देव दासियां, मंदिर में पुजारिओं सहित नगरसेठों आदि की कामतृप्ति करती थी।

वेश्यावृति का आधार 'भूख' है। कोई पेट की भूख मिटाने के लिए इस धंधे में आती है, तो कोई पेट के नीचे की भूख मिटाने के लिए इनके संपर्क में आते हैं। विश्व का सबसे पुराना व्यापार देह व्यापार है। ज्ञात इतिहास केञ् अनुसार भारत के मंदिरों की देवदासियां संभवतयाः पहली वेश्याएं थी, इसी प्रकार कोस्थि में एफ्रोडाइट के मंदिर तथा आर्मीनिया में एनाइतिस के मंदिर की हायरोड्यूल (मंदिर में रहने वाली दासियां) भी इसी काल की वेश्याएं थी, जो धन के बदले देह परोस पुरुष की काम तृप्ति करती, मिलने वाले धन को मंदिर के कोष में जमा करवा देती थी। यह देव दासियां, मंदिर में पुजारिओं सहित नगरसेठों आदि की कामतृप्ति करती थी। धर्म के नाम पर चलने वाला काम वासना का यह खेल मंदिरों से निकल नगर में वेश्यावृति के रूप में फैलने लगा।
देवदासी प्रथा
देवदासी प्रथा भारत के दक्षिणी पश्चिम हिस्से में सदियों से चले आ रहे धार्मिक उन्माद की उपज है। जिन बालिकाओं को देवी-देवता को समर्पित किया जाता है, वह देवदासी कहलाती हैं। देवदासी का विवाह देवी-देवता से हुआ माना जाता है, वह किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकती। सभी पुरुषों में देवी-देवता का अक्श मान उसकी इच्छा पूर्ति करती हैं।

देवदासी प्रथा भारत में आज भी महाराष्ट्र और कर्नाटक के कोल्हापुर, शोलापुर, सांगली, उस्मानाबाद, बेलगाम, बीजापुर, गुलबर्ग आदि में बेरोकटोक जारी है। कर्नाटक के बेलगाम जिले के सौदती स्थित येल्लमा देवी के मंदिर में हर वर्ष माघ पुर्णिमा जिसे 'रण्डी पूर्णिमा' भी कहते है, के दिन किशोरियों को देवदासियां बनाया जाता है। उस दिन लाखों की संख्या में भक्तजन पहुँच कर आदिवासी लड़कियों के शरीर के साथ सरेआम छेड़छाड़ करते हैं। शराब के नशे में धूत हो अपनी काम पिपास बुझाते हैं।

नारी देह, पुरुष के लिए सदैव आकर्षण का केंद्र रही है। समुंद्र मन्थन के दौरान अमृत कलश दैत्यों के हाथ लग गया, तब दैत्यों से अमृत कलश वापिस लेने के लिए सुंदर नारी का रूप धरे भगवान विष्णु के यौवन पर मुग्ध हो असूरों ने अमृत कलश उन्हें सौंप दिया। महाभारत काल के दौरान तो वेश्याओं का वर्गीकरण भी किया गया जैसे राज वेश्या, नगर वेश्या, गुप्त वेश्या (सफेदपोश, कालगर्ल की भांति) देव वेश्या (देववासी) ब्रह्मा वेश्या (तीर्थ स्थान पर रहने वाली) आदि। प्राचीन काल से ही नारी यौवन पुरुषों केञ् बीच युद्ध का विषय बना रहा है। इस प्रकार के युद्ध को विराम देने के लिए एक निर्णय लिया गया कि जिस यौवना के कारण युद्ध छिड़ा हो उसे नगरवधु की उपाधि देकर सामुहिक भोग की वस्तु बना दिया जाए। आम्रपाली इसी कारण नगरवधु बनने को मजबूर हुई। नगरवधु की एक रात्रि की कीमत अत्याधिक होने के कारण नगर के चंद साहूकार ही उसका रसपान कर पाते थे। लेकिन सम्राट अशोक के काल की प्रख्यात नगरवधु आम्रपाली से चुनिदां किशोरियों को परीक्षण दिलवाया जाता था और चौसठ कलाओं में पारंगत होने पर उन्हें पेशे में उतार दिया जाता था। उनकी देह की कीमत नगरवधु से कम आंकी जाती थी। उन दिनों वेश्याएं समाज की सम्मानित नागरिक होती थी। इन्हें जनपद कल्याणी भी कहा जाता था। ये वेश्याएं केवल मनोरंजन ही नहीं करती थी, अपितू राजा की सलाहकार, सहचरी व गुप्तचर भी होती थी। मदनमाला, चित्रलेखा (चंद्रगुप्त मौर्य की सहचरी), चंद्रसेना (अशोक की सहचरी), देवरक्ता (हर्षवर्धन की सहचरी) के अतिरिक्त वसन्तसेवा, महानंदा, पिंगला आदि अनेक नाम उल्लेखनीय हैं।

मुगल बादशाह के जमाने में लगभग दस लाख परिवार कोठा संस्कृति के पेशे से ही बसर करते थे, देश में इनकी बाढ़ का प्रमुख कारण सिकंदरs की सेना द्वारा स्त्रियों के साथ मनमानी करना था। इनकी तुलना पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा शोषित बांग्लादेश की उन सोनार युवतियों से कर सकते हैं, उनमें से अधिकांश महिलाएं अब कलकता व मुंबई के कोठों पर दम तोड़ रही है। मुगल साम्राज्य के अन्तिम बादशाह ओरंगजेब ने गद्दीशीन होते ही अपने किले सहित सभी वजीरों, नवाबों के हरम खाली करवा दिए। हरम से निकाली गई युवतियों को बाहरी दुनियां के बारे में ज्यादा ज्ञान नहीं होता था। हरम में तो वे अपने सरनाम मालिक के अलावा किसी अन्य पुरुष का चेहरा तक भी नहीं देख पाती थी, क्योंकि हरम के पहरेदार भी ख्वाजा (हिजड़े) होते थे। हरम से निकली युवतियां यहां-वहां कोठों पर बैठ धंधा करने लगी।

अंग्रेजों ने भी राजा महाराजाओं को ऐय्याश बनाए रखने के लिए वेश्याओं की सेवाओं का भरपूर प्रयोग कर अपना उल्लू सीधा किया। इतना ही नहीं अंग्रेजों ने अपने सैनिकों व कर्मचारियों के लिए कुछ विशेष कोठे सुरक्षित भी कर लिए थे।

1947 में देश आजाद हुआ। देश का बटवांरा, राजनीतिक उठापटक, भ्रष्टस्नचार, नाकाम न्याय व्यवस्था, मंहगाई, बेरोजगारी ने इतनी बहू-बेटियों को वेश्या बना डाला, जितनी पहले कभी नहीं बनीं। चूल्हे की आग जलाने हेतू गरीब युवतियां सफेदपोश पैसे वाले 'इज्जतदार' लोगों के जिस्म की आग को शांत कर मजबूरन गुप्त वेश्याएं बन गई।

स्वतंत्र भारत के संविधान के अनुसार वेश्यावृति पर कानूनन प्रतिबंध है, लेकिन इसका कोई असर देखने को नहीं मिलता। ताजा स्थिति यह हो गयी है कि कई शहरों में तो कोठों के बाजारों के अलावा अनेक बस्तियां भी है, जहां घर-घर में देह व्यापार पुलिस के कथित सरंक्षण में होता है।

जबरन वेश्यावृति के धन्धे में धकेली गई युवतियों की स्थिति बद् से बद्तर होती है। जिन्हें अपने पेट की भूख मिटाने केञ् लिए एक रात में बीस-बीस, तीस-तीस 'मर्दों' को शरीर बेचना पड़ता है। फिर भी उसको भरपेट अच्छा भोजन नसीब नहीं होता। यह सब हमारे भारत देश में ही संभव है।

रिपोर्टों के अध्ययन से निष्कर्य निकलता है कि अधिकांश वेश्यावृति में धकेली गई युवतियां भूख की मारी हुई हैं। बेसहारा, बलात्कार की शिकार व अपहृताएं होती है। जिन्हें एक-एक कमरे में जानवरों की तरह रखा जाता है। इन बेदम, लाचार, निर्जीव सी नारियों को नारी कहना विचित्र सा लगता है। क्या शेष है उनमें जिसे एक सामाजिक बोध के साथ नारी कहा जाए? भयंकर आर्थिक शोषण और उत्पीड़न के इन मूर्त रूपों को देखकर अपने समाज के विरुद्ध मन आक्रोश से भर जाता है।

वेश्याओं की दूसरी श्रेणी में वे वेश्याएं आती है जो अपनी वर्तमान आर्थिक स्थिति को बेहतर करने के लिए वेश्यावृति करती हैं। मध्यवर्गीय परिवार से संबधित ये महिलाएं दलालों के माध्यम से ही धंधा करती हैं। इनका कार्यक्षेत्र आसपास की रिहायशी कालोनियों तक ही सीमित होता है। कुछ महिलाएं अति महत्वाकांक्षी प्रवृति की होती हैं। इसमें वह कामकाजी महिलाएं शामिल हैं जो शार्टकट से तरक्की पाने को वेताब रहती हैं। वे बॉस को अपने रूप-यौवन के जाल में फांसकर योग्य कर्मचारियों को पछाड़ तरक्की पाने में सफल हो जाती हैं। उन्नति पाने के लिए किसी भी हद को पार करने पर राजी हो जाती हैं। ऐसी महिलाओं को वेश्या कहना वेश्याओं का अपमान करना है।

वेश्याओं का वर्ग ऐसा भी है, जिनके पास अच्छे वस्त्र, प्रसाधन की सुविधा है, स्थान है और अपनी एक विशिष्ट समाजिक पहचान भी है। गायन, वादन, सौंदर्य के आकर्षण में बांध ग्राहक को सम्मोहित करती है।

वर्तमान समय में देह व्यापार भी हाईटैक हो गया है। इन्टरनेट, मोबाइल पर वेश्याएं आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। दोस्ती के नाम पर राष्ट्रीय समाचार पत्रों में छपे विज्ञापन वास्तव में देह व्यापार की ओर इशारा करते हैं। नादान व कामुक प्रवृति की कॉलेज छात्राएं आधुनिकता के नाम पर इस धन्धे से संलिप्त हो जाती है। शुरूआती दौर में ये अपने पुरुष मित्रों से शारिरीक मित्रता होने पर उपहार लेती हैं, लेकिन पुरुष मित्रों की संख्या बढ़ने के साथ-2 उपहार, नकद राशि में तब्दील हो जाता है। ऐसी किशोरावस्था वेश्याओं का अन्त बहुत बुरा होता है। छोटे-छोटे ढ़ाबों से लेकर फाइव स्टार होटलों में कालगर्ल्स का जाल फैला हुआ है जो दलालों के माध्यम से बड़ी आसानी से उपल्बध हो जाती हैं।




