क्या बौद्ध आंदोलन अपने मुख्य लक्ष्य से भटक गया है?


दिनांक 24 दिसंबर 2017 को रायपुर से 95 किलोमीटर दूर महासमुंद जिले के सिरपुर प्राचीन बौद्ध शहर में आयोजित होने वाले तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन में शामिल होने का मौका मिला। इस कार्यक्रम में आयोजको की मेहनत उनका लगन देखते बन रहा था। लेकिन उन्हें जिस प्रकार से लोगों का सहयोग मिलना चाहिए था वह नहीं मिला। रविवार होने के बावजूद सम्मेलन में ज्यादातर चेयर खाली थी ऐसा लग रहा था कि प्रचार में कुछ कमी रह गई या प्रचार किसी खास कुनबे तक सीमित था। खुद इन पंक्तियों के लेखक को तीन दिन पहले ही ऐसे किसी सम्‍मेलन हाने का पता चला।  नाम भले ही अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन रखा गया था लेकिन देश के नामचीन बौद्ध प्रचारक जो खास तौर पर साहित्य और विभिन्‍न माध्‍यमों से धम्‍म का प्रसार कर रहे हैं और देश भर में दौरा कर रहे हैं। वे लोग इस कार्यक्रम में नदारत थे। वजह जो भी हो लेकिन यह सम्मेलन अधूरा सा प्रतीत हो रहा था।
जो लोग छत्तीसगढ़ के आसपास के जिलो से आए है वह सिरपुर के खुदाई से निकले बौद्ध स्थल का मुआयना करने में लगे हुए थे। शायद कुर्सी खाली रहने का यह भी एक कारण था। वैसे श्रीलंका समेत आस पास के अन्य देशो से भी वक्तागण आए हुए थे (जिनका अस्‍थाई ठिकाना वर्तमान में भारत ही है) और अपना वक्तव्य दे रहे थे। एक सिख वक्ता अपने वक्तव्य में तमाम धर्मो की जिस प्रकार तारीफे कर रहे थे और यह निष्कर्ष निकाल रहे थे कि कोई भी धर्म बुरा नहीं है। आश्चर्य होता है कि कोई व्यक्ति ऐसा अर्तराष्ट्रिय बौद्ध सम्मेलन में कह रहा है। जबकि 25 दिसंबर को मनुस्‍मृति दहन दिवस है। निश्चित तौर पर आयोजको द्वारा इसकी तैयारी नहीं की गई होगी ना ही वक्ताओ से आलेख मंगवाया गया होगा। तभी ऐसी त्रुटियां रह गई क्योंकि यह कार्यक्रम सर्वधर्म सम्‍मेलन तो नही था जबकि बौद्ध धम्‍म ईश्वर एवं पैगंबर विहीन धर्म है। जो वैज्ञानिक विचारधारा को बढ़ाता है। यदि ऐसे मंच से कोई व्यक्ति उच्च-नीच बढ़ाने वाले महिलाओं का शोषण करने वाले की तारीफ कर रहा है तो यहां एक दुर्भाग्य कि तरह है।
बौद्ध आंदोलन अपने मुख्य लक्ष्य से भटक गया है

बौद्ध आंदोलन या बौद्ध प्रचार का मुख्य मकसद बौद्धों की जनसंख्या में बढ़ोतरी करना या बौद्ध धर्म में प्रवेश करने हेतु धमकी देना रह गया है। दूसरा मकसद चंदे की उगाही है. बाद में बिना ऑडिट किये हिसाब देना फेमस रिवाज है. समाजिक बुराईयों से मुक्‍त जातिविहीन वर्गविहीन समतामूलक समाज निर्माण का मकसद कहीं पीछे छूट गया है और ऐसा अंधविश्वास से मुक्ति और वैज्ञानिक विचारधारा की ओर जाने पर ही हो पाएगा। लेकिन बौद्ध सम्‍मेलनों में जातिविहीन, समतामूलक समाज बनाने के लिए कोई प्रयास दिखाई नहीं पड़ते हैं। इस कारण बौद्धिस्ट किसी खास जातियों या वर्गों तक सीमित दिखाई पड़ते हैं और इनके बीच जातियां उसी प्रकार कायम रहती हैं जिस प्रकार वे हिंदू धर्म में थे। कई बार बौध महासभा के पदाधिकारियो की लिस्ट देख कर लगता है की यह किसी जाति की खाप पंचायत है. 
उनके बीच गैर जाति का बुद्धिस्ट अलग-थलग ठगा सा महसूस करता है। किसी ने ठीक ही कहा है डॉक्टर अंबेडकर के बुद्धिस्ट बनने के बाद वंचित समुदाय ने अपने आप को बुद्ध धर्म तक सीमित कर लिया है। वह आंदोलन जो उन्होंने शुरू किया था वह दम तोड़ चुका है। इस कार्यक्रम में आने के बाद यह बातें शत-प्रतिशत सही लग रही थी। मैं बुरी तरह भयभीत हूं कि कहीं बौद्ध समाज हिंदू धर्म के एक नए कुनबे की तरह ना बन जाए। जाति तोड़ने के बजाय एक नई जाति के रूप में ना स्थापित हो जाए। ऊंच-नीच खत्म करने के बजाय एक नए ऊंच-नीच की खाई को ना बना दिया जाए।
संजीव खुदशाह
www.sanjeevkhudshah.com 

