Monday, September 30, 2013

महिशासुर आंदोलन का इतिहास

महिशासुर आंदोलन का इतिहास
29 सितम्‍बर 2013
Photo: महिशासुर आंदोलन का इतिहास  29 सितम्‍बर 2013  जेएनयू में पहली बार 25 अक्टूबर 2011 को 'महिशासुर शहादत दिवस' मनाया गया। 2013 का यह आयोजन शहादत दिवस की तीसरी वर्षगांठ होगी। विरोध और स्वीकार से गुजरते हुए इस वर्श देश के अलग-अलग 60 जगहों पर महिशासुर शहादत दिवस का मनाया जाना अप्रत्याषित ही है। दरअसल, महिशासुर का प्रश्‍न देश के 85 फीसदी पिछड़ों-दलितों और आदिवासियों के पहचान से जुड़ा हुआ है। अपनी जड़ों की तरफ लौट रहे हैं, अपने नायकों को इतिहास में तलाश रहे हैं। इतिहास का बहुजन पाठ अभी बाकी है।    महिशासुर-दुर्गा विवाद  2011 के दशहरा के मौके पर 'ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम' ने 'फारवर्ड प्रेस' में प्रकाशित प्रेमकुमार मणि का लेख 'किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन' के माध्यम से जेएनयू छात्र समुदाय के बीच विमर्श के लिए महिशासुर के सच को सामाने लाया। दुर्गा ने जिस महिशासुर की हत्या की, वह पिछड़ा वर्ग का न्यायप्रिय और प्रतापी राजा था। आर्यों ने छलपूर्वक इस महाप्रतापी राजा की हत्या दुर्गा नामक कन्या के हाथों करवाई। जेएनयू में जारी इस पोस्टर को लेकर संघी-सवर्ण छात्रों ने बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम के छात्रों के साथ मारपीट की। इस प्रकरण में जेएनयू प्रशासन ने ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम के अध्यक्ष जितेंद्र यादव को धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में नोटिस जारी किया। लगभग 1 महीने तक चले इस विवाद में अंततः पिछड़े वर्ग के छात्रों की जीत हुई। देश के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और राजनेताओं के दबाव में जेएनयू प्रशासन ने एआईबीएसएफ से लिखित रूप में मांफी मांगते हुए कहा कि जितेंद्र यादव के खिलाफ कोई प्रॉक्टोरियल जांच नहीं चल रही है। इस जीत से उत्साहित पिछड़े वर्ग के छात्रों ने 25 अक्टूबर 2011 को जेएनयू परिसर में महिशासुर शहादत दिवस मनाया। इस बार देश के 60 से अधिक जगहों पर महिशासुर शहादत दिवस का आयोजन हो रहा है।   इतिहास में महिशासुर  जब भारत पर आर्यों का हमला हुआ उस समय महिशासुर बंगाल-बिहार-उडी़सा के राजा थे। गंगा का दोआब होने के कारण बंगाल-बिहार-उडी़सा की जमीन बहुत उपजाऊ थी। आर्य इस पर कब्जा करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने 7 बार आक्रमण किया और हर बार परास्त हुए। 'बल नहीं तो छल, छल का बल' अंत में आर्यों ने   छलपूर्वक महिशासुर की हत्या का शड्यंत्र रचा। हिन्दू धर्मषास्त्रों के अनुसार दुर्गा नामक कन्या 8 दिन तक महिशासुर के भवन में रही और 9वें दिन उनकी हत्या कर दी। चुंकी महिशासुर ने स्त्रियों और पशुओं पर हाथ नहीं उठाने का प्रण किया था। उस समय के अनार्य समाज में स्त्रियों से युद्ध करना और पशुओं का वध परंपरा के विरूद्ध था। दुर्गा ने इसी का फायदा उठाया और महिशासुर