छत्तीसगढ़ के कुम्हारों का संबंध अतीत के बौद्ध धम्म से रहा है।

लक्ष्मी नारायण कुम्भकार “सचेत”


भारत की इस धरती के अतीत की संस्कृति ,परंपरा और सामाजिक जीवन दर्शन का इतिहास आज अपने मौलिक स्वरूप में भले ही दिखाई नहीं देता हो लेकिन समाज के लोक जीवन में उस अतीत की प्रचलित प्रथाओं के अमिट चिन्ह आज भी सर्वत्र विभिन्न रुपों में विद्यमान है।
हमारे आसपास के विभिन्न मूलनिवासी समाजों के रीति-रिवाजों,परंराओं, मान्यताओं,लोक कथाओं, लोग गीतों , देवी-देवताओं, खान-पान, परिधानों,पूजा पद्धतियों आदि लोग जीवन में रचे-बसे विविध आयामों का बारीकी से अध्ययन किया जाए तो आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इन तमाम अपरिभाषित और अनभिज्ञ रीति-रिवाजों व परंपराओं का संबंध हजारों साल पूर्व की बौद्ध संस्कृति व परंपराओं से जुड़ता हुआ दिखाई देने लगेगा। आज जरूरत है तो सिर्फ़ ऐसे जिज्ञासा पूर्ण खोजी दृष्टिकोण और वास्तविक इतिहासबोध की जिनके सहारे हम अपने वर्तमान की टूटी हुई कड़ियों को जोड़ने में सफल होकर उनके तारों को अतीत के मूल इतिहास से मिला सकें।
इसी प्रयास के चलते मैंने भारत व छत्तीसगढ़ में एतिहासिक महत्व रखने वाले कुम्हार समाज की एक ऐसी परंपरा का अध्ययन किया है जिनको तार्किक एतिहासिक व पुरातात्त्विक दृष्टि से विष्लेषण करने के पश्चात निर्विवाद रूप छत्तीसगढ़ के इन लाखों कुम्हारों को अतीत के ऐतिहासिक बौद्ध धम्म से जुड़ा हुआ पाएंगे।
विगत दिनों मैं छत्तीसगढ़ के धमतरी जिला के ग्राम सिवनी (बारना) गया हुआ था। महानदी के तट पर स्थित इस गांव में कुम्हारों की अच्छी -खासी आबादी निवास करती है और ये लोग अपना पुश्तैनी व्यवसाय, मिट्टी के बर्तन,ईंट,मूर्तियां आदि बनाकर अपना जीविकोपार्जन करते आ रहे हैं।
इस ग्राम सिवनी के 65 वर्षीय आत्मा राम कुम्हार (प्रजापति) ने बताया कि उनके पूर्वजों के जमाने से पोला, दीपावली आदि खास पर्वों के अवसरों पर जब चाक द्वारा मिट्टी के बर्तन बनाने की शुरुआत की जाती है तो चाक में मिट्टी का लोंदा रखने के बाद सबसे पहले लगभग तीन इंच ऊंचाई और दो इंच मोटाई की एक गुंबद नुमा आकृति बनाते हैं जिसे हम ठाकुर देव कहते हैं।
आत्मा राम कुम्हार ने पूछने पर अपने अतीत का स्मरण करते हुए आगे बताया कि यह परंपरा मेरे दादा-परदादा के द्वारा भी निभाया जाता था जोकि मुझे भी विरासत में प्राप्त हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि यह ठाकुर देव (गुंबद नुमा आकृति) छत्तीसगढ़ भर के सभी कुम्हार अपने चाक से आज भी बनाते हैं और यह प्रथा सदियों से चली आ रही है।

उक्त कुम्हार ने इस गुंबद नुमा आकृति (ठाकुर देव) के बारे में आगे बताया कि इस ठाकुर देव को अन्य बर्तनों,खिलौनों,बैलों,आदि पात्रों के साथ सुखा लेने के बाद जब आंवे में पकाने का समय आता है तब इसी ठाकुर देव को आंवे में सबसे पहले स्थापित करके पहले उनकी पूजा-अर्चना करते हैं और सभी बर्तनों को ठीक-ठाक पक जाने की कामना करते हैं।पश्चात उसके ऊपर अन्य सभी कच्चे बर्तनों व खिलौनों को जमा लेते हैं फिर आग सुलगाकर बर्तनों को पका लेते हैं।
दूसरे दिन उन बर्तनों को निकालते हैं उसी समय उक्त पक चुके ठाकुर देव को भी सम्मान पूर्वक निकालते हैं।
बाद में इस पके हुए ठाकुर देव को गांव के अंतिम छोर पर स्थित मूलनिवासियों के ग्राम रक्षक लोक देवता ठाकुर देव की ठीया(ठाना, स्थान )में ले जाकर चढ़ा देते हैं और नारियल,फूल,अगरबत्ती आदि के माध्यम से उनकी पूजा-अर्चना करते हैं साथ ही नारियल का प्रसाद भी लोगों को बांट कर खुशी मनाते हैं।