राष्ट्र निर्माण का कार्यक्रम है आरक्षण


लेखक: दिलीप मंडल
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आरक्षण पर चल रहे विवाद में नया मोड़ ला दिया है। उन्होंने कहा ‘जीवन में आगे बढ़ने के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं है। बिना आरक्षण भी सफलता पाई जा सकती है।’ इसे लेकर एक निरर्थक विवाद खड़ा हो गया है, जबकि राष्ट्रपति महोदय ने यह बात सदिच्छा से कही है और उनकी बात सही है। संविधान में आरक्षण का प्रावधान इसलिए नहीं किया गया कि वंचित समुदायों के लोग या कोई भी इसका लाभ उठाए और तरक्की करे। संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की कल्पना व्यक्तिगत उपलब्धियां हासिल करने के जरिए के तौर पर नहीं की थी। रिजर्वेशन का निजी तरक्की से कोई लेना-देना नहीं है। सरकारी क्षेत्र में इतनी नौकरियां और सरकारी शिक्षा संस्थानों में इतनी सीटें भी नहीं हैं कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में इनके बल पर किसी समुदाय की तरक्की हो जाए।
भेदभाव का समाज
संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को राष्ट्र निर्माण का कार्यक्रम माना था और ‘एक बनते हुए राष्ट्र’ के लिए जरूरी समझकर इसे संविधान में जगह दी थी। यही वजह है कि इसे मूल अधिकारों के अध्याय में रखा गया। संविधान निर्माता भारत को एक समावेशी देश बनाना चाहते थे, ताकि हर समूह और समुदाय को लगे कि वह भी राष्ट्र निर्माण में हिस्सेदार है। यह पूना पैक्ट के समय वंचित जातियों से किए गए वादे का पालन भी है। दलित, पिछड़े और आदिवासी मिलकर देश की तीन चौथाई से भी ज्यादा आबादी बनाते हैं। इतनी बड़ी आबादी को किनारे रखकर भला कोई देश कैसे बन सकता है? आरक्षण सबको साथ लेकर चलने का सिद्धांत है। इसे सिर्फ करियर और तरक्की से जोड़कर देखना सही नहीं है।

रिजर्वेशन ने वंचित समूहों के लिए तरक्की के अवसर खोले हैं। इतिहास में यह पहला मौका है जब भारत की इतनी बड़ी वंचित आबादी, खासकर एक समय अछूत मानी जाने वाली जातियों के लोग शिक्षा और राजकाज में योगदान कर रहे हैं। किसान, पशुपालक, कारीगर और कमेरा जातियों की भी राजकाज में हिस्सेदारी बढ़ी है, जिससे देश मजबूत हुआ है। आरक्षण विरोधी तर्कों के जवाब में सिर्फ इतना कहना जरूरी लगता है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए आरक्षण कतई जरूरी नहीं है, बशर्ते जन्म के आधार पर समाज में भेदभाव न हो। भारत में ऊंच-नीच को धार्मिक साहित्य में मान्यता प्राप्त है। इसलिए बाबा साहेब ने इन ग्रंथों को खारिज करने की बात ‘एनिहिलिशेन ऑफ कास्ट’ नामक किताब में प्रमुखता से की है। यहां हर आदमी एक वोट दे सकता है और हर वोट की बराबर कीमत है लेकिन समानता का यह चरम बिंदु है। हर आदमी की बराबर कीमत या औकात यहां नहीं है और यह हैसियत अक्सर जन्म के संयोग से तय होती है।