की हत्या कर दी और उत्तर भारत पर आर्यों का कब्जा हो गया। अब बारी महिशासुर को उनके ही लोगों के बीच बदनाम करने की थी। क्योंकि आर्य को यह भय था कि महिशासुर के लोग उन पर कभी भी हमला कर सकते हैं और आमने-सामने की लड़ाई में आर्यों की हार सुनिश्‍चित है। एक बार फिर छल का सहारा। महिशासुर को बदनाम करने के लिए बड़े पैमाने पर उनकी हत्या के जश्‍न मनाए गए और अनार्य के मन में उनके खिलाफ घृणा भरी गई। हत्या जश्‍न के पीछे के शड्यंत्र को समझना होगा। इस प्रकार आने यहां के मूल निवासियों को मानसिक रूप से गुलाम बना लिया और यह प्रक्रिया आज भी चल रही है। जातियों में विभक्त कर यहां के मूल निवासियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से असक्त बना दिया गया। महिशासुर दुर्गा युद्ध दरअसल आर्य-अनार्य, ब्राम्हण-शु्द्र, सवर्ण-अवर्ण, निम्न-और उच्च जाति और देव-दानव का युद्ध था।  असुरः भारत के मूल निवासी  संस्कृति और भाषा कैसे किसी समाज पर कैसे वर्चस्व स्थापित करती है, हिन्दू/आर्य/देव/ब्राम्हण संस्कृति इसका सर्वश्रेष्‍ट उदाहरण है। असुर/दैत्य/राक्षस आदि शब्दों में घृणा भरे गए। असूर/दैत्य/राक्षस से यहां के मूल निवासी भी घृणा करने लगे। जबकि ये शब्द ब्राम्हण संस्कृति के शब्दों के विपरीतार्थक हैं। असुर अर्थात् जो सुर नहीं है। जो देवता नहीं है वह दानव है। जो आर्य नहीं वह अनार्य है। जबकि अर्थ लगाया गया कि देवता अच्छे हैं और दानव खराब हैं। आर्य अच्छे हैं और अनार्य बुरे हैं। इतिहास में देवताओं/आर्यों और सुरों ने हमेशा बुरा काम किया है। फिर भी वे अच्छे हैं जबकि असुरों ने एक भी मानवता विरोध काम नहीं किए। वे अपने और अपने मूलनिवासियों की रक्षा में संघर्ष किए और छलपूर्वक मारे गए। आज की भाषा में असुर का तात्पर्य इस देष का दलित-पिछड़ा-आदिवासी है। समुद्र मंथन में जो लोग सांप की पूंछ की तरफ से उन्हें अमृत मिला और जो लोग मुंह की तरफ थे उन्हें विष। यही है आर्यों का न्याय, देवताओं और सवर्णों का  न्याय! आजादी के आंदोलन में भी जिन्होंने जान दी उन्हें क्या मिला? 50 वर्षो के बाद बधिया 27 प्रतिशत आरक्षण। सत्ता-संस्‍थानों और संसाधनों पर एकछत्र सवर्णों का कब्जा है। असुरों/पिछड़ों के हक की लड़ाई लड़ने वालों को आज भी दमन किया जा रहा है, बदनाम किया जा रहा है। जिसके कारण हमारे नेता पिछड़ों का नाम लेने से कतराने लगे हैं।  महिशासुरः पिछड़ों के नायक  देश के विभिन्न हिस्सों में कई जातियां महिशासुर को अपना नायक मानती हैं। बंगाल के पुरूलिया जिले में महिशासुर की पूजा होती है और मेला लगता है। वहां के लोग महिशासुर को अपना पूर्वज मानते हैं। झारखंड में असुर जनजाति के लोग अपने को महिशासुर का वंशज मानते हैं। कवयित्री सुषमा असुर ने 'फारवर्ड प्रेस' के साथ साक्षात्कार में कहा था-'देखो मैं महिशासुर की वंशज हूं।' झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन भी महिशासुर को अपना पूर्वज मानते हैं। शिबू सोरेन ने रावण को अपना पूर्वज बताते हुए पुतला दहन से इनकार कर दिया था। मध्यप्रदेश में रहने वाली कुछ  जनजातियां महिशासुर को अपना पूर्वज मानती है। 