छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मेलन में मेरा कार्यकाल

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डॉ संजीव खुदशाह 

2026 के छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मेलन के चुनाव में जिस तरह से निर्वाचन हुआ और एक पक्ष को सुना गया दूसरे पक्ष को अनसुना किया गया। इसीलिए मुझे लगता है कि मुझे अपनी बात कहनी चाहिए। इसीलिए मैं अपनी बात को यहां पर रख रहा हूं। 

आदरणीय ललित सुरजन के समय से मैं छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मेलन का सदस्य के साथ-साथ कार्यकारिणी सदस्य भी रहा हूं। करीब 20 साल से ज्यादा समय हो चुके हैं और पिछले कार्यकाल में मुझे सम्मेलन का कोषाध्यक्ष बनाया गया। इस समय सम्मेलन के अध्यक्ष श्री रवि श्रीवास्तव, महामंत्री डॉ राकेश तिवारी थे। क्योंकि मैं और भी समितियों में पदाधिकारी रह चुका हूं तो मुझे कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी का बखूबी एहसास है और समिति की नियमावली को भी मैं भली भांति समझता हूं। मुझे बड़ी खुशी थी कि मैं इस संगठन का पदाधिकारी बना और कोषाध्यक्ष के रूप में मुझे काम करने का मौका मिला। मैं चाह रहा था कि संगठन को नई ऊंचाई पर पहुंचाऊ। लेकिन 3 साल के दौरान मुझे इसका चार्ज ही नहीं मिला। यहां तक की कार्यक्रम की जानकारी तक मुझे नहीं दी जाती थी। कब कार्यक्रम होना है कितने पैसे खर्च होने हैं कौन अतिथि होगा कौन कार्यक्रम की अध्यक्षता करेगा? कौन रचनाएं पढ़ेगा? पता नहीं यह सब कौन डिसाइड कर रहा था ? मुझे कार्यक्रमों का तब पता चलता था जब मेरे पास दस्तखत के लिए चेक भेजे जाते थे। सम्मेलन के पास करीब ₹800000 थे जिसमें से ₹500000 भूपेश बघेल के कार्यकाल में मिले थे। मैं डॉक्टर राकेश तिवारी से पूछा है कि उनके हस्ताक्षर से यह कार्यक्रम की सूचना जारी हो रही है। क्या उन्हें मालूम है तो डॉक्टर राकेश तिवारी जो की महामंत्री थे उन्होंने बताया कि मुझे भी जानकारी नहीं है। तो मैं इसका विरोध किया कि पदाधिकारी केवल हस्ताक्षर करने के लिए नहीं होते। नियम अनुसार समिति के पटल पर कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा जाना चाहिए और उसमें तय होना चाहिए कि कार्यक्रम कब होगा कितना खर्च होना है। कौन कौन मेहमान आएंगे। किसको क्या जिम्मेदारी मिलेगी? लेकिन यह सिर्फ राजेंद्र चांडक और रवि श्रीवास्तव के द्वारा तय किया जा रहा था। रवि श्रीवास्तव चेक बुक पर ब्लैक दस्तखत कर चुके थे. मेरे पास उसकी फोटोग्राफ आज भी मौजूद है। मुझे और मेरे साथी डॉक्टर राकेश तिवारी को सिर्फ चेक में हस्ताक्षर करते समय पता चलता था कि कौन सा कार्यक्रम हो चुका है और उसमें इतना खर्चा हुआ है। 