भगवान जैसे निर्जीव चीज की सेवा करने के नाम पर पुजारियों और मठाधिशों की सेवा के लिए शुरू की गई 'देवदासी प्रथा' घोषित रूप से भले ही समाप्त हो गई हो, लेकिन देवदासियां आज भी हैं। इस बात को बल हाल ही में रितेश शर्मा की एक डॉक्युमेंट्री फिल्म 'द होली वाइव्स' से मिला है। दिल्ली में प्रदर्शित की गई इस फिल्म में देवदासी प्रथा जैसी उस कुरीति पर सवाल उठाए गए, जिस पर मेनस्ट्रीम मीडिया में आजकल मुश्किल से ही कोई बहस होती है। यह फिल्म बताती है किस तरह इस दौर में जहां महिला अधिकारों को लेकर हल्ला मचाया गया, घरेलू हिंसा विरोधी कानून बने और महिला अधिकारों पर कई बहसें हुईं, बावजूद इसके कर्नाटक, राजस्थान और मध्यप्रदेश के कई इलाके ऐसे हैं, जहां इन कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। वह भी धर्म के नाम पर और पूरी तरह सार्वजनिक तौर पर।

अपनी फिल्म के निर्माण के दौरान रितेश उन इलाकों में गए, जहां महिलाओं को धर्म और आस्था के नाम पर वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेला जाता है और कई बार बलात्कार तक का शिकार होना पड़ता है। लेकिन, जीविकोपार्जन और सामाजिक-पारिवारिक दबाव के चलते ये महिलाएं इस धार्मिक कुरीति का हिस्सा बनने को मजबूर हैं। अपने प्रारंभिक दौर में देवदासी प्रथा के अंतर्गत ऊंची जाति की महिलाएं जो पढ़ी-लिखी और विदुषी हुआ करती थीं, मंदिर में खुद को समर्पित करके देवता की सेवा करती थीं और देवता को खुश करने के लिए मंदिरों में नाचती थीं। समय ने करवट ली और इस प्रथा में शामिल महिलाओं के साथ मंदिर के पुजारियों ने यह कहकर शारीरिक संबंध बनाने शुरू कर दिए कि इससे उनके और भगवान के बीच संपर्क स्थापित होता है। धीरे-धीरे यह उनका अधिकार बन गया, जिसको सामाजिक स्वीकार्यता भी मिल गई। उसके बाद राजाओं ने अपने महलों में देवदासियां रखने का चलन शुरू किया। मुगल काल में, जबकि राजाओं ने महसूस किया कि इतनी संख्या में देवदासियों का पालन-पोषण करना उनके वश में नहीं है, तो देवदासियां सार्वजनिक संपत्ति बन गईं।

आज भी कहीं वैसवी, कहीं जोगिनी, कहीं माथमा तो कहीं वेदिनी नाम से देवदासी प्रथा देश के कई हिस्सों में कायम है। कर्नाटक के 10 और आंध्र प्रदेश के 14 जिलों में यह प्रथा अब भी बदस्तूर जारी है। देवदासी प्रथा को लेकर कई गैर-सरकारी संगठन अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं। इन संगठनों का मानना है कि अगर यह प्रथा आज भी बदस्तूर जारी है, तो इसकी मुख्य वजह इस कार्य में लगी महिलाओं की सामाजिक स्वीकार्यता है। इससे बड़ी समस्या इनके बच्चों का भविष्य है। ये ऐसे बच्चे हैं, जिनकी मां तो ये देवदासियां हैं, लेकिन जिनके पिता का कोई पता नहीं है। ये तमाम समस्याएं उठाने वाली रितेश की इस फिल्म को मानवाधिकारों के हनन का ताजा और वीभत्स चित्रण मानते हुए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शित किया जा रहा है। रितेश हालांकि मानते हैं कि फिल्म के प्रदर्शन से ज्यादा जरूरी है कि इस विषय पर हमारे देश की कानून व्यवस्था कोई ठोस कदम उठाए, जिससे न केवल इस कुप्रथा का उन्मूलन हो, बल्कि ऐसी महिलाओं और उनके बच्चों को भी पुनर्वासित किया जा सके, जो इस कुप्रथा की गिरफ्त में हैं।

देवदासी हिन्दू धर्म में ऐसी स्त्रियों को कहते हैं, जिनका विवाह मन्दिर या अन्य किसी धार्मिक प्रतिष्ठान से कर दिया जाता है। समाज में उन्हें उच्च स्थान प्राप्त होता है और उनका काम मंदिरों की देखभाल तथा नृत्य तथा संगीत सीखना होता है। परंपरागत रूप से वे ब्रह्मचारी होती हैं, पर अब उन्हे पुरुषों से संभोग का अधिकार भी रहता है। यह एक अनुचित और गलत सामाजिक प्रथा है। इसका प्रचलन दक्षिण भारत में प्रधान रूप से था। बीसवीं सदी में देवदासियों की स्थिति में कुछ परिवर्तन आया। पेरियार तथा अन्य नेताओं ने देवदासी प्रथा को समाप्त करने की कोशिश की। कुछ लोगों ने अंग्रेजों के इस विचार का विरोध किया कि देवदासियों की स्थिति वेश्याओं की तरह होती है।

कुछ दिनों पहले मैंने किसी न्यूज़ चैनल पर वेल्लोर की खबर चलते देखी। खबर कुछ ऐसी थी कि 12-13 साल की बच्चियों को देवदासी चुना गया और उन्हें अगले कुछ सालों तक देव और देवियों यानी भगवान की सेवा में अपना जीवन व्यतित करना है। समाज में इन बालिकाओं का दर्जा जरुर कुछ श्रेष्ठ हो जायेगा, पर देवदासी प्रथा के तहत उनकी आज़ादी छिन चुकी है, इस बात से अनजान ये बच्चियां सिर्फ इस बात से खुश थीं कि अब उन्हें मंदिर की स्वामिनी का दर्जा और देखरेख का अधिकार प्राप्त हो गया है। वहां रहने के दौरान वस्त्र और अच्छा खाना खाने को मिलेगा, साथ ही उस गरीबी से भी छुटकारा भी मिलेगा, जिसके साथ वह पैदा हुई हैं। कमर के उपरी हिस्से तक निर्वस्त्र इन बच्चियों के सर पर मटकियां रख कर जुलुस भी निकाला गया। भीड़ का नेतृत्व करती इन किशोरियों का बालमन जब परिपक्व होगा, बढ़ती उम्र और मातृत्व की लालसा चरम पर होगी और ये यादें साथ होंगी, तो क्या वो एक सम्मानित जीवन की नीव रख पाएंगी? कैसे जी पाएंगी वो इन कड़वी यादों के साथ? दूसरी ओर एक खुशहाल जिंदगी न मिल पाने पर, समाज द्वारा नकार दिए जाने पर क्या वेश्यावृति की ओर इनके कदम नहीं मुडेंगे? न चाहते हुए भी उन्हें वेश्यावृति के गहरे दलदल मे ढकेल दिया जाएगा।

हम थोड़ा पीछे इतिहास के आइने में देखें, तो यह समझना आसान हो जाएगा कि छठी और 10वीं शत्ताब्दी में इसका क्या स्वरुप था और बाद में यह कितना विकृत हो गया था। राजाओं और सामंतों के लिए यह भोग विलास और समाज मे अपनी प्रतिस्ठा की पहचान बन चुका था। इस प्रथा को सबसे ज्यादा बढावा दिया चोलों (चोल वंश के राजा) ने। सदियां गुजरने के बाद भी प्रथा ज्यों की त्यों चली आ रही है, बदले तो सिर्फ हमारे बाहरी आवरण। इस कुप्रथा की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वो इन बच्चियों के सुनहरे वर्तमान और भविष्य पर भारी हैं। जो मैंने देखा और जो अनुभव किया, उसमें दो चीजे थीं। पहली यह कि बच्चियों को निर्वस्त्र कर के घुमाया जा रहा था। दूसरा, लोगो का हुजूम, जो इन नाबालिग बच्चियों का उत्साहवर्द्धन कर रहा था और प्रशासन को कोई खबर नहीं थी।

गौरतलब है कि कर्नाटक में प्रशासन ने 1982 में और आन्ध्र प्रदेश में 1988 में इस प्रथा पर रोक लगा दी थी। पर 2006 में हुए सर्वे में यह बात निकल कर सामने आई कि इस परम्परा का निर्विरोध पालन होता चला आ रहा है। उन समुदायों की भावना प्रगतिशील देश की कल्पना पर भारी पड़ रही है। और, उन्हें कोई मतलब नहीं है कि इस बुराई को अपने साथ ढोते रहना कितना गलत है। समय-समय पर फिल्मकारों ने इस विषय की गंभीरता को उठाने की कोशिश की है, लेकिन हमारे यहां की जनता, जो मलिका और प्रियंका चोपड़ा को अधनंगी देखने की आदि हो चुकी है, ने नकार दिया। फिल्म 'प्रणाली' इसका बेहतरीन उदहारण है कि कैसे देवदासी बनी नायिका अपने ख़ोल से बाहर आ कर मातृत्व सुख और अपने बच्चे को सामाजिक अधिकार दिलाने के लिए समाज के ठेकेदारों से लड़ती है।

सदियों से चली आ रही परम्परा का अब ख़तम होना बहुत ही जरुरी है। देवदासी प्रथा हमारे इतिहास का और संस्कृति का एक पुराना और काला अध्याय है, जिसका आज के समय में कोई औचित्य नहीं है। इस प्रथा के खात्मे से कहीं ज्यादा उन बच्चियों के भविष्य की नींव का मजबूत होना बहुत आवश्यक है, जिनके ऊपर हमारे आने वाले भारत का भविष्य है। उनके जैसे परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरनी बहुत जरुरी है।

इसके इतर एक अच्छी खबर यह है कि पुरी के प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर में 800 साल पुरानी देवदासी परंपरा खत्म होने के कगार पर है और यहां विशेष अनुष्ठानों के लिए केवल दो ही देवदासियां हैं। इस बात का पहले से ही आभास होने पर मंदिर प्रशासन ने परंपरा को जीवंत रखने के लिए 90 के दशक की शुरुआत में नई देवदासियों को जोडऩे का प्रयास किया था, लेकिन इस पद्धति के खिलाफ देशभर में हुए विरोध प्रदर्शन के चलते और महिलाओं के इसमें रुचि नहीं दिखाने से ये कोशिशें नाकाम रहीं। 12वीं सदी के इस मंदिर में 36 अलग-अलग सेवाएं देवदासियों द्वारा की जाती हैं। स्थानीय तौर पर इन्हें 'महरी' कहा जाता है।

