मुक्ति कौन पथे Mukti kon pathe

mukti koun pathe

बाबा साहेब डाँ अंबेडकर का प्रसिघ्द भाषण मुक्ति का रास्ता क्या है?

(अखिल मुंबई इलाखा परिषद, मुंबई, दिनांक 31 मे 1936)

सज्जनो, बन्धूओं और बहनो !

इस परिषद का आयोजन, मेरे धर्म परिवर्तन की घोषणा के विचार हेतु, पूर्ण नियोजित ढंग से किया गया। यह आप लोग जान चुके है। धर्म परिवर्तन का विषय मेरी दृष्टि से अपार स्नेह एवं चिन्तन का विषय है। केवल इतना ही नहीं, तो आप सब लोगों का आगामी जीवन मेरी दृष्टि से उपरोक्त विषय पर निर्भर होने के कारण वह बहुत महत्वपूर्ण लगता है। इसका महत्व आप लोगो को समझ में आ चुका होगा, ऐसा निश्चित रूप से कहा जा सकता है। यदि ऐसा न होता तो आज इतनी बड़ी संख्या में आप यहा एकत्रित नहीं होते। और आप सब यहां एकत्रित हुये है, यह देखकर मुझे अपार खुशी हो रही है।

धर्म परिवर्तन करने की घोषना के बाद से ही अनेक स्थान पर छोटी-बड़ी तादात में सभा का आयोजन कर हमारे लोगों ने इस विषय पर अपने विचारों को व्यक्त किये, उन्हें सबने सुना, परंतु सभी लोग एक जगह इकट्ठा होकर विचार-विमर्श कर धर्म परिवर्तन के प्रश्न पर निर्यात्मक रूप से चर्चा करने का अवसर हमें अब तक नहीं मिल पाया था। उस अवसर की आप लोगों से भी अधिक मुझे आवश्यकता थी। धर्म परिवतर्न की मुहिम सफल होने के लिए पूर्व तैयारी की बहुत आवश्यकता होती है, यह बात आप सभी को स्वीकार करनी होगी। धर्म परिवर्तन करना कोई बच्चों का खेल नहीं है। धर्म परिवर्तन मनोरंजन का भी विषय नहीं है। यह मनुष्य के जीवन की सफलता का प्रश्न हैं।

जिस प्रकार जहाज के कप्तान को जहाज एक बन्दरगाह से दूसरे बन्दरगाह ले जाने के लिए जितनी पूर्व तैयारी की आवश्यकता होती है, उतनी ही पूर्व तैयारी धर्म परिवर्तन हेतु करनी पड़ेगी। इसके बगैर एक किनारा छोड़ने के बाद दूसरा किनारा मिल पाना संभव नहीं है। किंतु जहाज में कुल कितनी संख्या में यात्री आने है, इस बात की जानकारी हासिल किए बिना जहाज का कप्तान आवश्यक सामान जुटाने के प्रयास में नही लगता, इसी तरह मेरी भी अवस्था है। कुल कितने लोग धर्म परिवर्तन करने के इच्छुक है, इसकी पुरी जानकारी के बिना मेरा धर्म परिवर्तन की पूर्व तैयारी के काम में जुट पाना संभव नहीं। इसलिए अपने लोगों की कही पर सभा हुए बगैर जनमत का अंदाजा लगाना संभव नहीं, ऐसा मुझे लगा, और यह बात जब मैंने मुंबई के अपने कार्यकर्ताओं के समझ रखी तो उन लोगों ने खर्चों का अथवा मेहनत का कारण देकर टाल-मटौल की बात न करते हुए परिषद का आयोजन करते हेतु, उसकी जिम्मेदारी सहर्ष स्वीकार की। यह जिम्मेदारी ठीक से निभाने हेतु कितने कष्ट सहन करने पड़े इसकी जानकारी से हमारे पूज्य नेता एवं स्वागत समिति के अध्यक्ष माननीय रैवजी दगडूजी डोलस, इन्होंने अपने भाषण में विस्तार पूर्वक आपको अवगत कराया है। इतने दुखों को सहन करने के बाद में भी उन्होंने मेेरे लिया इस सभा का आयोजन किया हैं, इसके लिए मैं परिषद की स्वागत समिति का अत्यन्त श्रणी हूँ।

केवल महार समाज की ही परिषद क्यों ?

मेरी धर्म परिवर्तन की घोषणा सभी अछूतों के लिए है तो फिर सभी अछूतों की सभा का आयोजन क्यो नहीं किया गया ? केवल महार सभा का आयोजन ही क्यों किया गया ? इस तरह का आपेक्ष कुछ लोग ले सकते है। जिस विषय की चर्चा करने के लिए यह सभा बुलाई गई है उस विषय का समाधान पूर्वक उत्तर देने के पूर्व, मुझे इस आपेक्ष का उत्तर देना आवश्य जान पड़ता है। महार समाज की ही क्यों सभा बुलाई गई, सभी अछूतों की सभा क्यों नहीं बुलायी गयी ? इस बात के पिछे अनेक कारण है। पहला कारण यह की इस परिषद में किसी भी तरह की मांग नहीं करनी है, सरकार से कोई भवी राजनैतिक अधिकारों की मांग नहीं करनी है अथवा हिंदू लोगों से कुछ सामाजिक अधिकारों की मांग नहीं करनी है। अपने जीवन को किस तरह से सुखमय बनाना है, अपने भविष्य की रूप रेखा किस तरह बनानी है, केवल यही प्रश्न इस परिषद की चर्चा का विषय है। यह प्रश्न भिन्न जातियों के स्वतंत्र रूप से विचार-विमर्श कर हल करना ही बेहतर होगा। जिन कारणों से सम्पूर्ण अछूतों सभा संयुक्त रूप से आयोजित करना मुझे अनावश्यक लगा, यह उनमें से एक कारण है। केवल महार समाज की परिषद आयोजित करने का दूसरा भी कारण है। धर्म परिवर्तन की घोषना किए हुए आज लगभग दस महिनों का समय बीत चुका है। इस दौरान जनजागृति का बहुत कुछ कार्य हो चुका है। अब जनमत के अवलोकन का समय आ चुका है ऐसा मुझे लगता है। जनमत का अंदाजा लगाने हेतु अलग-अलग जातियों की सभाओं का आयोजन करना यह सीधा और सरल मार्ग है, ऐसी तमेरी नीजी धारणा है। धर्म परिवर्तन का प्रश्न कृति में लाने के लिए जिस प्रयास की आवश्यकता है, वह प्रयास करने के पूर्व जनमत का सही रूझान क्या है इस बात का यकिन रक लेना बहुत आवश्यक है। और मेरी यह धारणा है कि अलग-अलग जाति की सभा का आयोजन कर आजमाये गये जनमत के बारे में जो यकिन किया जा सकता है वैसा यकिन सम्पूर्ण अछूत जाति की संयुक्त रूप से सभा का आयोजन करके आजमाये गये जनमत के विषय में किया नहीं जा सकता हैं। क्योंकि सभी अछूतों की इकठ्ठी परिषद ऐसा नाम देकर यदि सभा का आयोजन किया जाये तब भा वह सभी अछूत जनो के प्रतिनिधीक स्वरूप कर सभा नहीं हो सकेंगी। ऐसा न तथा जनमत का यकिन कर सके इसलिए केवल महार लोगों की सभा का आयोजन किया गया है। इस सभा में अन्य अछूत जातियों को शामिल नहीं करने से उनकी कोई हानी नहीं हो सकती। उन्हें यदि धर्म परिवर्तन नहीं करना हो तो उनको इस सभा में सम्मिलीत नहीं करने के कारण, उन्हें बूरा लगने का औचित्य नहीं। परंतु उन्हें यदि धर्म परिवर्तन करना हो तो तब, इस सभा में उनको शामिल नहीं किया जा सका इस वजह से उनके धर्म परिवर्तन में कोई बाधा नहीं आयेगी। जिस तरह महार लोगों की सभा का आयोजन हुआ है, उसी तरह अस्पृश्यों की अन्य जातियों ने अपनी-अपनी जातियों की सभा आयोजित कर धर्म परिवर्तन के विषय पर अपना जनमत अभिव्यक्त करने का अवसर खुला है और इस तरह का आयोजन वह भी करें, ऐसा अनुरोध मैं उन्हें करता हूँ। और इस कार्य हेतु मुझसे जो भी सहयोग हो सकेगा, वह मैं सहर्ष देने के लिए तैयार हूँ। अब तक की जो बाते मैंने आपको बताई है वह मात्र भूमिका पर थी। अब मैं आज की सभा के प्रमुख विषय पर आपका ध्यान आकर्षित करता हूँ।

धर्म परिवर्तन का विषय जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही वह गहन भी है। सीधे सामान्य आदमी के बुद्धि को उसका आकलन हो पाना कठिन है। उसी भाँती आम आदमी को धर्म परिवर्तने के समान विषय को समझाना साधारण काम नहीं है। तथापि आप सब को पूर्ण रूप से समझाये बिना धर्म परिवर्तन कृती में लाना मुश्किल है, यह मैं पूरी तरह जाता हूँ और इसलिए जितनी सरलता से इस विषय पर विवेचन किया जा सकता है उतनी सरलता से मैं करूंगा।

धर्म परिवर्तन का भौतिक कारण

धर्म परिवर्तन के विषय पर दोहरे दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए। उस पर सामाजिक दृष्टि से विचार करना आवश्यक है, तथा धार्मिक दृष्टि से भी विचार होना आवश्यक है। ऐहिक दृष्टि से विचार करना चाहिए उसी भाँती तात्वीक दृष्टि से भी विचार करना आवश्यक है। चाहे किसी भी दृष्टि से धर्म परिवर्तन पर विचार किया जाए तो सर्वप्रधम छुआ-छुत क्या बला है ? उसका वास्तविक स्वरूप क्या है ? इसे पूरी तरह समझ लेना आवश्यक है। उसके बगैर मेरी धर्म परिवर्तन की घोषना का अर्थ आपकी समझ में नहीं आ पायेगा। अष्पृश्यता क्या बला है ? और इसका सही स्वरूप क्या है ? यह आपको ज्ञात हो इसलिए सर्वप्रथम होने वाले अन्यायों की याद दिलाना आवश्यक हैं। सरकारी पाठशाला में बच्चों का दाखिला करने का अधिकार जताने से, कुँओं से पानी निकालने का अधिकार माँगने से, दुल्हें को घोड़े पर बिठाने का अधिकार जताने से, सवर्ण हिंदूओं द्वारा मारपीट किए जाने की घटनाए आये दिन होती है, और इससे सभी भली भाँति अवगत है। परंतु मार पीट किये जाने के और अन्य अनेक कारण भी है और उनका जिक्र किए जाने से भारत के बाहर की दूनिया के अन्य लागों को बड़ा आश्चर्य होगा। बढ़िया कपडे पहनने की वजह से मारपीट किए जाने के अनेक उदाहरण दिए जा सकते है। गहने पहनने की वजह से तारपीट के उदाहरण दिए जा सकते हैं। तांबा और पीतल के बर्तन का उपयोग पानी लाने के लिए किए जाने के कारण मारपीट के उदाहरण दिये जा सकते है। जमीन जायदाद खरिद किए जाने से, घर जला देने के उदाहरण दिये जा सकते है। जनेऊ पहनने के कारणों से मारपीट किए जाने के उदाहरण दिए जा सकते है। मरे हुए जानवरों को उठाने से मना करने पर तथा मृत मांस खाने से मना करने पर भी मारपीट किए जाने कके उदाहरण दिये जा सकते है। जूते जुराब पहनकर गांव में चलने से, सवर्ण हिंदूओं को पायलागी कर अभिवादन न किए जाने से, शौच के लिए लोटा इस्तेमाल करने पर, यातना दिए जाने के उदाहरण दिये जा सकते है। पंचायत के दावत में रोटी परोसी जाने पर पिटाई किए जाने की घटना हाल ही मंे हुई हैं। उपरोक्त अन्याय, अत्याचार होने की तथा आपसे अमानविय बर्ताव किए जाने की अनेक घटनाएँ आपने सुनी होगी। और आपसे में से कुछ लोगों को तो प्रत्यक्ष अनुभव भी होगा। जहाँ पिटाई संभव न हो वहाँ बहिष्कार के अस्त्र का इस्तेमाल आप लोगों के विरोध में किस तरह से किया जाता है, इस बात को भी आप भली भाँति जानते हो। मजदुरी नहीं मिलने देना, खेती की मुंड़ेर से जानवरों को नहीं जाने देना, हम लोगों का गांव में प्रवेश के लिए मनाही करना आदि सभी तरह की मनाही कर सवर्ण हिंदू लोगों ने आप लोगो का जिना मुश्किल कर दिये जाने की यादें आप में से बहुतों के जहन में होगी। परंतु ऐसा सब कुछ क्यों होता है ? इसकी जड़ में क्या हैं ? यह बात मेरी समझ से आप में गिने चुने लोगों के ही समझ मे आती होगी। यह बात आप सभी को जानना अतिआवश्यक है।

