहुमत दिलाया था. जबकि वास्तविकता यह थी कि उस समय कांग्रेस और भाजपा के हाशिए पर चले जाने के कारण सवर्ण वर्ग को सत्ता में आने के लिए किसी क्षेत्रीय दल के सहारे की जरूरत थी, और यह सहारा उसे बसपा में दिखाई दिया था. यह शुद्ध राजनीतिक अवसरवादिता थी, सोशल इंजिनियरिंग नहीं थी. अब जब भाजपा हाशिए से बाहर आ गयी है और 2014 में शानदार तरीके से उसकी केन्द्र में वापसी हो गयी है, तो सवर्ण वर्ग को किसी अन्य सहारे की जरूरत नहीं रह गयी, बल्कि कांग्रेस का सवर्ण वोट भी भाजपा में शामिल हो गया. लेकिन मायावती हैं कि अभी तक तथाकथित सोशल इंजिनियरिंग की ही गफलत में जी रही हैं, जबकि सच्चाई यह भी है कि मरणासन्न भाजपा को संजीवनी देने का काम भी मायावती ने ही किया था. उसी 2007 की सोशल इंजिनियरिंग की बसपा सरकार में भाजपा ने अपनी संभावनाओं का आधार मजबूत किया था.
मुझे तो यह विडम्बना ही लगती है कि जो बहुजन राजनीति कभी खड़ी ही नहीं हुई, कांशीराम और मायावती को उसका नायक बताया जाता है. केवल बहुजन नाम रख देने से बहुजन राजनीति नहीं हो जाती. उत्तर भारत में बहुजन आंदोलन और वैचारिकी का जो उद्भव और विकास साठ और सत्तर के दशक में हुआ था, उसे राजनीति में रिपब्लिकन पार्टी ने आगे बढ़ाया था. उससे कांग्रेस इतनी भयभीत हो गयी थी कि उसने अपनी शातिर चालों से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए और वह खत्म हो गयी.  उसके बाद कांशीराम आये, जिन्होंने बहुजन के नाम पर जाति की राजनीति का माडल खड़ा किया. वह डा. आंबेडकर की उस चेतावनी को भूल गए कि जाति के आधार पर कोई भी निर्माण ज्यादा दिनों तक टिका नहीं रह सकता. बसपा की राजनीति कभी भी बहुजन की राजनीति नहीं रही. बहुजन की राजनीति के केन्द्र में शोषित समाज होता है, उसकी सामाजिक और आर्थिक नीतियां समाजवादी होती हैं, पर, मायावती ने अपने तीनों शासन काल में सार्वजानिक क्षेत्र की इकाइयों को बेचा और निजी इकाइयों को प्रोत्साहित किया. उत्पीडन के मुद्दों पर कभी कोई आन्दोलन नहीं चलाया, यहाँ तक कि रोहित वेमुला, कन्हैया कुमार और जिग्नेश भाई के प्रकरण में भी पूरी उपेक्षा बरती, जबकि ये ऐसे मुद्दे थे, जो उत्तर प्रदेश में बहुजन वैचारिकी को मजबूत कर सकते थे.
इन चुनावों में मायावती को मुसलमानों पर भरोसा था, पर मुसलमानों ने उन पर भरोसा नहीं किया, जिसका कारण भाजपा के साथ उनके तीन-तीन गठबंधनों का अतीत है. उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मात्र 4 और पूर्वी उत्तर प्रदेश से मात्र 2 सीटें मिली हैं, जिसका मतलब है कि उनके जाटव वोट में भी सेंध लगी है. मायावती की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह जमीन की राजनीति से दूर रहती हैं. न वह जमीन से जुड़ती हैं और न उनकी पार्टी में जमीनी नेता हैं. एक सामाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलन का कोई मंच भी उन्होंने अपनी पार्टी के साथ नहीं बनाया है. यह इसी का परिणाम है कि वह बहुजन समाज के हिन्दूकरण को नहीं रोक सकीं. इसी हिन्दूकरण ने लोकसभा में उनका सफाया किया और यही हिन्दूकरण उनकी वर्तमान हार का भी बड़ा कारण है.
मायावती की इससे भी बड़ी कमी यह है कि वह नेतृत्व नहीं उभारतीं. हाशिए के लोगों की राजनीतिक भागीदारी जरूरी है, पर उससे ज्यादा जरूरी है उनमें नेतृत्व पैदा करना, जो वह नहीं करतीं. इसलिए उनके पास एक भी स्टार नेता नहीं है. इस मामले में वह सपा से भी फिसड्डी हैं.
 मायावती के भक्तों को यह बात बुरी लग सकती है, पर मैं जरूर कहूँगा कि अगर उन्होंने नयी लीडरशिप पैदा नहीं की, वर्गीय बहुजन राजनीति का माडल खड़ा नहीं किया और देश के प्रखर बहुजन बुद्धिजीवियों और आन्दोलन से जुड़े लोगों से संवाद कायम करके उनको अपने साथ नहीं लिया, तो वे 11 मार्च 2017 की तारीख को बसपा के अंत के रूप में अपनी डायरी में दर्ज कर लें.
(11 मार्च 2017)