एक शोधकर्ता रवि नारायण मिश्रा ने कहा कि देश में यह एक मात्र विष्णु मंदिर है, जहां महिलाओं को नृत्य और गायन के अलावा विशेष अनुष्ठान करने की भी इजाजत होती है। महरी सेवा एकमात्र सेवा है, जिसमें महिलाओं की एक बड़ी भूमिका होती है। पुजारी रवींद्र प्रतिहारी कहते हैं कि एक महिला के बिना इस अनुष्ठान को नहीं किया जा सकता। जगन्नाथ मंदिर प्रशासन के उप प्रशासक भास्कर मिश्रा ने कहा कि इस बार नंदोत्सव के दौरान महिलाओं की सेवा नहीं ली जा सकी। उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव में देवदासियां उनकी मां की भूमिका में होती हैं। भास्कर मिश्रा ने कहा कि 80 साल पहले इस मंदिर में दर्जनों देवदासियां थीं, लेकिन अब केवल दो शशिमणि और पारसमणि रह गई हैं। उन्होंने कहा कि 85 वर्षीय शशिमणि के बाएं पैर में फ्रैक्चर होने के कारण वह बिस्तर पर हैं, वहीं पारसमणि ने भी लंबे समय से मंदिर आना बंद कर दिया है। मंदिर के पास अपने कमरे में बिस्तर पर ही रहने को मजबूर शशिमणि कहती हैं कि वह अब सेवा नहीं कर सकतीं, जो वह आठ साल की उम्र से करती आ रहीं हैं। उन्होंने कहा, 'मैं आठ साल की उम्र में महरी बन गई थी। मैं उस समय से मंदिर के अनुष्ठानों में भाग ले रही हूं।' शशिमणि ने कहा कि लोग देवदासियों का सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा कि देवदासियों को भगवान जगन्नाथ की 'जीवित पत्नी' माना जाता है। उन्होंने कहा, वह (भगवान जगन्नाथ) मेरे पति हैं और मैं उनकी पत्नी। इस बारे में कोई विवाद नहीं है।'

उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र की देवदासियों ने इस साल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मुंबई में अपना अर्धनग्न प्रदर्शन किया। वे सरकार के सामने पहले ही अपनी मांगें कई बार रख चुकी हैं तथा विरोध प्रदर्शन कर चुकी हैं। उन्हें उम्मीद है कि अब इस अनोखे अर्धनग्न प्रदर्शन से सरकार दबाव में आ जायेगी और उनकी सुनवाई हो सकेगी। यह एक अलग ही प्रश्न है, जो हमारे समाज की संरचना पर विचार करने के लिए मजबूर करता है कि इस जमाने में भी देवदासी प्रथा जीवित क्यों है? यह प्रथा, जिसमें माना जाता है कि इन महिलाओं का विवाह भगवान से हुआ है और वे उन्हीं की सेवा के लिए मंदिर के प्रांगण में रहती है, की हकीकत का सभी को पता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ये महिलायें निराश्रित और बदहाल होती हैं। इन्हें भगवान जैसे निर्जीव चीज की सेवा की आड़ में पुजारियों और मठाधीशों की सेवा करनी पड़ती है।

यह शुद्ध रूप से धर्मक्षेत्र की वेश्यावृत्ति है, जिसे धार्मिक स्वीकृति हासिल है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इन देवदासियों, जिन्हें जोगिनियां भी कहा जाता है, के बच्चों की स्थिति का संज्ञान लिया और आंध्र प्रदेश सरकार से पूछा कि उसने इन बच्चों के कल्याण के लिए क्या किया है? 2007 में सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र मिला था, जिसमें इन बच्चों की दुर्दशा को बयान किया गया था, जिसे कोर्ट ने जनहित याचिका मान लिया था। मानवाधिकार आयोग के 2004 की एक रिपोर्ट में इन देवदासियों के बारे में बताया गया है कि देवदासी प्रथा पर रोक के बाद वे देवदासियां नजदीक के इलाके में या शहरों में चली गई, जहां वे वेश्यावृत्ति के धंधें में लग गई। 1990 के एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक 45।9 प्रतिशत देवदासियां एक ही जिलें में वेश्यावृत्ति करती हैं तथा शेष अन्य रोजगार जैसे खेती-बाड़ी या उद्योगों में लग गईं। 1982 में कर्नाटक सरकार ने और 1988 में आंध्र प्रदेश सरकार ने देवदासी प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन कर्नाटक के 10 और आंध्र प्रदेश के 15 जिलों में अब भी यह प्रथा कायम है।

इस प्रथा को कई सारे दूसरे स्थानीय नामों से भी जाना जाता है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी अपनी तरफ़ से पहल कर इन महिलाओं के बारे में जानकारी एकत्र करने के लिए राज्य सरकारों से सूचना मांगी। इसमें तमिलनाडु आदि कई राज्यों ने कहा कि उनके यहां यह प्रथा समाप्त हो चुकी है। उड़ीसा में बताया गया कि केवल पुरी मंदिर में एक देवदासी है, लेकिन आंध्र प्रदेश ने 16,624 देवदासियों का आंकड़ा पेश किया। महाराष्ट्र सरकार ने कोई जानकारी नहीं दी। जब महिला आयोग ने उनके लिए भत्ते का एलान किया, तब आयोग को 8793 आवेदन मिले, जिसमें से 2479 को भत्ता दिया गया। बाकी 6314 में पात्रता सही नहीं पायी गई।


Jeevan Kumar Mallar Speech Made at Chhattisgarh


Jeevan Kumar Mallar Speech Made at Chhattisgarh Raipur DMA Seminar

15.12.2012
Raipur, Chhattisgarh

My dear SC/ST/OBC Educated Mass of Chhattisgarh state.  Today, we are observing the 56th Death Anniversary of Dr.Babasaheb Ambedka.  On this occasion, we are sitting in this hall to remember the Message of Dr.Ambedkar…
Now I am remembering his 18th March 1956 Speech.  Just 9 month before his death… with the lots of pain, with lots of Anguish he said a few words to our Educated Masses that “because of my struggles in the last 5o years of my life, I have been able t get something to my people.  Some people got the benefit of my struggles, they got employment and they have got education and everything.  I wanted them to lead the society and wanted them to guide my people, my society.  But today, I feel that these people have become a bunch of clerks. They are only interested in filling their own stomach, they they have forgotten their society…
Today we are garlanding his photographs and statues all over the country… at the same time we try to understand his pain and anguish.  Because it was unimaginable one…
In the current situation When we compare  our Bahujan Activist with other brahminical activist they celebrate scheduled caste leaders anniversaries everywhere all over India for example, RSS is celebrating Dr.Ambedkar ‘s Parnirvan Diwas in a grand manner.  Why? Because they want to make our people fools again and again.  Our people also blindly follow the concept of Hinduism and the so called Educated masses are also trying to justify the Manuvadi Social System.  The people who availed the reservation in both Employment and Education, they forget about the root, where they came from? Such  people are the most dangerous virus than the Manuvadi.  This type of people plays the significant role in polluting the entire society in the name of Scheduled Caste. Why? You are all sleeping... So many gurus’ and Saints emerged and sacrificed their life to awake the SC/ST/OBC community.  But Still now, you are sleeping and enjoy to sleep.... I want to ask one question that How many days you will sleep? When  will you wake up from your sleep? Because of your continuous sleep, Microscope Community Brahmins have been enjoying by oppressing the Majority Community SC/ST/OBCs for the last 2000 years.  I warned you... “Stop... your Sleep” Stop.... your Sleep... Stop... your Sleep.” How many days you are enjoying your sleep? Stop... your sleep... wake up immediately and go to every nook and corner of the country  like Dr.Ambedkar and create political awareness among the people.. that is the real offering we offer to our legend Dr.Ambedkar. When we Compare the Revolution of French, China, Cuba, Bolcivic(Russia), the working class people understood their oppression within 100years whereas in India , our SC/ST/OBC people  continuously lived like a Slave for the last 2000years. This is a very serious issue in front of us.  According to the Hindu manudarma, the 85% of the SC/ST/OBC peoples’ status is “Duty to Serve” for the Brahmins, Kshatriyas and Vaishiyas.
When the Hindu philosophy entered into India, our people SC/ST/OBC were not ready to accept the Manu system, especially the Scheduled Caste people openly opposed this philosophy.  Thatswhy, except Scheduled Caste rest of the caste came under the Manu Dharma Social System.  Later, the Manu declared Scheduled Caste as “out caste” accordingly,  “Out Caste” people come under “untouchable Caste” . In this scenario the tribal wanted to escape from this caste system, that’s what, the whole adivasi community migrated from their own land and settled in the forest and mountains... this people escaped from the banner of” untouchablity”. They lived very happily and peacefully with nature, since they  people escaped from the Manu Social System directly. Due to the continuous struggle against Manu Social System, our Scheduled Caste People, came out of the village. Still now our people are living away from the village and are going on the same...
Now a days the RSS people are targeting the SC/ST community especially the Tribe Community.  Adivasis minds are all pure, fresh and empty. So this Brahminical force has been entering into this empty mind and injecting the philosophy of Manu.  Our tribal people also knowingly or unknowingly, have got converted as a part of Hinduism... In Madhya Pradesh, with the support of Adivasi Community, BJP came to power         .  Not only that, it is happening throughout India, because the Braminical force are working in a discipline manner to make the SC/ST as slaves.  But Our Ambedkar Missionaries who are supposed to work for the Liberation of our people take it easy policy and less disciplined than Manu Missionaries.  This Manu Missionaries are working their strategies day and night to sustain the Social System in India. But Our people are conducting programme for Dr.Ambedkar only twice in a year that too in a ritual manner. Rest of the days they forget about Dr.Ambedkar and are busy with their own programme. Our people failed to read and understand the message of Dr.Ambedkar.  No sooner they get the job and education, they forget their own society and get alienated from their own people. They feel shame to say their own caste and live in different names and different caste.  Most of the Educated Employees are  Narcissistic .   This narcissist’s people won’t be able to understand the value of Political Power.  Dr.Ambedkar told that “Political Power is the only master key which can open any lock whether it is social, economic, education and cultural problem.  Be aware of narcissistic behavior educated mass, because this people are in the forefront to promote the culture of Brahmanism and spreading the dangerous species of virus within SC/ST/OBC communities.  They are living in the separate world in the concept of “I, My, Myself and Mine”.  Such people always need an ego boost from others around him. For example if an educated employee when he goes to his village for vacations or festivals he expects the village people to praise him about his family and his settlement. If the villagers failed to do this the employee judge the village people who are his relatives to be fools and uneducated. This is the mindset of most of the educated employees throughout India. That’s why our people are being treated worse than beasts.  
Our religious saints like Sant Kabir, Sat Guru Ravidass Narayana Guru, Ayya Vaikunda Samy, Sat Guru Arunachalasamigal, Nathanar and Social Political Gurus like Mahathma jothibai  phule, Shahu Maharaj, Thanthai Periyar, Dr.Ambedkar and manyavar Kanshiram  fought against the Hindu Manu Dharm.  Because of their uncompromised struggle against Brahmanism and Hinduism, now we are enjoying little bit Self Respect, Dignity and reservation.
Because of reservation we got good houses, car good education for your children and everything.  After getting reservation, our people failed to pay back to their own society.  Still now More than 90% of our community people facing lot of discrimination, humiliation, atrocity in their day to day life.  Because of this Brahminical Rule
·                     Murder, Kidnapping, of SC/ST and Backward Community are increasing
·                     Rape of SC/ST and Backward women
·                     Physical and Mental torture to our Bahujan communities
·                     Burning of houses and property of SC/ST and backward are increasing
·                     Our SC/ST and backward students from the leading institution like IIT, AIIMS are facing lot of discrimination by the Brahmin professors and students.  Within four years, 15 students in IIT committed suicide and within 15years 2500 SC/ST/OBC students were forcefully  evicted from the college of IIT
·                     Educated employees also facing lot of problem in their department most of the chairman cum Managing Director in PSU’s are Brahmins.  60% of Brahmins are holding the key post in Judiciary and Defence and controlling the whole India
·                     Our Dalit IAS/IPS officers are living worse than clerk and peon.  Peon and clerk are living with self respect and dignity, when compared to IAS/IPS officers.  Our IAS/IPS officers are carrying the memorandum and running behind the ministers for their good post.
These are all our challenges in front of us to face.  Our educated masses are also busy to give petitions and memorandums to higher authorities..  We are always talking and writing about the issues and problems. But we fail to do the homework for our solution.  You and me have forgotten the Mission of Dr.Ambedkar, that’s’ why  we do not think about the solution.
Babasaheb Dr.Ambedkar said – Educate, Agitate, Organize… We must understand the true and deep meaning of each and every word.  These are not ordinary words; “Educate” does not mean just paper education like MA, PhD etc., it means the cultivation of Mind. Not just stuffing some information in your mind.  Cultivation of Mind- that was the deeper meaning of “ Educate” . and then Babasaheb Dr.Ambedkar used  the word “Agitate” By agitation he meant Agitation of Mind. Once you get real and true education, your mind will get agitated: it will create anger in you.  “Agitate” does not mean going to the road, with flag in hand and shouting slogans. And then Dr. Babasaheb Ambedkar used the word “Organise”. Cultivation of Mind and Agitation of Mind will get together to create Strength. If your come together, join together, then automatically without doing any fighting, struggles and etc., you can achieve the Mission of Dr.Ambedkar and Thanthai Kanshiram.
Time has come now ……. We are observing the death anniversary of Babasaheb Dr.Ambedkar 56th year of Anniversary, because of whose struggle and sacrifices, we are sitting in this hall. Today is the day each one of us should decide or pledge together that now we have to fulfil his Mission.  The ordinary people of our community don’t have any economic security, they have nothing with them, and they are struggling for their day today survival.  But the people, who are sitting in the hall are having everything, education, economy and security.  It is your responsibility to give guidance to your own society… Time has come now to wake up….
So, friends let us come together and work together under the leadership of Bahujan Movement not Sarvjan Movement. Then only our SC/ST/OBC people will get Self Respect and progress.  The day is not far off.
With this message and appeal I hope that you will understand and you will do something in this regard….
Once again, I thank  the organiser Mr.Sanjeev khudshah and others who have organized this meeting.  I believe that they should continue to work in this direction…