2008 में 'यादव शक्ति' पत्रिका ने दावा किया था कि महिशासुर पषुपालक जातियों के नायक थे। पत्रिका का आवरण कथा ही था-'यदुवंश शिरोमणि महिशासुर।'   हत्या के जश्‍न दशहरा को प्रतिबंधित किया जायः  अब जब यह साबित हो गया है कि यहां के मूल निवासियों (पिछड़ा-दलित-आदिवासी) के राजा थे तब उनकी हत्या के जश्‍न के रूप में दशहरा मनाने से मूलनिवासियों की भावनाएं आहत होती हैं। वैसे भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी की हत्या का जश्‍न मनाना कहां तक जायज है? हम भारत के राष्‍ट्रपति, प्रधानमंत्री और सवर्ण की पक्षधर सुप्रीम कोर्ट से मांग करते हैं कि दशहरा पर रोक लगाई जाय। हम सामाजिक न्याय की पक्षधर शक्तियों से महिशासुर के पक्ष में खड़े होने की अपील करते हैं।   17 अक्टूबर, 2013 को जेएनयू में आयोजित महिशासुर शहादत दिवस में आप सभी आमंत्रित हैं।  स्थानः .1 ऑडिटोरियम, जेएनयू, नई दिल्ली, 3 बजे दिन।   आमंत्रित अतिथिः कांचा इलैया, चंद्रभान प्रसाद, प्रेमकुमार मणि, प्रो विवेक कुमार    ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम           संपर्कः 9716839326
जेएनयू में पहली बार 25 अक्टूबर 2011 को 'महिशासुर शहादत दिवस' मनाया गया। 2013 का यह आयोजन शहादत दिवस की तीसरी वर्षगांठ होगी। विरोध और स्वीकार से गुजरते हुए इस वर्श देश के अलग-अलग 60 जगहों पर महिशासुर शहादत दिवस का मनाया जाना अप्रत्याषित ही है। दरअसल, महिशासुर का प्रश्‍न देश के 85 फीसदी पिछड़ों-दलितों और आदिवासियों के पहचान से जुड़ा हुआ है। अपनी जड़ों की तरफ लौट रहे हैं, अपने नायकों को इतिहास में तलाश रहे हैं। इतिहास का बहुजन पाठ अभी बाकी है।
महिशासुर-दुर्गा विवाद
2011 के दशहरा के मौके पर 'ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम' ने 'फारवर्ड प्रेस' में प्रकाशित प्रेमकुमार मणि का लेख 'किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन' के माध्यम से जेएनयू छात्र समुदाय के बीच विमर्श के लिए महिशासुर के सच को सामाने लाया। दुर्गा ने जिस महिशासुर की हत्या की, वह पिछड़ा वर्ग का न्यायप्रिय और प्रतापी राजा था। आर्यों ने छलपूर्वक इस महाप्रतापी राजा की हत्या दुर्गा नामक कन्या के हाथों करवाई। जेएनयू में जारी इस पोस्टर को लेकर संघी-सवर्ण छात्रों ने बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम के छात्रों के साथ मारपीट की। इस प्रकरण में जेएनयू प्रशासन ने ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम के अध्यक्ष जितेंद्र यादव को धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में नोटिस जारी किया। लगभग 1 महीने तक चले इस विवाद में अंततः पिछड़े वर्ग के छात्रों की जीत हुई। देश के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और राजनेताओं के दबाव में जेएनयू प्रशासन ने एआईबीएसएफ से लिखित रूप में मांफी मांगते हुए कहा कि जितेंद्र यादव के खिलाफ कोई प्रॉक्टोरियल जांच नहीं चल रही है। इस जीत से उत्साहित पिछड़े वर्ग के छात्रों ने 25 अक्टूबर 2011 को जेएनयू परिसर में महिशासुर शहादत दिवस मनाया। इस बार देश के 60 से अधिक जगहों पर महिशासुर शहादत दिवस का आयोजन हो रहा है।