अब जब आप उक्त तीन इंच की उस आकृति को देखेंगे तो आप चौंक जाएंगे। दरअसल यह आकृति बौद्ध परंपरा की मनौती स्तूप से मिलती जुलती है। उक्त कुम्हार ने जो आकृति बनाई है उसको वह दो भागों में बनाते हैं। सबसे पहले एक प्लेट बनाकर नीचे रखा गया उसके बाद वही गुंबद नुमा आकृति, ठाकुर देव बना कर उस आधार पर रख दिया जाता है । अब आप उस संपूर्ण आकृति को देखेंगे तो नीचे का जो प्लेट नुमा आधार है वह वेदिका (चबूतरा) है और ऊपर स्थापित गुंबद नुमा आकृति कुछ और नहीं स्पष्ट रूप से मनौती स्तूप ही है जोकि बौद्ध धर्म दर्शन की मूल परंपरा का अटूट हिस्सा है।
उक्त 60 वर्षीय आत्मा राम कुम्हार जोकि अशिक्षित भी है से पूछने इस पर ज्ञात हुआ कि इनको व इनके पूरे समाज के अन्य कुम्हारों को इस ठाकुर देव बनाने की परंपरा का संबंध अतीत के बौद्ध धर्म की मनौती स्तूप की परंपरा से होने के ज्ञान नहीं है। मूलनिवासी कुम्हारों की यह अज्ञानता घुसपैठिए आर्यों द्वारा अतीत में किए गए एतिहासिक छेड़-छाड़ और अमानवीय राजनैतिक स्वार्थ का ही दुष्परिणाम है यह प्रमाणिक सच्चाई है।
जिस दिन भारत के मूलनिवासी कुम्हार व अन्य समाज के लोग अपने -अपने समाज की ऐसी ही तमाम छोटी-बड़ी रीति-रिवाजों और प्रचलित प्रथाओं को खोजकर उसका एतिहासिक दृष्टिकोण से विष्लेषण करना शुरू कर देंगे तो मेरा दावा है कि उनको उनकी सारी परंपराओं के तार अतीत के ऐतिहासिक बुद्ध धम्म से जुड़ता हुआ दिखाई देगा।
ज्ञात हो कि इसी गांव सिवनी (बारना) से बारह किलोमीटर दूर गांव खरेंगा है जोकि धमतरी से भी बारह किलोमीटर दूर स्थित है।इस खरेंगा गांव में एक तालाब है जिसके पार में एक पुराना पीपल पेड़ है ।इस पेड़ के नीचे लगभग दो फिट व्यास का एक प्राचीन गोल पत्थर मौजूद हैं।इस गोलाकार पत्थर पर आठ कमल की पंखुड़ियां उत्कीर्ण की गई है जोकि बुद्ध धर्म की परंपरा का द्योतक है। उक्त गोल पत्थर को गांव के बुजुर्गवार सदियों से “बुद्ध पथरा” (बुद्ध का पत्थर) संबोधित करते आ रहे हैं।
इसका मतलब साफ है कि उक्त गांव खरेंगा के अतीत में कभी भव्य बुद्ध विहार रहा होगा, जिसका यह हिस्सा “बुद्ध पथरा” के नाम से आज भी वहां मौजूद हैं। अगर सरकार द्वारा पुरातात्त्व विभाग के माध्यम से यहां आस-पास के क्षेत्र में वैज्ञानिक विधि द्वारा सर्वेक्षण करवा कर व्यापक रूप से खुदाई करवाई जाए तो
निश्चित रूप से यहां बुद्ध धम्म से संबंधित एतिहासिक विरासत मिलना तय है।
कुछ माह पूर्व भी मैंने इसी तरह का एक शोध पूर्ण लेख इसी मूकनायक में लिखा था जिसमें मैं इसी तरह के मनौती स्तूप को “सत्ती कलश” के रूप में छत्तीसगढ़ के अनेक समाजों द्वारा पूजने की परंपरा का उद्घाटन किया था।
छत्तीसगढ़ का कुम्हार समाज इस लेख को पढ़ने के पश्चात निश्चित रूप से अपने पूर्वजों को अतीत के महान बुद्ध धम्म से जुड़ा हुआ पाएंगे तो वे आज गर्व की अनुभूति करेंगे।

लक्ष्मी नारायण कुम्भकार “सचेत” दुर्ग (छ0ग0)

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