Thank you…
Jai bhim… Jai Bharat …. Jai Kanshiram….
Jeevankumar Mallar – Tamilnadu
09442608416

बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस की याद में संगोष्ठि का आयोजन


16 दिसंबर 2012 को छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में दलित मुव्हमेन्ट ऐसोसियेशन कि ओर से बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस की याद में एक संगोष्ठि का आयोजन किया गया। यह सेमिनार दो सत्र में विभाजित था, पहला सत्र का विषय था- बाबा साहेब डाँ अम्बेडकर के बाद दलित आंदोलन की दशा एवं दिशा। दूसरा सत्र-कांचा इलैया की किताब 'मै हिन्दू क्यो नही हूँ?' के पाठ एवं पुस्तकचर्चा पर केंद्रित था। प्रथम सत्र के मुख्य अतिथी तमिलनाडु से आये बसपा के प्रदेश महासचिव श्री जीवन मलार थे। इस सत्र का संचालन श्री रतन गोण्डानेजी ने किया सत्र के प्रमुख वक्ता थे-श्री तुहीन देब निदेशक स्टेट रिरोर्स सेन्टर छ.ग., अरविन्द चुहान, कार्यकर्ता एम्बस, श्री विष्णु बघेल, सी.ए., श्री विश्वास मेश्राम, अध्यक्ष विज्ञान सभा सर्वप्रथम श्री रतन गोण्डानेजी ने दलित मुव्हमेन्ट ऐसोसियेशन के क्रियाकलापों का परिचय दिया कि किस प्रकार यह ऐसोसियेशन छोटी-छोटी गुमनाम दलित जातियों जैसे डोम, डोमार, हेला, मखियार, लालबेगी एवं खटीक के बीच कार्य कर रही है एवं उनमें दलित आंदोलन का प्रचार कर रही है। श्री तुहिन देब ने कहा जो गलतियां कम्युनिष्टो ने जाति भेद को नकार कर की है अब उन्हे यह नही करना चाहिए अब कम्युनिष्ट एवं दलित आंदोलन को एक होकर चलने कि जरूरत है। श्री अरविंद ने कहा हम मूलत: नागवंशी एवं बुध्दिष्ठ है। उसी प्रकार श्री विष्णु बघेल ने कहा दलित आंदोलन में काशिराम का बहुत बडा योगदान है। उन्होने अंबेडकर को पूरे भारत में स्थापित करने का काम किया तथा दलित आदिवासी एवं पिछडो को जागरूक किया। विश्वास मेश्राम ने कहा बाबासाहेब की सोच बहुत व्यापक थी उनके बारे में व्यापक दायरे में सोचने कि आवश्यकता है। सिर्फ बाबासाहेब मेरी जाति के है कहने से नही होगा। हरेक जाति आज अपने आपको श्रेष्ठ समझती है। उन्होने कहा बाबा साहेब द्वारा दिये फायदे को खत्म करने का षडयंत्र हो रहा है। ततपश्चात मुख्य अतिथी श्री जीवन कुमार मलार ने अपना वक्तव्य दिया। उन्होने कहा आज बहुजन आंदोलन के पुरोधा श्री कांशीराम को भुलाने कि कोशिश कुछ षडयंत्रकारियों के द्वारा की जा रही है। तथा मायावती ने बहुजन विरोधी विचार धारा सव्रजन को लाकर अंबेडकरी आंदोलन को नेस्तनाबूत करने का बीडा उठा लिया हे। अब हमें मायावती के बीएसपी पर किये गये बेजा कब्जे से मुक्त कराना है। श्री जीवन ने कहा बाबा साहेब के शिक्षित संगठित एवं संर्घषशील से मतलब एम ए बीए या शासकिय नौकरी नही था। शिक्षित से तात्पर्य शिक्षित दिमाग को विकसित करना है जो अपने शोषकों एवं हितैसियों में फर्क कर सके। इस प्रकार प्रहला सत्र समाप्त हुआ।
दूसरा सत्र प्रसिध्द किताब 'मै हिन्दू क्यो नही हूँ ?' के पाठ एवं परिचर्चा पर केन्द्रीत थी। जिसमें मुख्य वक्ता थे श्रीमति शोभा मुंगेर, श्री संजय पराते, श्री संजीव खुदशाह, श्री शेखरन एवं श्री विश्वास मेंश्राम। सर्वप्रथम श्री संजीव खुदशाहजी ने इस किताब के बारे में बताया कि किस प्रकार एक ओबीसी गडरिया जाति में जन्में श्री कांचा ईलैया हिन्दू धर्म से अंजान थे एवं शासकीय मिशनरियों ने उन्हे उनसे बिना पूछे हिन्दू लिखना एवं पूकारन शुरू कर दिया। श्री खुदशाह जी ने इस किताब के कुछ महत्वपूर्ण अंशो का पाठ किया जिस पर श्री संजय पराते ने आलेख प्रस्तुत किया एवं उडिसा से आये श्री शेखरन ने इस विषय पर विस्तार से अपना मत दिया। अंत में श्री विश्वास मेंश्राम ने संजय पराते के द्वारा उठाये कुछ सवालो का जवाब दिया तथा कहा कि दलितों पर अत्याचार भारतीय संबिधान के वजह से नही बल्कि प्रशासन के कुटिल रवैये के कारण है। इस प्रकार धन्यवाद ज्ञापन करते हुए श्री मेश्राम ने सभी को चाय हेतु आंमंत्रित किया।