इतिहास में महिशासुर

जब भारत पर आर्यों का हमला हुआ उस समय महिशासुर बंगाल-बिहार-उडी़सा के राजा थे। गंगा का दोआब होने के कारण बंगाल-बिहार-उडी़सा की जमीन बहुत उपजाऊ थी। आर्य इस पर कब्जा करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने 7 बार आक्रमण किया और हर बार परास्त हुए। 'बल नहीं तो छल, छल का बल' अंत में आर्यों ने
छलपूर्वक महिशासुर की हत्या का शड्यंत्र रचा। हिन्दू धर्मषास्त्रों के अनुसार दुर्गा नामक कन्या 8 दिन तक महिशासुर के भवन में रही और 9वें दिन उनकी हत्या कर दी। चुंकी महिशासुर ने स्त्रियों और पशुओं पर हाथ नहीं उठाने का प्रण किया था। उस समय के अनार्य समाज में स्त्रियों से युद्ध करना और पशुओं का वध परंपरा के विरूद्ध था। दुर्गा ने इसी का फायदा उठाया और महिशासुर की हत्या कर दी और उत्तर भारत पर आर्यों का कब्जा हो गया। अब बारी महिशासुर को उनके ही लोगों के बीच बदनाम करने की थी। क्योंकि आर्य को यह भय था कि महिशासुर के लोग उन पर कभी भी हमला कर सकते हैं और आमने-सामने की लड़ाई में आर्यों की हार सुनिश्‍चित है। एक बार फिर छल का सहारा। महिशासुर को बदनाम करने के लिए बड़े पैमाने पर उनकी हत्या के जश्‍न मनाए गए और अनार्य के मन में उनके खिलाफ घृणा भरी गई। हत्या जश्‍न के पीछे के शड्यंत्र को समझना होगा। इस प्रकार आने यहां के मूल निवासियों को मानसिक रूप से गुलाम बना लिया और यह प्रक्रिया आज भी चल रही है। जातियों में विभक्त कर यहां के मूल निवासियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से असक्त बना दिया गया। महिशासुर दुर्गा युद्ध दरअसल आर्य-अनार्य, ब्राम्हण-शु्द्र, सवर्ण-अवर्ण, निम्न-और उच्च जाति और देव-दानव का युद्ध था।
असुरः भारत के मूल निवासी
संस्कृति और भाषा कैसे किसी समाज पर कैसे वर्चस्व स्थापित करती है, हिन्दू/आर्य/देव/ब्राम्हण संस्कृति इसका सर्वश्रेष्‍ट उदाहरण है। असुर/दैत्य/राक्षस आदि शब्दों में घृणा भरे गए। असूर/दैत्य/राक्षस से यहां के मूल निवासी भी घृणा करने लगे। जबकि ये शब्द ब्राम्हण संस्कृति के शब्दों के विपरीतार्थक हैं। असुर अर्थात् जो सुर नहीं है। जो देवता नहीं है वह दानव है। जो आर्य नहीं वह अनार्य है। जबकि अर्थ लगाया गया कि देवता अच्छे हैं और दानव खराब हैं। आर्य अच्छे हैं और अनार्य बुरे हैं। इतिहास में देवताओं/आर्यों और सुरों ने हमेशा बुरा काम किया है। फिर भी वे अच्छे हैं जबकि असुरों ने एक भी मानवता विरोध काम नहीं किए। वे अपने और अपने मूलनिवासियों की रक्षा में संघर्ष किए और छलपूर्वक मारे गए। आज की भाषा में असुर का तात्पर्य इस देष का दलित-पिछड़ा-आदिवासी है। समुद्र मंथन में जो लोग सांप की पूंछ की तरफ से उन्हें अमृत मिला और जो लोग मुंह की तरफ थे उन्हें विष। यही है आर्यों का न्याय, देवताओं और सवर्णों का न्याय! आजादी के आंदोलन में भी जिन्होंने जान दी उन्हें क्या मिला? 50 वर्षो के बाद बधिया 27 प्रतिशत आरक्षण। सत्ता-संस्‍थानों और संसाधनों पर एकछत्र सवर्णों का कब्जा है। असुरों/पिछड़ों के हक की लड़ाई लड़ने वालों को आज भी दमन किया जा रहा है, बदनाम किया जा रहा है। जिसके कारण हमारे नेता पिछड़ों का नाम लेने से कतराने लगे हैं।