यह वर्ग कलह की बात है

उपरोक्त जो कलह के उदाहरण बताए गये है, उससे आदमी के गुण दोषों का कुछ भी सम्बन्ध नहीं हैं। यह दो दुष्टों के बीच का कलह नहीं है। छुआ-छूत की यह समस्या वर्ग कलह की समस्या है। सवर्ण और अछूत समाज के बीच का यह कलह है। किसी एक आदमी के शोषण का प्रश्न ही नहीं है। किसी एक आदमी पर हो रहें अन्याय का यह प्रश्न नहीं है। यह प्रश्न एक समाज वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर किए जा रहें शोषण का प्रश्न है। यह एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर किए जा रहें शोषण का प्रश्न है यह वर्ग कलह सामाजिक दर्जा संम्बधी कलह है। एक वर्ग ने दूसरे वर्ग से बर्ताव करते समय किस प्रकार का बर्ताव करना है इस संम्बध का यह कहल है। इस कलह के जो उपरोक्त उदाहरण बताए गये है, उससे जो मुख्य बात खुले आम स्पष्ठ हो जाती है, वह यह की आप उच्च वर्ग से बर्ताव करते समय बराबरी के नाते से बर्ताव किए जाने की बात करते हो, इसलिए यह कलह उत्पन्न होता है। अगर यह सच नहीं है तो, रोटी का भोजन परोसने से, किमती कपड़े पहनने से, जनेऊ पहनने से, पितल या तांबे के बर्तन रखने से, घोडे पर बारात ले जाने से उच्च वर्ग की किसी भी तरह की  कोई हानी नहीं की जाती। आप सब इन बातों में अपनी ही जेब हल्की करते हो। फिर भी उच्च वर्ग में हमारा ऐसा करने से रोष क्यों हैं ? इस रोष की एक वजह है, और यह की हमारा समता से जिने का बर्ताव उनके झुठे बडप्पन को चोट पहूचांता है। आप नीच हो, अपवित्र हो, ऐसी उनकी धारणा है। आप निम्न पायदान पर रहो तो वो आपको सूख पूूर्वक जिने देंगे। यदि आपने अपने पायदान को छोड़ दिया तब कलह प्रारंभ होता हैं, यह बात निर्विवाद है। उपरोक्त उदाहरण से एक बात और स्पष्ट हो जाती है कि छुआ-छूत कभी कभार की बात न होकर स्थायी है। यह बात यदि स्पष्ट शब्दों में हम कहें तोयह है कि सवर्णाें और अछुतों के बीच का कलह स्थायी है। और वह कई सदियों तक ऐसा ही रहेगा। इसकी वजह यह है कि जिस धर्म ने तुम्हें निचे का स्थान दिया है, वह उच्च वर्ग की धारणा के अनुसार सनातन है। और उस धर्म में किसी भी तरह का संसोधन समयानुसार संभव नहीं है। आप आज जिस तरह से नीच हो उसी तरह स्थायी रूप से रहना होगा। इसका मतलब यह है कि सवर्ण और अछूातों में यह कलह स्थायी रूप से रहेगा। इस कलह से आपका छुटकारा किस तरह से हो, यह मुख्य प्रश्न है। और आपको इस प्रश्न पर विचार किए बगैर पर्याय नहीं, ऐसा मेरा विचार है। आप में से जिन लोगों को हिंदू लोग जिस अवस्था में रखना चाहेंगे वैसा रहने के जो इच्छुक है, उनके सेवा धर्म को स्वीकार कर, जिन्हें जीवन यापन करना है, उन लोगों को इन समस्या पर सोचने की आवश्यकता नहीं है, परंतु जिन्हें स्वाभिमान से जिना आवश्यक महसूस होता है, उन्हें इस समस्या पर विचार किए बगैर पर्याय नहीं है। किस तरह से इस कलह से बचाव किया जा सकता हैं ? इसका विचार करने की उन्हें आवश्यकता है। कलह से हमारा बचाव कैसा होगा इस समस्या पर निर्णय लेना मुझे तसे बहुत कठिन महसूस नहीं हसे रहा है। यहां पर इकठ्ठा हुए सभी लोगों को एक बात स्वीकार करनी होगी, और वह यह है कि किसी भी कलह में जिसके पास सामथ्र्य होता है, उसकी ही जित होती है। जिनके पास सामथ्र्य नहीं है, वह विजय की आशा नहीं रख सकते। यह बात सभी ने अपने जीवन में अनुभव की है। इसलिए उसके समर्थन में कोई सबूत देने की आवश्यकता नहीं है।

प्रथम सामथ्र्य प्राप्त करें

इसके बाद जिस प्रश्न पर आपको विचार विमर्श करना आवश्यक है, वह यह है कि इस कलह से छुटकारा प्राप्त करने के लिए आपके पास पर्याप्त सामथ्र्य है ? इंसान को तीन तरह का सामथ्र्य मिला हुआ है। उसमें एक मनुष्यबल है, दुसरा सम्पŸाी बल है, और तीसरा मानसिक बल है। क्या आपको लगता है कि इन तिनों प्रकार की शक्तियों में कोई शक्ति आपको उपलब्ध है ? मनुष्य बल की दृष्टि से यदि देखें तो आप लोग अल्पसंख्यक में हो, यह बात स्पष्ट है। मुंबई प्रदेश में अछुत वर्ग की आबादी एक बटा आठ है। और वह भी संगठित नहीं है। हमारे आपस के जातिभेद के फलस्वरूप उसमें संघ शक्ति का संपूर्ण अभाव है। हम संघठित तो है ही नहीं, परंतु हम इकठ्ठा भी नहीं है, और गाँव, कस्बों में बिखरे पड़े है। इसी कारण से हमारी अल्पसंख्या का भी किसी तरह का लाभ आपात काल में संकटग्रस्त अछूतों की बस्ती का नहीं हो सकता। धन बल की दृष्टि से देखे तो आपकी वही लाचार व्यवस्था है। आप लोगों के पास थोड़ा बहुत मनुष्य बल तो है, ऐसा कहा जा सकता है, परंतु आप लोगों के पास धनबल कतई नहीं है, यह बात निर्विवाद रूप से स्पष्ट है। आप लोगों के हाथ में व्यापार नहीं, उत्पन्न नहीं, नौकरी नहीं, खेती भी नहीं है। उच्च वर्ग के लोग जो कुछ भी दया स्वरूप देंगे, वही आपकी जिविका का साधन है। आपके पास अनाज नहीं है, आपके पास कपडालत्ता भी नहीं है। फिर आपके पास घनबल कैसे होगा ? यदि आप पर अन्याय हो रहा हो तो उसके विरोध में न्यायालय से न्याय की माँग करने की भी शक्ति आपके पास नहीं है। आप में से हजारो लोगो को न्यायालय का खर्चा उठाने की हैसियत न होने से हिन्दू लोगों द्वारा होने वाले अन्याय, विडम्बना और अल्याचार को आप चुपचाप सह रहे हो। मानसिक शक्ति की तो इससे भी बड़ी कमी है। सैकड़ों वर्षो से, उनके द्वारा हो रहे अन्याय अत्याचारो को, घृणा को चुपचाप सहते जाने से पलट कर जवाब देने की और प्रतिकार करने की आप की हिम्मत नष्ट हो गई है। आप लोगो का आत्मविश्वास, उत्साह एवम् महत्वाकांक्षा मर सी गयी है। आप सब लोग हताश, लाचार एवम् निस्तेज हो चुके हो, निराशाा और कायरता का माहौल सभी ओर छा गया है। हम भी कुछ कर सकते है, इस तरह का विचार भी किसी के जेहन को छुता तक नहीं।

आप का ही छल क्यों होता है ?

आपकी दशा का वास्तविक वर्णन जो मैने प्रस्तुत किया है, यदि वह सच है, तब उससे निकलने वाले निष्कर्ष को आप सभी ने स्वीकार करना होगा। और वह यह है कि यदि आप, अपने सामथ्र्य का अभाव होने के कारण ही आप पर अन्याय-अत्याचार होता आया है, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। इस अँचल में केवल आप ही अल्पसंख्या में हो ऐसी बात नहीं है। आप की तरह ही मुसलमान भी अल्पसंख्या में है। जिस तरह महार, मांग जाती के लोगों के दो चार मकान गाँव में होते है, उसी तरह मुसलमानों के भी एक दो मकान गांव में होते है। परंतु उन मुसलमानों को कोई भी आदमी छेड़ता नहीं। परंतु आपकी जाति के दस मकान होने पर भी, गाँंव के लोग आप लोगों का हर तरह का छल करते है, ऐसा क्यो होता है ? यह प्रश्न बहुत महत्वपुर्ण है। और उसकी खोज आप लोगों ने अच्छी तरह करनी चाहिए। मेरी दृष्टि से इस प्रश्न का एक ही उत्तर है, और वह यह कि उन दो मुसलमानों के मकानो के संरक्षण में सम्पूर्ण हिन्दुस्तान के मुसलमानों की शक्ति तथा सामथ्र्य है, यह बात हिन्दु लोग अच्छी तरह से जानते है, और इसलिए उन दो मुसलमानों के मकानों से छेड़खानी करने की कोई भी हिन्दू हिम्मत जुटा नही पाता। उन दो मुसलमानों के मकानो को यदि कोई ठेस पहुँचाता है तो पंजाब से लेकर तमिलनाड़ू तक का मुसलमान अपनी सम्पूर्ण शक्ति से उन पीड़ित मुसलमानों की रक्षा हेतु जुट जाएगा, इस तरह का आत्मविश्वास उनमें होने के कारण वे मुलमानों के मकान निर्भयता से अपना जीवन यापन करते है। लेकिन आपके विषय में हिन्दु लोगों को यकिन होता है कि आपकी कोई भी सहायता करेगा नहीं, आप लोगों के लिये कोई भी दौड़कर सहायता के लिये आयेगा नहीं, आपको पैसे की भी सहायता करेगा नहीं, और अधिकारी वर्ग की भी आपको सहयता नही मिल पायेगी। तहसिलदार, पुलिस आदि उन्ही लोगों के होने के कारण छुत-अछुतो के संषर्घ में वे जाति विशेष के पक्षधर हो जाते है, वह अधिकारी अपने कर्तव्य का पालन नही करते, इस बात का पक्का विश्वास उन्हें होता है। आप लोगो की लाचार अवस्था के कारण ही हिन्दू लोग आप पर जुल्म और अन्याय करते है। 

यहाँ तक का मैंनें जो स्पष्टीकरण दिया है, उसमें दो बातें साफ हो जाती है। उनमें से एक बात यह है कि, बगैर सामथ्र्य के आप इस अन्याय अत्याचार का प्रतिकार नहीं कर सकते। दूसरी बात यह की आज प्रतिकार करने हेतु आवयश्क सामथ्र्य आपके पास नहीं है। इन दो बातों के स्पष्ट हो जाने के बाद तिसरी बात अपने आप स्पष्ट होती है, वह यह की, आपको आवश्यक सामथ्र्य कही  बाहर से प्राप्त करना होगा। यह सामथ्र्य आपको किस प्रकार से प्राप्त होगा, यही सचमूच अतिमहत्वपूर्ण प्रश्न है और इस पर आपनक गंभिरता से विचार करना चाहिए।

बाहर से सामथ्र्य प्राप्त करना चाहिए

इस देश में स्थित जातिभेद तथा धर्मभेद का लोगों के मन मस्तिष्क पर तथा नैतिकता पर विलक्षण प्रभाव है, ऐसा मुझे दिखाई देता है। इस देश में दुःख दरिद्रता और क्लेश के विषय में किसी को भी खेद नहीं है, और यदि होगा भी तो वह उनके निवारण हेतु कोई प्रयास करते नहीं। लेकिन अपने धर्म बंधुओं पर अथवा जातियों पर यदि कोई दुःखों की, संकट की घड़ी आयी तब अथवा उन पर किसी प्रकार का कोई अत्याचार हुआ तब वह लोग उन्हें हर प्रकार से सहायता देते है। यह नैतिकता की दृष्टि से चाहे जितना भी विकृत हो परंतु वह जारी है इसे हमें नही भूलना चाहिए। जिस किसी गाँव में अछुत लोगों पर हिंदूओं द्वारा अत्याचार किया जाता है, उस गाँव में अन्य धर्म के लोग नहीं बसते है, ऐसी बात नहीं है। अछुतों पर हो रहा अत्याचार अन्यायकारी है, एह बात उनके मन में ठेस पहूँचाती नहीं, ऐसी भी बात नहीं है। लेकिन अछुतों पर अन्याय हो रहा है, यह जानते हुए भी वह उनकी सहायता के लिए उठ खड़े नहीं होते। इनकी कौनसी बजह है ? आप लोग हमारी सहायता क्यों नहीं करते ? यदि हम उनसे ऐसा प्रश्न करें तो वह कहते है कि ‘आप लोगों के आपसी विवाद में हम लोग क्यों दखल अंदाजी करें, यदि आप हमारे धर्म को मानने वालों में से होते तो हम आपकी सहायता किए होते’ इस तरह का उŸार वह आपको देते है। इससे यह बात आपको स्पष्ट हो जायेगी की अन्य किसी समाज से रिस्ते नाते जोड़े बगैर या धर्म में सम्मिलीत हुए बगैर आप लोगों को बाहरी सामथ्र्य प्राप्त नहीं हो सकता। इसका सिधा स्पष्ट आशय यह है कि आप लागों ने धर्म परिवर्तन कर किसी अन्य समाज में शामिल होना होगा।  उसके बगैर आपको उस समाज का सामथ्र्य प्राप्त नहीं होगा और जब तक आपके पास सामथ्र्य नहीं है, तब तक आपको और आपके आने वाली पिढ़ि को आज की लाचारी वाली स्थिती में ही जीना होगा

धर्म परिवर्तन के आध्यात्मिक कारण

ऐहिक कल्याण हेतु धर्म परिवर्तन की आवश्यकता क्यों है, इसका दिग्दर्शन अब तक के विवेचन में किया गया हैं। अब आध्यात्मिक कारणों के लिए धर्म परिवर्तन किस तरह आवश्यक है, इस संबंध में मेरे विचार में आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ। सर्वप्रथम धर्म किस लिए होता है ? उसकी क्या आवश्यकता है ? यह जान लेना चाहिए। धर्म की अनेक लोगों ने की हुई अनेक तरह की परिभाषा आपको दिखाई देती है। परंतु इन सभी में अर्थपूर्ण एवं सभी को मान्य होगी, ऐसी केवल एक ही परिभाषा है। ‘जिससे सम्पूर्ण जनता का धारण होता है, वही धर्म’ यही धर्म की सही परिभाषा है। यह धर्म की परिभाषा मैंने नहीं की है। यह परिभाषा सनातनी हिंदूओं के नेता बालगंगाधर तिलक द्वारा की हुई है। इसलिए धर्म की परिभाषा के संबंध में मैंने तोड़ मरोड़ की है, इस तरह का आरोप मुझ पर कोई लगा नहीं सकता। यह परिभाषा मेरी न होने पर भी, वह मुझे वाद-विवाद के लिए मान्य है, ऐसा कुछ भी नहीं है। मुझे यह परिभाषा मान्य है। समाज की धारणा के लिए रचे गये बंधन का मतलब धर्म, यदि मेरे भी धर्म संबंधित विचार है। यह परिभाषा वास्तविक दृष्टि से अथवा तर्क की दृष्टि से योग्य दिखाई देने पर भी समाज की धारणा के लिए, सामाजिक बंधन किस तरह के हो ? इस प्रश्न का उपरोक्त परिभाषा द्वारा कुछ भी बोध नहीं हो पाता है अथवा आशय अनबुझा रह जाता है। समाज की योग्य धारणा के लिए समाज के बंधन किस तरह के हो ? यह प्रश्न बकाया रह जाता है। यह प्रश्न धर्म की परिभाषा से भी अधिक महत्वपूर्ण है। चुंकि धर्म कोनसा और अधर्म कोनसा यह परिभाषा पर निर्भर न होकर बंधनों के उद्देश्य और स्वरूप पर निर्भर है। जिन बंधनों से समाज की सम्पूर्ण जनता की धारणा हो सकती है, वह बंधन किस तरह के हो मतलब यह की सच्चे धर्म का स्वरूप कैसा हो, इस पर विचार-विर्मश करते समय समाज एवं व्यक्ति इनका आपस में तात्विक दृष्टि से संबंध क्या हो, और कैसा हो, यह प्रश्न सहज रूप से उठ खड़ा होता है। इस प्रश्न के संबध में आधुनिक समाज शास्त्रियों के तीन तरह के विचार प्रतीपादीत किये है। कुछ समाज शास्त्रि की मान्यता है कि व्यक्ति मात्र को सुख प्रदान हो, यही समाज संघठन का मुख्य हेतु है। कुछ के विचार है कि, व्यक्ति मात्र को उसके आंतरिक गुणों का तथा शक्ति का विकास सुलभ हो और उसके पूर्ण विकास हेतु सहायक हो, यह समाज संघठन का अंतिम हेतु होना चाहिए और कुछ यह मानते है कि समाज संघठन का मुख्य हेतु, व्यक्ति की उन्नती अथवा व्यक्ति मात्र का सुख न होकर आदर्श सामाज का निर्मान करना यही है। हिंदू धर्म की कल्पना उपरोक्त तीन तरह के विचारों से एकदम ही भिन्न है। हिंदू धर्म में व्यक्ति कि लिए कोई स्थान नहीं है। हिंदू धर्म की रचना वर्ग की कल्पनापर आधारित है। एक आदमी ने दूसरे आदमी से किस तरह का बर्ताव करना चाहिए, इस बात की शिक्षा हिंदू धर्म में नहीं है। एक वर्ग ने दूसरे वर्ग से किस तरह पेश आना चाहिए, इसके बंधन हिंदू धर्म में है।जिसमें आदमी की कोई अहमियत नहीं, वह धर्म मुझे कदापि मान्य नहीं। व्यक्ति मात्र के जीवन को समाज की आवश्यकता होने के बावजूद समाज की धारणा धर्म का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता। व्यक्ति का विकास यही धर्म का सच्चा लक्ष्य है, ऐसा मैं मानता हूँ। व्यक्ति समाज के अंतर्गत होने पर भी, व्यक्ति समाज की ईकाई होने पर भी, उसके और समाज का बीच के संबंध जिस्म और जिस्म से जुड़े भाग या बग्गी का उसके पहियों से जिस तरह का अटुट संबंध होता है, उस तरह का संबंध समाज से व्यक्ति मात्र का नहीं होता है, ऐसा मेरा अपना विचार है।