दूसरे, तरक्की के लिए भी आरक्षण जरूरी नहीं, बशर्ते हमारा समाज ऐसा हो, जिसमें किसी खास समुदाय में पैदा होना किसी एक की कामयाबी और दूसरे की नाकामी का कारण न बने। जैसे, काफी संभावना है कि कॉर्पोरेट सेक्टर में आपका जॉब इंटरव्यू कोई सवर्ण पुरुष ले रहा हो और आपके प्रमोशन का फैसला भी किसी सवर्ण हिंदू पुरुष के हाथ में हो। ऐसा इसलिए नहीं है कि आप जातिवादी हैं या इंटरव्यू लेने वाले जातिवादी हैं। यह भारतीय समाज की संचरना का नतीजा है। ऊपर के पदों पर खास जातियों का वर्चस्व एक सामाजिक सच्चाई है। यही सुविधा पिछड़े और दलितों को भी हासिल हो, तब कहा जा सकता है कि तरक्की करने के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं है। अभी तो जन्म का संयोग जीवन में किसी के सफल या असफल होने में एक बड़ा फैक्टर है।
तीसरे, अगर तरक्की करने के लिए आरक्षण जरूरी न होता तो भारत में आजादी के बाद बना शहरी दलित-पिछड़ा मध्यवर्ग सरकारी नौकरियों के अलावा और क्षेत्रों से भी आता। आज लगभग सारा दलित मध्य वर्ग सरकारी नौकरियों में आरक्षण की वजह से तैयार हुआ है। अगर सब कुछ प्रतिभा और मेहनत से ही तय हो रहा है तो शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करने वाले दलित निजी क्षेत्र के शिखर पदों पर लापता क्यों हैं? कानून और न्याय के क्षेत्र में भी यह सच है। उच्च न्यायपालिका में आरक्षण नहीं है। नतीजा यह है कि सुप्रीम कोर्ट में आज एक भी दलित जज नहीं है, और तो और, कोई सीनियर एडवोकेट भी नहीं है।
चौथी बात। महामहिम राष्ट्रपति की बात का अर्थ यदि यह है कि आरक्षण से तरक्की के दरवाजे बेशक खुल जाते हैं, पर कामयाबी मेहनत से ही मिलती है, तो वह बिल्कुल वाजिब बात कह रहे हैं। किसी इंस्टिट्यूट में प्रवेश बेशक आरक्षण से मिल सकता है, पर सभी स्टूडेंट्स को एक ही परीक्षा एक ही मापदंड से पास करनी होती है। इसलिए जब स्टूडेंट पास होकर निकलता है, तो उसके पास बुनियादी क्वालिफिकेशन और काबिलियत जरूर होती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका ऐडमिशन कोटे से हुआ है या नहीं।
सपनों से दूर
भारत में तरक्की करना परीक्षा पास करने और नौकरी पा लेने का मामला नहीं है। उससे पहले वंचित समुदाय के व्यक्ति को, खुद से एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। वह लड़ाई है महत्वाकांक्षा जगाने की। वंचित समुदाय के व्यक्ति के लिए अक्सर बड़े सपने देखना आसान नही होता। दरअसल सपने इस बात पर निर्भर करते हैं कि व्यक्ति के आसपास का वातावरण उन सपनों के अनुकूल है या नहीं, और उन सपनों की प्रतिष्ठा है या नहीं। कमजोर तबके अक्सर इस कल्चरल कैपिटल से वंचित होते हैं। प्रतिभा और मेहनत के बावजूद ऊंचे पद कई बार उनकी कल्पना में ही नहीं होते। इसलिए आरक्षण जरूरी है। किसी की निजी तरक्की के लिए नहीं, बेशक राष्ट्र निर्माण के लिए।
courtesy navbharat times

दलितों का ब्राहमणी करण आखिर कब तक चलेगा?

यह दौर दलितों के तालिबानीकरण का है !
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राजसमन्द में हुई आतं?की वारदात के पक्ष में बड़ी संख्या में चरमपंथी हन्दू सोशल मीडिया पर अपने विचार खुल कर ज़ाहिर कर रहे है ,लोगों ने आतंकी शम्भू की तस्वीर को " माई हीरो शम्भू भवानी " हेज टैग के साथ अपनी प्रोफाइल पिक्चर तक बना डाली है ,इन शम्भू समर्थकों के नाम के साथ लगी जाति का विश्लेषण करने पर चोंकाने वाला सत्य सामने आता है ,इस दुर्दांत हत्याकांड का खुलकर समर्थन कर रहे लोगों का 95 फीसदी अपर कास्ट हिन्दू है ,जो शम्भू लाल रेगर नामक एक दलित के कृत्य को जायज ठहरा रहे है ।