हरीश कुण्डे

जेएनयू में मनाया गया महिषासुर का शहादत दिवस

जेएनयू में मनाया गया महिषासुर का शहादत दिवस



PRESS NOTE, AIBSF



• अगले सप्ताह 'महिषासुर-दुर्गाः एक मिथक का पुनर्पाठ' वि‍षय पर पुस्तिका जारी की जाएगी
• इतिहास में जेा छल करते रहे उन्हीं को देवत्वऔ का तमगा मिल गया है और जिन्होंने अपनी सारी उर्जा समाज सुधार और वंचित तबकों के उत्थान के लिए झोंक दी उन्हें असुर या राक्षस करार दे‍ दिया गया
जेएनयू 30 अक्टू बर 2012 : विवादित विषयों पर बहस की अपनी पुरानी पर
ंपरा को बरकरार रखते हुए जेएनयू के पिछडे समुदाय के छात्रों के संगठन ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट् फोरम (एआईबीएसएफ) के बैनर तले सोमावार (29 अक्टू बर) रात को महिषासुर का शहादत दिवस मनाया गया।
देर रात तक चले इस समारोह में देश भर से आए विद्वानों ने महिषासुर पर अपने विचार रखे. इस अवसर पर प्रसिद्ध चित्रकार लाल रत्नाआक द्वारा बनाये गये महिषासुर के तैलचित्र पर माल्यार्पण किया गया.
समारोह को संबोधित करते हुए आदिवासी मामलों की विशेषज्ञ और 'युद्धरत आम आदमी' की संपादक रमणिका गुप्ता ने कहा कि 'इतिहास में जेा छल करते रहे उन्हीं को देवत्वो का तमगा मिल गया है और जिन्होंने अपनी सारी उर्जा समाज सुधार और वंचित तबकों के उत्थान के लिए झोंक दी उन्हें राक्षस करार दे‍ दिया गया. ब्रह्मणवादी पुराणकारों/ इति्हासकारों ने अपने लेखन में इनके प्रति् नफरत का इजहार का भ्रम का वातावरण रच दिया है. आखिर समुद्र मंथन में जो नाग की मुंह की तरफ थे और जिन्हें विष मिला वे राक्षस कैसे हो गए? कामधेनु से लेकर अमृत के घडों को लेकर भाग जाने वाले लोग किस आधार पर देवता हो सकते हैं? ' उन्होंेने कहा कि 'वंचित तबका इन मिथकों का, अगर पुर्नपाठ कर रहा है तो किसी को दिक्कत क्यों हो रही है?'
जेएनयू की प्रो. सोना झरिया मिंज ने कहा कि हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित कहानियों के समानांतर आदिवासी समाज में कई कहानियां प्रचलित हैं. इन कहानियों के नायक तथाकथित असुर या राक्षस कहे जाने वाले लोग ही हैं जिन्हें कलमबद्ध करने की जरूरत है.
प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार ने कहा कि मिथकों की राजनीति और राजनीति का मिथक पर बहस बहुत जरूरी है. हमारे नायकों को आज भी महिषासुर की भांति बदनाम करने की साजिश चल रही है.
इतिहास-आलोचक ब्रजरंजन मणि ने कहा कि शास्त्रीय मिथकों से कहीं ज्याजदा खतरनाक आधुनिक विद्वानों द्वारा गढे जा रहे मिथक हैं. पौराणिक मिथकों के साथ-साथ हमें आधुनिक मिथकों का भी पुर्नपाठ करना होगा.
मंच का संचालन करते हुए एआईबीएसएफ के अध्यीक्ष जितेंद्र यादव ने कहा कि पिछडा तबका जैसे-जैसे ज्ञान पर अपना अधिकार जमाता जाएगा वैसे-वैसे अपने नायकों को पहचानते जाएगा. महिषासुर की शहादत दिवस इसी कडी में है. संगठन महिषासुर शहादत दिवस को पूरे देश में मनाने के लिए प्रयत्नदशील है.
संगठन के जेएनयू प्रभारी विनय कुमार ने कहा कि अगले सप्तािह 'महिषासुर-दुर्गा:एक मिथक का पुनर्पाठ' वि‍षय पर पुस्तिका जारी की जाएगी, जिसका संपादन अकादमिदक जगत में लोकप्रिय पत्रिका 'फारवर्ड प्रेस' के संपादक प्रमोद रंजन ने किया है। गौरतलब है कि 'फारवर्ड प्रेस' में ही पहली बार वे महत्विपूर्ण शोध प्रका‍शित हुए थे, जिससे यह साबित होता है 'असुर' एक (आदिवासी) जनजाति है, जिसका अस्तित्वत अब भी झारखंड व छत्तीयसगढ में और महिषासुर राक्षस नहीं थे बल्कि इस देश के बहुजन तबके के पराक्रमी राजा थे। उन्हों ने कहा कि पुस्तिका में महिषासुर और असुर जा‍ति के संबंध में हुए नये शोधों को प्रकाशित किया जाएगा तथा इसे विचार-विमर्श के लिए उत्त र भारत की सभी प्रमुख यु‍निवसिटियों में वितरित किया जाएगा।
इस मौके पर 'इन साइट फाउंडेशन' द्वारा महिषासुर पर बनाई गई डाक्युशमेंट्री भी दिखाई गई.
समारोह को एआईबीएसएफ कार्यकर्ता रामएकबाल कुशवाहा, आकाश कुमार, मनीष पटेल, मुकेश भारती, संतोष यादव, श्री भगवान ठाकुर आदि ने भी संबोधित किया.
प्रेषक : विनय कुमार, जेएनयू अध्यक्ष, एआईबीएसएफ, 158, साबरतमी जेएनयू मोबाइल – 9871387326

कांशीराम के बहाने दिखाई दलित एकजुटता

दैनिक भास्कर भिलाई से प्रकाशित
कांशीराम के बहाने दिखाई दलित एकजुटता


विभिन्न प्रांतों के दलितों को एक करने की मुहिमराज्य में निवास कर रहे अलग-अलग प्रांतों के दलितों को एकजुट करने एक बड़ी मुहिम शुरू हो गई है। दलित मूवमेंट एसोसिएशन के बैनर तले आयोजन किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में एक प्रमुख आयोजन दो दिन पहले सेक्टर-6 के डॉ. अंबेडकर सांस्कृतिक भवन में कांशीराम की पुण्यतिथि पर हुआ। जिसमें भिलाई स्टील प्लांट व अन्य सार्वजनिक कंपनियों के अफसरों सहित भिलाई में निवासरत विभिन्न प्रांतों के दलित प्रतिनिधियों ने अपनी उपस्थिति दी। 
दलितों को एकजुट करने छत्तीसगढ़ स्तर पर विविध आयोजन के लिए 15 विभिन्न संस्थाओं ने मिलकर कैलेंडर तैयार किया है। जिसमें दलितों से जुड़े मुद्दों पर राज्य के विभिन्न शहरों में कार्यक्रम शुरू हुए हैं। इस एकजुटता को आगामी लोकसभा-विधानसभा चुनावों से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। आयोजक भी इससे इंकार नहीं कर रहे हैं। 
आयोजन की श्रृंखला में 'हमारे महापुरुषों की विरासतÓ कार्यक्रम में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक दिवंगत कांशीराम को लोगों ने याद किया और भारतीय समाज व्यवस्था को बदलने के उनके योगदान की सराहना की। मुख्य अतिथि बीएसपी के जीएम एल. उमाकांत ने कहा कि स्व. कांशीराम का उद्देश्य देश के 85 फीसदी जनसंख्या को एकजुट करना था। उन्होंने अपने त्याग और आचरण से इसमें सफलता पाई। अपने संस्मरण सुनाते हुए बीएसपी के विधि अधिकारी टी. दास ने कहा कि जब स्व.कांशीराम ने डॉ. अम्बेडकर की पुस्तक 'एनहिलेशन ऑफ कास्टÓ को 7 बार पढ़ा तो उनका जीवनदर्शन बदल गया। बीएसपी के डीजीएम एफ. आर. जनार्दन ने 1978 के रामनामी मेले में उनकी उपस्थिति को याद करते हुए बताया कि गिरौदपुरी मेले के दौरान कसडोल में रूकने की व्यवस्था न होने पर एक बस कंडक्टर के छोटे से कमरे में 10-15 साथियों के साथ, जमीन पर लेटकर रात गुजारने का मार्मिक वृतांत सुनाया। इस अवसर पर पंजाब नेशनल बैंक में कार्यपालक जी डी राउत ने बताया कि लोगों को जोडऩे के लिए स्व. कांशीराम ने भाईचारा बनाओ कार्यक्रम, जाति तोड़ो-समाज जोड़ो, सफाई कामगार आंदोलन, साइकिल रैली आदि अनेक अभियान चलाए। आदिवासी ओमखास समाज के महासचिव किशोर एक्का, बीएसपी के डीजीएम पी. जयराज, सामाजिक कार्यकर्ता विजय कश्यप, विमला जनार्दन, डा. अकिल धर बैनर्जी और प्रवीण कांबले ने भी संबोधित किया। आयोजन में विनोद वासनिक, नरेंद्र खोबरागढ़े, एन. चिन्ना केशवलू, प्रदीप सोमकुंवर, वासुदेव लाउत्रे, दिवाकर प्रजापति, शीलाताई मोटधरे और अरविंद रामटेके सहित अन्य का योगदान रहा।
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'' निश्चित रूप से राजनीतिक मोर्चे पर दलित एकजुटता हमारा सबसे बड़ा मकसद है। आरक्षण में कटौती और जाति प्रमाण पत्र बनाने में आने वाली अड़चनें सहित ढेरों ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर जिनके लिए एक बड़ा आंदोलन खड़ा करना जरूरी है। डॉ. अंबेडकर परिनिर्वाण दिवस पर 6 दिसंबर को हम लोग रायपुर में समूचे प्रदेश से दलित समुदाय को एकजुट करने की तैयारी है। वहां हमारे आंदोलन को नाम भी मिल जाएगा और आगे की मुहिम भी वहीं से शुरू होगी।''
संजीव खुद शाह, आयोजक

‎"पिंड दान" एक ब्राम्हणी पाखंड...

‎"पिंड दान" एक ब्राम्हणी पाखंड...
इन दिनों हिन्दू धर्म के अनुसार श्राद्ध या पितृपक्ष का महिना चल रहा है, इस महीने में हिन्दू कोई भी शुभ काम नहीं करते हैं शादी -व्याह करना , कपडे -गहने खरीदना आदि अशुभ माना जाता है. लोग अपने मरे हुए पूर्वजो (पितरो ) का आवाहन करते हैं , पिंडदान, तिलांजलि, दान और सिर्फ ब्राह्मणों को भोजन करवाना आदि कर्मकांड किये जाते हैं. पर क्या सच में श्राद्ध मरे हुए पितरो का ही किया जाता है? कहीं ऐसा तो नहीं की ब्राम्हण (जिसे सबसे ज्यादा फायदा होता है जैसे - भोजन , दान आदि ) ने श्राद्ध में मृत पितरो को पूजने का चलन अपने लाभ के लिए चलाया हो ?क्यों की मृत लोग तो भोजन और दान लेने तो आएंगे नहीं ....चलिए श्राद्ध का सच जानते हैं. श्राद्ध का अर्थ है सत्य का धारण करना अथवा जिसको श्रद्धा से धारण किया जाए ..श्रद्धापूर्वक मन में प्रतिष्ठा रखकर, विद्वान, अतिथि, माता-पिता, गुरु आदि की सेवा करने का नाम श्राद्ध है. श्राद्ध जीवित माता-पिता, आचार्य ,गुरु आदि पुरूषों का ही हो सकता है. मृतकों का नहीं. मृतकों का श्राद्ध तो पौराणिकों की लीला है..वैदिक युग में तो मृतक श्राद्ध का नाम भी नहीं था. मृतक के लिए बर्तन देने चाहिएँ और वे वहाँ पहुँच जाएँगे, मृतक का श्राद्ध होना चाहिए तथा इस प्रकार होना चाहिए और वहाँ पहुँच जाएगा ऐसा किसी भी वेदमंत्र में विधान नहीं है. पितर शब्द "पा रक्षेण" धातु से बनता है, अतः पितर का अर्थ पालक, पोषक, रक्षक तथा पिता होता है..जीवित माता-पिता ही रक्षण और पालन-पोषण कर सकते है.मरा हुआ दूसरों की रक्षा तो क्या करेगा उससे अपनी रक्षा भी नहीं हो सकती, अतः मृतकों को पितर मानना मिथ्या तथा भ्रममूलक और ढोंग, पाखंड है.