समाज और व्यक्ति

जिस प्रकार एक बुँद पानी भी यदि सागर में डाल दे तो, वह बुँद भर पानी अपना निजी अस्तित्व खो देता हैं। उस प्रकार मनुष्य समाज में रहने से वह समाप्त नहीं हो सकता। मनुष्य का जीवन स्वतंत्र होता है। उसका जन्म समाज सेवा हेतु न होकर स्वयं की उन्नती के लिए होता है। यही कारण है कि प्रबतीशिल राष्ट्र में एक आदमी दूसरे आदमी को अपना गुलाम नहंीं बना सकता।जिस धर्म में व्यक्ति को प्रधानता नहीं वह धर्म मुझे मान्य नहीं हो सकता। उसी तरह, जिस धर्ममें एक वर्ग विशेष शिक्षा प्राप्त करे दूसरे वर्ग को हथीयार चलाने का अधिकार प्राप्त हो, तिसरे वर्ग विशेष को ही व्यापार करने का अधिकार मिला हो, और चैथा वर्ग विशेष केवल सेवा करे, इस तरह की व्यवस्था है, वह धर्म मुझे मान्य नहीं है। सभी को विद्या चाहिये, शस्त्र हर एक के लिए आवश्यक है, धन सभी को चाहिए, यह बात जो धर्म भूल जाता है और वह धर्म जो किसी एक को ज्ञानी बनाने के लिए बाकी अन्य लोगों को अज्ञानता में रख छोड़ता है, जो धर्म किसी एक के हाथ में शस्त्र देकर दूसरे को निःशस्त्र करता है, वह धर्म न होकर किसी एक ने दूसरे को गुलामी में रखने की षडयंत्रकारी योजना है।

जो धर्म कुछ लोगों को धन कमाने का मार्ग खुला रखता है, और बाकी लोगों के लिए जीवन यापन के लिए दूसरों पर निर्भर रहने की अनुमती देता है, वह धर्म न होकर स्वार्थ परायण है। हिंदू धर्म का चातर्वण्र्य इसी प्रकार का है। उसके संबंध मं मेरे विचारों को मैंने आप लोगों के लिए हितकारी है ?इस पर आप विचार करें। व्यक्ति की आत्मा अन्नती हेतु पोषक वातावरण का निर्माण करना, यह धर्म का मुलभूत आधार है, इसे यदि मान्य करें तो हिंदू में आपकी आत्मोन्नती कदापी संभव नहीं है। व्यक्तिक के विकास के लिए तीन बातें आवश्यक होती है। 01. सहानुभूती, 02. समता और 03. स्वतंत्रता। हिंदू धर्म में इन तीनों बातों में से एक भी आपको उपलब्ध है, क्या आप ऐसा कह सकते है ?

क्या हिंदू धर्म में आप लोगों के लिए सहानुभूती है ?

सहानुभूती की दृष्टि से यदि परखा जाए तो सभी ओर शून्यता ही नजर आएगी, ऐसा कहा जा सकता है। आप लोग जिधर भी जाते है तो आपसे अपनत्व की भावना स बर्ताव नहीं किया जाता है। इस बात का आप को अनुभव है। अपनत्व की भावना तो है ही नहीं, परंतु हिंदू लोग आपसे परायों से भी बढ़कर बुरा व्यवहार करते है। एक ही गाँव में बसने वाले सवर्ण और अछुतों का आपस में किस तरह का सम्बन्ध होता है, इस पर हम गौर करें तो वह लोेग पड़ोस में रहने वाले दो भाइयों की तरह रहते है, ऐसा कदापी नहीं कहाँ जा सकता। जिस तरह से मुसलमान लोगों से हिन्दूओं का मेलमिलाप है, उनसे जितना स्नेह भाव है, उसका एक फिसदी भी अपनापन अछुतों से हिन्दूओं का नहीं होता है। हिंदू-मुस्लिम लोेल बोर्ड में, कायदे कौन्सिल में, व्यापार में एक दूसरे की सहायता का बर्ताव करते है। परंतु आप लोगों से उस तरह का सहानुभतीपूर्ण व्यवहार, हिंदू लोग करते है, इस बात का क्रूा एक तो भी उदाहरण दिया जा सकता है ? इसके विपरित उनका रर्वया आपके विरोध में हरदम बना रहता है, यह बात अपनेपन में सत्य है हिंदूओं क ेमन में आप लोगों से विरोध का परिणाम कितना घातक सिद्ध हुआ है, इसे वह अपने अनुभव से अच्दी तरह से बता सकते है, जिन्हें न्याय मांगने के लिए न्यायालय हमें न्याय देगा, पुलीस हमारी सहायता करेगी, ऐसा आप में से किसी को भी भरोसा क्यों नहीं है ? और वह यह है कि हिंदू लोगों की आप लोगों के प्रति किसी भी प्रकार की सहानुभूती न होने के कारण वह अपने अधिकारों का सदुपयोग करेंगे ऐसी आशा आप लोगों को नहीं है। यह बात यदि सच है तो इस तरह के शत्रुता से भरे माहौल में रहकर आप लोगों को क्या लाभ होगा ?

क्या हिंदू समाज में आप लोगों के प्रति समता है ?

क्या हिंदू समाज में आप लोगों के प्रति समानता का व्यवहार है ? यह प्रश्न पुछना ही बेमानी होगा। छुआ-छुत का बर्ताव ही अपने आप में प्रत्यक्ष असमानता है। यह असमानता की इतनी बढ़ी जलती ज्वाला कही भी दिखाई नहीं देगी। छुआ-छुत से बढ़कर घीनौनी असमानता विश्व के इकतहास में कही भी नहीं है। छोड़े बड़े के मानसिकता केरहते किसी आदमी ने अपनी कन्या का ब्याह किसी अन्य आदमी के पुत्र से न करना, छोटे-बड़े की मानसिकता के रहते किसी आदमी ने अन्य किसी आदमी के साथ मिल बैठकर भोजन न करना, इस प्रकार की असमानता दर्शाने वाला व्यवहार हमे दिखाई देता है। परंतु एक आदमी ने दूसरे आदमी को न छूने के समान नीचतापूर्ण व्यवहार हिंदू धर्म के सिवा और हिंदू समाज के अलावा क्या अन्य कही दिखाई देगा ? जिसके छू लेने मात्र से पानी अपवित्र हो जाता है, जिसके स्पर्श करने मात्र से मंदिर में रखी मूर्ति अपवित्र हो जाती है, वह प्राणी इंसान की श्रेणी में आता हो क्या ऐसा कोई भी की सकता है ? अछूत आदमी को देखने की दृष्टि और कोढ़ी आदमी को देखने की दृष्टि इनमें क्या फर्क है ? कोढ़ी आदमी के प्रति लोगों के मन में घ्रणा भी यदि हो तो भीउस आदमी के प्रति लोगों के मन में सहानुभूती होती है। परंतु आप लोगों के प्रति सहानुभूती होती ही नहीं, परंतु घ्रणा मात्र होती है। कोढ़ी आदमी से बढ़कर आप लोगों की हीन अवस्था है। आज भी यदि गाँवों में सवर्ण हिंदू उपवास की समाप्ती पर भोजन कर रहा हो, और अछुत की आवाज उस वक्त उसे सुनाई पढ़ जाए तो वह भोजन करना त्याग देता है। इतना अधिक कलंक आप लोगों के शरिर में है, इतना अधिक कलंक आप लोगों की आवाज में है। अस्पृश्यता हिंदू धर्म पर कलंक है, ऐसा कुछ लोग कह रहें है। परंतु सही देखा जाये तो, उन लोगों के बातों में कोई अर्थ नहीं है। हिंदू धर्म कलंकित है, ऐसा एक भी हिंदू स्वीकार नहीं सकता। परंतु आप लोग कलंकित हो, अपवित्र हो, ऐसा बहुसंख्य हिंदू समाज समझता है। आपको यह दशा क्यों प्राप्त हुई ? आप लोग हिंदू धर्म में रहने से आपको यह दशा प्राप्त हुई है, ऐसा मुझे लगता है। आप लोगों में से जो भी मुसलमान हो गये है, उन्हें हिंदू अछूत नहीं समझते है, और उनसे असमानता का व्यवहार भी नहीं करते। आप लोगों में से जो लोग ईसाई हो गये है उन्हें हिंदू लोग अछुत नहीं समझते है, और उनसे असमानता का व्यवहार भी नहीं करते। हाल ही में त्रावणकोर में हुई घटना पर संजिदंगी से विचार करना होगा। वहाँ की थिया जाति के अछुतों को आम रस्तों पर चलने की मनाही है। परसों उनमें से कुछ लोगों ने सिख धर्म अपनाया, यह बात आप लोगों को पता होगी। अछुत रहते जिन लोगों को रास्ते पर चलने की पाबंदी थी, उन्ही लोगों ने सिख धर्म का स्वीकार करते ही उन पर लगी गई पांबदी हटाई गयी। इन सब बातों से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि आप लोगों की अस्पृश्यता की और समानता की यही वजह है तो वह आप लोगों का हिंदू धर्म की प्रति लगाव ही है।

इस अन्यायी असमानता में सांत्वना देने के उद्देश्य से कुछ सवर्ण हिंदू लोग अछूतों को बतयाते है कि ‘आप लोग शिक्षा प्राप्त करे, फिर हम लोग आप लोगों को स्पर्श करेंगे। आप लोग साफ सुथरे रहो तब हम लोग आप को छू सकेंगे और समानता का व्यवहार करेंगे।

सच बात यह है कि, अनाड़ी महारों की और मैले कुचले महारों की जिस तरह की दुर्गती होती है उसी तरह की पढ़े लिखे महारों की, पैसे वालों महारों की और साफ सुथरे रहने वाले महारों की होती है। यह बात आप सभी लोगों को निजी अनुभवों से मालूम है, परंतु यह प्रश्न अलग रखा जाए तो भी यदि शिक्षा लिए बगैर, पैसा हुए बगैर और शरिर पर कपड़ा हुए बगैर यदि मान सम्मान नहीं मिलेगा तब सिधे साधे महार लोगों ने क्या करना चाहिए ? जिसे शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकती जिसे पैसा प्राप्त नहीं हो सकता और जो साफ सुथरे कपडे नहीं पहन सकता उस महार को समानता का उपदेश दिया गया है, उसका संबंध विद्या, धन, पोषाख, पराक्रम इन उपरी बातों से कतई नहीं है। आदमी की इंसानियत की महत्वपूर्ण बात है, ऐसी दोनो धर्मों की मान्यता है। और वह इंसानियत सभी को आदरनीय होनी चाहिए। कोई किसी का अपमान न करें और कोई किसी को असमान न समझे, ऐसी शिक्षा वह धर्म देते है। हिंदू धर्म में इस तरह कह शिक्षा का पूरा अभाव है। जिस धर्म में आदमी को आदमी नहीं समझा जाता हो, और उसकी इंसानियत की कोई कदर न हो, वह धर्म किस काम का है ? और उससे चिपक कर रहने से आपका कौनसा हित है ? इसके प्रत्युŸार में कुछ हिंदू लोग उपनिषेदों की साक्ष देते है और उसके अनुसार ईश्वर सर्वव्यापी है, इस तरह के विचारधारा की डिंगे हाॅकते है।

विज्ञान और धर्म यह दोनों अलग-अलग बातें है। कोई चित्र विज्ञान का सिद्धांत है या धर्म का उपदेश इस पर गंभिरता से विचार किया जाना चाहिए। ईश्वर सर्वव्यापी है, यह विज्ञान का सिद्धांत है। धर्म के मूल में आपसी बर्ताव का संबंध होता है, लेकिन विज्ञान में ऐसी कोई बात नहीं होती है ईश्वर सभी में बसा हुआ है यह धर्म का उपदेश नहीं है। यह तो विज्ञान का सिद्धांत है, धर्म की शिक्षा नहीं है। यह बात, हिंदू लोग उस तरह व्यवहार नहीं करते है, यह जो मैं कहता हूँ, उसका सबूत है इसके विपरित यदि हिंदू लोगों का आग्रह है कि ईश्वर सर्वव्यापी है, यह विज्ञान का सिद्धांत न होकर उनके धर्म की नींव है और इसलिए उनका धर्म श्रेष्ठ है। तब उन्हें इतना जवाब बहुत है कि उनके जैसे नीच लोग दूनिया और दूसरे कोई नहीं होंगे। मुख से सर्वाभूती ईश्वर ऐसा जाप करने वाले और कृती से मनुष्य मात्र को बेइज्जत करने वाले को ‘मुख में राम, बगल में छुरी’ अथवा ‘बातों से सज्जन और करतूतों से कसाई’ जैसे दुष्ट लोगों की श्रेणी में रहना होगा। सर्वाभूति एक ईश्वर है। इसे मानने वाले और कृति से आदमी को पशुतूल्य समझने वाले लोग ढ़ोंगी है, उनकी संगत मत किजिए। चिटीयों को चिनी खिलाने वाले और आदमी को पानी के बगैर मारने वाले लोग ढ़ोंगी हैं, उनकी संगत मत किजिए। उनकी संगत कर आप लोगों पर क्या परिणाम हुआ है इस बात की आपको जरा भी कल्पना नहीं। आपकी ईज्जत खत्म हो चुकिं है, आप लोगों का मान-सम्मान समाप्त हो चुका है। असल मेें देखा जाए तो हिंदू समाज में ही आप लोगों को मान-सम्मान नहीं है। यह कहना वास्तविकता की दृष्टि से अपूर्ण होगा। आपको केवल हिंदू लोग ही तुच्छ समझते है, ऐसा नहीं है तब, मुसलमान एवं ईसाई लोग भी आप लोगों को तुच्छ समझते है। सही में देखा जाए तो ईस्लाम धर्म मं और ईसाई धर्म में ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा इस तरह का विषमता भरा उपदेश नहीं है। ऐसा होने के बावजुद वो आपको अछूत समझते है, इसका क्या कारण है ? इसका एक ही कारण है। और वह यह की हिंदू लोग आप लोगों को नीच समझते है। अछूतों से यदि हम समानता का व्यवहार करें तो हिंदू लोग अछूतों के समान हमें नीच समझेंगे, इस डर से मुसलमान और ईसाई लोग आप लोगों से हिंदू लोगों की भाँती ही अस्पृश्यता का व्यवहार करते है। हम हिंदू समाज में हीन समझे गये है, केवल इतना ही नहीं तो हिंदू लोगों के असमानता भरे व्यवहार से हम पूरे हिन्दूस्तान में सभी से ज्यादा हीन समझे गये है। इस अपमान कारक हालात को बदलने के लिए, अगर कोई एकमेव उपाय है तो वह यह है की हमें हिंदू धर्म और हिंदू समाज का त्याग करना होगा।

हिंदू धर्म में क्या तुम्हें आजादी है ?