खादी भंडार को दिया गया चेक बाउंस हो गया। और राजेंद्र चांडक ने खादी भंडार के मालिक से मुझे फोन करवाया कि आपके ऊपर मैं कानूनी कार्यवाही करूंगा आपका चेक बाउंस हो गया। इसके बाद मैं चेक में बिना जांच के दस्तखत करना बंद कर दिया। पहले यह पता किया जाता की अकाउंट में पैसे है या नहीं तभी बैंक के चेक में दस्तखत किया जाता। मैंने सम्मेलन के प्रबंधन मंत्री राजेंद्र चांडक जी से पूछा कि आपने जो कार्यक्रम तय किया है क्या इस कार्यकारिणी में पास कराया हो तो उसे प्रस्तुत करें। इसी प्रकार एफडी को तोड़ने का प्रस्ताव मेरे पास भेजा गया। उसे भी मैंने कहा कि एफडी तोड़ने से पहले इस कार्यकारिणी में पास कराया जाए। लेकिन इस बात को लेकर के एक बैठक में बहस भी हुई। मैं समिति में एक कठपुतली कोषाध्यक्ष के रूप में नहीं रहना चाहता था। मैंने राजेंद्र चांडक जी को कहा कि आप इसका प्रभार ले लें। अगर मुझे नहीं देते हैं। मैं किसी के इशारे में काम करने के लिए तैयार नहीं हूं ।मुझे पपेट बनना स्वीकार नहीं था। 

हमने 12 अप्रैल 2025 को प्रभार नहीं दिए जाने के संबंध में सम्मेलन के अध्यक्ष को पत्र लिखा। जिसमें वरिष्ठ सदस्यों के हस्ताक्षर थे सुधा वर्मा, डॉ सत्यभामा आदिल, डॉ माझी आनंद डॉ राकेश तिवारी एवं डॉ संजीव खुदशाह। श्री जीवेश प्रभाकर ने भी इस पर आवाज उठाई। इस पर भी रवि श्रीवास्तव ने कोई कार्यवाही नहीं की। 

इसके बाद आया चुनाव का समय डॉ राकेश तिवारी ने सभी सदस्यों को जो उनके संपर्क में थे फोन करके अपने पक्ष को बताया और प्रयास किया की सच्चाई को सामने रखा जाए लेकिन इसमें वह सफल नहीं हो पाए। दरअसल हम कोई संघर्ष नहीं करना चाहते हैं हम चाहते थे कि डेमोक्रेसी के लिए लड़ने वाले लोग कम से कम संस्था में डेमोक्रेसी का पालन करें। लेकिन मेरे 3 साल के इस अनुभव में यह बात सामने आई की हिंदी साहित्य सम्मेलन में डेमोक्रेसी जैसे कोई भी बात नहीं है। यहां पर सिर्फ इशारे में चलने के लिए कठपुतली की जरूरत है। इशारे पर चेक में सिग्नेचर करने के लिए पदाधिकारी चाहिए। प्रश्न उठाने वाले डेमोक्रेसी की मांग करने वाले लोग नहीं चाहिए। सम्मेलन के वित्तीय लेनदेन में गंभीर अनियमितता पर सवाल उठाने के बावजूद किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। यह सम्मेलन कितने दिन चलेगा ऐसी हालत में यह कहना कठिन है । आर्थिक स्रोत लगभग खत्म हो चुका है नीचे दिए गए चेक में आप देख सकते हैं कि खुलेआम खर्च किया जा रहा है इस खर्च का कोई प्रस्ताव पास नहीं किया गया कोई संकल्प नहीं पारित किया गया। सिर्फ एक दो लोग मिलकर संस्था को अपने ढंग से चलने का प्रयास कर रहे हैं। जो कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध है। चेक पर आंख मूंद कर दस्तखत करने वाले कानून की गिरफ्त में आ सकते हैं। सम्मेलन में कोई प्रस्ताव रजिस्टर नही रखा जाता है जिसमें कम से कम अध्यक्ष महामंत्री एवं कोषाध्यक्ष के दस्तखत हो। चुनाव में नई कार्यकारिणी चुनी गई और पदाधिकारी के रूप में नए लोग चुनकर आए हैं आशा करता हूं कि वह कठपुतली की तरह नहीं बल्कि एक जिम्मेदार सदस्य के रूप में काम करेंगे सम्मेलन को नई ऊंचाई देंगे।

डॉ संजीव खुदशाह 

पूर्व कोषाध्यक्ष 

छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मेलन 

रायपुर

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