अब विचारणीय बात है यह है कि पितरों को भोजन किस प्रकार मिलेगा, भोजन वहाँ पहुँचता है या पितर लोग यहाँ करने आते है..यदि कहो कि वहीँ पहुँचता है तो प्रत्यक्ष के विरुद्ध है. क्योंकि तृप्ति सिर्फ ब्राह्मण की होती है.यदि भोजन पितरों को पहुँच जाता तब तो वह सैकड़ो घरों में भोजन कर सकता था. मान लो भोजन वहाँ जाता है तब प्रश्न यह है कि वही सामान पहुँचता है जो पंडित ब्राम्हणों को खिलाया जाता है या पितर जिस योनि में हो उसके अनुरूप मिलता है. यदि वही सामान मिलता हो और पितर चींटी हो तो दबकर मर जायेगी और यदि पितर हाथी हो तो उसको क्या असर होगा? यदि योनि के अनुसार मिलता है तब यदि पितर मर कर सूअर बन गया हो तो क्या उसको विष्ठा के रूप में भोजन मिलेगा? यह कितना अन्याय और अत्याचार है कि ब्राह्मणों को खीर और पूरी खिलानी पड़ती है और उसके बदले मिलता है मल. इस सिद्धांत के अनुसार श्राद्ध करने वालो को चाहिए कि ब्राह्मणों को कभी घास, कभी मांस, कभी कंकर-पत्थर आदि खिलाये क्योंकि चकोर का वही भोजन है. योनियाँ अनेक है और प्रत्येक का भोजन भिन्न-भिन्न होता है, अतः बदल-बदलकर खाना खिलाना चाहिए, क्योंकि पता नहीं पितर किस योनि में है.

कहते है श्राद्ध करने वाले का पिता पेट में बैठ कर, दादा बाँई कोख में बैठकर, परदादा दाँई कोख में बैठ कर और खाने वाला पीठ में बैठ कर भोजन करता है.
पौराणिकों, ब्राम्हणों... ! यह भोजन करने का क्या तरीका है? पहले पितर खाते है या ब्राह्मण? झूठा कौन खाता है? क्या पितर ब्राह्मण के मल और खून का भोजन करते है? एक बात और पितर शरीर सहित आते है या बिना शरीर के? यदि शरीर के साथ आते है तो पेट में उतनी जगह नहीं कि सब उसमे बैठ जाएँ और साथ ही आते किसी ने देखा भी नहीं अतः शरीर को छोड़ कर ही आते होंगे. पितरों के आने-जाने में ,भोजन परोसने में तथा खाने आदि में समय तो लगता ही है, अतः पितर वहाँ जो शरीर छोड़ कर आये है उसे भस्म कर दिया जाएगा,इस प्रकार सृष्टि बहुत जल्दी नष्ट हो जायेगी. मनुष्यों की आयु दो-तीन मास से अधिक नहीं होगी, जब क्वार का महिना आएगा तभी मृत्यु हो जायेगी, अतः श्राद्ध कदापि नहीं करना चाहिए.

इस प्रकार यह स्पष्ट सिद्ध है कि श्राद्ध जीवित माता -पिता का ही हो सकता है.. दयानंद सरस्वती का भी यही अटल सिद्धांत है..मृतक श्राद्ध अवैदिक और अशास्त्रीय है..यह तर्क से सिद्ध नहीं होता..यह स्वार्थी, टकापंथी और पौराणिकोंका ब्राम्हणों का मायाजाल है......................