महिशासुरः पिछड़ों के नायक
देश के विभिन्न हिस्सों में कई जातियां महिशासुर को अपना नायक मानती हैं। बंगाल के पुरूलिया जिले में महिशासुर की पूजा होती है और मेला लगता है। वहां के लोग महिशासुर को अपना पूर्वज मानते हैं। झारखंड में असुर जनजाति के लोग अपने को महिशासुर का वंशज मानते हैं। कवयित्री सुषमा असुर ने 'फारवर्ड प्रेस' के साथ साक्षात्कार में कहा था-'देखो मैं महिशासुर की वंशज हूं।' झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन भी महिशासुर को अपना पूर्वज मानते हैं। शिबू सोरेन ने रावण को अपना पूर्वज बताते हुए पुतला दहन से इनकार कर दिया था। मध्यप्रदेश में रहने वाली कुछ जनजातियां महिशासुर को अपना पूर्वज मानती है। 2008 में 'यादव शक्ति' पत्रिका ने दावा किया था कि महिशासुर पषुपालक जातियों के नायक थे। पत्रिका का आवरण कथा ही था-'यदुवंश शिरोमणि महिशासुर।'
हत्या के जश्‍न दशहरा को प्रतिबंधित किया जायः
अब जब यह साबित हो गया है कि यहां के मूल निवासियों (पिछड़ा-दलित-आदिवासी) के राजा थे तब उनकी हत्या के जश्‍न के रूप में दशहरा मनाने से मूलनिवासियों की भावनाएं आहत होती हैं। वैसे भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी की हत्या का जश्‍न मनाना कहां तक जायज है? हम भारत के राष्‍ट्रपति, प्रधानमंत्री और सवर्ण की पक्षधर सुप्रीम कोर्ट से मांग करते हैं कि दशहरा पर रोक लगाई जाय। हम सामाजिक न्याय की पक्षधर शक्तियों से महिशासुर के पक्ष में खड़े होने की अपील करते हैं।
17 अक्टूबर, 2013 को जेएनयू में आयोजित महिशासुर शहादत दिवस में आप सभी आमंत्रित हैं।
स्थानः .1 ऑडिटोरियम, जेएनयू, नई दिल्ली, 3 बजे दिन।
आमंत्रित अतिथिः कांचा इलैया, चंद्रभान प्रसाद, प्रेमकुमार मणि, प्रो विवेक कुमार

ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम संपर्कः 9716839326



Saturday, September 21, 2013

ये फिल्म जरूर देखे जय भीम कामरेड

पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त- जयभीम कामरेड
संजीव खुदशाह
पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त। ये जुमला आनंद पटवर्धन की फिल्म ‘‘जयभीम कामरेड’’ पर सौ फीसदी सही बैठता है। उन्होने एक ऐसी फिल्म बनाई जो डाक्युमेन्ट्री होते हुए भी फिचर फिल्म की तरह आगे बढ़ती है। इसके पात्र असल जिंदगी के है। वे गाते है, नुक्कड़ नाटक करते है, लोगो को जागृत करते है, शहीद भी होते है, आत्महत्या भी करते है तथा जेल भी जाते है। बिल्कुल फीचर फिल्म की तरह। किन्तु इसके पात्रों की मृत्यु होना, जेल जाना अभिनय का हिस्सा नही हैं। एक वास्तविक घटना है। यह फिल्म कुल 14 साल में बन कर तैयार हुई। इसमें कई कहानियां एक साथ चलती है। शायर विलास घोगरे, ईस्पेक्टर मनोहर कदम, भोतमागे परिवार, कबीर कलामंच, शीतल साठे आदि आदि।