हर नागरिक को कानून द्वारा जितना व्यवसाय स्वातंत्र मिला हुआ है, उतना ही व्यवसाय स्वातंत्र आप लोगों को भी मिला हुआ है, ऐसा कुछ लोग कह सकते है। लेकिन उनके इस कहने में क्या सचमुच में कोई सच्चाई है, इसका गहन विचार आपने करना चाहिए। जिस जन्म जात व्यवसाय के सिवा अन्य कोई दूसरा व्यवसाय समाज व्यवस्था करने नहीं देती, उस आदमी को, तुम्हें व्यवसाय स्वतंत्रता प्राप्त है, ऐसा बतीयाने से क्या लाभ है ? जिन्हें पैसा कमाने का कोई भी अवसर प्राप्त नहीं है, उन्हें तुम्हारी दौलत को कोई भी हथिया नहीं सकता, उन्हें तुम्हारी दौलत का मन मर्जी से इस्तेमाल करने की तुम्हें पूरी आजादी है, ऐसा कहने में कौनसी सच्चाई है ? जन्म जात अपवित्रता के कारण जिनका नौकरी मंे प्रवेश हो ही नहीं सकता, जिनके अधिनस्त नौकरी करने में अन्य लोगों को अपमान महसूस होता है ऐसे आदमी को तुम्हें किसी भी नौकरी पर अधिकार जताने का आपको स्वातंत्र है ऐसा उसे कहना, उसकी मजाक करने जैसी बात है। कानूनन बहुत सारे अधिकार मिले होगे, परंतु समाज उन अधिकारों का इस्तेमाल आप लोगों को करने दे तो ही वे सही अधिकार है, ऐसा कहा जा सकेगा। अछूतों को अच्छे कपड़े पहनने नहीं देता, तब उसे अधिकार का क्या फायदा है ? अछूतों ने पितल और तांबे के बर्तनों में पानी भरकर लाने का अधिकार कानून द्वार किया गया है, परंतु हिंदू समाज अछूतों को धातु के बर्तन इस्तेमाल नहीं करने देता है, तब उन अधिकारों का कौनसा फायदा है ? अछूतों को अपने घरों की छप्पर पर कवेलू लगाने नहीं देता है तब ऐसे अधिकार का क्या फायदा है ? इस तरह के अनेक उदाहरण दिये जा सकते है परंतु सारांश यह है कि हिंदू समाज हमें जिसे अधिकार पर हिंदू समाज को आपŸाी है, हरकत है, वह अधिकार यही कानून द्वारा दिया गया हो तो भी उस का कोई उपयोग नहीं है। जब तक सामाजिक स्वतंत्रता आपको प्राप्त नहीं होगी तब तक आपको कानूनन कितनी भी स्वतंत्रता दी हो तो भी उसका कोई उपयोग नहीं है। आपको शारिरीक स्वतंत्रता है, ऐसा कुछ लोग कहेंगे। कानून द्वारा पाबंदी नहीं होगी, वहा पर आप जा सकते हो कानूनन मनाई नहीं हो, शरीर है, उसी तरह मन भी है। जितनी तन को स्वतंत्रता को आवश्यकता है उतनी ही मानसिक स्वतंत्रता की भी आवश्यकता है। केवल शारिरीक स्वतंत्रता का कोई फायदा नहीं है। मानसिक स्वतंत्रता को ही महत्व है ? सच देखा जाए तो तन की स्वतंत्रता किस लिये होती है ? वह केवल इसलिए है कि हर इंसान को मन पूर्वक व्यवहार करने की सुविधा उपलब्ध हो। कैदी के पां की बेड़ियाँ निकालकर उसे खुला छोड़ने का मतलब क्या है ? इसके पिछे निहित हेतु केवल यहि है कि उसने बाहरी दूनिया में खुले दिन से विचरण कर वह अपनी कार्यकुशलता का पूरा फायदा ले सके। लेकिन जिस आदमी का मन ही स्वतंत्र न हो उसे ऐसी बाहरी स्वतंत्रता का क्या फायदा है ? मानसिक स्वतंत्रता ही सच्ची स्वतंत्रता है। जिसका मन स्वतंत्र ही है, खुला होकर भी वह गूलाम है। जिसका मन स्वतंत्र नहीं है, वह कैदी नहीं तब भी जेल में है। जिसका मन स्वतंत्र नहीं वह जिन्दा होकर भी मरे समान है। मन की स्वतंत्रता ही जिन्दा होने का प्रमाण है। परंतु मानसिक स्वतंत्रता विद्धमान है उनका लोप नहीं हुआ है, इसका क्या प्रमाण है ? मानसिक स्वतंत्रता किसे मिली हुई हैं ऐसा कब कहा जा सकता है ? जो अदमी अपनी बुद्धि जागृत रखकर अपने अधिकार क्या है, अपने कर्तव्य क्या है, इसकी जानकारी प्राप्त करता है उसे मैं स्वतं कहता हूँ। जो परिस्थितीयों का दास नहीं है, जो परिस्थितीयों को अपने अनुकूल बनाता है, वह आदती स्वतंत्र है ऐसा मैं मानता हूँ। जो रूढ़ी परम्परा का दास नहीं बना, जो पूरानी परंम्परा का अनुसरण करने वाला नहीं बना, जिसके विचारों की बृद्धि बुझ नहीं पायी है, वह व्यक्ति स्वतंत्र है, ऐसी मेरी मान्यता है। जो पराधीन नहीं हुआ है, जो किसी दूसरों के मतानुसार व्यवहार नहीं करता, जो कार्य कारण पर विचार किए बिना किसी भी चीज पर विश्वास नहीं करता है, जो अपने अधिकारों का हनन करने पर अधिकारों की रक्षा हेतु सजक रहता है, जो प्रतिकुल जनमत से घबराता नहीं, दुसरों के हाथों का खिलौना न बनने की बुद्धि स्वाभिमान जिसके पास है, वही इंसान स्वतंत्र है, ऐसा मैं समझता हूँ। जो अपने जीवन का लक्ष्य एवं जिवन जिने का तरीका दुसरे किसी की आज्ञा के अनुरूप निश्चित नहीं करता है, जो अपनी बुद्धि से अपने जीवन का लक्ष्य क्या हो, तथा अपना जीवन किस कार्य में और किस तरह व्यतित करें, यह स्वयं निश्चित करता है, सारांश में, जो संपूर्ण रूप से स्वावलंबी है, वही आदमी स्वतंत्र है, ऐसा मैं समझता हूँ।

इस दृष्टि से यदि हम देखें तों क्या आप स्वतंत्र है ? क्या आपको जीवन और आपके जीवन का लक्ष्य आपके वश में है ? मेरे मतानुसार आप स्वतंत्र हो ही नहीं, परंतु आप गुलाम हो, सेवक हो, और इतना ही नहीं तो आपके दासता की कोई सिता नहीं। हिंदू धर्म में किसी को भीविचार स्वतंत्रता नहीं हो सकती है। जो आदमी हिंदू धर्म में रहेगा, उस आदमी को अपने विचार स्वतंत्रता को तिलाजंली देनी ही होगी। उसे वेद प्रमाण मानकर व्यवहार करना होगा। वेदों में यदि उस तरह की आज्ञा न हो तो स्मृति के आज्ञा अनुसार उसे व्यवहार करना होगा। स्मृति में यदि उस तरह की आज्ञा न हो तो महाजानों के अनुसार व्यवहार करना होगा। हिंदू धर्म में बृद्धि को, विचारों को प्रधानता तो है ही नहीं, लेकिन उसका अवसर भी नहीं हैं हिन्दूओं ने किसी न किसी की गुलामी करनी ही चाहिए। वेदों की गुलामी करनी है, स्मृति को प्रमाण मानना चाहिए, या महाजनों का अनुकरण करना चाहिए। उसने विचार शक्ति का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जब तक आप हिंदू धर्म में हो तब तक आपको विचार स्वतंत्र प्राप्त नहीं हो सकता। इस पर कोई ये कह सकता है कि हिंदू धर्म ने केवल आप लोगों की ही मानसिक स्वतंत्रता को छिना नहीं है, तो हिंदू धर्म को प्रमाण मानने वाली सभी जातियों की मानसिक स्वतंत्रता ठिन ली है। यह सच है कि हिंदू धर्म के कारण सभी बौद्धिक गुलामी से जकड़े हुए है, परंतु इस कारण वे सभी सुमदुखी है, ऐसा किसी ने भी नहीं मानना चाहिए, क्योंकि इस बौद्धिक गुलामी के दूष्परिणाम सभी को भूगतने नहीं पड़ते है। स्पृश्य वर्गों के ऐहिक सुखों पर इस बौद्धिक गुलामी का कोई बुरा असर नहीं हो सकता। यद्यपी वह वदों के गुलाम है, स्मृति के दास है, महाजनों के याचक है, परंतु हिंदू समाज के व्यवहार में उन्हें वेदों ने, स्मृति ने और महाजनों ने ऊँचा पर दिया है। दुसरों पर हुकूमत चलाने के लिए उन्हें अधिकार दिए गये है। सम्पूर्ण हिंदू धर्म, उँचे वर्गाें के हिंदूओं ने उँचे वर्गों की हितरक्षा हेतु रचा है। यह बात एकदम निर्विवाद है। जिसे वे धर्म कहते है, उस धर्म में आपको मुक्ति न हो, इस तरह की व्यवस्था भी उस धर्म में की गई है। इसलिए हिंदू धर्म की बौद्धिक गुलामी से मुक्ति की जितनी उधिक आवश्यकता आपको है, उतनी अन्य हिंदूओं को नहीं है। इस तरह विचार करें तो, यह ंिहन्दु धर्म आपको दो तरह से घातक सिद्ध हुआ है। इस धर्म ने आपकी मानसिक स्वतंत्रता छिनकर आपको गुलाम बनाया हुआ है और इसी धर्म ने आपको व्यवहारिक जीवन में गुलामी की अवस्था में रख छोड़ा है। यदि आपको स्वतंत्रता प्राप्त करनी है, तो अपने धर्म परिवर्तन करना ही होगा।

अछुत समाज के संघठन और धर्म परिवर्तन

अस्पृश्यता निवारण का आज कल जो आन्दोलन चल रहा है, उस आन्दोलन पर इस तरह का कटाक्ष किया जाता है कि अछुत वर्गों में भिन्न-भिन्न जातियों को सामिल किया गया है, उन जातियों में भी आपस में जाति भेद का व्यवहार किया जाता है, अस्पृश्यता का व्यवहार किया जाता है। महार, मांग जाति के लोग ऐ दुसरे का छुआ भोजन ग्रहण नहीं करते है। दोनों भी भंगी जाति को ठुते नहीं और उनसे अस्पृश्यता का व्यवहार करते है। इस तरह आपस में जाति भेद और अस्पृश्यता का पालन करने वाले लोगों को उँची जाति के लोगों से, ‘आप जाति भेद की दिवार तोड़ दिजिए, अस्पृश्यता का व्यवहार त्याग दिजिए, ऐसा कहने का क्या अधिकार है ? ऐसा प्रश्न बार-बार पुछा जाता है। आप लोग आपसी जाति भेद और अस्पृश्यता को पहले समाप्त करों और फिर हमारे पास न्याय मांगने आओ, इस तरह की चालाकी से भरी परिपूर्ण सलाह उन्हें दी जाती है। इस टिप्पनी के तह सच्चाई है, यह हम सब को  स्वीकार करनी होगी। परंतु इस तरह की टिप्पनी में जो दोष मढ़ा गया है वह झूठ है। अछूत जातियों में सम्मिलित लोग जातिभेद मानते है और कुठ लोग अस्पृश्यता मानते है, इसे झुटलाया नहीं जा सकता है। यह बात स्वीकार कर लेने पर भी इस अपराध के लिए वह जिम्मेदार है, यह कहना पूर्ण रूप से झूठ है। जातिभेद और अस्पृश्यता का निर्माण अछूत लोगों ने नहीं किया है। 

जातिभेद और अस्पृश्यता की नंींव उन्होने रखी है। जातिभेद और अस्पृश्यता का पालन करना वरिष्ठ वर्गीय हिन्दूओं ने सिखाया है। यह बात यदि सत्य है तो फिर जातिभेद और अस्पृश्ता की रूढी-परंपरा को जिम्मेदार स्पृश्य वर्ग के हिन्दु है अस्पृश्य उसका जिम्मेदार नहीं हो सकता। अस्पृश्ता लोग जातिभेद और अस्पृश्य का पालन करने में केवल वरिष्ठ वर्ग हिन्दुओं की प्रथा का अनुसरण मात्र कर रहे है। और यदि यह प्रथा गलत है तो, इस पाप के दोषी वर्ग है  जिन्होने यह गलत पाठ पढाया है। वे दोषी नही जिन्होने गलत पाठ पढ़ा है। यह मेरा उत्तर तर्क संगत होने पर भी इस तरह के उत्तर से मुझे स्वयं को संतुष्टी नहीं है। जिन कारणों से जातिभेद और अस्पृश्ता जैसी बुराई अपने समाज में प्रवेश कर गई है, उन कारणों के जिए हम जिम्मेदार न भी हो तो भी हममें जातिभेद और अस्पृश्ता है, उसका धिक्कार न कर, वह जिस प्रकार से है, उसे उसी तरह रहने देना, हमारे लिए ठीक नहीं है। अस्पृश्ता और जातिभेद के लिए हम जिम्मेदार न होने पर भी उसे नष्ट कर करने की जिम्मेदारी हम पर है। यह जिम्मेदारी आप सब ने समझी है, इसलिए मुझे सतुष्टी है। मेरा पूर्ण विश्वास है कि महार जाति में ऐसा कोई भी नेता नहीं है जो जातिभेद आप सब ने समझी है, इसलिए मुझे सतुष्टी है। मेरा पूर्ण विश्वास है कि महान जाति में ऐसा कोई भी नेता  नहीं है जो जातिभेद का पालन करो, ऐसा कहता हो। यदि तुलना करनी हो तो वह नेताओं के बीच ही की जानी चाहिए। महार समाज के शिक्षित वर्ग और ब्राम्हणों के शिक्षित वर्ग में यदि तुलना की जायें तो महारों का शिक्षित वर्ग जातिभेद की दिवार ढहाने के लिए अधिक अनुकूल है, यह बात सभी को स्वीकार्य होगी। केवल इतना ही नहीं तो, उपरोक्त बात की सच्चाई प्रत्यक्ष कार्यो द्वारा भी सिद्ध की जा सकती है। आज महार जाति में ढुंॅढने से एक भी मनुष्य मिलना मुश्किल है, जो महार-माॅंग जाति के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता होना चाहिए, इस बात का विरोध करता हो। हमारे बीच का जातिभेद तोडने की आवश्यकता तो आप समझ चूके है, इस बात की मुझे खुशी है, और में आप लोगों का अभिंनदन करता हॅू। परंतु अछुतों के बीच का जातिभेद खत्म करने का प्रयास कैसे सफल बनाया जा सकता है। इस बात पर आपने क्या विचार किया है। केवल सहभोजन से या कभी कभार हुए अंतर्जातीय विवाह से ही जातिभेद समाप्त नहीं होगा। जातिभेद यह एक मानसिक स्थिती है, यह मानसिक व्यथा है। यह मानसिक बिमारी लगने का कारण हिन्दु धर्म की शिक्षा है। हम सभी जातिभेद का पालन इसलिए करते है, छुआछुत को इसलिए मानते है, क्योकि हम हिंदु धर्म में है और वह धर्म वैसा करने की शिक्षा देता है। कोई चिजं अगर कडवी हो तो उसे मिठी की जा सकती है, यदि वह वस्तु नमकिन हो तो उसकी रूची में बदलाव लाया जा सकता है, पंरतु जहर को अमृत नहीं बनाया जा सकता है। हिन्दु धर्म में रहकर जातिभेद को नष्ट करने की बात कहना जहर को अमृत बनाने जैसी ही बात होगी। 

