बेजा कब्जा मकान और उस पर बुलडोजर

Encroached house and the bulldozer action against it

डॉ संजीव खुदशाह 

*”गरीबों की झोपड़ियों पर चढ़ा बुलडोजर“* यह हैडिंग देख करक मन आकर्षित हो जाता है और पढ़ने को मन करता है कि मामला क्या है? हर कोई ऐसे समाचार को पढ़कर उद्वेलित हो जाता है कि आखिर गरीबों का क्या दोष है? क्यों उनकी झोपड़ियां उनके घरों को तोड़ा जा रहा है? यह गलत है आदि आदि। पिछले दिनों रायपुर के ग्राम नकटी में सरकार ने करीब 85 घरों पर बुलडोजर चलाया। यह समाचार सोशल मीडिया से लेकर के पूरे मेंन स्ट्रीम की मीडिया में सुर्खी बनकर सामने आया। आइए इस प्रकार के मामले को विस्तार से समझते हैं ।

मैं यहां सिर्फ ग्राम नकटी की बात नहीं कर रहा हूं ऐसे हर प्रकरण की बात कर रहा हूं जहां पर बुलडोजर चला कर बेजा कब्जा को तोड़ा जाता है ‌। आज से करीब 20-25 साल पहले एक राजनीतिक पार्टी ने एक नारा पूरे मध्य प्रदेश/ छत्तीसगढ़ में फैलाया वह था। *जो जमीन सरकारी है वह जमीन हमारी है।* यह नारा अभी भी ग्रामीणों के बीच में बसा हुआ है। उनके मन में बना हुआ है। हर गांव की स्थिति यह है की बड़ी तेजी से खुली सरकारी जमीनों में बेजा कब्जा किया जा रहा है। चाहे वह सड़क, गली की जमीन हो, चाहे वह किसी योजना की जमीन हो। चाहे वह चरागन हो, शामिलात चरागन हो। किसी भी खाली जमीन को अपनी जमीन समझ कर कब्जा करने की प्रवृत्ति यहां पर बहुत है। बहुत जगह यह होता है कि अपनी खुद की भूमि स्वामी की जमीन को बेचकर लोग सरकारी जमीनों में ऊंचे ऊंचे मकान बना लेते हैं और जब इन मकानों को तोड़ा जाता है तो हो हल्ला मचाते हैं। स्वाभाविक है जिसका मकान टूटेगा उसे तकलीफ होगी। लेकिन इस मुद्दे को बहुत ही गहराई से समझने की जरूरत है। खास करके ऐसे लोगों को जो इस तरह से बेजा कब्जा करके मकान बना लेते हैं। 

वैसे सरकारी जमीन पर मकान बनाने पर ग्राम पंचायत, नगर निगम और स्थानीय निकाय को यह जिम्मेदारी है कि वह नोटिस जारी करें और इस तरह से बेजा कब्जा करने वाले को बेदखल करें। लेकिन कर्मचारियों की कमी, राजनीतिक दखल के कारण यह संभव नहीं हो पता है। अक्सर नोटिस भेजने के बाद में राजनीतिक पार्टी या किसी स्थानीय टूटपूंजिया नेता के द्वारा धमकी दिया जाता है की नोटिस वापस लो, नहीं तो अच्छा नहीं होगा। कई बार संबंधित कर्मचारी अधिकारी को स्थानांतरित भी कर दिया जाता है। मारपीट भी की जाती है।

रायपुर के ग्राम नकटी का मामला कुछ ऐसा ही है खसरा नंबर 460 करीब 15 हेक्टेयर भूमि जो की शामिलात चारागन की भूमि है। लोग इस प्रकार की जमीन को अपनी जमीन समझते हैं। कई लोग इसे पंचायत की जमीन समझ बैठते हैं। दरअसल यह होती है सरकार की जमीन। खुली भूमि पर सरकार कार्यालय, सामाजिक भवन, जनकल्याण की योजनाएं बनाती है। जो की जनता के ही काम आती हैं। 

हालांकि हर मामले में जब इस प्रकार सरकार के द्वारा जो बेदखली होती है तो 90% मामलों में इन निवासियों का रिहैबिलिटेशन करती है। नकटी के मामले में भी नया रायपुर के सेक्टर 30 में 6 घंटे के भीतर सभी बेजा कब्जाधारियो को फ्लैट उपलब्ध करा दिए जाने का समाचार सामने आया है।

*पट्टा देने का आश्वासन*

बेजा कब्जाधारी भी एक मतदाता होते हैं इसीलिए हर राजनीतिक पार्टी और उनके प्रत्याशी इन वोटरो से उस जमीन पर पट्टा देने का वादा करते हैं। वोट पाने की खातिर। लेकिन पट्टा सिर्फ उन्ही जमीन में दिया जा सकता है जो आबादी मद की जमीन होती है। पट्टा मिलने की लालच में भी बहुत सारे लोग बेजा कब्जा करने के लिए उमड़ पड़ते हैं। 

*अंत में नुकसान गरीबों का होता है* 

शहर और गांव में इस प्रकार बेजा कब्जा करना एक सामान्य बात हो गई है। लेकिन कभी न कभी यह बेजा कब्जा टूटता ही है। क्योंकि सड़क चौड़ीकरण होनी ही है। शासकीय भूमि में वृक्षारोपण से लेकर कई और काम होने हैं। लेकिन लोग समझते हैं कि 50 सालों से कब्जा कर रह रहे हैं तो अब यह उनका हो गया। लेकिन ऐसा होता नहीं है। इन मकानों में बिजली मिल जाती है, संपत्ति कर भी पटाने लगते हैं, विभिन्न प्रकार के टैक्स देने लगते हैं। तो लोगों के मन में यह भ्रम पैदा हो जाता है कि अब इन जमीनों पर उनका मालिकाना हक हो गया है। और वह महंगे ऊंचे ऊंचे मकान बनने लगते हैं। जैसा कि मैंने बताया इस प्रकार सरकारी जमीन पर बनाया गया मकान आज नहीं तो कल टूटना ही है। जब ऐसा होता है तो सबसे ज्यादा नुकसान इन गरीबों का ही होता है और इसके पीछे उनकी समझ की कमी है। वह सोचते हैं कि उनका मकान कभी नहीं टूटेगा क्योंकि वह टैक्स पटा रहे हैं। उनको गवर्नमेंट ने बिजली उपलब्ध करा दी है। इसलिए अब यह उनका अपना हो गया। इसीलिए जहां तक हो सके इस प्रकार से बेजा कब्जा करने से बचना चाहिए। क्योंकि रिहैबिलिटेशन में जो मकान दिए जाते हैं वह पर्याप्त नहीं होते हैं। कमरे बहुत छोटे होते हैं सीढ़ीओ से ऊपर चढ़ना पड़ता है। बहुत सारी समस्याएं होती हैं लोकेशन भी चेंज हो जाता है। इसके कारण व्यवसाय से लेकर के बाकी दिक्कत है आती है। क्या अब समय नहीं आ गया इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचने का बेटा कब्जा करने से बचने का ?

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