ये फिल्म 11/7/1997 को मुम्बई के रमाबाई नगर मे स्थित अम्बेडकर की मूर्ति पर चप्पल की माला पहनाकर अपमानित करने की घटना से प्रारंभ होती है। इस अपमान  के विरोध में रमाबाई नगर के दलित मजदूर शांति पूर्वक प्रदर्शन करने के लिए निकले ही थे कि महाराष्ट्र पुलिस ने उन पर फायरिंग कर दी। इस गोली कांड में 10 दलित मारे गये। इसी नगर में शायर विलास घोगरे झोपड़ीनुमा घर मे रहते है और अपनी सुरीले गीतो से लोगो में जागृति लाने का काम कर रहे है। वे इस घटना से इतने आहत होते है कि 4 दिनो बाद 15 जुलाई को आत्महत्या कर लेते है।
चारो ओर इस गोली कांड की निदा की जाती है। गौर तलब है कि इस हत्याकांड को सही साबित करने के लिए पुलिस ने एक झूठा विडियो भी जारी करती है। जिसमें काटछांट कर यह दिखाने की कोशिश की गई कि टैंकर में आग लगने के कारण बचाव में फायरिंग की गई थी, जबकि वहां कोई टैकर था ही नही। अम्बेडकरवादियों ने इस हत्याकांड के विरोध में प्रदर्शन किया और दबाव में आकर तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने इसकी जांच के लिए गुण्डेवार कमीशन बिठाया। लेकिन फायरिंग का आदेश देने वाले इंस्पैक्टर मनोहर कदम को तरक्की दे दी गई। लंबी लड़ाई के बाद 2009 में कोर्ट ने इंस्पैक्टर कदम को धारा 304 के तहत आजीवन करावास की सजा सुनाई। दूसरी ओर हाई कोर्ट ने उसे जमानत पर रिहा कर दिया। तब तक सरकार ने कदम को अस्पताल में रखा। महाराष्ट्र के डीजीपी ने ब्यान दिया की तकनीकी गलती की वजह से कदम को सजा हुई इसलिए उन्हे अस्पताल में रखा है। ये सारी घटनाएं क्रमानुसार इस फिल्म में बखूबी फिल्माया गया है।
इसी प्रकार खैरलांजी की बलात्कार हत्याकांड की घटना तथा उसके खिलाफ हुए प्रदर्षन को विस्तार दिखाय गया है। इस फिल्म का दूसरा भाग में कबीर कला मंच और उसकी गतिविधियों पर फोकस  है। कबीर कला मंच के मुख्य सदस्यों में से एक दलित कलाकार शीतल साठे है वह एक ऐसे गरीब परिवार से ताल्लुक रखती है जहां उसकी मां थाली में देवी देवताओं की मूर्ती सजाकर भिक्षा मांगने का व्यवसाय करती है। उसका घर झोपड़ पट्टीयों के बीच पुरानी टीन के चादरों से बना हुआ है। कबीर कला मंच के कार्यक्रमों के दौरान उन्होने अंर्तजातिय विवाह किया। तंगहाली होने के बावजूद शीतल पुणे यूनिवर्सिटी से एम.ए. गोल्डमेडलिस्ट है और वह गलियां, नुक्कड़ो में गीत के माध्यम से अम्बेडकर, फूले, कबीर एवं भगत सिंह के विचारों से लोगो को जागृत करने में लगी हुई है।