कातिल के चाहने वाले लोगों के तर्क लगभग वही है जो संघी दुष्प्रचार के साहित्य में बर्षों से विष वमन किये जा रहे है ,लोग राजसमन्द की वारदात को जायज ठहराने के लिए अजीबोग़रीब कुतर्क उछाल रहे है ,लोगों के बीच यह झूठ फैलाया जा रहा है कि आतंकी हमले का शिकार हुआ बंगाली मजदूर अफराजुल ने हत्यारे शम्भू की बहन से शादी कर रखी थी और उसे भगा कर पश्चिमी बंगाल ले गया था ,जबकि सच्चाई तो यह है कि कातिल की बहन तो छोड़िए उसकी किसी रिश्तेदार से भी अफराजुल का किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं था ,वह तो     नफरत की विचारधारा द्वारा प्रशिक्षित हत्यारे शम्भू को ठीक से जानता तक नहीं था ,बावजूद उसे कातिल ने महज़ मुसलमान होने की वजह से हमले का शिकार बनाया और बड़ी बेरहमी से पहले तो काटा और फिर जला डाला ।

इस आतंकी वारदात को सिर्फ सनकी आदमी की सनक में किया आम अपराध बता देना उन घृणा के कारोबारी संगठनों की तरफदारी करना है जो अपनी विषैली विचारधारा से कमजोर दिमाग युवाओं को फंसा कर आत्मघाती दस्ते तैयार कर रहे है ,राजसमन्द का जघन्य हत्याकांड यह भी साबित करता है कि दलित युवाओं का तालिबानीकरण किया जा रहा है ,उनके ज़रिए मौत के सौदागर अपना आतंकी खेल खेलने में सफल हो रहे है ।

इससे उच्च जाति के साम्प्रदायिक तत्व एक तीर से कईं शिकार करने की कोशिस कर रहे है ,वे दलितों और मुसलमानों को आमने सामने की एक अंतहीन लड़ाई में झोंक कर खुद सुरक्षित होने के प्रयास में है ,इसी के साथ वे दलित नोजवान पीढ़ी के अपराधीकरण का काम भी कर रहे ताकि वे हत्या ,दंगे ,लूट ,हमले जैसी वारदातें करते रहे और जेलों में बरसों सड़ते रहें ,इस तरह एक व्यक्ति ही नहीं बल्कि पूरा परिवार ही बर्बाद हो जाये और अन्ततः सम्पूर्ण समुदाय ही नष्ट हो जाये ।

दलित और मुस्लिम्स को आपसी युद्ध मे धकेल कर भारत के मनुवादी तत्व सारे अवसरों ,साधनों व संशाधनों पर काबिज हो कर ऐश्वर्य भोगते रहना चाहते है ,यह एक दीर्घकालिक भयानक हिन्दू षड्यंत्र है जिसका दलित शिकार हो चुका है ।

बड़े पैमाने पर दलित युवाओं को उन उग्र हिन्दू संगठनों से जोड़ा जा रहा ,जिनके जरिये हिंसक गतिविधिया करवाई जा सके ,हुड़दंग करने ,दंगे फैलाने ,त्रिशूल बांटने ,शस्त्र पूजा करवाने ,चाकूबाजी और मुकदमे करवाने ,हत्याएं करवाने तथा जैल भेजने के लिए ये नवनिर्मित हिन्दू बहुत काम आते है ,हालांकि ये हिन्दू तभी तक माने जाते हैं ,जब तक कि सामने मुसलमान हो या चुनाव हो ,बाकी समय मे इनको नीच हिन्दू के तौर पर ही माना जाता है ,हिंदुत्व की प्रयोगशाला में आज दलितों की औकात चीरे फाड़े जाने वाले मेढकों जैसी हो गयी है ,फिर भी दलित खुशी खुशी हिंदुत्व के हरावल दस्ते बने हुए है ।

एक फर्जी किस्म का ऊपरी ऊपरी क्षणिक आदर भाव मिल जाने और थोड़ी बहुत आर्थिक मदद पा कर आज का भ्रमित दलित नोजवान आत्मघाती हमलावर तक बनने को तत्पर हैं ,वह कुछ भी सोच विचार नही कर पा रहा है ,उसके मन मस्तिष्क पर हिदुत्व कुप्रचार इतना हावी हो गया है कि वह स्वयं को धर्म यौद्धा समझ कर मरने मारने पर उतारू है ,वस्तुतः आज देश का दलित किशोर और नोजवान ज़िंदा बम बन कर खुदकशी की राह पर चल पड़ा है ।