कहने का आशय यह है कि, जिस धर्म में, एक आदमी को दूसरे आदमी की घृणा करने का उपदेश दिया जाता है, उस धर्म में हम लोग जब तक बने रहेगे तब तक हमारे मनकी जातिभेद की भावना कभी भी खत्म नहीं होगी। अस्पृश्यों के बिच का जातिभेद और अस्पृश्ता यदि हमें खत्म करना हो तो धर्म परिवर्तन यही केवल अंतिम उपाय है। 

नाम परिवर्तन और धर्म परिवर्तन

धर्म परिवर्तन की आवश्यकता किसलिए है, इस बात का विवेचन मैंने आपके सामने प्रस्तुत किया है। यह विवेचन आपके लिए विचार प्रवर्तक साबित होगा, ऐसी मुझे लगा है। अब तक का मेरा विवेचन जिन लोगों को कठीन और गहन लगा होगा, उन्हें यह विषय सरल रूप मंें समझ में आ जाए इस हेतु में कुछ बालबोध विचार आपके समय रखूंॅगा। इस धर्म परिवर्तन के प्रश्न में ऐसी कौनसी नई बात है ? सच देखा जाए तो हिन्दुओं से आप लोगों का कौनसा ऐसा सामाजिक रिश्ता है ? जिस तरह मुसलमान हिन्दुओं से भिन्न है, उतने ही आप हिन्दुओं से भिन्न हो। जिस तरह मुसलमानों से हिन्दुओं का जिस तरह कोई रोटी-बेटी का सम्बन्ध नहीं होता है उसी तरह आपका भी हिन्दुओं से कोई रोटी-बेटी का संबंध नहीं होता है। आप लोगों का और हिन्दुओं का समाज अभी भी मित्र है और दो अलग-अलग समाज है। धर्म परिवर्तन करने से एक समाज के दो टुकड़े किए गये, ऐसा कोई कह नहीं सकता, और ऐसा किसी को भी महसूस नहीं होगा। आज जिस तरह आप लोग अलग-अलग हो, उसी तरह धर्म परिवर्तन करने के बाद भी अलग ही रहोंगें। धर्म परिवर्तन से नया कुछ होने वाला नहीं है, यह बात जब सही है तो धर्म परिवर्तन का महत्व आप लोगों को शायद नहीं समझा होगा परन्तु नाम परिवर्तन का महत्व आप लोगों ने समझा है, यह बात जब सही है तो धर्म परिवर्तन का भय किसीको भी क्यों लगाना चाहियें ? यह बात मेरी समझ में नहीं आती। दुसरी बात यह है कि, धर्म परिवर्तन का महत्व आप लोगों को शायद नहीं समझा होगा परन्तु नाम परिवर्तन का महत्व आप लोगों ने समझा है, यह बात निर्विवाद है। आपमें से यदि किसी को उसकी जाती क्या है ? यह प्रश्न किया जाए तो यह चोखामेला, हरिजन इत्यादि नाम बताता है, परंतु महार जाति का नाम बताता नहीं। नाम परिवर्तन की आवश्यकता यदि न हो तो कोई भी नाम में परिवर्तन नहीं करेगा। इस तरह नाम परिवर्तन के पीछे का कारण बड़ा ही सरल है। अपरिचित आदमी को अछुत कौन और सवर्ण कौन, यह बताया नहीं जाता इसलिए जब तक जाति का बोध नहीं हो जाता है। इसलिए जब तक जाति का बोध नहीं हो जाता तब तक सछुत हिन्दुओं के दिल में किसी भी प्रकार की दूषित भावना उत्पन्न नहीं होती। यात्रा में अपरिचित सछुत और अछुत भाई चारे से व्यवहार करते हुए दिखाई देते है। वे एक दूसरे का हुक्का-बिडी पिते है फल वगैरह लेते है। पंरतु यदि उसे उस आदमी की जाति एक बार मालूम हो जाए तो और वह अछुत है यह मालूम हो जाए तो उसके मन में घृणा उत्पन्न हो जाती है, उसे गुस्सा आ जाता है और इस आदमी ने मुझे धोखा दिया है इसलिए उसे क्रोध आ जाता है और यात्रा के दौरान हुई गाली गलौच और मारपीट में बदल जाती है यह अनुभव अनेक लोगों ने किया होगा ऐसा मुझे विश्वास है, ऐसा अक्सर क्यों हो जाता है, यह आप सभी जानते हैं। आप लोगों को जो जातिसूचक नाम मिला है, उस नाम को इतनी गंध लगी है कि उसका उच्चार करने से ही सर्वण लोगों का जी मचलने लगता है और इसलिए आप स्वयं को महार नहीं बताकर चोखमेला बताकर सवर्णाें को बहकाने का प्रयास करते हो। परंतु इससे भी वे लोग बहकावें में आते नहीं, इसका भी आपको अनुभव है। क्योंकि चाहे चोखामेला कहो या हरिजन कहो, लोगों को जो समझना है चो समझ ही लेते है। आपको नामांतर की आवश्यकता क्यों महसूस होती है यह आपके इस प्रकार के बर्ताव से ही सिद्ध कर दिया है। मुझे आपसे यही पुछना है कि नाम परिवर्तन करना यदि आवश्यक होता है तो फिर आपको धर्म परिवर्तन में क्यों हर्ज होना चाहिए ? धर्म परिवर्तन भी एक प्रकार से नाम परिवर्तन ही है। धर्म परिवर्तन के कारण होने वाला नाम परिवर्तन आपको अधिक फायदेमंद होगा। मुसलमान कहलाना, ईसाई कहलाना, बौद्ध कहलाना, सिख कहलाना, यह धर्म परिवर्तन है ही, परंतु नाम परिवर्तन भी है। वह सही नाम परिवर्तन है। इस नाम परिवर्तन में कोई दुर्गंध नहीं है। यह नाम परिवर्तन आमूलचुल परिवर्तन है। उसकी कोई खोज कर सकता नहीं। परंतु चोखामेला, हरिजन इस तरह के नाम परिवर्तन से कोई लाभ नहीं है। पूराने नाम की बदबू नये नाम को लगेगी ही। जब तक आप हिंदू धर्म में हो तब तक आपको नाम परिवर्तन करना ही होगा। क्योंकि सिर्फ हिंदू कहेने मात्र से बात नहीं बनेगी। हिंदू कोई मनुष्य मात्र है ऐसा कोई भी पहचानता नहीं। महार कहने मात्र से कोई बात नहीं बनेगी, क्योंकि उस नाम के उच्चारण मात्र से कोई पास आयेगा नहीं। इस तरह बिच में लटके रहने अपेक्षा आज यह नाम, कल दूसरा नाम ऐसा जब-तब नाम परिवर्तन करते रहने की अपेक्षा एक बार धर्म परिवर्तन करके आपने हमेशा-हमेशा के लिए नाम परिवर्तन क्यों नहीं कर लेना चाहिए, यह मेरा आपसे प्रश्न है।

विरोधीयों की भूमिका

धर्म परिवर्तन का आंदोलन प्रारम्भ होने के पश्चात अनेक लोगों ने इस आंदोलन के विरोध में अनेक आलोचनाएं की है। उन आलोचनाओं में कितनी सच्चाई है, इस पर विचार करना आवश्यक है। कुछ बिन्दू लोग धार्मिकता के ढोंग की लाड लेकर लोगों को बता रहे है कि, धर्म कोई उपभोक्ता वस्तु नहीं है। जिस प्रकार आज हम एक कोट पहनते है, दूसरे दिन दूसरा पहनते है। धर्म इस तरह बदला नही जा सकता। जिस हिन्दू धर्म को नकार कर आप दुसरा धर्म अपनाने जा रहे हो, तो क्या आपके पुरखे जो इतने दिनों तक हिन्दू धर्म में रहे, वे सभी मुर्ख थंे ? यह प्रश्न कुछ सयानों ने उठाया है। मेरी दृष्टि से इस आलोचना में किसी भी तरह की सच्चाई नहीं है। केवल पुरखों का धर्म कहकर उससे चिपके रहना किसी मुर्ख को ही अच्छा लगेगा। किसी भी ज्ञानी इन्सान को इस तरह की भूमिका स्वीकार्य नहीं होगी। केवल पुरूषों का धर्म है, इसलिए धर्मपरिवर्तन उचित नहीं है, ऐसा तर्क देने वालों ने शायद इतिहास पढा नहीं होगा, यही कहा जा सकता है। आर्यो का धर्म, जिसे वैदिक धर्म कहा जाता है, उसमें गोमांस खाना, शराब पिना, अनाचार करना, इन मुख्य तीन बातों में उनका धर्म निहित था। वह धर्म हजारों सालों तक भारतवर्ष के लोगों ने अपनाया हुआ था और आज भी कुछ ब्राम्हनांे को उस धर्म को अपनाने की हुक सी आती है। केवल पुरखों का ही धर्म पालन करना चाहिए तो फिर वैदिक धर्म त्यागकर हिंदुस्तान के लोगों ने बौद्ध धर्म को क्यों स्वीकार किया था ? उन्होने वैदिक धर्म त्यागकर जैन धर्म क्यों स्वीकार किया था ? इस हिन्दु धर्म में हमारे पुरखों रहे यह बात सच है। परन्तु वे लोग अपनी खुशी से, अपने दिल से वहाॅं रहे, ऐसा मैं नहीं कह सकता। इस देश में हजारों सालों से चातुर्वण्र्य व्यवस्था का राज कायम था। इस चातुर्वण्य व्यवस्था में ब्राम्हणों ने विद्या पढ़नी चाहिए, क्षत्रियों ने युद्ध करना चाहिए, वैश्य बनियोने व्यापार करना चाहिए और शूद्रो ने सेवा करनी चाहिए, इस तरह का नियमबद्ध जीवनक्रम बंधा हुआ था। इस जीवनक्रम में शुद्र विद्या से वंचित थे। धन-दौलत से वंचित थे और अस्त्रशस्त्र से वंचीत थे। इस तरह की विपत्र और निशस्त्र अवस्था में हमारे पुरखों को जीवन-यापन करना पड़ा, उन्होनें यह धर्म अपनी खुशी से स्वीकार किया होगा, ऐसा कोई भी बुद्धिमान आदमी कह नहीं सकता। क्या हमारे इन पुरखों को धर्म के विरोध में विद्रोह करने के अवसर प्राप्त थे और यदि उन्होनंे विद्रोह किया नहीं होता तब, यह धर्म उन्होने खुशी से स्वीकार किया होगा, ऐसा कहा जा सकता था। परंतु सही स्थिति की छानबिन करने से पता चलता है कि उनके पास कोई उपाय न होने के कारण ही उन्हें इस धर्म में रहना पडा था, यही बात निर्विवाद रूप से सामने आती है। इस दृष्टि से यदि हम अवलोकन करे तो यह हिन्दु धर्म हमारे पुरखों का धर्म न होकर, उनपर जोर जबरदस्ती से थोपी हुअी गुलामी है। उस गुलामी से छुटकारा पाने के कोई भी साधन उन्हें उपलब्ध नहीं थे। इसलिए उन्हें इस गुलामी के विरोध करना संभव नहीं हो सका और परिणाम स्वरूप उन्हें गुलामी में ही रहना पड़ा। इसके लिए उन्हें केाई दोषरोपण नहीं किया जा सकता है। कोई भी उनके प्रति दया ही व्यक्त करेगा। पंरतु इस युग की पिढी पर उस तरह की ज्यादती करना किसी को भी संभव नहीं है। उन्हे हर तरह की आजादी है इस आजादी का उपयोग कर यदि उन्होने अपनी मुक्ति नही की तो उनके लिए, उनके जैसे नीच, उनके जैसे मक्कार, उनके जैसे दूमछल्ले दुसरे और कोई हो ही नहीं सकते, ऐसा बडे दुख के साथ कहा जाएगा। 