शीतल साठे फिल्म ‘‘जयभीम कामरेड’’ में एक कुशल अभिनेत्री की तरह सामने आती है इस फिल्म में वह कई सभाओं में कार्यक्रम प्रस्तुत करती देखी जाती है। मै आपको बताना चाहूगां की शीतल ने ये काम किसी फिल्म के लिए नही किया बल्कि फिल्मकार ने इसकी गतिविधियों को एक फिल्म की तरह पर्दे पर उतारा है। कहा जाता है, इसी दौरान गरीबों की जमीन हड़पने वाले सेज तथा विल्डरों के खिलाफ इस मंच ने आंदोलन छेड़ा। इसी से खफा होकर सरकार ने इन्हे नक्सली बताना प्रारंभ कर दिया। और उनके खिलाफ ए.टी.एस. (आंतंकवाद निरोधक दस्ता) को लगा दिया। सबसे पहले 2011 में दीपक डेगले की  गिरफतारी Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA) के तहत हुई। दिपक का टार्चर हुआ। मंच के बाकी सदस्य भूमिगत हो गये. तब जक जय भीम कामरेड प्रद‍िर्शित हो चुकि थी, और कबीर कला मंच के बारे में झूठा प्रचार कमजोर हुआ। हाई कोर्ट ने दीपक और 5 अन्य को जमानत दे दी। मंच हिम्मत बढी और आखिर 2 अप्रैल 2013 को महाराष्ट्र विधान सभा के सामने सत्याग्रह के दौरान शीतल साठे और सचिन माली स्वयं सामने आये और गिफतार हो गये। इन पर भी (UAPA) के तहत आरोप लगाये गये। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस समय शीतल गर्भवती है।
हालांकि फिल्म ‘‘जयभीम कामरेड’’ 1997 से प्रारंभ होकर 2011 में पूरी हो गई थी। लेकिन इस फिल्म में पर्दे पर उतारी गई घटनाएं और किरदार आज भी गतिशील है। आज टीवी पर शीतल के रिहाई का दृश्‍य देखकर लगता है फिल्म अभी भी चल रही है।
सचमुच यह फिल्म आम दर्शको से अपने आपको जोड़ पाती है। चौदह साल तक एक फिल्म पर कार्य करना मजबूत इरादे की बदौलत ही संभव है। इसके लिए आनंद पटवर्धन बधाई के पात्र है। इस फिल्म को कई राष्ट्रीय अंर्तराष्ट्रीय अवार्ड से नवाजा गया है। जयभीम कामरेड दरअसल उन लोगो की कहानी है जो नाच गाने के माध्यम से अम्बेडकरी और मार्क्सवादी विचार धारा का मेल कर जन-जन तक पहुचा रहे है इनका प्रभाव समाज में इस कदर पड़ रहा है कि लोग भ्रष्टाचार, शोषण के खिलाफ उठ खड़े हो रहे है और सामंतवादी सरकार को इन्हे नक्सली कहकर जेल में डालने को मजबूर हो ना पड़ रहा है।
आज शीतल साठे जमानत पर आजाद हो गई लेकिन उनके तीन साथी सचिन माली, सागर गोरख और रमेश गायचर अभी भी जेल में है। महाराष्ट्र देश में सांस्कृतिक क्रिया कलापों की धानी मानी जाती है। ऐसे स्थान में कबीर कला मंच को नक्सली करार देने से महाराष्ट्र के सांस्कृतिक आंदोलन हानि पहुच रही है। क्या इस देश में कबीर, आंबेडकर और भगत सिंह के गीत गाना गैर कानूनी है। यदि सरकार ऐसा मानती है तो कबीर, आम्बेडकर और भगत सिंह को नक्सली घोषित कर देना चाहिए।
यह बड़ा ही गंभीर मसला है कि सरकार के निशाने में आज बुध्दिजीवी है। वह वर्ग जो अपने विचार के बल पर समाज को जागृत करने का काम कर रहे है, आज लेखक, साहित्यकार, सांस्कृतिक कर्मी, फिल्मकार सभी सरकार के रडार पर है। जो भी व्यक्ति व्यवस्था की खामियों को उठाता है उसे सरकार आतंकवादी या नक्सली घोषित करने में जरा भी देर नही करती। यह नही भूलना चाहिए की भारत एक लोकतांत्रिक देश है जनता के लिए जनता के द्वारा शासित। मुझे ऐसा लगता है अब आनंद पटवर्धन को जयभीम कामरेड पार्ट-2 बनाने की आवश्‍यकता पड़ेगी क्योकि इसके पात्र अभी भी अपने लक्ष्य के लिए संघर्ष कर रहे है।
संजीव खुदशाह
Sanjeev Khudshah
M-II/156, Phase-1,

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