दलित युवाओं का यह तालिबानीकरण अब रंग दिखा रहा है ,उन्हें  इतना भर दिया गया है कि वे अब भस्मासुर बनकर खुद का ही नुकसान कर रहे है ,वे अब मनु के गीत गा रहे है ,वे अब आरक्षण हटाने की मांग कर रहे है ,कल वे संविधान को मिटाने की बात करेंगे और लोकतंत्र की जगह तानशाही की वकालत भी करने लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी ।

दलितों को आतंकी बनानेे का सबसे सटीक उदाहरण राजसमन्द को माना जा सकता है, किसी भी हिन्दू संगठन ने अफराजुल की निर्मम हत्या की निंदा नही की ,एक दो दिन की खामोशी के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद इंटरनेट हिन्दू आर्मी सक्रिय हो गई और हत्यारे शम्भू को हीरो बना डाला ,उसे एक भटका हुआ नोजवान बताते हुए उससे बात करने और उसके प्रति सहानुभूति दिखाने की अपीलें जारी होने लगी है ।

हैरत की बात तो यह है कि जितने भी लोग सोशल मीडिया और अन्यत्र शम्भू के पक्ष में मोर्चा खोले हुए है वे लगभग ऊपर के तीन वर्णों से आते है और उनका सीधा जुड़ाव संघ और उसके समविचारी संगठनों से है ,हद तो यह है कि एक नराधम के कुकृत्य को धर्मसम्मत और राष्ट्रभक्ति का पर्याय बताया जा रहा है ,उसको शम्भू नाथ बाहुबली कह कर गौरवान्वित किया जा रहा है ,एक निर्दोष ,निरपराध व्यक्ति को धोखे से बुलाकर पीछे से वार करने वाले अव्वल दर्जे के कायर को महान शूरवीर बता कर उसको महिमामण्डित इसलिए किया जा रहा है ताकि अन्य दलित युवाओं को भी इससे प्रेरणा मिल सके और वे भी इस धर्मयुद्ध में शामिल हो जाएं ।

आतंक को पालने पोषने और उसका समर्थन करने के लिए टेरर फंडिंग भी शुरू हो चुकी है ,हत्यारे शम्भू भवानी के मुकदमे के लिए पैसे एकत्र हो रहे है ,उसके परिवार को मदद करने के लिए उसकी पत्नी का बैंक अकाउंट नम्बर सबको भेजा गया है ,यह गतिविधियां इसलिए हो रही है कि इस तरह की आतंकी वारदातों को अंजाम देने वाले स्वयं को अकेला नही समझें ,उग्र हिदू समूह उनके साथ खड़े है ,वे बेझिझक विधर्मियों,लव जिहादियों ,पाकपरस्त म्लेच्छों को मार सकते है।

यह दौर भारत के दलितों के तालिबानीकरण का है । 

-भंवर मेघवंशी
( सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार )

बाबासाहेब डाॅ.भीमराव अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस के अवसर पर ’साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्म निरपेक्षता’ विषय पर संगोष्ठी संपन्न