आदमी और जानवरों में भेदः- 

पुरखों का धर्म कहकर उसे चिपके रहना, केवल मुर्खो को अच्छा लगेगा। कोई बुद्धिमान आदमी इस तरह की भूमिका स्वीकार नहीं करेगा। जिस परिस्थिती में मनुष्य जन्मा हो, उसने मरते दम तक उसी अवस्था में रहना चाहिए, यह उपदेश जानवरों के लिए उचित हो सकता है, परंतु आदमी के लिए उचित नहीं है। आदमी तथा पशु में कोई भेद है तो वह यह है कि पशु अपनी प्रगती नहीं कर सकता और मनुष्य अपनी प्रगती कर सकता है। स्थानातंर किए बगैर हमारा विकास संभव नहीं है। धर्म परिवर्तन एक तरह का स्थलांतर है। और यदि धर्म परिवर्तन के बिना प्रगति नहीं होती है, तो धर्म परिवर्तन करना आवश्यक है। केवल माता-पिता का धर्म है यह बात विकास प्रिय आदमी की बाधा नहीं बन सकती। धर्म परिवर्तन के विरोध में और भी एक मुद्दा उछाला जा सकता है। वह यह है कि, धर्म परिवर्तन एक तरह का पलायन है। आज हिन्दु धर्म में सुधार लाने हेतु हिन्दुस्तान के अनेक लोग प्रयासरत है। उनक सहायता से जातिभेद को और अस्पृश्ता को नष्ट किया जा सकता है, ऐसे समय धर्म परिवर्तन करना सर्वथा अयोग्य है। यह कुछ लोगों का कहना है। हिन्दुओं के समाज सुधारकों के विषय में किस का क्या दृष्टिकोण है, इसमें मुझे कोई लेना-देना नहीं है। मेरे जेहन में उनके प्रति बहुत कडुवाहट है। मैं उन्हें भली-भांॅती जानता हंॅू और इन आधे अधुरे लोगों से मैं उब चुका हॅू। जिन्हें अपनी ही जाति में रहना है, जिन्हें अपनी ही जाति में मरना है, जिन्हें अपनी जात-बिरादरी में ब्याह लोागों ने यकिन नहीं किया, इसलिए आगबबुला होना, यह बडे ही अचंभे की बात है। इन लोगों की बता सुनकर मुझे अमेरीका के निग्रो की याद आती है। उस व्यक्त अमेरीका में काले निग्रों लेागों के हालात हिन्दुस्तान के अछूतों जैसे ही थे। उनकी गुलामी कानून द्वारा उन पर लादी गयी थी और आपकी गुलामी धर्म ने लादी है, इतना ही गुलामी में भेद है। इस गुलामी से छुटकारा दिलाने हेतु अमेरीका के कुछ सुधारक प्रयासरत थे। पंरतु हिन्दु समाज सुधारकों एवम् काले निग्रों को उनकी दासता से मुक्ति दिलाने हेतु प्रयासरत अमेरीकन श्वेत सुधारकों के बीच क्या  तुलना की जा सकती है? निग्रो लोगों को गुलामी से मुक्ति दिलाने हेतु जिस तरह से अमेरीकन लोगों को मौत के घाट उतारा, और इन अपने अनगिनत लोगों के प्राणो की आहूती दी। उस घटना का वर्णन यदी हम इतिहास से पढें और हमारे समाज सुधारकों का चित्र सामने रखें तब उसे कहाॅ राजा और कहाॅ भिखारी के रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता है। सुधारक कहे जानेवाले हिंदुस्तान के अस्पृश्यों के तारणहारों से यह पुछा जा सकता है कि जिस तरह अमेरीकन सुधारकों ने निग्रो लोगों को गुलामी से मुक्ति दिलाने हेतु जो आपस में युद्ध किया था, उस तरह क्या तुम भी आपस में युद्ध करने के लिये तैयार हो? तब, समाज सुधार की व्यर्थ बकवास करने का क्या उपयोग है? हिन्दुओं के बीच में अछुतों की उन्नती के लिए प्रयास करने वाले प्रमुख व्यक्ति के रूप में गांधी का नाम लिया जाता है। उनकी कोशिश कहाॅ तक है? अग्रेज सरकार के विरोध में निशस्त्र प्रतीकार की जंग छेड़ने वाले गांधी अछूतों पर अत्याचार करने वाले हिन्दुओं को दिल भी दुखाना नहीं चाहते थे। उनके विरोध में सत्याग्रह करने को तैयार नहीं थे। केवल इतना ही नहीं तो वे हिन्दुओं के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी लड़ना नहीं चाहते थे। मेरी समझ में नहीं आता है की इन समाज सुधारकों का क्या उपयोग है?

स्पृश्यों की ही गलती है। 

कुछ लोग अछुतों की सभा में आकर बडे जोर-जोर से हिन्दुओं को गालीयाॅ देेते है। कुछ लोग अछूतों की सभा में आकर अछूतों को उपदेश देकर कहते है कि आप लोग साफ-सुधरे रहीये, आप लोग शिक्षा ग्रहण करे, आप लोग स्वय्म अपने पैरों पर खडा रहीये, आदि आदि। अगर सही देखा जाए तो असली गुहगार स्पृश्य वर्ग है। यदि किसी की गलती है, तो वह स्वर्ण वर्ग की ही है। परंतु उन सवर्ण हिन्दुओं का सम्मेलन कर, उनको कोई खरी-खरी सुनाने वाला दिखाई नहीं देता। हिन्दू धर्म में रहकर अपली लडाई जारी रखे, आप और हम मिलकर कामयाबी हासिल करेंगें। इस तरह कहने वाले समाज सुधारकों को दो बाते, याद दिलाना आवश्यक है। बिल विश्वयुद्ध में एक अमेरीकन और एक ब्रिटिश आदमी के बीच जो बातचीत हुई है थी, उसे मैने पढा है। जो ज्ञानवर्धक होने के कारण इस अवसर पर उसका उल्लेख करना मुझे उचित जान पडता है। इन दोनो के संवाद का विषय था, विश्वयुद्ध कब तक जारी रखना इससे संबधित था। उस अमेरीकन के प्रश्न का जवाब देते हुए ब्रिटिश आदमी ने बडी डिंगे हाॅकते हुए कहा की, ‘अंतिम फ्रेंच इन्सान खत्म होने तक हम अपनी जंग जारी रखेगें।’ ‘तब मुझे इसका आशय यह महसुस होता है कि अंतिम अछुत खत्म होेने तक यह जंग से जारी रखेगें। दुसरों की गर्दन हाथ में धरकर युद्ध पर निलके सैनिक से विजय की आशा रखना कीतना सही है, इसका निर्णय लेना आपको कटिन नहीं है। हमारी जंग में जब हमें ही मौत आनी है तो फिर नाहक ही गलत जगह युद्ध करने का क्या उपयोग है। हिन्दु समाज का सुधार हमारा ध्येय नहीं है, और न ही वह हमारा कार्य हैं। हमारी अपनी आजादी हासिल करना, यह हमारा ध्येय है। इसके सिवाय हमारा और कोई कर्तव्य नहीं हैं। धर्म परिवर्तन करने से यदि हमें हमारी आजादी हासिल होती है तब फिर हम क्यों भला हिन्दू समाज सुधार की लडाई मोल ले ? और उस लडाई में हमारा सामध्र्य शक्ति और संम्पत्ति को क्यों नष्ट करें ? हिन्दु समाज का सुधार करना यह अस्पृश्यता निवारण के आन्दोलन का मुख्य हेतु है इस तरह की गलत समझ कोई न करें। अस्पृश्ता निवारण आन्दोलन का प्रमुख उद्येश्य अछूतों को सामाजिक स्वतंत्रता दिलाना, यह है और वह स्वतंत्रता धर्म परिवर्तन के सिवा प्राप्त नहीं होगी, यह भी उतना ही सच है। परंतु इस समता की प्राप्ति के लिए उन्होने हिन्दु धर्म में ही रहना होगा, नहींे तो समता प्राप्त नहीं होगी, ऐसा कोई भी कह नहीं सकता। समता प्राप्ति हेतु दो मार्ग मुझे दिखाई देते है। हिन्दु धर्म में रहकर समता प्राप्त करनी हो तो केवल छूआछूत की भावना को त्याग देने से ही काम सफल नहीं होगा। रोटी-बेटी व्यवहार हो तो ही समानता की प्राप्ति होगी। इसका अर्थ यह है कि चातुर्वर्ण व्यवस्था खत्म होनी चाहिए और ब्राम्हाणी धर्म का अंत होना चाहिए। क्या यह बात संभव है ? और यदि यह बात संभव नहंी है तो हिन्दु धर्म में रहकर समता के व्यवहार की आशा रखना क्या बुद्धिमानी होगी ? और इस प्रयास में क्या आप सफल हो सकोंगे ? उसकी तुलना में धर्म परिवर्तन के द्वारा बडी आसानी से सामाजिक समता की प्राप्ति होती है। जब इस तरह की सच्चाई है तो फिर धर्म परिवर्तन के द्वारा बडी आसानी से सामाजिक समता की प्राप्ति होती है। जब इस तरह की सच्चाई है तो फिर धर्म परिवर्तन का सीधा सरल मार्ग हमें क्यों नहीं अपनाना चाहिए ? मेरी राय में धर्म परिवर्तन का रास्ता अछूत समाज और हिन्दुओं को भी समान रूप से फायदेमंद होगा। जब तक आप हिन्दु धर्म बने रहेगें तब तक आपको हिन्दूओं से छूआछूत के विरोध में, पानी की समस्या के लिए, रोटी के लिए, बेटी के लिए लडाई लडनी होगी। और जब तक यह लडाई रहेगी। तब तक आप एक दूसरे के मन्दिर पर अधिकार जताने की आवश्यकता नहीं होगी। सहभोजन, सहविवाह आदि सामजिक अधिकारों के लिए लडाई का कोई कारण नहीं रहेगा। और यह लडाई खत्म हो जाने से दोनों में प्यार और सदभावना विकसित होगी। आज मुसलमान ओर ईसाई समाज से हिन्दूओं के आपसी रिश्ते कैसे है, इस पर ध्यान दीजिए। आपकी भांॅति हिन्दू लोगों के मंदिरों में मुसलमानों ओर ईसाई लोगों के लिए प्रवेश निषेध है। आपके समान ही हिन्दूओं का मुसलमानों और ईसाईओं का रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं है। यह सब कुछ होते हुए भी उनमें और हिन्दूओं में आज जो आपसी सद्भावना है, वह आपमें ओर हिन्दूओं में रहने के कारण हिन्दूओं से सामाजिक अधिकारों के लिए लडना पडता है। पंरतु उन्होने हिन्दू धर्म को त्याग देने से उन्हें हिन्दू लोगों से धार्मिक एवंम् सामाजिक अधिकारों के लिए उन्हें सघंर्ष करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। दूसरी बात यह है कि हिन्दू समाज में उनके लिए किसी भी तरह के सामाजिक अधिकार न होने बाद भी, उनमें किसी भी तरह का रोटी-बेटी का रिश्ता न होने के बाद भी, हिन्दू समाज उनमें असमानता का व्यवहार नहीं करता। धर्म परितर्वन करने से यदि समता प्राप्त हो सकती है, धर्म परिवर्तन के द्वारा यदि हिन्दू और अछूतों में सद्भावना निर्माण हो सकती है। तब वह समता का सरल और सुखमय मार्ग अछूतों ने क्यों नहीं स्वीकारना चाहिए ? इस तरह से यदि हम देखे तो धर्म परिवर्तन का मार्ग सच्चा स्वंतत्रता की और ले जानेवाला है और उसमें सच्ची समता की प्राप्ती होगी। धर्म परिवर्तन का मार्ग पलायन का मार्ग नहीं है। वह डरकर भागने का मार्ग नहीं है, वह तो बुद्धिमानी का मार्ग है। 

धर्म परिवर्तन के विरोध में एक और बात कही जाती है। जातीभेद से तंग आकर धर्म परिवर्तन करने में कुछ भलाई नहीं है। इस तरह का तर्क कुछ हिन्दू लोग करते है। कही भी जाए तो वहाॅ जातिभेद है। मुसलमान बने तब भी उनमें जातिभेद है। ईसाई बने तब भी वहाॅ जातिभेद है, ऐसा हिन्दू लोग कहते है। खेद के साथ सच्चाई को स्वीकार करना पड़ता है कि हिन्दूस्तान में अन्य धर्मों में भी जातिभेद का प्रवेश हो चुका है। लेकिन इस पाप के जिम्मेदार हिन्दू लोग ही है। मुल रूप से यह बिमारी हिन्दूओं से पैदा हुई है और उसका संसर्ग अन्य लोगों को हो गया है। इसके लिये उनका ना इलाज था। इसाई और मुसलमानों में जातिभेद होने के बावजूद भी वह जातिभेद हिन्दूओं की जातिभेद की भाॅति है, यह कहना नीम हकीमों जैसी बात होगी। हिन्दूओं के जातिभेद और मुसलमान तथा ईसाईयों के जातिभेद में बहुत बडा अंतर है। सर्वप्रथम ध्यान देने वाली बात यह है कि मुसलमान और ईसाईयों में जातिभेद होने के बाद भी इस तरह का जातिभेद उनके समाज का प्रमुख अंग है, ऐसा कोई भी नहीं कह सकता। आप कौन है ? इसका मैं मुसलमान हॅू या मै ईसाई हॅू। इतना ही उत्तर देने पर उस उत्तर से सबकी संतुष्टी हो जाती है। और इस उत्तर से प्रश्न पूछने वाले की संतुष्टि हो जाती है। आप किस जाती से हो ? यह प्रश्न पुछने की किसी को भी आवश्यकता महसूस नहीं होती। परंतु किसी भी हिन्दू को आप कौन है। यह प्रश्न पूछना पडता है। और इस प्रश्न का जवाब दिये बगैर उसकी सही सही स्थिति ध्यान में नहीं आती है। इस से यह सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दू समाज में जाति को किस तरह प्रधानता मिली हुई है, और मुसलमान तथा ईसाई समाज मंें जाति को कैसे गौण स्थान प्राप्त है, इस बात का खुलासा उपरोक्त विवेचन से आपकों हो सकता है। इसके अलावा हिन्दू धर्म का जातिभेद तथा मुसलमान और ईसाई धर्म के जातिभेद में ओर भी एक मुख्य भेद है। हिन्दुओं के जातिभेद की जड़ में हिन्दूओं का धर्म है। मुसलमान ओर ईसाईयों के जाति भेद की जड़ में उनके धर्म का अधिष्ठान नहीं है। हिन्दूओं ने जातिभेद समाप्त कर देगे ? ऐसा कहने पर उनका धर्म उनकी बाधा बनेगा। पंरतु यदि ईसाई और मुस्लिमों ने उन लोगों के बीच विद्यमान जातिभेद को समाप्त करने की सोची तो, इस सोच पर उनका धर्म बाधा नहीं बनेगा। हिन्दूओं को धर्म को समाप्त किए बिना जातिभेद को समाप्त करना संभव नही है। मुसलमानों को तथा ईसाईयों को जातिभेद का नाश करने के लिए धर्म का इस कार्य हेतु प्रबल समर्थन ही प्राप्त होगा। जाति भेद सभी धर्मों में है, यह स्वीकार कर लेने में भी हिन्दू धर्म में ही बने रहना चाहिए। यह निष्कर्ष इससे कदापि नहीं निकाला जा सकता है। जातिभेद की तीव्रता कम है अथवा जिस समाज में मिलने से जातिभेद सरलता से और सुलभता से समाप्त किया जा सकता है, उस समाज में मिलना चाहिए, वही सही तर्कशुद्ध सिद्धान्त है, ऐसा मानना होगा। 

केवल धर्म परिवर्तन करने मात्र से क्या होगा ? आप लोग अपनी आर्थिक और शैक्षणिक स्थिती को सुधारने का प्रयास किजिए, इस तरह की सिख कुछ हिन्दू लोग दे रहे है। इस प्रश्न से अपने बीच में कुछ लोग भ्रमित होने की संभावना है और इसलिए मुझे इस प्रश्न पर विचार करने की आवश्यकता महसूस होती है। पहला प्रश्न तो यह है कि आपकी आर्थिक तथा शैक्षणिक स्थिती में सुधार लाने के प्रयास कौन करने वाले है ? आप या जो इस तरह का उपदेश देते है वे प्रयास करेंगे। वह हिन्दू लोग जो इस तरह का उपदेश करते है वह केवल बात करने के अलावा आपके लिये कुछ करेंगे ऐसा मुझे लगता नहीं और कुछ करने की उनकी तैयारी भी मुझे दिखाई नहीं देती। जबकी हर कोई हिन्दू केवल अपनी जाति तक ही सीमित दृष्टि रखकर केवल अपनी जाति विशेष की आर्थिक दशा में सुधार लाने हेतु प्रयासरत है, ब्राम्हाण महिलाओं के लिए प्रसुतीग्रह, ब्राम्हाण बालकों के लिए स्काॅलशिप, ब्राम्हण बेकरों के लिए रोजगार दिलाने हेतु कार्यरत है। सारस्वत ऐसा ही कुछ कर रहा है। कायस्थ वही कर रहा है, मराठे भी वही कर रहे है। जिसे भी देखो, वह केवल अपनों के लिए कर रहा है। ओर जिसका कोई नहीं उसका खुदा मददगार है इस तरह की स्थिती है। आपकी उन्नति आपही ने करनी है, दूसरा कोई भी आपको मदद नहीं करेगा। इस तरह की वस्तुस्थिति है तब इन लोगों की बातों पर ध्यान देने से हमें क्या लाभ होगा ? हमें भ्रमित कर समय टालने के अलावा इनका कोई दूसरा उद्देश्य नजर नहीं आता है। आपकी स्थिति आपको ही सुधारनी हैं, जब ऐसा ही है तब इन हिन्दू लोगों के फिजूल के तर्कों पर ध्यान देने की हमें आवश्यकता नहीं है और हमें उपदेश देने का उन्हें कोई अधिकार भी नहीं है। परंतु इतना ही कहकर इस प्रश्न को टाल देने का मेरा इरादा नहीं है। मुझे उसका खंडन करना जरूरी है। 

