छत्तीसगढ़ एक शांत प्रदेश के रूप में जाना जाता रहा है। अलग-अलग धर्मों, समुदायों और संस्कृतियों के लोग यहाँ लंबे समय से साथ रहते आए हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में धर्म को लेकर कुछ ऐसी अप्रिय घटनाएँ सामने आई हैं, जो इस सामाजिक सौहार्द और आपसी भरोसे के लिए चिंता पैदा करती हैं। हाल ही में बिलासपुर में हुई घटना भी इसी चिंता को गहरा करती है।
बिलासपुर केवल छत्तीसगढ़ का दूसरा बड़ा शहर या न्यायधानी नहीं है। यह सदियों से बनती आई उस साझा संस्कृति का शहर है, जिसमें अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और प्रदेशों से आए लोग साथ रहते आए हैं।
बिलासपुर का इतिहास बहुत पुराना है। रतनपुर की कलचुरी विरासत, मल्हार और तालागांव की पुरातात्विक धरोहरें इस भूभाग की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की गवाही देती हैं। वहीं रेलवे, कोयला और बिजली उद्योगों ने आधुनिक बिलासपुर को देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों का शहर बनाया। ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और दूसरे प्रदेशों से आए लोगों ने यहाँ रहते हुए अपनी मेहनत और अपनी संस्कृति से शहर को समृद्ध किया।
इस साझा सामाजिक ताने-बाने में मुस्लिम समाज की मौजूदगी भी कोई नई बात नहीं है। मध्यकालीन राजनीतिक और व्यापारिक संपर्कों से लेकर सैनिकों, कारीगरों और दूसरे पेशेवर समुदायों तक, अनेक लोग समय के साथ इस क्षेत्र में आए और यहीं के होकर रह गए। बाद में सूफी परंपरा ने भी इस सामाजिक समरसता को मजबूत किया। लुतरा शरीफ जैसे केंद्र आज भी कौमी एकता और साझा आस्था की लोक परंपरा का हिस्सा हैं।
यानी बिलासपुर की पहचान किसी एक धर्म से नहीं बनती। बिलासपुर की पहचान उसकी विविधता से बनती है।
इसीलिए हाल की घटना को केवल मार-पीट, तोड़फोड़ या पुलिस कार्रवाई की खबर मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। ऐसी घटनाएँ समाज के उस भरोसे को भी चोट पहुँचाती हैं, जिसे बनाने में वर्षों लगते हैं।
सबसे अधिक चिंता इस बात की होनी चाहिए कि किसी स्थानीय विवाद को ऐसा रूप न दे दिया जाए, जिसमें आम नागरिक अपने ही शहर में एक-दूसरे को संदेह की निगाह से देखने लगें।
किसी भी धार्मिक या सामुदायिक विवाद में सबसे पहले नुकसान उस आम आदमी का होता है, जो सुबह अपनी दुकान खोलता है, काम पर जाता है, बच्चों को स्कूल भेजता है और अपने पड़ोसी के साथ सामान्य जीवन जीना चाहता है।उसे न राजनीति चाहिए, न तनाव।उसे सिर्फ सुरक्षित और शांत शहर चाहिए।
आज विवाद केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहते। सोशल मीडिया अधूरी जानकारी, पुराने वीडियो, भड़काऊ संदेश और बिना पुष्टि के किए गए दावों को कुछ ही घंटों में हजारों लोगों तक पहुँचा देता है। फिर कुछ लोगों की हरकत का बोझ पूरे समुदाय पर डाल दिया जाता है।
यहीं से ‘हम’ और ‘वे’ की भाषा पैदा होती है।
और यहीं से डर की राजनीति के लिए जमीन तैयार होती है।
इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि युवाओं के बीच जाति और धर्म को लेकर एक तरह के अहं और दंभ की भावना को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिस उम्र में युवाओं के भीतर सवाल, सपने और अपने भविष्य को बनाने की बेचैनी होनी चाहिए, उस उम्र में यदि उन्हें उनकी धार्मिक या जातीय पहचान के नाम पर दूसरों से श्रेष्ठ होने का अहसास कराया जाए, तो यह केवल उनके भविष्य को नहीं, पूरे समाज के भविष्य को नुकसान पहुँचाता है।
युवा किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। उन्हें नफरत और श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाने के बजाय शिक्षा, रोजगार, रचनात्मक अवसर और अपने जीवन को बेहतर बनाने का रास्ता मिलना चाहिए।
जिस युवा के हाथ में रोजगार और अपने भविष्य का भरोसा होता है, उसके सामने नफरत की राजनीति की जमीन अपने आप छोटी होने लगती है।
सरकार और व्यवस्था की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं हो सकती। युवाओं को सही समय पर रोजगार मिले, उन्हें अपनी प्रतिभा विकसित करने के अवसर मिलें और वे समाज के निर्माण में अपनी भूमिका महसूस करे यह भी सामाजिक शांति की बुनियादी शर्त है।
क्योंकि रोजगार केवल आर्थिक सुरक्षा नहीं देता, वह व्यक्ति को अपने भविष्य के प्रति विश्वास भी देता है। और जिस समाज के युवाओं के पास भविष्य का भरोसा होता है, वहाँ आपसी सहयोग और सहमति के लिए जगह अधिक होती है।
यदि किसी घटना का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाए, धार्मिक पहचान को उकसाया जाए या उस उन्माद को हवा दे कर जानबूझकर ऐसा वातावरण बनाया जाए जिसमें नागरिक भय और असुरक्षा महसूस करें, तो यह केवल सामाजिक सौहार्द के लिए नहीं, लोकतंत्र के लिए भी खतरनाक है।
दहशत में लिया गया निर्णय विवेक का निर्णय नहीं होता।
प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यों को शीघ्र और स्पष्ट रूप से सामने रखे, अफवाहों पर रोक लगाए और निर्दोष नागरिकों को सुरक्षा का भरोसा दे।
मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सनसनी के बजाय सत्य को सामने रखे।
और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी उससे भी बड़ी है—वे आग बुझाने का काम करें, उसमें हवा देने का नहीं।
और हमारी अपनी जिम्मेदारी?
हम किसी घटना को देखकर तुरंत यह तय न करें कि ‘वे’ ऐसे हैं और ‘हम’ वैसे।
बिलासपुर की असली ताकत उसके नागरिकों के बीच का भरोसा है। एक दूसरे के प्रति नफरत कुछ लोगों को क्षणिक ताकत दे सकती है, लेकिन समाज को भीतर से कमजोर करती है।
इसलिए आज सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किसके खिलाफ खड़ा है।
सवाल यह होना चाहिए कि हम अपने शहर को किसके हाथों सौंपना चाहते हैं डर फैलाने वालों के या भरोसा बनाने वालों के?
बिलासपुर को दहशत नहीं चाहिए उसे शांति चाहिए।
उसे समृद्धि चाहिए।
और सबसे बढ़कर उसे एक-दूसरे पर भरोसा चाहिए।
रूपेंद्र तिवारी





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