(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च के लिए विशेष)
विन्नी खुदशाह
आज जब शहर की पढी लिखी महिलाएं अपना वक्त किटी पार्टी, बीसी पार्टी, रेव पार्टी और विभिन्न धार्मिक आयोजनों में बिताती है। तो वे इस भ्रम में जीती है की वे अतिआधुनिक और विकसित हो चुकी है। वे खुले विचार की है। लेकिन जब गुलाबी गैंग जैसे संगठनों के क्रिया कलापो से सामना होता है तो पता चलता है की वास्तविक स्त्री चेतना क्या है। ऐसी महिलाओं के लिए ये एक सीख लेकर आती है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) का इतिहास 20वीं सदी की शुरुआत में महिला श्रम आंदोलनों से जुड़ा है। 1908 में न्यूयॉर्क में महिलाओं के मताधिकार और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग से इसकी शुरुआत हुई। 1910 में क्लारा ज़ेटकिन ने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में इसे प्रतिवर्ष मनाने का सुझाव दिया। 1917 में रूसी महिलाओं की हड़ताल और अंततः 1975 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा इसे आधिकारिक मान्यता मिलने के बाद, यह लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण के वैश्विक प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा।
अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर फेसबुक के एक मित्र ने मुझे एक स्टेटस टैग किया जिससे मै बहुत प्रभावित हुई। उसका मसला कुछ इस तरह था “अंतराष्ट्रीय महिला दिवस स्पा डिस्काउंट, ब्युटीपार्लर, मात्रत्व, स्त्रीत्व के लिए नही मनाया जाता बल्कि इतिहास में इन सब के विरूद्ध हुए संघर्ष को याद करने के लिए मनाया जाता है।“ कितना अंतर है वास्तविक महिला चेतना और उसके भ्रम में। पुरूष को खुश करने की तैयारी में दिन के 24 में से 22 घंटे खर्च करने वाली महिला क्या वास्तविक महिला चेतना से बा वास्ता है। आज की धार्मिक, व्यावसायिक एवं मीडिया व्यवस्था ने स्त्री चेतना को सुंदर, अतिसुंदर, नरम, कोमल नाम के डिब्बे में बंद कर दिया है। आज की आधुनिक चेतन शील स्त्री वही मानी जाती है जो ज्यादा से ज्यादा समय ब्युटीपार्लर में देती है। महिला संगठन में पुरूष के खिलाफ लंबे भाषण दे सकती है।
विज्ञापन के रूप में किन्हे बढावा दिया जाता है? विज्ञापन में वास्तविक नायिकाये कहां है कल्पना चावला, मलाला, उर्मिला सिरोम, किरन बेदी कहीं नजर नही आती। नजर आती है तो सिर्फ सनी लियोन सहित वे फिल्मी अभिनेत्रियां जिन्होंने स्त्री चेतना को कमजोर ही किया है। दुखद तथ्य है कि सरकारी विज्ञापन भी इसी राह पर चलते है।
ये चुनौती आज महिला संगठनों के सामने सीना ताने खड़ी है कि क्या कभी स्त्री उन धार्मिक रीति रिवाजों के विरूद्ध खड़ी हो सकेगी जो उसे हलाला, इद्दत की मुद्दत के लिए बाध्य करती तो कभी ढोर गवार का दर्जा देती ? क्या कभी उन बंधनों को तोङ सकेगी जो उसे एक दान की वस्तु समझते है ? क्या कभी ऐसे ग्रंन्थों की होली जलायेगी जो उसे नरक का द्वार कहती, सती प्रथा, कन्या वध प्रथा, भ्रूण हत्या करने को उकसाती ? क्या ऐसे नायकों की पूजा करने से मना करेगी जो गर्भवती स्त्री को घर से निकालना आदर्श समझता हो ? अक्सर ऐसा देखा जाता है। स्त्री उन्ही कुरितियों की जङे सींचती आई है जो उसे बेङियों में जकङती है। दरअसल स्त्रियों की पहली लङाई अपने आप से है।
मेरा मानना है स्त्री चेतना सही मायने में तब शिखर पर पहुँचेगी जब वह इन चुनौतियों के विरूद्ध खड़ी होकर संघर्ष करेगी। क्योंकि यही स्त्री शोषण की जन्म स्थली है।





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挺不错的样子嘛!