केवल धर्म परिवर्तन कर लेने मात्र से क्या होने वाला है ? ऐसा जो हिन्दू लोग पूछते है, उनकी विचार शून्यता का मुझे बडा आश्चर्य होता है। हिन्दूस्तान के सिख, मुसलमान तथा ईसाई लोग धर्मपरिवर्तन करने के पूर्व हिन्दू ही थे और इन लोगांे में अधिकंाश शुद्र तथा अछूत थे। जो लोग हिन्दू धर्म को त्यागकर सीख बने, जो लोग हिन्दू धर्म त्यागकर मुसलमान बने, जो लोग हिन्दू धर्म को त्यागकर ईसाई बने उन लोगों की उन्नती नहीं हुई, क्या ऐसा इन आलोचकों का कहना है ? क्या ऐसी इन आलोचनों की राय है ? और यह कहना यदि सत्य नहीं और धर्म परिवर्तन करने से उनकी उन्नती हुई यह स्वीकार करते है, तब अछूतों ने धर्म परिवर्तन करने से उनका कुछ कल्याण नहीं होगा, ऐसा कहना कितना यथार्थ होगा। इस पर उन्हें अवश्य ही विचार करना चाहिए। धर्म परिवर्तन कर लेने से कुछ भी होना नहीं है यह कहने का मूल आशय धर्म एकदम निरर्थक वस्तु है। उससे कोई लाभ नहीं और कोई हानी नहीं। इस तरह की जिनकी सोच है उन लोगों की अछूतों ने हिंदू बने रहने चाहिए, इस तरह की जिद क्यों है ? इसका आकलन मुझे नहीं हो पा रहा है। धर्म में कुछ भी धरा नहीं है ऐसी जिन लोगों की धारणा है उन्हें किसी धर्म का त्याग किया क्या या किसी धर्म में प्रवेश किया क्या इस बाबद ऐसे लोगों ने हा-तौबा क्यों मचानी चाहिए ? केवल धर्म परिवर्तन कर लेने मात्र से क्या हासिल होगा क्या उपलब्धी होगी ऐसे जो हिंदू प्रश्न करते है, उनसे ’केवल स्वराज से क्या हासिल होगा’ ऐसा प्रश्न करना अनूचित नहीं होगा। हिंदूस्तान के लोगों का अश्पृश्य लोगों की तरह आर्थिक और शैक्षणिक विकसा जरूरी है, यह यदि सत्य तब स्वराज की क्या उपयोगिता है ? और यदि केवल स्वराज प्राप्ति के द्वारा इस राष्ट्र को कुछ लाभ होता हो तो धर्म परिवर्तन से भी अछूतों को लाभ होना ही चाहिए। गहन सोच-विचारकर सभी को स्वीकार करना होगा कि जितनी स्वीकार की आवश्यकता हिन्दूस्तान को है, उतनी ही आवश्यकता अछूतों को धर्म परिवर्तन की है। स्वराज का जितना महत्व देश को है, उतना ही धर्म परिवर्तन का महत्व अछूतों को है। धर्म परिवर्तन और स्वराज इन दोनोें का अंतिम उद्देश्य एक ही है। उस अंतिम उद्देश्य में कोई अंतर नहीं है। वह अंतिम उद्देश्य है स्वतंत्रता की प्राप्ती और स्वतंत्रता यदि मनुष्यमात्र के जीवन के लिए आवश्यक वस्तु है तब धर्म परिवर्तन मे अछूतों को स्वतंत्र जीवन प्राप्त हो सकता है तब वह धर्मपरिवर्तन निरर्थक है, ऐसा कोई भी कह नहीं सकता। 

पहले उन्नती या पहले धर्मपरितवर्तन ? 

पहले उन्नती या पहले धर्मपरिवर्तन करना चाहिए इस प्रश्न पर मुझे विचार करने की आवश्यकता महसूस होती है। इसलिए उन्नती पहले होनी चाहिए इस तरह की जिनकी सोच है उनमें में तहमत नहीं हो सकता। प्रथम धर्म परिवर्तन फिर उसके बाद आर्थिक उन्नती अथवा पहले आर्थिक फिर उसके उपरान्त धर्म परिवर्तन इस तरह का विवाद पहले राजनीतिक उन्नती या पहले सामाजिक उन्नती के विवाद की तरह शूष्क है। समाज की उन्नती के लिए अनेक साधनों की आवश्यकता होती है। और उन सभी साधनों की अपनी अहमियत या आवश्यकता होती है। उसमें किसी एक वस्तु का उपयोग पहले किया जाए और दूसरी चिज का उपयोग बाद में किया जाए, इस तरह का अनुक्रम हर समय रखा नहीं जा सकता। परंतु इस समय अनुक्रम रखा जाए ऐसा आग्रह हो तो पहले धर्मपरिवर्तन  या पहले धर्मपरिवर्तन या पहले आर्थिक उन्नती, इस प्रश्न का मेरा उत्तर, प्रथम धर्मपरिवर्तन यही होगा। जब तक आप पर अस्पृश्ता का कलंक है तब तक आपकी आर्थिक उन्नती कैसे संभव है ? यह मेरे समझ से परे है। व्यापार  करने के उधेश्य से आपमें से यदि किसी ने कोई दुकान खोली और दुकानदार अछूत है।, यह जानकारी होने पर उससे कोई भी वस्तु खरीदेगा नहीं। नौकरी पाने के उधेश्य से यदि आप में से किसी ने नौकरी के लिए अपनी अर्जी दाखिल की और खरीदार चाहता हो तो खरीदार अछूत है यह जानने के पश्चात कोई भी वह खेत आपको बेचेगा नहीं। आर्थिक उन्नती का कोई भी रास्ता आप लोगों ने चयन किया तो अस्पृश्ता की वजह से किसी भी मार्ग में आपको सफलता हासिल नहीं होगी। अस्पृश्ता आप लोगों की उन्नती के रास्तें में हमेशा की रूकावट है, और इस बाधा को दूर किए बिना आपके विकास का रास्ता साफ नहीं हो सकता और धर्म परिवर्तन के बगैर यह बाधा दूर नहीं हो सकती। आपके बिच के कुछ युवा आज शिक्षा प्राप्ती की चाहत मंे है और पढाई के लिए जहाॅ कही से भी हो ये रूपया प्राप्ति के प्रयास से है। इस रूपयों की लालच में बहुतों के दिल में जहाॅ हम है, वही अछूत रहकर ही अपनी उन्नती करने की मानसिकता दिखाई देती है। परंतु इन युवाओं को मै एक प्रश्न पूछता चाहता हूॅ, पढाई पूरी हो जाने के बाद जब आपकी पढाई के अनुरूप आपको नौकरी प्राप्त करने का मार्ग यदि खुला नहीं है तो फिर पढाई कर के आप क्या करना चाहते हो ? हमारे बहुत से पढे लिखे लोग बेरोजगार है। इसकी क्या वजह है ? मेरी राय में इस बेरोजगारी का बहुतांशी कारण अस्पृश्ता ही है। अस्पृश्ता की वजह से ही आपके गुणों की कदर नहंी हो सकती। अस्पृश्ता की वजह से ही आपकी योग्यता के अनुरूप आपको फल नहीं मिलता। अस्पृृश्ता की वजह से ही आपको सेना से हटा दिया गया है। अस्पृश्ता की वजह से ही आप पुलिस की नौकरी नहीं पा सकते। अस्पृश्ता की वजह से ही आप कोर्ट कचहरी में नौकरी नहीं पा सकते । अस्पृश्ता के कारण ही आप कोई अच्छा पद हासिल नहीं कर सकते। अस्पृश्ता एक तरह का अभिशाप है। इस अभिशाप से आप जल गये हो और आप लोगों की गुणवत्ता की राख बन चुकी है। ऐसी परिस्थिति में आप गुणवत्ता अर्जित करे भी  तो कैसे ? और करे भी तो उसका कौनसा फायदा होगा ? आपके आर्थिक उन्नती के दरवाजे खुले हो, यदि आपकी ऐसी इच्छा है तो आपने पहले अस्पृश्ता को समाप्त करना होगा। 

धर्म परिवर्तन के विरोध में कुछ संदेह

यहाँ तक धर्म परिवर्तन विरोधियों ने जो कारण गिनाए है, कारणों पर विचार किया है। अब धर्म परिवर्तन के प्रति सहानुभूति रखने वालों ने जो संदेह व्यक्त किए है, उन संदेह का समाधान करने का मैं प्रयास रक रहा हूँ। सर्वप्रथम, हमारे महार जागीर का क्या होगा ? यह भय बहुतांस महार लोगों को सता रहा है, यह बात मुझ तक पहूँ है। धर्म परिवर्तन आंदोलन के विरोधी सर्वण लोगों ने, ‘आप यदि धर्म परिवर्तन करते हो तो आपकी महारमी समाप्त हो जाएगी’ यह भय गाँवों में बसे लोगों में फैलाया गया है, यह बात मुझ तक पहूँची है। महारकी अगर समाप्त हो जाती है तो निजी तौर पर मुझे कुछ भसी दुख होगा नहीं। यह बात आप सभी भली भांती जानते हो। महारो को यदि अधोपती के ओर ले जाने वाली यउि कोई चिज होगी, तो वह महारकी ही है, यह मेरी राय मैं पिछले दस सालों से आप लोगों के बीच रखता आया हूँ, और जिस दिन आपको, इस महारकी की जंजिरों से मुक्ति मिलेगी, उस दिन से ही आपकी उन्नती का मार्ग खुल गया, ऐसा मैं समझुँगा। परंतु जिस किसी को यदि महारकी प्रिय होगी, उनको मैं इतना विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि धर्म परिवर्तन से महार वतन को किसी भी तरह का धोखा नहीं है। इस संदर्भ में सन 1850 के कानून का उल्लेख करना आवश्यक है। उस कानून की धारा के तहत किसी भी आदमी को, उसने धर्म परिवर्तन किया है, केवल इस कारण से उसके वारीस या मालमŸाा के किसी भी अधिकारी को बाधा पहूँच नहीं सकती। जिन्हें कानून का आधार पर्याप्त नहीं लगता हो, उन्होंने नगर जिले की परिस्थिती का विचार कारना चाहिए। नगर जिले में बहुत से महार ईसाई बने है, और कुछ जगह तो एक ही परिवार के आदमी ईसाई बने है और बाकी सब महार बने रहे। तथापि जो ईसाई बने उनका महार वतन का अधिकार समाप्त नहीं हुआ है। इस बात का प्रमाण आपको नगर जिले का के महार दे सकते है। इसलिए धर्म परिवर्तन से महार वतन से को धोखा है, यह भय मन में किसी को भी नहीं रखना चाहिए।

दूसरा संदेह राजनितिक अधिकारों के संबंध में है। धर्म परिवर्तन किए तो हमारे अधिकारों का क्या होगा ? इस तरह का संदेह बहुत से लोग कर रहे है। अछुतों को मिले राजनितिक अधिकारों का मुल् मैं जानता नहीं हूँ, ऐसा कोई भी नहीं कह सकता। इन राजनितिक अधिकारों के लिए जितना परिश्रम और जितने प्रयत्न मैंने किए है उतना परिश्रम और प्रयत्न किसी अन्य ने नहीं किये है। तथापी राजनितिक अधिकारों पर सम्पूर्ण रूप से निर्भर रहना ठिक नहीं होगा, ऐसा मुझे लगता है। जो राजनितिक अधिकार हमे मिले है वे जब तक सृष्टि विद्यमान है, तब तक मिलते रहेंगे, ऐसी शर्त पर नहीं दिए गये है, वह कभी न कभी समाप्त होने है। अंग्रेजी सरकार ने जो कम्यूनल अवार्ड घोषित किया था, उसके अनुसार हमें मिले अधिकारों की समय सिमा निश्चित नहीं है, फिर भी वे अधिकार हमें हमेशा के लिए मिले है, ऐसा कोई भी कह नहीं सकता। जिन्हें राजनितिक अधिकारों का लालच है, उन्होंने राजनितिक अधिकार समाप्ति के बादफिर क्या होगा, इस बात पर अवश्य करना चाहिए। जिस दिन यह राजनितिक अधिकारों की समाप्ति होगी उस दिन के बाद हमें अपने सामाजिक सामर्थ पर निर्भर रहना होगा। उस निर्भरता का अभाव हमें है, यह बात मैं आपको बता चूका हूँ। वह सामथ्र्य हमें धर्म परिवर्तन किए बगैर प्राप्त नहीं हो सकता, यह भी मैं स्पष्ट कर चुका हूँ। किसी भी आदमी ने तत्कालीक फायदे का विचार नहीं करना चाहिये। तत्कालीक लाभ के चक्कर में पड़कर शाश्वत हित किस बात में है। इस पर विचार नहीं करना, बहुत दुःख दायी होगा। ऐसे हालात में हमेश के लिए लाभ किस चिज में निहित है, इस पर सभी ने अवश्य की विचार करना चाहिए। मेरे मतानुसार, शाश्वत हितों की दृष्टि से देखा जाए तो धर्म परिवर्तन का उपास ही सही उपाय है। उसके लिए राजनितिक अधिकारों की तिलाजंली देने की भी नौबद आयी तो भी हमें पिछे नहीं हटना चाहिए। धर्म परिवर्तन करने से राजनितिक अधिकारों को खतरा नहीं है। परंतु धर्म परिवर्तन कर लेने से राजनितिक अधिकारों को खतरा क्यों है ? यह मेरे समझ से परे है। आपको जो राजनितिक अधिकार हैवह आप कही भी गये तब आपके साथ जायेंगे। इस विषय में मुझे कतई संदेह नहीं है। आप यदि मुसलमान हो जाते है तो आपके अधिकार मुस्लिमों के नाते आपको प्राप्त होंगे। आप ईसाई बनते हो तो आपके अधिकार ईसाई के नाते आपको मिलेंगे। आप यदि खि बनते हो तो आपके अधिकार आपको सिख के नाते प्राप्त होंगे। राजनितिक अधिकार जनसंख्या पर आधारित है। जिस किसी समाज की जनसंख्या बढंेगी, उस समाज के राजनितिक अधिकार भी बढेंगे। यदि हम हिंदू समाज से अलग हो जाते है तो हमारी पन्द्रह सीटे बचे हुए हिंदूओं के हिस्से में जाएगी। इस तरह भ्रमित होने की जरूरत नहीं।हम यदि मुसलमान बनते है तो, हमे जो पन्द्रह स्थान मिले हुए है, उतने स्थान की आज की तारिख में मुसलमानों को स्थान प्राप्त है। उसमें बड़ोŸारी होगी। हम यदि ईसाई होते तो हमारे समाज के स्थान है आज जो ईसाईयों को मिले हुए स्थान है। उसमें उतनी बड़ोŸारी होगी। वह हमारी जनसंख्या अनुपात में निश्चित ही बढेंगे। कुल मिलाकर, हमारे हमारे राजनीतिक अधिकार हम जहाँ कही भी जाएंगे, वही वे भी जाएंगे। इसलिए इस विषय में डर का कोई कारण नहीं है। इसके विपरित यदि हमने धर्म परिवर्तन नहीं किया और हिंदू धर्म में ही बने रहे तो क्रूा हमारे अधिकार कायम रहेंगे ? इस पर आपने अवश्य विचार करना चाहिए। मान लिजिए कि हिदंू धर्म ने अस्पृश्यता नहीं माननी चाहिए और कोई अस्पृश्यता को मानता है तो वह गुनाह समझा जाए, इस तरह का कानून बनाया और उस तरह का कानून बनाने के बाद आपको प्रश्न किया की, ‘अस्पृश्यता को हमने कानून द्वारा समाप्त कर दिया है, अब आप लोग अछूत रहे नहीं। केवल आप गरीब और दरिद्री हो आपकी अन्य अनेक जातियाँ भी दरिद्र है, परंतु हमने ऐसी जातियों को स्वतंत्र राजनितिक अधिकार नहीं दिए है। फिर आपको क्या दिए जाये ? इस प्रश्न पर आप लोग कौनसा उŸार देंगे, इस पर आपने पूरी तरह से विचार करना चाहिए। मुस्लिम लोग, ईसाई लोग इस प्रश्न का उŸार सफलतापूर्वक दे सकते है। हमारा समाज दरिद्री है, अज्ञानी है, पिछड़ा हुआ है, इसलिए हमें राजनितिक अधिकार प्राप्त नहीं हुए है। वह अधिकार हमें इसलिए मिले है कि हमारा समाज अलग है, और जब तक हमारा धर्म अलग है, तब तक हमें राजनितिक अधिकारों का लाभ मिलना ही चाहिए, इस तरह की भूमिका आप तब तक हिंदू धर्म और हिंदू समाज में है तब तक नहीं ले सकते। जिस दिन आप सभी धर्म परिवर्तन कर स्वतंत्र हांेगे, उस दिन ये भूमिका आप लोग ले सकते है, तब तक नहीं ले सकते और जब तक इस तरह की स्वतंत्र भूमिका पर जोर देकर राजनितिक अधिकारों की माँग कर नहीं सकते तब तक आपके राजनितिक अधिकार शाश्वत है, उन्हें किसी प्रकार का धोखा नहीं है, ऐसा मानना अत्यन्त मूर्खता का लक्षण है, ऐसा मुझे लगता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो धर्म परिवर्तन, राजनितिक अधिकारों का विरोधक न होकर राजनितिक अधिकारों का सर्वधन करने का, वह एक मार्ग है, ऐसा कहना उचित होगा।