गांधी और दलित प्रश्न

(भारतीय भाषा परिषद में दिया गया व्याख्यान का अंश)
गांधी और दलित प्रश्न
            संजीव खुदशाह
यह सर्वविदीत है कि महात्मा गांधी वर्ण व्यवस्था के पोषक थे। इसके पीछे वे तर्क देते थे कि यह व्यवस्था विश्व के अधिकांश उन्नत समाजो में देखने मिलती है। वे जाति भेद को वर्ण भेद से अलग मानते थे। वे मानते है कि ''वर्ण व्यवस्था में उंच नीच की भेद वृत्ति नही है।``[1]  वे मनु की तरह वर्गो को उच्च और निम्न बड़ा या छोटा नही मानते है।
गांधीजी के हरिजन उत्थान मुद्दे पर निम्न चार बिन्दुओं को उदघृत किया जाता है जो इस प्रकार है-
१.  पुना पैक्ट जिसमें उन्होने यरवदा जेल में अनशन किया था।
२. अपनी पत्रिका का नाम हरिजन (गांधीजी का अंग्रेजी साप्ताहिक विचार पत्र) रखना।
३. साबरमती आश्रम में अछुत जातियों को शामिल करना।
४. दिल्ली की एक भंगी बस्ती में कुछ दिन प्रवास करना।
यहां पर हमें गांधीजी के व्दारा समय समय पर किये गये इन कार्यो की एतिहासिकसामाजिक एवं राजनीतिक पहलूओं पर चर्चा करेगें साथ-साथ अपना ध्यान इस ओर भी आकृष्ट करेगे की इस मुद्दे पर उनके विचार क्या थे तथा व्यवहारिक धरातल पर उनके विचार क्या प्रभाव छोड़ते है।
वैसे गांधी के परिप्रेक्ष्य में दलित (यहां हरिजन कहना उचित होगा) के विषय में चर्चा करना एक गैर जरूरी पहलू जान पड़ता है। क्योकि दलितों का एक बड़ा  समूह गांधी के हरिजन उत्थान पर किये गये कार्यो को संदेह कि नगाह से देखता है। इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि जाति-भेद वर्ण-भेद तथा अस्पृश्यता भेद के उनमूलन सम्बधी ज्यादातर उनके विचार केवल उपदेशात्मक थे व्यवहारिक नही थे।
एक ओर वे वर्ण व्यवस्था के बारे में कहते है- ''वर्ण व्यवस्था का सिध्दान्त ही जीवन निर्वाह तथा लोक मर्यादा की रक्षा के लिए बनाया गया है। यदि कोई ऐसे काम के योग्य है जो उसे उसके जन्म से नही मिला तो व्यक्ति उस काम को कार सकता है। बर्शते कि वह उस कार्य से जीविका निर्वाह न करेउसे वह निष्काम भाव सेसेवा भाव से करे लेकिन जीविका निर्वाह के लिए अपना वर्णागत जन्म से प्राप्त कर्म ही करे।`` [2]
यानि जिसका व्यवसाय शिक्षा देना है वो मैला उठाने का काम मनोरंजन के लिए करें (व्यवसाय के रूप में नही)। इसी प्रकार गाय चराने का पुश्तैनी कार्य करने वाले चाहे तो पूजा कराने का काम कर सकते हैंलेकिन पूजा से लाभ नही प्राप्त कर सकते । जाहिर है उच्च व्यवसाय वाला व्यक्ति निम्न व्यवसाय को पेशा के रूप में कभी भी अपनाना नही चाहेगा। किन्तु निम्न व्यवसाय वाला व्यक्ति उच्च व्यवसाय को अपनाने की चेष्टा करेगा। अत: यहां गांधी जी के उक्त कथन से आशय निकलता है कि यह बंदिश केवल निम्न जातियों के लिए तय की गई ताकी वे उच्च पेशा अपना न सके और अराम तलब तथा उच्च आय वाले पेशे पर उच्च जातियों का ही एकाधिकार रहे। यहां स्पष्ट है गांधी जातिगत पेशा के आरक्षण के पक्षधर थे।
कहीं-कहीं पर गांधीजी के विचार साफ-साफ बुजुर्वावर्ग को सुरक्षित करने हेतु रखे गये मालूम होते है-गांधीजी के समाज में विश्वविद्यालय का प्रोफेसरगांव का मुन्शीबड़ा सेनापतिछोटा सिपाहीमजदूर और भंगी सब एक से खानदानी माने जायेगे। सबकी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति समान होगी इससे प्रतिष्ठा या आय वृध्दि के लिए धन्ध छोड़कर दूसरा धन्धा करने का प्रलोभन नही रहेगा।[3]
यानि प्रोफेसर और भंगी दोनों खानदानी माने जायेगें। क्यो माने जायेगे कैसे माने जायेगे ये स्पष्ट नही है। लेकिन धन्धा बदलने की पावंदी गांधी स्पष्ट लगाते है। जो आज के दौर में प्रासंगिक बिल्कुल भी नही है। पहले भी नही था। गांधी के करीबी एवं फाईनेन्सर टाटा लुहार तो नही थे लेकिन लुहार का काम (व्यवसाय) करते थे। ऐसे ही कई उनके करीबी थे जो गैरजातिगत पेशा अपनाए हुए थे। गांधी अपनी आत्मकथा में खुद को एक पंन्सेरी बताते है लेकिन सियासत करते थे।
यहां पाठको का ध्यान आकृष्ठ कराना चाहूगां कि गांधीजी ये मानते थे कि गवांर का बेटा गवांर और कुलीन का बेटा जन्म से ही कुलीन पैदा होता है । वे कहते है कि जैसे ''मनुष्य अपने पूर्वजो की आकृति पैदा होता है वैसे ही वह खास गुण लेकर ही पैदा होता है।`` [4]
गांधीजी अछूतपन या अस्पृश्यता का तो विरोध करते है। लेकिन एक मेहतर को अपना व्यवसाय बदलने की अनुमति भी नही देते है। वे कहते है कि -अपनी संतानों के संदर्भ में प्रत्येक व्यक्ति मेहतर है तथा आधुनिक औषधि विज्ञान का प्रत्येक व्यक्ति एक चमार किन्तु हम उनके कार्य-कलापों को पवित्र कर्म के रूप में देखते है।[5]  गांधी जी पेशेगत आनुवंशिक व्यवस्था का समर्थन करते है।
वे एक स्थान पर लिखते है कि ब्राम्हण वंश का पुत्र ब्राम्हण ही होगाकिन्तु बड़े होने पर उससे ब्रामहण जैसे गुण नही है तो उसे ब्राम्हण नही कहा जा सकेगा। वह ब्राम्हणत्व से च्युत हो जायेगादूसरी ओर ब्राम्हण के रूप में उत्पन्न न होने वाला भी ब्राम्हण माना जायेगा यद्यपि वह स्वयं अपने लिए उस उपाधि का दावा नही करेगा। [6] यानि कोई भी गैर ब्राम्हण प्रकाण्ड विद्वान होने पर भी पण्डितजी की उपाधि का दावा न करे।
गांधीजी के इन आदर्शो के विपक्ष में डा. अम्बेडकर आपत्ति दर्ज कराते है कि जाति-पांति ने हिन्दू धर्म को नष्ट कर दिया है। चार वर्णो के आधार पर समाज को मान्यता देना असंभव है क्योकि वर्ण व्यवस्था छेदो से भरे बर्तन के समान है। अपने  गुणो के आधार पर कायम रखने मे यह असमर्थ है। और जाति प्रथा के रूप में विकृत हो जाने की  इसकी आंतरिक प्रवृत्ति है।
ज्यादातर यह माना जाता है कि १९३२ के बाद ही गांधीजी के अंदर हरिजन प्रेम उमड़ा। इसके पहले वे निहायत ही परंपरा पोशी एवं संस्कृतिवादी थे। भारत में दलितों के काले इतिहास के रूप में दर्ज यह घटना पूना पैक्ट के नाम से प्रसिध्द है। ज्यादातर साथी पूना पैक्ट के बारे में अवगत है। दरअसल स्वतंत्रता पूर्व डा.अम्बेडकर की सलाह पर अंग्रेज प्रधान मंत्री रैम्जले मैक्डोनल्ड ने १७ अगस्त १९३२ में '`कम्युनल अवार्ड`` के अंतर्गत दलितों को दोहरे वोट का अधिकार दिया था। जिसके व्दारा दलितों को यह अधिकार प्राप्त होना था कि आरक्षित स्थानों पर केवल वे ही अपनी पसंद के व्यक्ति को वोट देकर चुन सकते थे तथा समान्य सीटों पर भी वे अन्य जातियों के प्रत्याशियों को वोट देकर अपनी ताकत दिखा सकते थे। गांधीजी इस प्रस्ताव के विरूध्द थे उन्होने यह तर्क दिया कि इससे हरिजन हिन्दुओं से अलग हो जायेगे। उन्होने लगभग ३० दिनों का आमरण अनशन किया। घोर दबाव में दलितों के मसिहा डा.अम्बेडकर को झुकना पड़ा और दलित अपने अधिकार से वंचित हो गये। इसपर जो समझौता हुआ वही आगे चलकर आरक्षण व अन्य सुविधाओं के रूप में साकार हुआ। इसे पूरा दलित समाज काले इतिहास के रूप में आज भी याद करता है।
पूना पैक्ट के संदर्भ में यरवदा जेल में हुए इस अनशन में गांधीजी जीत तो गये लेकिन उन्होने दलितों की समस्या को काफी करीब से देखा एवं महसूस किया। शायद उनके अंदर जलती हुई पश्चाताप का नतीजा ही रहा होगा कि उन्होने अपनी हरिजन सेवक नाम की हिन्दी साप्ताहिक विचार पत्रिका प्रारंभ १९३२ की तथा काफी सारे लेख अस्पृश्यता पर केन्द्रित करते हुए लिखां उन्होने अपने आश्रम में पैखाने सफाई हेतु लगे भंगी को हटा कर पारी-पारी सभी को पैखाने सफाई कराने के निर्देश दिये। जिस पर उनका उनकी पत्नी से तकरार भी हुई।
ऐसा कहा जाता है कि महात्मा गांधी भंगी जाति से बहुत प्रेम करते थे और उन्होने ''हरिजन`` शब्द केवल भंगियों को ध्यान में रखते हुए ही  इस्तेमाल करना शुरू किया था। दूसरा वाक्या अकसर सुनाया और बार-बार दोहराया जाता है कि गांधी जी ने कहा था कि-''यदि मेरा जन्म हो तो मै भंगी के घर पैदा होना चाहूंगा।`` अक्सर हरिजन नेता इन वाक्यों को गांधीजी के भंगियों के प्रति पे्रम को साबित करने के लिए सुनाते है।
एक दलील और भी दी जाती है कि गांधी जी भंगियों से प्रेम तथा उनकी हालत सुधारने के लिए ही दिल्ली की भंगी बस्ती में कुछ दिन रहे। पर वास्तव में जो सुविधाएं उन्हे बिरला भवन या साबरमती आश्रम में उपलब्ध थी वही यहां उपलब्ध करायी गयी थी। गांधीजी न किसी के हाथ का छुआ पानी पीते थे और न उसके घर मे पका खाना खाते थे। अगर कोई व्यक्ति फल आदि उन्हे भेट करने के लिए लाता था तो वे कहते थे कि मेरी बकरी को खिला दो इसका दूध मै पी लूगां। [7]
यानि गांधीजी खुद दलितों से एक आवश्यक दूरी बना कर रहे। पत्रिका हरिजन १२ जनवरी सन १९३४ में वे लिखते है-''एक भंगी जो अपने कार्य इच्छा तथा पूर्ण वफादारी के साथ करता है वह भगवान का प्यारा होता है।`` यानि गांधीजी एक भंगी को भंगी बनाये रखने की वकालत करते नजर आते है।
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रसिध्द अधिकारी कर्नल सलीमन ने अपनी पुस्तक "RAMBLINGS IN OUDH" सफाई कर्मचारियों की १८३४ की हड़तालों का जिक्र किया है। इस पुस्तक से जाहिर है कि सफाई कर्मचारियों की हड़ताल से वे परेशान थे। परन्तु गांधीजी जो सिविल नाफरमानीहड़तालो और भूख हड़ताल का अपने राजनीतिक कार्य तथा अछूतों के अधिकारों के विरूध्द इस्तेमाल करते रहे थेभंगियों की हड़ताल के बड़े विरोधी थे। [8]
१९४५ में बंबई लखनउ आदि कई बड़े शहरों में एक बहुत बड़ी हड़ताल सफाई कामगारों ने की। यदि गांधीजी चाहते तो इन कामगारो का समर्थन कर हड़ताल जल्द समाप्त करवाकर इस अमानवीय कार्य में भंगियों को कुछ सुविधा दिलवा सकते थे किन्तु उन्होने उल्टे अंग्रेज सरकार का समर्थन करते हुए हड़ताल की निन्दा इस संबंध में एक लेख में वे लिखते है।
''सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के खिलाफ मेरी राय वही है जो १८९७ में थी जब मै डरबर (द.अफ्रीका) में था। वहां एक आम हड़ताल की घोषणा की गयी थी। और सवाल उठा कि क्या सफाई कर्मचारियों को इसमें शामिल होना चाहिएमैने अपना वोट इस प्रस्ताव के विरोध में दिया।`` [9]
इसी लेख में वे बंबई में हुए हड़ताल के बारे में लिखते है-
''विवादों के समाधान के लिए हमेशा एक मध्यस्थ को स्वीकार कर लेना चाहिए। इसे अस्वीकार करना कमजोरी की निशानी है। एक भंगी को एक दिन के लिए भी अपना काम नही छोड़ना चाहिए। न्याय प्राप्त करने के और भी कई तरीके उपलब्ध है।`` यानी भंगियों को न्याय प्राप्त करने के लिए हड़ताल करना महात्मागांधी की दृष्टी में अवैध है।
गांधीजी मानते है कि भारत में रहने वाला व्यक्ति हिन्दू या मुसलमानब्राम्हण या शूद्र नही होगाबल्कि उसकी महचान केवल भारतीय के रूप में होगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि वर्ण व्यवस्था की जड़ पर कुठाराघात किये बिना अस्पृश्यता को दूर करने का प्रयत्न रोग के केवल बाहरी लक्षणों की चिकित्सा करने के समान है। छुआछूत या अस्पृश्यता और जातिभेद को मिटाने के लिए शास्त्रों की सहायता ढूंढना जरूर कहा जाएगा कि जब जक हिन्दू समाज में वर्ण विभाजन विद्यमान रहेगी तब तक अस्पृश्यता के निराकरा की आशा नही की जा सकती। अत: वर्ण व्यवस्था में नई पीढ़ी की आस्था एवं श्रध्दा समाप्त करना हिन्दू समाज की मौलिक आवश्यकता है।
इस व्यवस्था के औचित्य के लिए शास्त्रों का प्रमाण प्रस्तुत करना उचित नही। अम्बेडकर ने कहा-शास्त्रों के आदेशो के कारण ही हिन्दू समाज में वर्ण विभाजन बना हुआ है जिसने हिन्दुओं में उंच-नीच की भावना उत्पन्न की हैजो अस्पृश्यता का मूल कारण है। स्पष्ट है आधुनिक युग में वर्ण विभाजन के आधार पर हिन्दू समाज का संगठन उचित प्रतीत नही होता।
डा.अंबेडकर इस बारे में आगे कहते है- ''हिन्दू समाज को ऐसे धार्मिक आधार पर पुन: संगठित करना चाहिए जो स्वतंत्रतासमता और बन्धुता के सिध्दान्त को स्वीकार करता हो। इस उद्देश्य की प्राप्ति को लिए जाति भेद और वर्ण की अलंध्यता तभी नष्ट की जा सकती हैजब शास्त्रों को भगवद मानना छोड़ दिया जाय।``
आखिर में यही कहा जा सकता है कि दलित संदर्भ में गांधी के विचार प्रासंगिता की कसौटी पर कई प्रश्न चिन्ह खड़े करते है। बहुत अच्छा होता यदि महात्मा गांधी अन्य मामले की तरह दलित समस्याओं को भी प्राकृतिक न्याय की कसौटी में कस कर देखते। तथा सभी को उच्च कोटि के व्यवसाय अपनाने की आज्ञा देते। समाज में उच्च कोटी तथा निम्न कोटी के व्यवसाय दोनो की जरूरत समान रूप से है। फिर इनके पुश्तैनी स्वरूप को बदलने की आजादी गांधी क्यों नही देतेंक्यो उच्च जातियों के पेशे आरक्षित करने का पक्ष  लेते हैआखिर श्रेष्ठता का सीधा संबंध संलग्न व्यवसाय से ही हैं । इसकी स्वतंत्रता के बिना समाज में समानता की कल्पना करना हास्यास्पद प्रतीत होता है।

[1] महात्मा गांधी यंग इन्डीया 29/12/1920
[2] पृष्ठ क्रमांक 122, गांधी-सामाजिक राजनेतिक परिर्वतन लेखक डा.हरिष कुमार प्रकाषक-अर्जुन पब्ल्षििंग हाउस नई दिल्ली-2
[3] पृष्ठ क्रमांक 123, गांधी-सामाजिक राजनेतिक परिर्वतन लेखक डा.हरिष कुमार प्रकाषक-अर्जुन पब्ल्षििंग हाउस नई दिल्ली-2
[4] पृष्ठ क्रमांक 126, गांधी-सामाजिक राजनेतिक परिर्वतन लेखक डा.हरिष कुमार प्रकाषक-अर्जुन पब्ल्षििंग हाउस नई दिल्ली-2
[5] पृष्ठ क्रमांक 102, महात्मा- तेन्दुलकर जी.डी. भाग-पब्लिीकेषन डिवीजन भारत सरकार नई दिल्ली
[6] महात्मा गांधी यंग इन्डिया 17 जुलाई 1925
[7] पृष्ठ क्र. 27 बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और भंगी जातियां लेखक भगवान दास प्र. दलित टुडे प्रकाषन लखनउ 226016
[8] पृष्ठ क्र. 31 बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और भंगी जातियां लेखक भगवान दास प्र. दलित टुडे प्रकाषन लखनउ 226016
[9] Removal of Untouchability by M.K.Gandhi Harijan 21-4-46