विमर्श,कसम,जाति उन्मूलन आंदोलन एवं दलित मूवमेंट एसोसिएशन का संयुक्त आयोजन

रायपुर, 07.12.2017। समाज में साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष माहौल बनाने हेतु विमर्श छत्तीसगढ़, क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच छत्तीसगढ़, जाति उन्मूलन आंदोलन छत्तीसगढ़ व दलित मूवमेंट एसोसिएशन ने बाबासाहेब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस एवं बाबरी मस्जिद के विध्वंस दिवस के अवसर पर ’साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्म निरपेक्षता’ विषय पर रायपुर में संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच कसम व जाति उन्मूलन आंदोलन की राज्य कमेटी सदस्य रेखा गोंडाने ने की। इस अवसर पर विशिष्ट वक्ता के रूप में जाति उन्मूलन आंदोलन के अखिल भारतीय कार्यकारी संयोजक व छत्तीसगढ़ संयोजक संजीव खुदशाह,क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के अखिल भारतीय संयोजक तुहिन, अम्बेडकर,फुले,पेरियार छात्र संगठन के सदस्य व टीस मुंबई के शोधार्थी श्रीकांत,अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान संगठन के छत्तीसगढ़ राज्य सचिव काॅ. तेजराम विद्रोही एवं वरिष्ठ वामपंथी विचारक काॅ.मृदुलसेन गुप्ता उपस्थित थे। कार्यक्रम में जाति उन्मूलन आंदोलन के सदस्य रवि बौद्ध,एडवोकेट रामकृष्ण जांगडे़ व गुरू घासीदास सेवादार संघ के दिनेश सतनाम ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम का संचालन विमर्श के रविन्द्र व आभार क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के सदस्य रतन गोंडाने ने किया। इस अवसर पर प्रख्यात जनगायिका बिपाशा राव ने जनगीत प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में आगामी 17 दिसंबर 2017 को रायपुर में आयोजित जाति उन्मूलन आंदोलन के राज्य सम्मेलन को तथा नागपुर में आगामी 13-14 जनवरी 2018 को जाति उन्मूलन आंदोलन के अखिल भारतीय सम्मेलन को सफल बनाने की अपील की गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं रेखा गोंडाने ने कहा कि बाबासाहेब सभी समाज को अपना घर समझते थे। यह हमें समता,समानता और न्याय आधारित संविधान की रचना में दिखता है। हमें दकियानूसी विचारों को छोड़ना व नये विचारों से युवा वर्ग को अवगत कराना होगा जिससे नवीन समाज की स्थापना हो और महिला-पुरूष में भेदभाव रहित समाज की ओर आगे बढ़ना है।
कार्यक्रम में प्रारंभिक वक्तव्य रखते हुए तुहिन ने कहा कि आज ही के दिन 25वर्ष पूर्व अयोध्या में धर्म निरपेक्षता को तार-तार किया गया था और इसके लिए डाॅ.बी.आर. अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस को जानबुझकर चुना गया। 1826 से पूर्व बाबरी मस्जिद व रामजन्म भूमि कोई मुद्दा नहीं था। सभी समुदाय भारत की बहुलतावादी संस्कृति के तहत एक साथ रहते आए । सबसे पहले अंग्रेज इतिहासकार लिडेन व बेबरीज ने बाबरी मस्जिद व रामजन्म भूमि विवाद को पैदा किया और इसे अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम समुदाय को लड़ाने के लिए मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल किया। 7वीं सदी में व्हेनसांग के जीवन वृतांत में उल्लेख है कि अयोध्या बौद्ध धर्म का प्रमुख केन्द्र रहा है। बाबरनामा से पता चलता है कि बाबर कला प्रेमी था और किसी भी साक्ष्य में यह पता नहीं चलता कि अयोध्या में मस्जिद  उसने बनवाई थी। बाद में दक्षिणपंथी कट्टरवादियों ने झूठ की बुनियाद पर साम्प्रदायिकता की आग भड़काई जिससे पूरे देश मेें दंगे हुए और भय का माहौल बना। वर्तमान दौर में देश में धुर दक्षिणपंथी शासक वर्ग द्वारा हमारी सामाजिक विरासत गंगा-जमुनी तहजीब के ताने-बाने को छिन्न भिन्न करने की लगातार कोशिश हो रही है इसे आमजनों तक सही बात को पहुंचाना होगा। लोगों के खान पान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले हो रहे हैं। मेहनतकश मजदूरों,किसानों,दलितों,आदिवासियों,महिलाओं व अल्पसंख्यकों की आवाज को दबाया जा रहा है। एैसे माहौल में प्रगतिशील संगठनांे, बुद्धिजीवियों व छात्र-नौजवानों को आगे आकर लोगों को सही बातों को बताने और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है।
संजीव खुदशाह ने कहा कि विचारोें की प्रासंगिकता वक्त के साथ बदल सकती है लेकिन डाॅ. भीमराव अम्बेडकर की सोच प्रगतिशील लोकतांत्रिक व्यवस्था में थी जिसके कारण उनकेे विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि धर्म निरपेक्षता का मतलब है कि शासन प्रणाली व राजनीति धर्म से अलग होगी। धर्म एक व्यक्तिगत मुद्दा है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि धर्म व राजनीति का घालमेल हो व धर्म राजनीति से उपर हो। हमारे पड़ोसी मुल्क में कानून के उपर धर्म है जिसके दुष्परिणाम हम देखते हैं। हमारे देश में तमिलनाडु में आदेश निकाला गया है कि सरकारी संस्थानों में किसी भी तरह के धार्मिक क्रियाकलाप नहीं होगा। वहीं अन्य प्रदेशों में यह लगातार जारी है। आज के समय बुद्धिजीवी वर्ग की जिम्मेदारी है कि बाबासाहेब के विचारों को आगे बढ़ाने की ताकि ऊंच-नीच,जाति भेद,लिंग भेद तोड़कर एक भेदभाव मुक्त समतावादी भारत की कल्पना को साकार किया जा सके। उन्होंने उपस्थित जनों से बाबा साहब के दिखाये पथ पर जाति उन्मूलन आंदोलन से जुड़ने की अपील की।
टीस मुंबई के शोधार्थी श्रीकांत ने कहा कि शोषितों से शोषक बनाने वाली शिक्षा व्यवस्था जब तक है तब तक समाज में बदलाव नहीं आऐगा। आमजन को मिथकों से दूर रहने के लिए सही बात बताना होगा। हमारे सामने इतिहास को विकृत कर प्रस्तुत किया गया है। इसलिए इतिहास पढ़ना ही नहीं इतिहास बनाना भी हमारी जिम्मेदारी है। रस्सी को सांप बताने वालों से हमें सावधान रहने की जरूरत है। शोषितों में सबसे शोषित महिला होती है और महिलाओं के लिए जाति व्यवस्था शोषण का प्रवेश द्वार है। विषमतावादी समाज को खत्म कर समतावादी समाज बनाना, जाति प्रथा को खत्म करना हमारी जिम्मेदारी है। 
इस अवसर पर बड़ी संख्या में बुद्धिजीवीगण,सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि,लेखक,साहित्यकार,संस्कृतिकर्मी व छात्र/छात्राएं उपस्थित थे।