यदि आप लोग हिंदू धर्म में बने रहे तो आपके राजनितिक अधिकार समाप्त होंगे। यदि आपको राजनितिक अधिकार खोने नहीं है तब धर्म परिवर्तन कीजिए, धर्म परिवर्तन से ही वह सुरक्षित रहेंगे। मेरा निश्चित हो चुाि है। मैं धर्म परिवर्तन करूँगा, यह निश्चित है। मेरे धर्म परिवर्तन करने का निर्णय किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं है। ऐसी कोई भी वस्तू नहीं है, जो अछूत बनकर मै प्राप्त नहीं कर सकता हूँ। मेरे धर्म परिवर्तन की जड़ में आध्यात्मिक भावना के अतिरिक्त और कोई दूसरी भावना नही है। हिंदू धर्म मेरे बुद्धि को स्वीकार नहीं हो सकता। हिंदू धम्र मेरे स्वाभिमान के अनुरूप नहीं है। लेकिन आप को आध्यत्मिक और भौतिक लाभ के लिए भी धर्म परिवर्तन करना आवश्यक है। कुछ लोग भोतिक लाभ के लिए धर्म परिवर्तन करने के तर्क की हँसी उड़ाते है और उपहास करते है। ऐसे लोगों को मुझे मुर्ख कहने में कोई संकोच नहीं है। मरने के बाद आत्मा का क्या होगा और क्या नहीं होगा यह बताने वाला धर्म अमिरों के उपयोग का होगा। फालतू समय में ऐसे धर्म पर विचार कर मनारंजन किया जा सकता है। जिन लोगों ने जिन्दा रहकर सूख भोगा है, उन्हें मरने के बाद भी कैसे सुख प्राप्त होना है, इसका विचार जिसमें है, वही धर्म है, ऐसा उन्हें महसूस होना स्वाभाविक है। परंतु जिन किसी की धर्म में रहने के बजह से बर्बादी हो गयी हो जो रोटी कपड़ा के लिए मोहताज हो गया हो, जिनकी इंसानियत समाप्त हो चुकि हो उन लोगों ने धर्म पर भौतिक दृष्टि से विचार नहीं करना चाहिए, तो क्या आँखें मिंचकर कर आसमान की ओर ताकते रहना चाहिए ? अमिरों के चोचले वाला वेदान्त गरीबों के किस काम का है ?

धर्म मनुष्य के लिए है

मैं तो आप लोगों से स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि आदमी धर्म के लिए नहीं है, धर्म आदमीयों के लिए है। इन्सानियत प्राप्त करनी हो तो धर्म परिवर्तन किजिए, स्वतंत्रता प्राप्त करनी हो तो धर्म परिवर्तन किजिए, सुख्मय जीवन व्यतित करना हो तो धर्म परिवर्तन किजिए। जो आप लोगों की इन्सानियत को तुच्छ समझता है, उस धर्म में आप क्यों रहना चाहते है ? जो धर्म आपको शिक्षा से वंचित रखता है उस धर्म में आप क्यों रहते हो ? जो धर्म आप लोगों के लिए पीने का पानी तक प्राप्त नहीं होने देना चाहता उस धर्म में आप क्यों रहना चाहते हो ? जो धर्म आपकी नौकरी में रूकावट डालता है, उस धर्म में आप क्यों रहना चाहते हो ? जो धर्म आप लोगों का पल-पल अपमान करता है, उस धर्म में आप क्यों रहना चाहते हो ? जिस धर्म में इंसान के साथ इंसानियत का व्यवहार करने की मनाही है, वह धर्म न होकर दादागिरी है। जिस धर्म में इंसान की इंसानियत रखना अधर्म समझा जाता हो वह धर्म न होकर रोग है। जिस धर्म में गंदे जानवरों को छुना मना नही पर आदमी को छुना मना है, वह धर्म न होकर पागलपन है। जो धर्म एक वर्ग विशेष को शिक्षा की, धन संचय की, शस्त्र रखने की पाबंदी लगाता हो, वह धर्म न होकर मनुष्य के जीवन से खिलवाड़ करने का षड़यंत्र है। जो धर्म अशिक्षितों को, अशिक्षित बने रहो, निर्धन को निर्धन बने रहो ऐससा उपदेश देता तो वह धर्म न होकर जेल है।

धर्म परिवर्तन के संबंध में जो कुछ प्रश्न उपस्थित होते है, उन प्रश्नांे का मैंने यथा संभव विवेचन करने का प्रयास किया है। इन प्रश्नों पर मेरा विवेचन शायद कुछ अधिक विस्तृत हो गया होगा। परंतु इस विषय पर चैतरफा विचार करने का मैंने पहले से ही तय कर रखा था। धर्म परिवर्तन के संबंध में विरोधकों ने जिन मुद्दो को उछाला था, उनका उŸार देना आवश्यक था। धर्म परिवर्तन की घोषना की सार्थकता बगैर समझे धर्म परिवर्तन नहीं करना चाहिए, ऐसा मेरा मानना है। और इस हेतु आपमें से किसी के मन में संदेह न रहे तथा किंतु परंतु को स्थान न रहे, इसी कारण इतने विस्तार से इस प्रश्न पर मुझे विचार करना पड़ा है। मेरे विचारों से आप लोग कहाँ तक सहमत होंगे, उसका मुझे पता नहीं परंतु आप उन्हें ध्यान में रखोगे, ऐसी मेरी आशा है। ‘जो अच्छा लगे वही कहा जाए’ इस प्रकार से लोकप्रियता प्राप्त करना, व्यवहारीक इंसान के लिए ठिक है, परंतु ऐसा एक मार्ग दर्शन के लिए ठीक नहीं, ऐसा मेरा मत है। लोगों की भालाई किसमें है, और बुराई किसमें है, यह जो निर्भय होकर, बिना किसी डर के लोगों की आलोचनाओं की पर्वा किये बगैर समझाता है उसे ही मैं सही मार्गदर्शक मानता हूँ। आपका हित किसमें है और समझाना मेरा कर्तव्य है। वह आपको अच्छा नहीं लगे तब भी बतलाना मेरा काम है। मैंने मेेरा कर्तव्य किया। अब इस प्रश्न पर निर्णय लेना आपका कर्तव्य है।                                 

धर्म परिवर्तन के विषय को मैंने जानबुझ कर दो भागों में बाँटा है। हिंदू धर्म का त्याग करना या हिंदू धर्म में ही बने रहना, यह एक भाग है। हिंदू धर्म को त्यागना हो तो किस धर्म को अपनाना चाहिए अथवा कौनसे नये धर्म का निर्माण करना चाहिए, यह उस प्रश्न का दुसरा भाग है। मुझे आज सिर्फ पहले प्रश्न के संबंध में निर्णय करना है, उसे किये बगैर दुसरे प्रश्न का विचार या तैयारी करने में कोई अर्थ नहीं है। इसलिए पहले प्रश्न पर जो कुछ तय करना है वह किजिए। मैं आपको तय करने के लिए दुसरा अवसर नहीं दे पाऊँगा।

आज की इस सभा में आप जो तय करोगे, उसी के अनुसार मैं अगला कार्यक्रम बनाऊँगा। आप यदि धर्म परिवर्तन के विरोध में निर्णय लेते हो तो प्रश्न यही नर समाप्त हो जाता है। फिर मुझे अपने खुद के लिए क्या कुछ करना है वो करूंगा। धर्म परिवर्तन की बात यदि आप तय करते हो तो आप सभी लोगों ने संघठित रूप से धर्म परिवर्तन का आसवासन देना होगा। धर्म परिवर्तन का निश्चित होने के उपरान्त जिसका जैसा मन चाहे वह अपने मन मुताबिक धर्म को अपनाने लगे, इस तरह का बिखराव आप लोग यदि करना चाहोगे तो मैं आप लोगों के धर्म परिवर्तन के कार्य का नेतृत्व स्वीकार नहीं करूंगा। आप सभी लोग मेरे साथ ऐसी मेरी इच्छा है। जिस धर्म को हम स्वीकार करेंगे, उस धर्म में हम लोगों की उन्नती के लिए जितनी भी मेहनत करने की आवश्यकता होगी, जितने भी प्रयास करने की आवश्यकता होगी, वह करने के लिए मैं तैयार हूँ। परंतु मैंने कहा, इसलिए धर्म परिवर्तन करना चाहिए, इस भावना के बश में होकर कुछ मत किजिये। आपकी बुद्धि को यदि जँचता हो, तक हामी भरिए। मेरे साथ चलने का आपने तय नहीं किया तो भी दुख नहीं होगा। उल्टा मेरी जिम्मेदारी अब समाप्त हुई, इसकी खुशी होगी। यह आर या पार का निर्णय लेने का प्रसंग है, इस बात को आप लोग अवश्य ध्यान में रखेंगे। आप लोगों की आने वाली पीढ़ी का भविष्य आप जिस तरह तय करेंगे उसी तरह तय होने वाला है। आप लोगों ने आजस्वतंत्र होने की ठानी तो आपकी भावी पीढ़ी  स्वतंत्र होगी। यदि आप लोगों ने गुलाम रहने का तय किया, तो आपकी भावी पीढ़ी भी गुलाम रहेगी। इसलिए आपकी जिम्मेदारी बेहत कठिन है।

स्वयं प्रकाशित होईये

आप लोगों को, इस अवसर पर क्या संदेश दिया जाए, इस पर सोच विचार करने पर, मुझे तथागत बुद्ध ने अपने संघ को परिनिवार्ण के पूर्व जो उपदेश किया था, और जिसका उल्लेख ‘महापरिनिवार्ण सुŸा’ में है, उसकी याद आती है। बुद्ध बिमारी से अच्छा हो जाने के उपरान्त बुद्ध विहार की छाया में स्थित आसन पर बैठे थे। तब भन्ते आनन्द तथागत बुद्ध के समीप आये और उन्हें अभिवादन कर एक ओर बैठ गये और कहा, ‘तथागत को मैंने स्वस्थ रहते हुये भी देखा है तथा बिमार में भी देखा है। तथागत की बिमारी मैं कुंठित हो गया हूँ मैं दिगभ्रित हो चुका हूँ, मुझे धर्म भी सुझाई नहीं दे रहा है। परंतु तब भी मुझे इतनी तो खुशी है कि भिक्षु संघ के विषय में कुछ कहे बगैर तथागत का परिनिवार्ण नहीं होगा’ तथागत बुद्ध ने कहा कि ‘आनन्द! भिक्षु को मुझसे और क्या चाहिए ? आनन्द, मेरे मन मंे कुछ और जबान पर कुछ, इस तरह से मैंने धर्म का उपदेश कदापि नहीं किया है। छुपाकर रखने वाली कोई बात मेरे पास नहीं है। तब आनन्द! तथागत भिक्षु के संबंध में क्या बतायेंगे ? आप लोग दिपक की समान स्वयं प्रकाशमान बनो। पृथ्वी की तरह पर प्रकाशीत मत बनो। अपने खुद पर यकिन करो, अन्य किसी के पिछलग्गु मत बनो। सत्य का ही आश्रय लो। और किसी अन्य की शरण जाओं नहीं ! मैं तथागत बुद्ध के शब्दों का आश्रय लेकर संदेश देना चाहूँगा कि आप लोग स्वयं अपने आधार बनो! अपनी खुद की बुद्धि के शरण जाईए। दुसरे किसी अन्य का उपदेश स्वीकार मत किजिए। किसी अन्य के वश में मत होईये।

‘सत्य का आधार लिजिए। सत्य की शरण में जाईए। अन्य किसी की शरण में मत जाईए।’ तथागत बुद्ध का यह उपदेश आप लोग इस अवसर पर ध्यान में रखेंगे तो मुझे यकिन है कि आप लोगों का निर्णयगलत नहीं होगा।

– डाॅ. बी. आर. अम्बेडकर का भाषण

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