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हम दलित मुव्हमेंट ऐशोसियेशन की दलित उत्थान पत्रिका का दूसरा अंक निकालने जा रहे है। आप सभी बंधुओं से निवेदन है कि अपनी रचनाएं अनुभव जो कुछ भी आपके मन में हो हमें भेजे, हम अवश्य इस पत्रिका में शामिल करेगें।
आपसे निवेदन है कि हमें "समाज के मूल रीति रिवाज विचार जो ब्राम्हणी सभ्यता से भिन्न है।" पर केन्द्रीत लेख विचार भेजे यह अंक इसी विषय पर केन्द्रित होगा। (छिटकी बुदकी, सगाई, शादी विवाह, छटी, पूजा एवं उसकी विधी देवी देवता अन्य ऐसी कोई रिवाज जो आज लुप्त हो रही है या अन्य कोइ विषय जो आप उचित समझे।)

पता इस प्रकार है:-

संजीव खुदशाह
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1. दलित उत्थान पत्रिका

Fwd: [D.M.A.-:1855] आमिर खान सचमुच बधाई के पात्र हैं

             आमिर खान के सत्य मेव जयते के ८ जुलाई  २०१२ के एपिसोड पर  बुद्धिजीवियों की जो प्रतिक्रियाय्रें फेसबुक पर आयीं हैं, उनमें अधिकाँश निराश करने वाली हैं. ऐसा लगता है कि जिस तरह  वाल्मीकि समाज के लोगों ने उसे काफी पसंद किया है, उस तरह से  अन्य लोगों ने उसका स्वागत नहीं किया है. कुछ ने इसे गांधीवादी माडल से परोसा गया प्रोग्राम बताया है, तो कुछ की शिकायत यह है कि इसमें डा. आंबेडकर और उनके जाति उन्मूलन आन्दोलन का  जिक्र नहीं किया गया है. कुछ का यह कहना है कि आमिर खान नाम का आदमी सरोकार का धंधा कर रहा है, इसलिए वे इस प्रहसन को महत्व नहीं देते.  किसी ने यह भी कहा कि आमिर खान मैला उठाने के इशु को भी भुना रहा है. एक टिप्पणी यह भी है कि इस समस्या को समझने में आमिर खान ने बहुत ज्यादा समय लगा लिया. और भी बहुत सारी टिप्पणियां हैं, पर मुख्य रूप से दलित बुद्धिजीवी इसलिए ज्यादा नाराज़ हैं कि आमिर खान ने डा. आंबेडकर का उल्लेख क्यों नहीं किया? 
            मेरी समझ में नहीं आता कि ये कैसी सामजिक चिताओं के बुद्धिजीवी हैं कि दलित गरिमा के इतने जरुरी और महत्वपूर्ण सवाल को उठाने वाले प्रोग्राम का भी उन्होंने स्वागत नहीं किया. आमिर खान ने इस एपिसोड  में जिस शिद्दत से मानवीय गरिमा को केंद्र में रखा है, वह निश्चित रूप से स्वागत योग्य है. इसमें वाल्मीकि समुदाय की पीड़ा को ही नहीं, बल्कि चमारों की पीड़ा को भी दिखाया  गया है. केवल  हिन्दू समाज ही नहीं, बल्कि उसमें   मुस्लिम, ईसाई और सिख समाजों में  मौजूद जातिभेद का गन्दा चेहरा भी  दिखाया गया है.  मगर खेद है कि इन समाजों के लोगों की इस पर कोई टिप्पणी पढने को नहीं मिली. यह गाँधी और आंबेडकर के नज़रिए से जातिवाद पर बहस करने वाला कोई दार्शनिक  कार्यक्रम नहीं था, वरन यह एपिसोड देश के भद्र जनों की आँखों का जाला साफ़  करने के लिए था, ताकि वे  इक्कीसवीं सदी में भी छुआछूत और जातिभेद की भयानक मौजूदगी को देख लें.  माना  कि आमिर खान ने  पैसों के लिए सत्य मेव जयते बनाया है, इसमें सरोकारों के व्यवसायीकरण की बात भी गलत नहीं है, पर क्या इस आधार पर किसी रचनात्मक काम की आलोचना की जानी चाहिए?  जो व्यावसायिकता गंभीर सामजिक मुद्दों पर राष्ट्र का ध्यान आकर्षित करती हो, जिसने  सरकारों तक को झकझोर दिया हो, उस व्यावसायिकता को कोसना सही समझ  नहीं है. इसी  बिना पर यदि कोई इसे आमिर खान का नाटक या प्रहसन समझता है, तो मुझे पक्का यकीन है कि सरोकारों से उसका रिश्ता हीनहीं है. संभवता ऐसे ही लोग आमिर खान का कार्यक्रम देख कर सवर्ण अस्मिता का सवाल उठा रहे हैं. क्या व्यवसायिकता के सन्दर्भ में उन दलित एन जी ओ  पर बात न करें, जो करोड़ों रूपये खर्च करके भी एक भी दलित समस्या पर देश का ध्यान आकर्षित नहीं कर सके, सिवाय सफाई कर्मचारी आन्दोलन को छोड़ कर; जिसके लीडर बेजवाडा बिलसन हैं. केवल इसी व्यक्ति को देश के चारों कोनों में जन आन्दोलन करने और सुप्रीम कोर्ट में मामला ले जाने का श्रेय जाता है. 
           मेरे लिए यह बड़ी ख़ुशी की बात है कि आमिर के प्रोग्राम को वाल्मीकि समाज के लोगों ने बहुत पसंद किया है. यह इसलिए भी कि इस  प्रोग्राम ने मैला साफ़ करने वाले लोगों की विचलित कर देने वाली जिन्दगी पर ज्यादा फोकस किया है. मुझे पूरा यकीन है कि इस ग्राम को देख कर बहुत से वाल्मीकि युवक-युवतियों में पढने के लिए संघर्ष की ललक पैदा हुई होगी. पर, उनमें से किसी ने भी गाँधी और बेडकर का सवाल नहीं उठाया. और न ही उन्होंने आमिर खान की नीयत पर सवाल उठाया है. बस आंबेडकर के नाम से वास्ता रखने वाले लोग  ही ये सवाल उठाया करते हैं. आंबेडकर मौजूद हैं, तो वे खुश, गाँधी गायब हैं, तो और भी खुश. ऐसे लोगों का क्या किया जाये, जो सिर्फ आंबेडकर का फोटो पोस्ट करने और जय भीम लिखने के सिवा कुछ नहीं करते. जब आमिर खान के प्रोग्राम में आंबेडकर का जिक्र न किये जाने की बात चली है, तो मुझे लगता है कि यह जिक्र डा. कौशल पवार अच्छे ढंग से कर सकतीं थीं. इस प्रोग्राम से यदि कोई हीरो बना है, तो डा. कौशल पवार ही बनीं हैं. जिस बेबाकी से उन्होंने अपनी पीड़ा और संघर्ष गाथा को प्रोग्राम में रखा, उस पूरी बातचीत में यदि वे डा. आंबेडकर को याद नहीं कर सकीं, तो जाहिर है कि आंबेडकर का उनकी जिंदगी में कोई रोल नहीं है. या वे भी वाल्मीकि समाज के उन लाखों लोगों में एक  हैं, जो आज भी आंबेडकर से नहीं जुड़े हैं. डा. कौशल लेखिका भी हैं, पर उन्होंने अपनी आत्मकथा नहीं लिखी. यदि 
लिखी होती, तो वे  हिंदी में पहली आत्मकथा लेखिका होतीं. मेरा सुझाव है कि वे आत्मकथा जरूर लिखें. 
        आमिर खान सचमुच  बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने दलित गरिमा के सवाल को  पूरे राष्ट्र की गरिमा का सवाल बनाने का सबसे जरूरी काम किया है. 
                
Kanwal Bharti
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अब आसानी से बनेगा जाति प्रमाण पत्र


(गौर तलब है कि सिर्फ छत्तीसगढ में दलितों एवं आदिवासियों को जाति प्रमाण पत्र बनाने के लिए तरह-तरह से उल्झाया जा रहा है। जिसके विरूध में हाई कोर्ट की फटकार के बावजूद शासन के कानों जूं तक नही रेगती।)

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की एकलपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में जाति प्रमाणपत्र के लिए १९५० के भू-अभिलेखों की अनिवार्यता नहीं होने की बात कही है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इसके बिना नियमानुसार जाति प्रमाणपत्र बनाकर देने के निर्देश दिए हैं।
कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ निवासी रामसजीवन ने मनेंद्रगढ़ एसडीओ के समक्ष स्थाई जाति प्रमाणपत्र बनवाने आवेदन दिया था। १९५० के पूर्व के भू-अभिलेख रिकार्ड प्रस्तुत नहीं करने पर उसके आवेदन को निरस्त कर दिया गया। इस पर उसने अधिवक्ता जितेंद्र पाली एवं मतीन सिद्दीकी के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका लगाई। इसमें बताया गया कि १९७० में उनके पिता की नियुक्ति एसईसीएल में हुई। उन्हें छत्तीसगढ़ के कोयलांचल एरिया में पदस्थ किया गया। १० दिसंबर १९८१ गंज उसका जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ। छत्तीसगढ़ शासन के सर्कुलर दिनांक २७ जून २००७ को छत्तीसगढ़ के मूल निवासियों को परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार वह व्यक्ति जो केंद्र सरकार की नौकरी में छत्तीसगढ़ में पदस्थ हैं, वह उनकी पत्नी व बच्चे छत्तीसगढ़ के मूल निवासी हैं। छत्तीसगढ़ शासन के कर्मचारी उसकी पत्नी व बच्चे छत्तीसगढ़ के नागरिक हैं। संवैधानिक पद पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त हुआ व्यक्ति उसकी पत्नी व बच्चे छत्तीसगढ़ के नागरिक होंगे। निगम, एजेंसी, कमिशन बोर्ड, बोर्ड के कर्मचारी व उनकी पत्नी व बच्चे छत्तीसगढ़ के नागरिक होंगे, परंतु उनकी जाति प्रेसीडेंटल आर्डर में दर्ज होनी चाहिए। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के न्यायादृष्टांत कुमारी माधुरी विरुद्ध एडिशनल कमिश्नर, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डीबी से पारित आदेश नरेंद्र डहरिया विरुद्ध छत्तीसगढ़ शासन में हुए निर्णय को प्रस्तुत किया गया। याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सतीश अग्निहोत्री ने अंतिम आदेश पारित कर एसडीओ मनेंद्रगढ़ को कहा है कि वे नियमानुसार याचिकाकर्ता को जाति प्रमाणपत्र बनाकर दें, इसके लिए १९५० का भू-अभिलेख रिकार्ड नहीं मांगा जाना चाहिए।
यदि इससे संबंधित कोई आदेश आपके पास मौजूद हो तो क़पया इस ईमेंल पर प्रेषित करने का कष्ट करें।

movementassociation.dalit@gmail.com