शिक्षाकर्मियों की हड़ताल हर बार असफल क्‍यों हो जाती है?

शिक्षाकर्मियों की हड़ताल हर बार असफल क्‍यों हो जाती है?
सचिन खुदशाह
लोगों के मन में यह सवाल हमेशा से आता रहा है कि शिक्षाकर्मी बार-बार हरताल क्यों करते है? इसके जवाब में तमाम मैसेज सोशल मीडिया में तैर रहे हैं जो इस तथ्‍य को बता रहे हैं कि क्यों शिक्षाकर्मी हड़ताल करने के लिए मजबूर हैं। उनकी परेशानियां उनकी आर्थिक स्थिति किसी से भी छिपी नहीं है। क्या राजनेता, क्या प्रशासक, पत्रकार मीडिया सभी उनकी परेशानियों से बावास्‍ता है।
शिक्षाकर्मी की मजबूरी
शिक्षाकर्मी संगठन की शिकायत है कि उन्हे कई कई महिने वेतन नही मिलता। इस कारण आर्थिक समस्‍या बनी रहती है। उनकी खास मांगों में शिक्षाकर्मी से शिक्षक मे संविलियन (यानी सरकारी कर्मचारी का दर्जा चाहिए जो वर्तमान में उन्‍हे नही मिल रहा है), उचित स्‍थानांतरण नीति शामिल है।
अब प्रश्न या होता है कि वे कौन से कारण है जिसके कारण शिक्षाकर्मी हड़ताल सफल नहीं हो पाती। इसकी पड़ताल भी जरूरी है आज हम इस मुद्दे पर बात करेंगे।
सरकार की मजबूरी
पहली बात तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि शिक्षाकर्मी फॉर्म भरने के पहले खासकर शुरुआती दौर में तकरीबन 22 साल पहले जब शिक्षाकर्मी जैसे पद का सृजन किया गया उसमें यह शर्त खुले तौर पर शासन के द्वारा प्रसारित किया गया था कि यह सेवा केवल 3 वर्ष के लिए है। और उसके बाद उन्हें सेवा से पृथक कर दिया जाएगा। किंतु बाद में इनकी सेवाएं बढ़ाई जाने लगी और वह कभी भी स्थाई शिक्षकों के तौर पर भर्ती नहीं किए गए। हालांकि कुछ शिक्षकों को स्थाई शिक्षक के तौर पर पदोन्नति भी मिली।
अब मैं आपको बताना चाहूंगा की शिक्षा कर्मी की भर्ती 3 वर्ष के लिए क्यों की जाती रही है। दरअसल उस समय इस बात को सामने रखा गया की शिक्षाकर्मी के इस पद हेतु रुपयों का इंतजाम वर्ल्ड बैंक के द्वारा होता है। और वर्ल्ड बैंक यह राशि ऋण के रूप में स्टेट गवर्नमेंट को 3 साल के लिए देता है। बाद में परिस्थिति का जायजा लेने के बाद यह राशि अगले तीन वर्षो के लिए बढ़ा दी जाती है।
दावा है छत्तीसगढ़ राज्य में करीब ढाई लाख शिक्षाकर्मी कार्यरत है निश्चित तौर पर इन्हें स्थाई करने के बाद और वर्ल्ड बैंक द्वारा राशि नहीं देने की स्थिति में वेतन देना राज सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी। इसलिए राज्‍य सरकार इन्‍हे स्‍थाई करने में हिचकिचाती है।
दूसरी मजबूरी है यूजीसी की गाईडलाईन जिनके अनुसार स्‍थाई शिक्षको को भारी भरकम वेतन देना जरूरी है। इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते है मान लिजिये किसी शिक्षाकर्मी का वेतन 30000 प्रतिमाह है तो यदि उसे शिक्षक पद पर बहाल किया जायेगा तो उसे यू जी सी के गाईडलाईन के अनुसार करीब डेढ गुना ज्‍यादा वेतन (75000) देना होगा। ऐसा करना सरकार के लिए एक टेढ़ी खीर है।
अब हम इस मुद्दे पर आते हैं कि क्यों शिक्षाकर्मियों का हड़ताल जो तमाम छोटी-छोटी मांगों पर आधारित होता है वह अक्सर असफल हो जाता पिछले बार के हड़ताल में तो करीब 25 शिक्षा कर्मी को मौत के मुंह में जाना पड़ा इनमें 4 आत्‍महत्‍या शामिल है बावजूद इसके सरकार का मन नहीं डोला इसके कुछ कारण है।
इसके कई कारण है जैसे शिक्षाकर्मियों के संगठन में कई गुट है अक्‍सर वह एकमत नहीं हो पाते हैं।  शिक्षाकर्मी में पोस्टिंग को लेकर बहुत मारा मारी है। शहर के आसपास पोस्टिंग कराने में वह मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक की एप्रोच रहते हैं। और जिन दमदार शिक्षाकर्मियों की पहुच उन तक रहती है वह शहर के आसपास वर्षों से काबिज है। बहुसंख्‍यक शिक्षाकर्मी सरकारा के निर्देशानुसार ग्राम पंचायत के मुख्‍यालय में नही रहते है। सरकारी काम के बटवारे  को लेकर महिला पुरूष में मतभेद की खबरे आम है। जनसमर्थन जुटाने में कमजोर साबित होते है। शिक्षाकर्मियों को चाहिए कि वह अपनी परेशानियों को पालको के आगे रखें और उनसे जनसमर्थन मांगे।
मताधिकार पर कमजोर - सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि इतनी बड़ी संख्या में होने के बावजूद वे सरकार बदलने का माद्दा नहीं रखते हैं वे और उनके परिवार चाहे जातिगत कारण हो या धर्मगत या अन्य कारण हो। वह उसी पार्टी को वोट देते हैं जिनके खिलाफ हड़ताल पर खड़े रहते हैं। इसीलिए कोई भी पार्टी उनसे खौफ नहीं खाती। इसीलिए हड़ताल पर जाने से पहले शिक्षाकर्मियों को मनन और विश्लेषण करना होगा और पूरी तैयारी के साथ हड़ताल पर बैठना होगा। तब कहीं जाकर उनका आंदोलन सफल हो सकेगा। क्योंकि उनकी सेवाओं से उनके परिवार की रोजी रोटी बंधी हुई है। वहीं बच्चों का भविष्य भी जुड़ा हुआ है।
सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए यह समस्‍या आने वाली है।

 यदि कोई केन्‍द्र या राज्‍य सरकार का कर्मचारी यह समझे की यह समस्‍या सिर्फ शिक्षाकर्मियों की है। वह इस समस्‍या से सुरक्षित है तो मै यह बताना चाहूंगा की नई नई पूंजी वादी एवं उदारवादी नीति में यही योजना बनाई जा रही है। अब चपरासी से लेकर आई ए एस तक ठेके पर लिये जायेगे। सरकार शिक्षा स्‍वास्‍थ अन्‍य जनहित वाली योजना से हाथ खीचना चाहती है। सरकार का काम केवल दो ही होगा। जनता से भूमि छीन कर पूंजीवादियों को देना और टैक्‍स वसूलना। राजस्‍थान सहित कई राज्‍यों में इसकी शुरूआत भी हो चुकी है। शिक्षाकर्मी की तरह पुलिस, पटवारी, ग्रामसेवक,कलर्क और अधिकारी ठेके पर भर्ती किये जा रहे है। इसलिए अन्य संगठन को भी समस्‍या को गंभीरता से लेने की जरूरत है।